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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages
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४८० * गीता-संग्रह *

बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया।
एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ १७॥
मैं वस्तुतः बोधस्वरूप हूँ। अपने स्वरूपके अज्ञानसे मैंने उपाधिकी कल्पना कर ली है, नित्य ऐसा विचार करते रहनेपर यह सिद्ध हो जाता है कि मेरी स्थिति निर्विकल्पमें ही है॥ १७॥

अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया ॥ १८॥
कितने आश्चर्य की बात है कि मुझमें सम्पूर्ण विश्वकी प्रतीति होते रहनेपर भी वह वस्तुतः मुझमें नहीं है। न तो कभी मुझे बन्धन हुआ और न तो मोक्ष। आश्रयहीन होनेके कारण भ्रान्ति स्वयं शान्त हो गयी॥ १८॥

सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम्।
शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन्कल्पनाधुना ॥ १९॥
यह निश्चय है कि इस शरीरके साथ यह सम्पूर्ण विश्व कुछ भी नहीं है और आत्मा शुद्ध चिन्मात्र है। फिर अब यह कल्पना किसमें सम्भव है ? अर्थात् किसीमें नहीं ॥ १९॥

शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा।
कल्पनामात्रमेवैतत्किं मे कार्यं चिदात्मनः ॥ २०॥
यह शरीर, स्वर्ग-नरक, बन्ध-मोक्ष और भय—यह सब केवल कल्पनामात्र है। फिर मुझ चिदात्माके लिये क्या कुछ कर्तव्य शेष है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ॥ २०॥

अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम।
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम् ॥ २१॥
आश्चर्य तो यह है कि भीड़-भाड़में भी मुझे द्वैत नहीं दीखता,

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* अष्टावक्रगीता * ४८१


सब सूने जंगलके समान हो गया। अब मैं प्रीति किससे करूँ? ॥ २१ ॥
नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित्।
अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा॥ २२॥
न मैं देह हूँ और न तो यह देह मेरा है। मैं जीव भी नहीं हूँ। मैं तो शुद्ध चेतन हूँ। मेरा बन्ध तो केवल इतना ही था कि मैं जीवित रहना चाहता था॥ २२॥
अहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्वाक् समुत्थितम्।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते समुद्यते॥ २३॥
आश्चर्य है, मुझ अनन्त महासमुद्रमें जब चित्तरूपी वायु चलने लगती है तब झटपट बहुत-से दृश्य पदार्थोंकी तरंगें उठने लगती हैं॥ २३॥
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति।
अभाग्याज्जीववणिजो जगतपोतो विनश्वरः॥ २४॥
मुझ अनन्त महासमुद्रमें जब चित्तरूपी वायु शान्त हो जाती है तब जीवरूपी व्यापारीके दुर्भाग्यसे यह संसाररूपी जहाज ठहरकर नष्ट हो जाता है॥ २४॥
मय्यनन्तमहाम्भोधावाश्चर्यं जीववीचयः।
उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः॥ २५॥
बड़े आश्चर्य कि बात है कि मुझ अनन्त महासमुद्रमें बहुत-सी जीवरूपी तरंगें स्वभावसे ही उठती हैं। वे आपसमें टकराती हैं, लहराती हैं और विलीन हो जाती हैं॥ २५॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शिष्येणोक्तमात्मानुभवोल्लास-
पञ्चविंशतिकं नाम द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥

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४८२ * गीता-संग्रह *


तीसरा प्रकरण

मनुष्यकी अज्ञानता

अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः।
तवात्मज्ञस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः ॥ १ ॥

तुमने अद्वितीय अविनाशी आत्माको तत्त्वतः (अभेद रूपसे) जान लिया है; तुम आत्मज्ञ हो, धीर हो; फिर धन कमानेमें तुम्हारी प्रीति क्यों है?॥ १ ॥

आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।
शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे ॥ २ ॥

