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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

by महाकवि बाणभट्ट

DevanagariHindipublished184 pages

Page 179 of 184

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Page 179

द्वितीय उच्छ्वासः

वृष्टिभिः स्नपयन्निव स्नेहगर्भेण दृष्टिपातमात्रेणान्तर्गतां प्रीतिमकथयत्।
अस्ताभिलाषिणि च लम्बमाने सवितरि विसर्जितराजलोकोऽभ्यन्तरं
प्राविशत्।
बाणोऽपि निर्गत्य धौतारकूटकोमलातपत्विषि निर्वाति वासरे, आस्ता-
चलकूटकिरीटे निचुलमञ्जरीभांसि तेजांसि मुञ्चति वियन्मुचि मरी-
चिमालिनि, अतिरोमन्थमन्थरकुरङ्गकुटुम्बकाध्यास्यमानअदिष्ठगोष्ठीन-
पृष्ठास्वरण्यस्थलीषु, शोकाकुलकोककामिनीकूजितकरुणासु तरङ्गिणीतटेषु
वासविटपोपविष्टवाचाटचटकचक्रवालेष्वालवालावर्जितसेकजलकुटेषु नि-
ष्कुटेषु, दिवसविहृतिप्रत्यागतं प्रस्रुतस्तनं स्तनंधये धयति धेनुवर्गमुद्गतक्षीरं
क्षुधिततर्णकव्राते, क्रमेण चास्तधराधराधातुधुनीपूरप्लावित इव लोहिताय-
मानमहसि मज्जति सन्ध्यासिन्धुपानपात्रे पातङ्गे मण्डले, कमण्डलुजल-

बाणोऽपीत्यादौ । बाणोऽप्यस्मिन्सति निवासस्थानमगादिति संबन्धः । 'रीतिः
स्त्रियामारकूटम्' इत्यमरः । निर्वाति शाम्यति । निचुलो वेतसवृक्षः । भुक्तोद्गीर्णा-
हारचर्वणं रोमन्थः । अदिष्ठं मृदुतमम् । गोष्ठीपूर्वं गोष्ठोनम् । 'गोष्ठात्तञ्चभूतपूर्वे' ।
उक्तं च—'गोष्ठं गोस्थानकं तत्तु गोष्ठीनं भूतपूर्वकम्' इति । कोकाश्चक्रवाकाः ।
तरङ्गिणी नदी । आलवालमावापः । कुटा घटाः । निष्कुटाः स्वगृहारामाः । स्तन-

उसे अनुगृहीत नहीं किया। केवल स्नेह से भरे अमृत की वर्षा करने वाले दृष्टिपातमात्र से
उसको जैसे नहलाते हुए उन्होंने अपने अन्तरतम की प्रीति प्रकट की। जब सूर्य अस्ताचल
की ओर लटकने लगे तब राजसमूह विसर्जित कर महल के अन्दर चले गये।
बाण भी वहाँ से निकल कर अपने निवासस्थान स्कन्धावार में लौट आया। ढलते हुए
दिन के आतप का तेज साफ-सुथरे पीतल के समान मन्द पड़ गया। अस्ताचल के मुकुट सूर्य
वेतस की मंजरी जैसे अपने तेजसमूह की छोड़कर आकाश से हट रहे थे। वनभूमियों के
मुलायम स्थानों में झुण्ड के झुण्ड मृग बैठकर धीरे-धीरे पँगुरी करने लगे। नदियों के तटों पर
प्रियाविरह से शोकाकुल होकर चक्रवाक की पत्नियां करुण आवाज में टर्राने लगीं। गृह के
पास वाले उपवनों में चटक नामक छोटे-छोटे पक्षी पेड़ों पर बैठ कर चहचहाने लगे और वृक्ष
के थलों में सींचने के काम में आने वाले घड़े औंधा कर रख दिए। दिन भर चरने के
बाद शाम को टहल कर आई हुई दुधार गायों के स्वयं उत्पन्न क्षीर वाले स्तन को उनके बछड़े
चुभलाने लगे। क्रम से अस्ताचल की गेरू आदि धातुओं के झरनों में डुबकी लगाने से लाल