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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages
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* रामगीता ( १ ) * ३९५


लीन हो जाता है॥ ५२॥

आदौ च मध्ये च तथैव चान्ततो
भवं विदित्वा भयशोककारणम्।
हित्वा समस्तं विधिवादचोदितं
भजेत्स्वमात्मानमथाखिलात्मनाम् ॥ ५३ ॥

संसारको आदि, अन्त और मध्यमें सब प्रकार भय और शोकका ही कारण जानकर समस्त वेदविहित कर्मोंको त्याग दे तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मारूप अपने आत्माका भजन करे॥ ५३॥

आत्मन्यभेदेन विभावयन्निदं
भवत्यभेदेन मयात्मना तदा।
यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः
क्षीरे वियद्व्योमन्यनिले यथानिलः॥ ५४॥

जिस प्रकार समुद्रमें जल, दूधमें दूध, महाकाशमें घटाकाशादि और वायुमें वायु मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपंचको अपने आत्माके साथ अभिन्नरूपसे चिन्तन करनेसे जीव मुझ परमात्माके साथ अभिन्न भावसे स्थित हो जाता है॥ ५४॥

इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो
जगन्मृषैवेति विभावयन्मुनिः।
निराकृतत्वाच्छ्रुतियुक्तिमानतो
यथेन्दुभेदो दिशि दिग्भ्रमादयः॥ ५५॥

यह जो जगत् है वह श्रुति, युक्ति और प्रमाणसे बाधित होनेके कारण चन्द्रभेद और दिशाओंमें होनेवाले दिग्भ्रमके समान मिथ्या ही है—ऐसी भावना करता हुआ लोक (व्यवहार)-में स्थित मुनि इसे देखे॥ ५५॥

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३९६ * गीता-संग्रह *


यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं
तावन्मदाराधनतत्परो भवेत्।
श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो
यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि॥ ५६ ॥

जबतक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलायी न दे, तबतक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे। जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है, उसे अपने हृदयमें सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है॥ ५६॥

रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसङ्ग्रहं
मया विनिश्चित्य तवोदितं प्रिय।
यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान्
स मुच्यते पातकराशिभिः क्षणात्॥ ५७॥

हे प्रिय! सम्पूर्ण श्रुतियोंके साररूप इस गुप्त रहस्यको मैंने निश्चय करके तुमसे कहा है। जो बुद्धिमान् इसका मनन करेगा, वह तत्काल समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ५७॥

भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जग-
न्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा।
मद्भावनाभावितशुद्धमानसः
सुखी भवानन्दमयो निरामयः॥ ५८ ॥

भाई! यह जो कुछ जगत् दिखायी देता है, वह सब माया है। इसे अपने चित्तसे निकालकर मेरी भावनासे शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ॥ ५८॥

यः सेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाञ्चितरेणुभिः स्पृशन्
पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः॥ ५९ ॥

जो पुरुष अपने चित्तसे मुझ गुणातीत निर्गुणका अथवा कभी-

२०- रामगीता (२) (अद्भुत रामायण)

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  • रामगीता ( १ ) * ३९७

कभी मेरे सगुण स्वरूपका भी सेवन करता है, वह मेरा ही रूप है। वह अपनी चरण-रजके स्पर्शसे सूर्यके समान सम्पूर्ण त्रिलोकीको पवित्र कर देता है॥ ५९॥

विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं
वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद् गुरुभक्तियुक्तो
मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः॥६०॥

यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियोंका एकमात्र सार है। इसे वेदान्तवेद्य भगवत्पाद मैंने ही कहा है। जो गुरुभक्तिसम्पन्न पुरुष इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा, उसकी यदि मेरे वचनोंमें प्रीति होगी तो वह मेरा ही रूप हो जायगा॥ ६०॥

।। इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे श्रीरामगीता सम्पूर्णा।।

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रामगीता ( २ )


भगवान् श्रीरामद्वारा हनुमान्जीको उपदेश


भगवान् श्रीरामद्वारा हनुमान्जीको उपदेश

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रामगीता-( २ )