जैसे सीपको न जाननेसे उसे चाँदी समझकर चाँदीका लोभ होता है, वैसे ही अपने स्वरूपको न जाननेसे ही विषयोंमें उन्हें सच समझनेके कारण प्रीति होती है॥ २ ॥

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि ॥ ३ ॥

जिस अधिष्ठान चैतन्यमें यह सम्पूर्ण विश्व सागरमें तरंगोंके समान स्फुरित हो रहा है, वह मैं ही हूँ—ऐसा जानकर भी तुम दीन-हीनके समान क्यों दौड़-धूप कर रहे हो?॥ ३ ॥

श्रुत्वापि शुद्धचैतन्यमात्मानमतिसुन्दरम्।
उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति ॥ ४ ॥

मैं अत्यन्त सुन्दर शुद्ध चैतन्य हूँ—ऐसा गुरु एवं शास्त्रसे श्रवण करके भी जो काम-भोगमें अत्यन्त आसक्त है, उसे मलिनताकी प्राप्ति होती है॥ ४ ॥

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते ॥ ५ ॥

यह बड़े आश्चर्य बात है कि सम्पूर्ण दृश्य-पदार्थोंमें अपनेको

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  • अष्टावक्रगीता * ४८३

और अपनेमें समस्त दृश्य-पदार्थोंको जाननेवाले विवेकशील पुरुषके चित्तमें भी ममता बनी रह जाती है॥५॥

आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥६॥

परम अद्वैत-वस्तुमें निष्ठा होनेपर एवं आत्माका दृढ़ निश्चय हो जानेपर भी बड़े आश्चर्यकी बात है कि पूर्वाभ्यासके कारण तुम कामके अधीन होकर विकल हो जाते हो॥६॥

उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत्कालमन्तमनुश्रितः॥७॥

बड़े आश्चर्यकी बात है कि ज्ञानके शत्रु—कामसे ग्रस्त होकर तुम कमजोर हो जाते हो और समय पाकर नष्ट हो जानेवाले भोगकी आकांक्षा करते हो॥७॥

इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षादेव विभीषिका॥८॥

नित्यानित्य-वस्तु-विवेकी, लौकिक-पारलौकिक भोगोंसे विरक्त एवं मुमुक्षु पुरुष भी मोक्षसे (संसारके छूट जानेसे) डरता है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है॥८॥

धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥९॥

धीर पुरुष भोग अथवा पीड़ा पाकर भी सर्वदा केवल आत्म-दृष्टि रखता है। वह न तुष्ट होता है, न रुष्ट होता है॥९॥

चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येन्महाशयः॥१०॥

महापुरुष तो कर्ममें लगे हुए अपने शरीरको दूसरेके शरीरके समान

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४८४ * गीता-संग्रह *


समझता है। स्तुति या निन्दासे उसे क्षोभ क्यों होगा ? ॥ १० ॥

मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः ।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः ॥ ११ ॥

स्थितप्रज्ञ एवं आश्चर्यरहित पुरुष इस विश्वको जादूका खेल समझता है। मौतको सामने देखकर भी भला वह क्यों डरेगा ? ॥ ११ ॥

निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १२ ॥

जिस महात्मा पुरुषका चित्त मोक्षपदके लिये भी विचलित नहीं होता; उस आत्मज्ञान-तृप्तकी समता भला किसके साथ की जा सकती है ? ॥ १२ ॥

स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन ।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः ॥ १३ ॥

जो सहज ही यह जानता है कि यह सम्पूर्ण दृश्य वस्तुतः कुछ नहीं है, वह स्थितप्रज्ञ भला यह क्यों देखने लगा कि यह ग्राह्य है और यह त्याज्य है ? ॥ १३ ॥

अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये ॥ १४ ॥

जिसने अपने अन्तःकरणसे वासनाओंका रंग धो दिया है, सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंको भगा दिया है और आशा-तृष्णाको नष्ट कर दिया है, उसके सामने प्रारब्धवश जो भोग आते हैं, उससे उसे न सुख होता है, न दुःख ॥ १४ ॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामाक्षेपद्वारोपदेशकं नाम तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ३ ॥

