गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 484 of 675
Read in context- अष्टावक्रगीता * ४८३
और अपनेमें समस्त दृश्य-पदार्थोंको जाननेवाले विवेकशील पुरुषके चित्तमें भी ममता बनी रह जाती है॥५॥
आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥६॥
परम अद्वैत-वस्तुमें निष्ठा होनेपर एवं आत्माका दृढ़ निश्चय हो जानेपर भी बड़े आश्चर्यकी बात है कि पूर्वाभ्यासके कारण तुम कामके अधीन होकर विकल हो जाते हो॥६॥
उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत्कालमन्तमनुश्रितः॥७॥
बड़े आश्चर्यकी बात है कि ज्ञानके शत्रु—कामसे ग्रस्त होकर तुम कमजोर हो जाते हो और समय पाकर नष्ट हो जानेवाले भोगकी आकांक्षा करते हो॥७॥
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षादेव विभीषिका॥८॥
नित्यानित्य-वस्तु-विवेकी, लौकिक-पारलौकिक भोगोंसे विरक्त एवं मुमुक्षु पुरुष भी मोक्षसे (संसारके छूट जानेसे) डरता है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है॥८॥
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥९॥
धीर पुरुष भोग अथवा पीड़ा पाकर भी सर्वदा केवल आत्म-दृष्टि रखता है। वह न तुष्ट होता है, न रुष्ट होता है॥९॥
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येन्महाशयः॥१०॥
महापुरुष तो कर्ममें लगे हुए अपने शरीरको दूसरेके शरीरके समान