[एक रामगीता अद्भुतरामायणके अन्तर्गत भी प्राप्त होती है, वहाँ इसका विस्तार अध्याय ११ से अध्याय १४ तक है। सीताहरणके पश्चात् ऋष्यमूकपर्वतपर विराजमान भगवान् श्रीराम हनुमान्‌जीके द्वारा जिज्ञासा करनेपर अपने तात्त्विक स्वरूपका जो उन्हें उपदेश देते हैं, वही रामगीताके नामसे विख्यात है, इसीके साथ ही इसमें सांख्य, योग एवं वेदान्ततत्त्वका प्रतिपादन करनेके बाद भक्तियोगका विवेचन किया गया है। अन्तिम अध्यायमें भगवान्‌ने अपनी विभूतियोंका प्रभावी वर्णन किया है। इस रामगीताको भी यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है—]

पहला अध्याय

भगवान् श्रीरामद्वारा हनुमान्‌जीको सांख्ययोगका उपदेश

रामः प्राह हनूमन्तमात्मानं पुरुषोत्तमः ।
वत्स वत्स हनूमंस्त्वं भक्तो यत्पृष्टवानसि ॥ १ ॥
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मम ।
अवाच्यमेतद्विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम् ॥ २ ॥

पुरुषोत्तम श्रीरामने अपने भक्त हनुमान्‌से कहा—हे वत्स हनुमान्! तुम मेरे भक्त हो, अतः जो तुमने पूछा है, उसे मैं बता रहा हूँ। मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो। यह सनातन विज्ञान अपनेमें गोपनीय और यत्र-तत्र कहनेयोग्य नहीं है ॥ १-२ ॥

यन्न देवा विजानन्ति यतन्तोऽपि द्विजातयः ।
इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूता द्विजोत्तमाः ॥ ३ ॥

इस विज्ञानको देवता और प्रयत्नशील द्विज साधक भी नहीं जानते। इसी ज्ञानका आश्रय लेकर श्रेष्ठ ब्राह्मण ब्रह्मस्वरूप हो गये ॥ ३ ॥

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४०० * गीता-संग्रह *


न संसारं प्रपश्यन्ति पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः ।
गुह्याद् गुह्यतमं साक्षाद् गोपनीयं प्रयत्नतः ।
वंशे भक्तिमतो ह्यस्य भवन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ ४ ॥

वे पुरातन ब्रह्मज्ञानी संसारको (सत्य) नहीं देखते। यह ज्ञान गुह्यसे भी परम गुह्य है और प्रयत्नपूर्वक गोपनीय है। इस (विज्ञानवेत्ता)-के वंशमें जन्म लेनेवाले भी भक्तिमान् ब्रह्मवादी होते हैं॥ ४ ॥

आत्मा यः केवलः स्वच्छः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः ॥ ५ ॥
अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः ।
सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः ॥ ६ ॥

आत्मा केवल, स्वच्छ, शान्त, सूक्ष्म और सनातन है। वह (आत्मा) सबके अन्दर स्पष्ट, प्रकाशमान और चिन्मय रूपसे स्थित है। वही अन्तर्यामी पुरुष है, वही प्राण है और वही परमेश्वर है॥ ५-६ ॥

स कालाग्निस्तद्व्यक्तं सद्यो वेदयति श्रुतिः ।
अस्माद्विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते ॥ ७ ॥

वह कालाग्नि है, वही अव्यक्त है और श्रुति (शब्दप्रमाणसे) उसका ज्ञान कराती है। संसारकी उत्पत्ति और लय उसीमें होता है ॥ ७ ॥

मायावी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः ।
न चाप्ययं संसरति न च संसारयेत्प्रभुः ॥ ८ ॥

वह सर्वसमर्थ मायावी अपनी मायासे अनेक रूप (शरीर) धारण करता है। यह कहीं आता-जाता नहीं और न किसीको संचालित करता है ॥ ८ ॥

नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः ।
न प्राणो न मनो व्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च ॥ ९ ॥

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* रामगीता (२) * ४०१


न रूपरसगन्धाश्च नाहङ्कर्ता न वागपि।
न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं प्लवङ्गम॥ १०॥
हे वानरश्रेष्ठ! न तो यह पृथ्वी है, न जल, न तेज, न वायु अथवा आकाश है। निश्चय ही न यह प्राण है, न मन और न शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध है। यह न अहंकार है, न वाणी-हाथ-पैर-पायु-उपस्थ आदि (कर्मेन्द्रियरूप) है॥ ९-१०॥