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  • अष्टावक्रगीता * ४८५

चौथा प्रकरण

आत्मज्ञानीकी स्थिति

हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता॥ १॥
यह सम्भव है कि स्थितप्रज्ञ आत्मज्ञानी पुरुष भी लीलापूर्वक भोगके खेल खेले, परंतु संसारका भार ढोनेवाले मूढ़ोंके साथ उसकी कोई तुलना नहीं है॥ १॥

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥ २॥
इन्द्रादि सारे देवता जिस पदकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त दीन रहते हैं, बड़े आश्चर्यकी बात है कि उसी पदपर स्थित होकर भी तत्त्वज्ञानी योगीको हर्षरूप विकार नहीं प्राप्त होता॥ २॥

तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥ ३॥
यद्यपि धुएँसे आकाश धूमिल-सा मालूम पड़ता है; परंतु वास्तवमें धुआँ उसे स्पर्श नहीं करता, ऐसे ही तत्त्वज्ञ पुरुषका पुण्य-पापसे (बाहरी सम्बन्ध दीखनेपर भी) भीतर किसी प्रकारका संस्पर्श नहीं होता॥ ३॥

आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।
यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥ ४॥
जिस महापुरुषने इस तत्त्वका साक्षात्कार कर लिया है कि यह सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप ही है, फिर यदि वह (प्रारब्धसे) स्वेच्छानुसार बर्ताव करे तो उसे भला कौन रोक सकता है?॥ ४॥

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने॥ ५॥
ब्रह्मासे तिनकेतक चार प्रकारके प्राणियोंमें एकमात्र तत्त्वज्ञ पुरुषकी

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४८६ * गीता-संग्रह *


यह शक्ति है कि वह इच्छा और अनिच्छा—दोनोंका त्याग कर सके। (विषयी जीव तो इच्छाका त्याग नहीं कर सकते और निर्विकल्प समाधिकी निष्ठामें तत्पर योगी अनिच्छाका परित्याग नहीं कर सकते—निष्काम-स्वरूपमें स्थित केवल तत्त्वज्ञ ही भावाभावात्मक दोनों स्थितियोंको प्रतीतिमात्र जानता है, यही इच्छा-अनिच्छाका त्याग है) ॥५॥

आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम्।
यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥६॥

कोई विरला पुरुष ही आत्मा और ब्रह्मकी एकताको जानता है, इसलिये वह सब कुछ कर सकता है, उसे कहीं भी कोई भय नहीं होता ॥६॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शिष्यप्रोक्तानुभवोल्लासषट्कं नाम चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ॥४॥


पाँचवाँ प्रकरण

दृश्यमान जगत्की असत्यता

न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।
सङ्घातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज॥१॥

किसी भी वस्तुके साथ तुम्हारा तादात्म्य नहीं है। तुम स्वयं शुद्ध हो, फिर क्या छोड़ना चाहते हो ? व्यष्टि अथवा समष्टि शरीरको इसी प्रकार विचारके द्वारा छोड़ते हुए तुम मुक्त हो जाओ ॥१॥

उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज॥२॥

जैसे समुद्रसे बुलबुले उठते हैं, वैसे ही तुमसे ये दृश्य-पदार्थ उदय हो रहे हैं। इस प्रकार एकमात्र आत्मसत्ताको ही जानकर तुम मुक्त हो जाओ ॥२॥

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* अष्टावक्रगीता * ४८७


प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥ ३ ॥
यद्यपि जगत् प्रत्यक्ष दीख रहा है तथापि तुम्हारे शुद्ध स्वरूपमें इसका अस्तित्व नहीं है। यह तो (भ्रमवश) रज्जुमें सर्पके समान दीखने लगा है—ऐसा निश्चय करके तुम मुक्त हो जाओ ॥ ३ ॥

समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ४ ॥
तुम पूर्ण हो, तुम यह जानकर कि सुख-दुःख, आशा-निराशा और जीवन-मृत्यु समान ही हैं, मुक्त हो जाओ ॥ ४ ॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामाचार्योक्तं लयचतुष्टयं नाम पञ्चमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ५ ॥


छठा प्रकरण

आत्मा और प्राकृतिक जगत्की समानताका अनुभव

आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत्।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥
मैं आकाशके समान अनन्त हूँ और प्राकृतिक जगत् घटके समान है। यही ज्ञान है, ऐसी अवस्थामें न तो इस जगत्का त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है। (अनन्त देशकी दृष्टिसे अल्प देश नहीं होता) ॥ १ ॥

महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ २ ॥
मैं महासमुद्रके समान हूँ और यह प्रपंच तरंगके समान। यही ज्ञान है। ऐसी अवस्थामें न तो इस प्रपंचका त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है। (कारणकी दृष्टिसे कार्य पृथक् नहीं होता) ॥ २ ॥

अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद्विश्वकल्पना।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ३ ॥
मैं सीपके समान हूँ और मुझमें रजतके समान विश्वकी कल्पना

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४८८ * गीता-संग्रह *


हुई है। यही ज्ञान है। ऐसी स्थितिमें न जगत्का त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है। (यहाँ जगत्को आत्माका विवर्त्त बतलाया है। भ्रान्तिजन्य कार्य-कारण आदि भाव नहीं होते) ॥ ३ ॥

अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥ ४॥

मैं समस्त भूतोंमें हूँ और सब भूत मुझमें हैं (सीपमें रजतके समान)—यही ज्ञान है। ऐसी अवस्थामें इस जगत्का न त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है॥ ४॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शिष्योक्तमुत्तरचतुष्कं नाम षष्ठं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ६ ॥


सातवाँ प्रकरण

ज्ञानीकी जगत्से असम्बद्धता

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ १ ॥

मुझ अनन्त महासमुद्रमें मनकी वायुसे प्रेरित होकर जगत्-रूप नौका इधर-उधर घूमती रहती है, इससे मुझे कोई चिढ़ नहीं है ॥ १ ॥

मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः॥ २॥

मुझ अनन्त महासमुद्रमें यह जगत्की तरंग स्वभावसे ही उठे या न उठे। न तो इससे मेरी वृद्धि होती है और न कोई क्षति ॥ २ ॥

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥

मुझ अनन्त महासमुद्रमें यह विश्व केवल कल्पनामात्र है, मैं अत्यन्त शान्त और नाम-रूपसे रहित हूँ, यही मेरी निष्ठा है ॥ ३ ॥

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* अष्टावक्रगीता * ४८९

नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ४॥

शरीरादिमें मैं आत्मा नहीं हूँ और न तो मुझ अनन्त शुद्धात्मामें शरीरादि ही हैं, अतः मुझमें न तो आसक्ति है, न स्पृहा। मैं परम शान्त हूँ—यही मेरी निष्ठा है॥ ४॥

अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत्।
अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ५॥

कैसा आश्चर्य है कि मैं केवल चित्स्वरूप हूँ और यह जगत् इन्द्रजालके समान है। अब मुझे क्यों और किसमें त्याज्य और ग्रहणकी कल्पना हो?॥ ५॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामनुभवपञ्चकविवरणं नाम सप्तमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ७॥


आठवाँ प्रकरण

चित्तकी आसक्ति-अनासक्ति ही बन्धन-मोक्षका कारण

तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १॥

जब चित्त कुछ चाहता है, किसीके लिये शोक करता है, किसी वस्तुको छोड़ता-पकड़ता है और किसी वस्तुसे रुष्ट एवं तुष्ट होता है, तभी बन्धन है॥ १॥

तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २॥

जब चित्त चाह, शोक, त्याग, ग्रहण, हर्ष और रोषसे रहित होता है, तभी मुक्ति है॥ २॥

तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३॥

जब चित्त किन्हीं दृष्टियोंमें आसक्त है, तब बन्धन है। जब

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४९० * गीता-संग्रह *


चित्त किसी भी दृष्टिमें आसक्त नहीं है, तब मोक्ष है॥ ३॥
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा॥ ४॥
जब अहंभावका बाध है, तब मोक्ष है, जब कहीं भी अहंभाव है, तब बन्धन है—ऐसा जानकर अपेक्षासे न तो किसीको पकड़ो और न छोड़ो॥ ४॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां गुरुप्रोक्तं बन्धनमोक्षव्यवस्था-नामाष्टमं प्रकरणं समाप्तम्॥ ८॥


नौवाँ प्रकरण

वासना ही सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंका कारण

कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती॥ १॥
'यह किया और यह नहीं किया'—ये द्वन्द्व कब, किसके शान्त हुए हैं? (कभी किसीके नहीं) ऐसा जानकर निर्वेदसे त्यागपरायण हो जाओ, कोई व्रत मत लो। (दृश्यकी किसी प्रतीतिके प्रति कुछ करने या न करनेका आग्रह मत करो। ज्ञानका फल अनाग्रह है)॥ १॥

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता॥ २॥
हे तात! कोई बिरला ही धन्य महापुरुष ऐसा होता है, जिसकी लोगोंके रंग-ढंग देखकर जीनेकी, भोगनेकी और जाननेकी इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं। (कर्तव्य, प्राप्तव्य, ज्ञातव्य आदि ज्ञानीको नहीं रहते)॥ २॥

अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम्।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति॥ ३॥
यह सम्पूर्ण जगत् मानसिक, दैविक एवं भौतिक तापसे दूषित तथा अनित्य है। इसमें कुछ सार नहीं है, यह निन्दित एवं त्याज्य

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  • अष्टावक्रगीता * ४९१

है, ऐसा निश्चय करके वह ज्ञानी शान्त हो जाता है॥ ३॥
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्।
तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४॥
भला ऐसा कौन-सा समय है अथवा कौन-सी अवस्था है, जब मनुष्य सर्दी-गर्मी, सुख-दुःखादिके द्वन्द्वोंसे आक्रान्त नहीं रहता ? इसलिये उनकी उपेक्षा करके जब-जो-जैसे मिले, उसीसे अपना काम चला ले। ऐसे पुरुषको ही सिद्धि मिलती है॥ ४॥

नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा।
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ५॥
ऐसा कौन (विचारशील) मनुष्य होगा, जो महर्षि, साधु एवं योगियोंके अनेकों मतमतान्तर देख उनसे उदासीन होकर शान्त न हो जाय ?॥ ५॥

कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ६॥
जो चैतन्यके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके निर्वेद और समताकी युक्तिसे औरोंको भी संसार-सागरसे तार देता है, वह क्या गुरु नहीं है?॥ ६॥

पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान् यथार्थतः।
तत्क्षणाद् बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि ॥ ७॥
तुम पंचभूतोंके विकारोंको (देहेन्द्रियादिको) यथार्थमें पंचभूत-मात्र ही देखो। तब तुम तत्क्षण ही बन्धन-मुक्त होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओगे॥ ७॥

वासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः।
तत्त्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा ॥ ८॥
वासना ही संसार है, इसलिये इन सबका परित्याग कर दो। वासना-त्यागसे ही संसारका त्याग होता है। अब (शरीर, अन्तःकरण और

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४९२ * गीता-संग्रह *


संसारकी) चाहे जैसी स्थिति हो, उससे कोई सम्बन्ध नहीं रहता ॥ ८ ॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां गुरुप्रोक्तं निर्वेदाष्टकं
नाम नवमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ९ ॥


दसवाँ प्रकरण

तृष्णा ही बन्धन है

विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसङ्कुलम्।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥

अपने शत्रु काम-भोग और अनर्थ-संकुल अर्थ तथा इन दोनोंके कारण धर्मको भी छोड़कर सर्वत्र उपेक्षाका भाव रखो ॥ १ ॥

