गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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यह शक्ति है कि वह इच्छा और अनिच्छा—दोनोंका त्याग कर सके। (विषयी जीव तो इच्छाका त्याग नहीं कर सकते और निर्विकल्प समाधिकी निष्ठामें तत्पर योगी अनिच्छाका परित्याग नहीं कर सकते—निष्काम-स्वरूपमें स्थित केवल तत्त्वज्ञ ही भावाभावात्मक दोनों स्थितियोंको प्रतीतिमात्र जानता है, यही इच्छा-अनिच्छाका त्याग है) ॥५॥
आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम्।
यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥६॥
कोई विरला पुरुष ही आत्मा और ब्रह्मकी एकताको जानता है, इसलिये वह सब कुछ कर सकता है, उसे कहीं भी कोई भय नहीं होता ॥६॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शिष्यप्रोक्तानुभवोल्लासषट्कं नाम चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ॥४॥
पाँचवाँ प्रकरण
दृश्यमान जगत्की असत्यता
न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।
सङ्घातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज॥१॥
किसी भी वस्तुके साथ तुम्हारा तादात्म्य नहीं है। तुम स्वयं शुद्ध हो, फिर क्या छोड़ना चाहते हो ? व्यष्टि अथवा समष्टि शरीरको इसी प्रकार विचारके द्वारा छोड़ते हुए तुम मुक्त हो जाओ ॥१॥
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज॥२॥
जैसे समुद्रसे बुलबुले उठते हैं, वैसे ही तुमसे ये दृश्य-पदार्थ उदय हो रहे हैं। इस प्रकार एकमात्र आत्मसत्ताको ही जानकर तुम मुक्त हो जाओ ॥२॥