न कर्ता न च भोक्ता च न प्रकृतिपूरुषौ।
न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः॥ ११॥
यह न कर्ता है न भोक्ता है, न यह प्रकृति-पुरुष ही है। यह न माया है, न प्राण है। यह यथार्थमें (शुद्ध) चैतन्यमात्र है॥ ११॥

तथा प्रकाशतमसो सम्बन्धो नोपपद्यते।
तद्वदेव न सम्बन्धः प्रपञ्चपरमात्मनोः॥ १२॥
जैसे प्रकाश और अन्धकारका परस्पर सम्बन्ध सम्भव नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा और (सांसारिक) प्रपंचका भी परस्पर सम्बन्ध सम्भव नहीं है॥ १२॥

छायातरू यथा लोके परस्परविलक्षणौ।
तद्वत्प्रपञ्चपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः॥ १३॥
जैसे संसारमें वृक्ष और उसकी छाया—ये दो भिन्न पदार्थ हैं, उसी प्रकार परमात्मा और प्रपंच परस्पर सर्वथा भिन्न हैं॥ १३॥

यद्यात्मा मलिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात्स्वभावतः।
नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि॥ १४॥
यदि आत्मा स्वभावतः मलिन, अस्वस्थ और विकारवान् हो तो उसकी मुक्ति सैकड़ों जन्मोंमें भी सम्भव नहीं होगी॥ १४॥

पश्यन्ति मुनयो मुक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः।
विकारहीनं निर्दुःखमानन्दात्मानमव्ययम्॥ १५॥
किंतु जीवन्मुक्त मुनिजन तो अपनी आत्माको यथार्थतः विकारहीन,

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४०२ * गीता-संग्रह *


दुःखरहित, अव्यय और आनन्दस्वरूप देखते हैं॥ १५॥
अहं कर्ता सुखी दुःखी कृशः स्थूलेति या मतिः।
साप्यहङ्कृतिसम्बन्धादात्मन्यारोप्यते जनैः॥ १६॥
मैं कर्ता हूँ, सुखी-दुःखी हूँ, दुबला-मोटा हूँ—इस प्रकारका जो भाव बनता है, उसे अहंकारके सम्बन्धसे लोग आत्मापर आरोपित कर लेते हैं॥ १६॥
वदन्ति वेदविद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम्।
भोक्तारमक्षयं बुद्ध्वा सर्वत्र समवस्थितम्॥ १७॥
वेदके तत्त्वज्ञ उस अनश्वर भोक्ताको सर्वत्र व्याप्त जानकर उस साक्षी (आत्मा)-को प्रकृतिसे परे कहते हैं॥ १७॥
तस्मादज्ञानमूलोऽयं संसारः सर्वदेहिनाम्।
अज्ञानादन्यथा ज्ञातं तच्च प्रकृतिसङ्गतम्॥ १८॥
इसलिये सभी देहधारियोंके लिये यह संसार अज्ञानमूलक ही है। प्रकृतिके संसर्गसे अज्ञानके कारण यह (संसार) अन्यथा प्रतीत होता है॥ १८॥
नित्योदितः स्वयंज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः।
अहङ्काराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते॥ १९॥
आत्मा तो नित्य जाग्रत्, स्वयंप्रकाश, सर्वत्र व्याप्त, परम पुरुष है। अहंकारके अज्ञानके कारण यह (जीव) अपनेको कर्ता मान बैठता है॥ १९॥
पश्यन्ति ऋषयो व्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः॥ २०॥
तेनात्र सङ्गतो ह्यात्मा कूटस्थोऽपि निरञ्जनः।
आत्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्यन्ति तत्त्वतः॥ २१॥
ऋषिगण सत् और असत् रूप नित्य आत्मतत्त्वका निश्चय ही अनुभव करते हैं। वे ब्रह्मवादी प्रधान प्रकृतिको कारणरूप जानकर

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* रामगीता (२) * ४०३


उससे सम्बद्ध होनेके कारण कूटस्थ, निरंजन, अक्षरब्रह्मको तत्त्वतः नहीं जान पाते॥ २०-२१ ॥