स्वप्नेन्द्रजालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा।
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ २ ॥

मित्र, जमीन, धन, महल, स्त्रियाँ, उत्तराधिकार आदि सम्पत्तियाँ—ये सब स्वप्न और इन्द्रजालके समान तीन या पाँच दिनकी वस्तु हैं, ऐसा देखो, समझो ॥ २ ॥

यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ ३ ॥

जहाँ-जहाँ तृष्णा है, वहीं-वहीं संसार है—ऐसा जानो। प्रौढ़ वैराग्यका आश्रय लेकर तृष्णाको छोड़ दो और सुखी (निश्चिन्त) हो जाओ ॥ ३ ॥

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तिस्तुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥

केवल तृष्णा ही बन्धन है और उसके नाशका ही नाम मोक्ष है। संसारमें अनासक्त होते ही बार-बार कृतकृत्यता और आनन्दकी उपलब्धि होने लगती है ॥ ४ ॥

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  • अष्टावक्रगीता * ४९३

त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते॥ ५॥

तुम एक एवं शुद्ध चेतन हो और यह विश्व जड़ तथा असत् है। अविद्या भी कुछ नहीं है। फिर तुम किस वस्तुको जाननेकी इच्छा करते हो?॥ ५॥

राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥ ६॥

राज्य, पुत्र, स्त्री, शरीर और सुख—इनमें तुम जन्म-जन्म आसक्त रहे हो, परंतु तुम्हारे आसक्त रहनेपर भी ये नष्ट हो गये॥ ६॥

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः॥ ७॥

धन, भोग अथवा पुण्य-कर्म—ये सब अब बहुत हो चुके हैं, बस करो। इस संसारके घोर जंगलमें इन साधनोंसे मनको शान्ति नहीं मिली॥ ७॥

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्॥ ८॥

न जाने कितने जन्मोंतक तुमने शरीर, मन एवं वाणीसे परिश्रम और क्लेशप्रद कर्मोंका अनुष्ठान किया है, अब तो उनसे उपराम हो जाओ॥ ८॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां गुरुप्रोक्तमुपशमाष्टकं नाम दशमं प्रकरणं समाप्तम्॥ १०॥


ग्यारहवाँ प्रकरण

शान्तिप्राप्तिके उपाय

भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी।
निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥ १॥

भावसे अभाव और अभावसे भावरूप विकार स्वभावसे ही होते रहते हैं। जो ऐसा निश्चय कर लेता है, वह विकार एवं क्लेशसे

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४९४ * गीता-संग्रह *


रहित हो जाता है और उसे अनायास ही शान्ति प्राप्त होती है॥ १॥

ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते॥ २॥
ईश्वर ही सबका निर्माता है, दूसरा कोई नहीं। जो ऐसा निश्चय कर लेता है, उसकी सारी आशाएँ भीतर ही गल जाती हैं, वह शान्त हो जाता है और उसकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती॥ २॥

आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति॥ ३॥
समयपर आपत्तियाँ और सम्पत्तियाँ दैव (प्रारब्ध)-से होती हैं, ऐसा जो निश्चय कर लेता है, वह सदा तृप्त रहता है। उसकी इन्द्रियाँ सदा स्वस्थ रहती हैं। न तो वह अप्राप्तकी प्राप्तिकी इच्छा करता है और न तो नष्ट वस्तुके लिये शोक ही करता है॥ ३॥

सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी।
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ४॥
सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु दैवसे ही होते हैं, जो ऐसा निश्चय कर लेता है, उसकी दृष्टिमें साध्य कुछ नहीं रहता। उसे परिश्रम नहीं होता और कर्म करनेपर भी वह लिप्त नहीं होता॥ ४॥

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥ ५॥
इस संसारमें चिन्तासे ही दुःख होता है, अन्यथा नहीं। जिसने ऐसा निश्चय कर लिया है, वह चिन्ताहीन साधक सुखी एवं शान्त हो जाता है, उसको कहीं भी स्पृहा नहीं होती॥ ५॥