अनात्मन्यात्मविज्ञानं तस्माद्दुःखं तथेतरत्।
रागद्वेषादयो दोषाः सर्वभ्रान्तिनिबन्धनाः॥ २२॥

अनात्मतत्त्वमें आत्माकी (भ्रान्ति) बुद्धि होनेसे ही दुःख और सुख होते हैं। राग-द्वेष आदि दोष भी उसी भ्रान्तिसे जुड़े रहते हैं॥ २२॥

कार्ये ह्यस्य भवेदेषा पुण्यापुण्यमिति श्रुतिः।
तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः॥ २३॥

इसी कारण कर्ममें पाप-पुण्यका समावेश शास्त्रानुसार हो जाता है और उसके वशीभूत सभीको देह धारण करना पड़ता है॥ २३॥

नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः।
एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः॥ २४॥

आत्मा तो नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ, दोषरहित और एक (अद्वितीय) है, किंतु मायाकी शक्तिसे उसमें भेद प्रतीत होता है, स्वभावतः नहीं॥ २४॥

तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः।
भेदोऽव्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया॥ २५॥

इसलिये ज्ञानीजन यथार्थमें अद्वैतकी ही सत्ता कहते हैं, किंतु माया आत्माके साथ लगी रहनेके कारण वह अव्यक्त आत्मा भी स्वभावतः भेदवाली प्रतीत होती है॥ २५॥

यथा हि धूमसम्पर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत्।
अन्तःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्न लिप्यते॥ २६॥

जैसे धुएँके सम्पर्कसे आकाश मलिन नहीं हो जाता (स्वभावतः स्वच्छ बना रहता है), उसी प्रकार अन्तःकरणमें उठनेवाले (राग-द्वेषादि) भावोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता॥ २६॥

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४०४ * गीता-संग्रह *


यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोपलः।
उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २७ ॥
जैसे स्फटिक-मणि अपनी (स्वच्छ) प्रभासे प्रकाशित रहती है, उसी प्रकार उपाधिरहित निर्मल आत्मा भी स्वयंप्रकाशित रहता है ॥ २७ ॥

ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद्विचक्षणाः ।
अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुबुद्धयः ॥ २८ ॥
बुद्धिमान् लोग इस संसारको ज्ञान-स्वरूप (आभासमात्र) कहते हैं, किंतु मंदबुद्धि (मूर्ख) इसे यथार्थ (सच्चा) समझते हैं ॥ २८ ॥

कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः।
दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २९ ॥
यथा संलक्ष्यते व्यक्तः केवलः स्फटिको जनैः।
रक्तिकाव्यवधानेन तद्वत्परमपूरुषः ॥ ३० ॥
भ्रान्तचित्त लोगोंको कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी, स्वभावतः चैतन्यरूप आत्मतत्त्व भी पदार्थ-जैसा प्रतीत होता है। जैसे लोग शुद्ध स्फटिक मणिको भी लाल पदार्थके संसर्गसे लाल ही देखते हैं, उसी प्रकार परमात्मतत्त्वके प्रति भी भ्रान्ति रहती है ॥ २९-३० ॥

तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतोऽव्ययः।
उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ ३१ ॥
इसलिये मुमुक्षु लोगोंको अक्षर, शुद्ध, सनातन, सर्वव्यापी, अव्यय, आत्मतत्त्वका ही चिन्तन, मनन, श्रवण तथा अनुसन्धान करना चाहिये ॥ ३१ ॥

यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा।
योगिनोऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयम् ॥ ३२ ॥
जब योगसाधकके मनमें सदा सर्वव्यापी चैतन्यका प्रकाश निरन्तर

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* रामगीता (२) * ४०५

बना रहता है, तब उसे आत्मतत्त्वकी उपलब्धि होती है॥ ३२॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते स्वयम्॥ ३३॥
जब वह (योगी) सभी प्राणी-पदार्थोंको स्वयं अपने भीतर और स्वयंको सभीमें देखने लगता है, तब वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ ३३॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभि पश्यति।
एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः॥ ३४॥
जब वह अन्य प्राणी-पदार्थोंको अपने भीतर ही देखता, तब अन्य की सत्तासे रहित परमात्मासे एकीभूत हुआ वह योगी केवलीभावको प्राप्त हो जाता है॥ ३४॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः।
तदासाममृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः॥ ३५॥
जब उस योगीके हृदयसे सम्पूर्ण कामनाओंका लोप हो जाता है, तब वह प्रज्ञासम्पन्न अमृतत्वको प्राप्त होकर परम कल्याणका भागी हो जाता है॥ ३५॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ ३६॥
जब विभिन्न भूत-पदार्थोंमें योगीकी एकत्व दृष्टि हो जाती है, तब उसी (दृष्टि)-का विस्तार होकर उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है॥ ३६॥
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः।
मायामात्रं जगत्कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः॥ ३७॥
जब वह योगी यथार्थ रूपमें केवल आत्माके अस्तित्वको देखने लगता है और सम्पूर्ण (बाह्य) जगत्को मायामात्र जान लेता है, तब उसे परमशान्ति प्राप्त होती है॥ ३७॥

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४०६ * गीता-संग्रह *


यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेषजम्।
केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः॥ ३८॥
जब उसे जन्म, बुढ़ापा, दुःख, रोग आदिकी एकमात्र औषधि ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह योगी साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है॥ ३८॥

यथा नदी नदा लोके सागरेणैकतां ययुः।
तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत्॥ ३९॥
जैसे संसारके (विभिन्न) नदियाँ और नद सागरमें जाकर एकरूप हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मा उस अक्षर, निष्कल परमात्मतत्त्वमें मिलकर एक हो जाता है॥ ३९॥

तस्माद्विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संस्थितिः।
अज्ञानेनावृतं लोके विज्ञानं तेन मुह्यति॥ ४०॥
इसलिये (यथार्थमें) ज्ञानकी ही सत्ता है, न तो प्रपंचकी और न सृष्टिकी कोई स्थिति है। संसारमें अज्ञानसे ज्ञान ढका रहता है, इस कारण लोगोंमें मोह उत्पन्न हो जाता है॥ ४०॥

तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम्।
अज्ञानमिति तत्सर्वं विज्ञानमिति मे मतम्॥ ४१॥
वह ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्प और अविनाशी है, शेष सभी (दृश्यमान प्रपंच) अज्ञानमात्र है। मूल सत्ता ज्ञानकी ही है—ऐसा मेरा मत है॥ ४१॥

एतत्ते परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम्।
सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता॥ ४२॥
मैंने यह उत्तम सांख्यरूप परम ज्ञान तुम्हें बताया है। यह समस्त वेदान्तका सार है और इसमें एकनिष्ठ चित्तवृत्ति होना ही योग है॥ ४२॥

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  • रामगीता (२) * ४०७

योगात्सञ्जायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रजायते।
योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित्॥ ४३॥
योगसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और ज्ञानसे योग परिपुष्ट होता है। योग और ज्ञानसे युक्त साधकके लिये कुछ भी अप्राप्त नहीं रहता॥ ४३॥

यदेव योगिनो याति सांख्यं तदभिगम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित्॥ ४४॥
जिस परमपदको योगीजन प्राप्त करते हैं, ज्ञानी भी वही प्राप्त करते हैं। जो योग और सांख्यको एकरूप देखते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानी हैं॥ ४४॥

अन्ये च योगिनो वत्स ऐश्वर्यासक्तचेतसः।
मज्जन्ति तत्र तत्रैव सत्वात्मैक्यमिति श्रुतिः॥ ४५॥
[श्रीरामजी बोले—] हे वत्स! अन्य (दिखावटी) योगीजन तो धन-सम्पत्तिमें आसक्त-चित्तवाले होते हैं और वे उसीमें नष्ट हो जाते हैं। श्रुतिका कथन है कि आत्माकी एकताका बोध ही वास्तवमें प्राप्य परमपद है॥ ४५॥

यत्तत्सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत्।
ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात्॥ ४६॥
ज्ञानयोगसे युक्त साधक देहान्त होनेपर उस सर्वव्यापी, दिव्य, महान्, अचल परमैश्वर्य पदको प्राप्त करते हैं॥ ४६॥

एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः।
कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः॥ ४७॥
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धोऽजरोऽमरः।
सर्वतः पाणिपादोऽहमन्तर्यामी सनातनः॥ ४८॥
मैं अव्यक्त आत्मा हूँ, मैं मायापति परमेश्वर हूँ, मैं सर्वव्यापी और सबकी आत्मा हूँ—ऐसा सभी शास्त्रोंमें कहा गया है। मैं ही