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यमिव सम्प्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ६॥
न मैं देह हूँ, न देह मेरा है, मैं तो शुद्ध बोधस्वरूप हूँ, जिसको

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* अष्टावक्रगीता * ४९५


ऐसा निश्चय हो गया है, उसे मानो कैवल्यकी प्राप्ति हो गयी है। वह इस बातका स्मरण नहीं करता कि मैंने क्या किया और क्या नहीं किया ॥ ६ ॥

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी।
निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥ ७ ॥

‘ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक सब मैं ही हूँ’—ऐसा जिसका निश्चय है, वह संकल्प-विकल्पसे रहित, पवित्र एवं शान्त हो जाता है। प्राप्ति और अप्राप्ति दोनोंमें वह निश्चिन्त रहता है॥ ७ ॥

नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिति शाम्यति ॥ ८ ॥

अनेक आश्चर्योंसे परिपूर्ण यह संसार कुछ नहीं है—ऐसा जिसका निश्चय है, उसकी सारी वासनाएँ भस्म हो जाती हैं। वह स्फूर्तिमात्र बचता है और वह मानो कुछ नहीं है (निर्वाण ही निर्वाण है), इस प्रकार शान्त हो जाता है॥ ८ ॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां ज्ञानाष्टकं नामैकादशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ११ ॥


बारहवाँ प्रकरण

आत्मस्वरूपमें स्थित पुरुषकी स्थिति

कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः।
अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ १ ॥

पहले शारीरिक कर्मकी असहिष्णुता तदनन्तर वाणीके विस्तारकी और फिर चिन्ताकी असहिष्णुता हो गयी। इसलिये मैं यों ही ज्योंका-त्यों स्थित हूँ॥ १ ॥

प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः ॥ २ ॥

शब्दादि विषयोंमें प्रीति न होनेके कारण और आत्माके अदृश्य

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४९६ * गीता-संग्रह *

होनेसे मैं विक्षेपके निमित्त उपस्थित होनेपर भी एकाग्र रहकर यों ही
स्थित हूँ॥ २॥
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये।
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः॥ ३॥
सम्यक् अध्यास आदिके कारण विक्षेप होनेपर समाधिके लिये
साधन करना होता है। ऐसा नियम देखकर मैं यों ही स्थित हूँ॥ ३॥
हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः॥ ४॥
त्याज्य-ग्राह्य, हर्ष और विषाद न होनेके कारण हे ब्रह्मस्वरूप !
मैं तो यों ही ज्यों-का-त्यों स्थित हूँ॥ ४॥
आश्रमाना श्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम्।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः॥ ५॥
यह आश्रम है और यह आश्रमका त्याग, यह ध्यान है और
यह विक्षेप, यह चित्तके द्वारा स्वीकार करनेयोग्य है और यह नहीं—
इन बातोंसे विकल्प ही होता है। ऐसा देखकर मैं तो यों ही स्थित
हूँ॥ ५॥
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा ।
बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः॥ ६॥
जिस प्रकार कर्मानुष्ठान (कर्म करना) अज्ञानसे होता है, इसी
प्रकार कर्मका त्याग भी अज्ञानसे ही होता है, इस तत्त्वको यथार्थ
रीतिसे जानकर मैं इसी प्रकार (आत्मस्वरूपमें ही) स्थित हूँ॥ ६॥
अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥ ७॥
अचिन्त्य आत्मतत्त्वका चिन्तन करनेसे भी वह चिन्तनरूप हो
जाता है। इसलिये उसका चिन्तन (भावना) छोड़कर मैं तो यों ही

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  • अष्टावक्रगीता * ४९७

अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित हूँ॥ ७॥

एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥ ८॥

जिसने अभ्यासके द्वारा अपनेको ऐसा बना लिया, वह कृतार्थ हो जाता है। जिसका ऐसा स्वभाव ही है, वह स्वतः कृतार्थ है॥ ८॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामेवमेवाष्टकं नाम द्वादशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १२॥