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४०८ * गीता-संग्रह *

सम्पूर्ण कामनाओं, रसों और गन्धादि विषयोंका परमाधार, अजर-
अमर, अन्तर्यामी, सनातन और सर्वत्र हाथ-पैरोंसे स्थित आत्मस्वरूप
हूँ॥ ४७-४८॥
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः।
अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम्॥ ४९॥
वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन।
प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ५० ॥
बिना हाथ-पैरोंवाला होकर भी मैं शीघ्रगामी हूँ और सब कुछ
ग्रहण करता हूँ, (सबके) हृदयमें रहता हूँ। मैं बिना आँखोंके देख
सकता हूँ और बिना कानके सुन सकता हूँ। मैं यह सब जानता
हूँ, पर मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी मुझे एकमात्र महान् पुरुष
(सत्ता) कहते हैं॥ ४९-५०॥
निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम्।
यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मायया मम॥ ५१॥
मेरे निर्गुण, निर्मल स्वरूप और उत्तम ऐश्वर्यको देवता भी नहीं
जान पाते; क्योंकि वे मेरी मायासे मोहित रहते हैं॥ ५१॥
यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः।
प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥
मेरा जो सर्वव्यापी परम गुह्य अव्यय स्वरूप है, उसमें तत्त्वदर्शी
योगीजन सायुज्य मुक्ति प्राप्त करके प्रविष्ट होते हैं॥ ५२॥
येषां हि न समापन्ना माया वै विश्वरूपिणी।
लभन्ते परमं शुद्धं निर्वाणं ते मया सह॥ ५३॥
जिन्हें यह विश्वव्यापी माया नहीं छूती, वे योगीजन परम पवित्र
निर्वाणपदको मेरे साथ प्राप्त करते हैं॥ ५३॥

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  • रामगीता (२) * ४०९

न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।
प्रसादान्मम ते वत्स एतद्वेदानुशासनम्॥ ५४॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्यं हनुमन्क्वचित्।
यदुक्तमेतद्विज्ञानं सांख्ययोगसमाश्रयम्॥ ५५॥
उनका सौ करोड़ कल्पोंमें भी पुनर्जन्म नहीं होता। हे वत्स! मेरी प्रसन्नतासे तुम्हें (यह ज्ञान) प्राप्त हुआ है। यही वेदोंका भी अनुशासन है। हे हनुमान्! सांख्ययोगका आश्रयभूत यह विज्ञान जो मैंने कहा है, उसे कभी अपुत्र, अशिष्य और अयोगी (कुपात्र)-को नहीं बताना चाहिये॥ ५४-५५॥
॥ इति श्रीअद्भुतरामायणे रामगीतायां प्रथमोऽध्यायः॥ १॥


दूसरा अध्याय

भगवान् श्रीरामद्वारा उपनिषत्-सिद्धान्तका निरूपण

पुना रामः प्रवचनमुवाच द्विजपुङ्गव।
अव्यक्तादभवत्कालः प्रधानं पुरुषः परः॥ १॥
पुनः प्रवचन करते हुए श्रीरामने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मुझ अव्यक्तसे कालकी उत्पत्ति होती है और उससे प्रधान नामक तत्त्व और परम पुरुषकी॥ १॥
तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्मात्सर्वमहं जगत्।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्॥ २॥
उन्हींसे यह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। इसलिये मैं ही सारा संसार हूँ। मेरे हाथ-पैर सब ओर हैं और मेरी आँखें, सिर तथा मुख सर्वत्र व्याप्त हैं॥ २॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्॥ ३॥
उस परमात्माके कान सभी ओर हैं। वह सबको व्याप्त करके