तेरहवाँ प्रकरण

स्वरूपस्थितिका आनन्द

अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम्।
त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥ १॥

‘आत्माके सिवाय अन्य कोई वस्तु है ही नहीं’—ऐसे बोधसे जो स्वरूपस्थिति प्राप्त होती है, वह केवल कौपीनधारी होनेपर भी दुर्लभ है। इसलिये त्याग-ग्रहणका परित्याग करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ १॥

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्॥ २॥

कहीं तो शरीरको कष्ट होता है और कहीं जिह्वाको तथा कहीं मनको। इसलिये उन सबको छोड़कर मैं अपने स्वरूपमें सुखपूर्वक स्थित हूँ॥ २॥

कृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्वतः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम्॥ ३॥

शरीर, अन्तःकरणादिके द्वारा किया हुआ कर्म वस्तुतः कुछ नहीं है, ऐसा निश्चय करके जब जो कर्तव्य सामने आ जाता है, उसे करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ ३॥

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४९८ * गीता-संग्रह *


कर्मनैष्कर्म्यनिर्वन्धभावा देहस्थयोगिनः ।
संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥

कर्मका संकल्प करो अथवा उसके त्यागका संकल्प करो—यह दुराग्रह तो देहाभिमानी साधकके लिये है। न मुझसे किसीका संयोग है और न तो वियोग, इसलिये मैं सुखपूर्वक रहता हूँ॥ ४॥

अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा।
तिष्ठन्गच्छन्स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५॥

स्थिति, गति अथवा शयनसे न मेरा कोई लाभ है न तो हानि; इसलिये उठते-बैठते-सोते मैं अपनी मौजमें रहता हूँ॥ ५॥

स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा।
नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६॥

न सोनेसे मेरी कोई हानि है और न परिश्रम करनेसे कोई लाभ। इसलिये हानि और लाभकी बुद्धिका परित्याग करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ ६॥

सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥

जगत्के किसी भी पदार्थमें, स्थितिमें यह सुख है—यह दुःख है, ऐसा नियम नहीं है—यह बात मैंने बार-बार देख ली है। इसलिये शुभ (हित) और अशुभ (अहित)-बुद्धिका परित्याग करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ ७॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां यथासुखसप्तकं नाम त्रयोदशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १३॥

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  • अष्टावक्रगीता * ४९९

चौदहवाँ प्रकरण

आत्मज्ञानी अवधूत पुरुषकी स्थिति

प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद्भावभावनः ।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंसरणो हि सः ॥ १ ॥

जिसका चित्त स्वभावसे ही शून्य (विषयचिन्तनरहित) है और जो उपेक्षापूर्वक विषयोंमें इस तरह बरत लेता है कि मानो कोई गाढ़ी नींदसे जगाया हुआ पुरुष आलस्यभरे शरीरसे काम कर रहा हो—ऐसा पुरुष संसारसे रहित ही है॥ १॥

क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः ।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥

जब मेरी स्पृहा ही नष्ट हो गयी तब धन क्या, मित्र क्या और मेरे लिये विषयरूप लुटेरे भी क्या? मेरे लिये शास्त्र क्या और विज्ञान भी क्या?॥ २॥

विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे ।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम ॥ ३ ॥

साक्षी पुरुषको जो ईश्वर और परमात्मासे अभिन्न है, जान लेनेपर जब बन्ध और मोक्ष दोनोंकी आस्था नष्ट हो गयी, तब मुझे मुक्तिके लिये क्या चिन्ता हो सकती है?॥ ३॥

अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥

जो भीतरसे तो विकल्पशून्य है और बाहरसे भ्रान्तपुरुषके समान स्वच्छन्द आचरण करता है, उसकी उन-उन अनिर्वचनीय अवस्थाओंको वैसे लोग ही जानते हैं॥ ४॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शान्तिचतुष्टयं नाम चतुर्दशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १४ ॥