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४१० * गीता-संग्रह *


स्थित है। वही सभी इन्द्रियों और गुणोंका प्रकाशक है, किंतु सभी इन्द्रियोंसे परे है॥ ३॥
सर्वाधारं स्थिरानन्दमव्यक्तं द्वैतवर्जितम्।
सर्वोपमानरहितं प्रमाणातीतगोचरम्॥ ४॥
वह सभीका आधार, स्थिर, आनन्दरूप, अव्यक्त और अद्वैत है। उसकी कोई उपमा नहीं है और वह किसी प्रमाणसे ज्ञात नहीं हो सकता॥ ४॥
निर्विकल्पं निराभासं सर्वाभासं परामृतम्।
अभिन्नं भिन्नसंस्थानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम्॥ ५॥
वह निर्विकल्प, निराभास, सर्वप्रकाशक, परम अमृत, सर्वथा अभिन्न, किंतु भिन्न आधारवान्, शाश्वत, ध्रुव और अव्यय है॥ ५॥
निर्गुणं परमं व्योम तज्ज्ञानं सूरयो विदुः।
स आत्मा सर्वभूतानां स बाह्याभ्यन्तरात्परः॥ ६॥
वह निर्गुण और परमाकाशस्वरूप है। विद्वान् उसके ज्ञानके अधिकारी हैं। वह सभी भूत-प्राणियोंका आत्मा है और वही बाहर-भीतर और उसके परे भी विद्यमान है॥ ६॥
सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः।
मया ततमिदं विश्वं जगद्व्यक्तरूपिणा॥ ७॥
वह सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानात्मा, परमेश्वर मैं हूँ। अव्यक्त रूपवाले मेरे द्वारा यह सारा संसार व्याप्त है॥ ७॥
मत्स्थानि सर्वभूतानि यस्तं वेद स वेदवित्।
प्रधानं पुरुषं चैव तत्त्वद्वयमुदाहृतम्॥ ८॥
सभी प्राणी-पदार्थ मुझमें स्थित हैं। जो यह जानता है, वही वेदज्ञ है। प्रधान (प्रकृति) और पुरुष (जीवात्मा)—ये दो तत्त्व कहे गये हैं॥ ८॥
तयोरनादिर्निर्दिष्टः कालः संयोजकः परः।
त्रयमेतदनाद्यन्तमव्यक्ते समवस्थितम्॥ ९॥
दोनोंका परम संयोजक अनादि काल बताया गया है। ये तीनों

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  • रामगीता ( २ ) * ४११

अनादि और अनन्त तत्त्व अव्यक्त आत्मामें स्थित रहते हैं ॥ ९ ॥

तदात्मकं तदन्यत्स्यात्तद्रूपं मामकं विदुः ।
महदाद्यं विशेषान्तं सम्प्रसूतेऽखिलं जगत् ॥ १० ॥
तदात्मक होकर भी उससे भिन्न होनेवाला स्वरूप मेरा ही जानो। महत्-तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि उसीसे होती है॥ १०॥

या सा प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्वदेहिनाम् ।
पुरुषः प्रकृतिस्थोऽपि भुङ्क्ते यः प्राकृतान् गुणान् ॥ ११ ॥
अहङ्कारविविक्तत्वात्प्रोच्यते पञ्चविंशकः ।
आद्यो विकारः प्रकृतेर्महानात्मेति कथ्यते ॥ १२ ॥
सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली प्रकृति कही गयी है। पुरुष उस प्रकृतिमें स्थित हुआ प्राकृत गुणोंका उपभोग करता है। अहंकारसे अलग होनेके कारण वह पच्चीसवाँ तत्त्व कहलाता है। प्रकृतिका प्रथम विकार महत् तत्त्व कहा जाता है॥ ११-१२॥

विज्ञानशक्तिर्विज्ञानादहङ्कारस्तदुत्थितः ।
एक एव महानात्मा सोऽहङ्कारोऽभिधीयते ॥ १३ ॥
विज्ञानसे विज्ञानशक्ति और उससे अहंकारकी उत्पत्ति होती है। महत् आत्मा एक ही है और उसीको अहंकार कहा जाता है॥ १३॥

स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्वचिन्तकैः ।
तेन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु ॥ १४ ॥
वही जीव और वही अन्तरात्मा नामसे तत्त्वज्ञोंद्वारा कहा जाता है। उसीके द्वारा जन्म-जन्मान्तरोंमें सुख-दुःखादि सभी प्रकारकी अनुभूति होती है॥ १४॥

स विज्ञानात्मकस्तस्य मनः स्यादुपकारकम् ।
तेनाविवेकतस्तस्मात्संसारः पुरुषस्य नु ॥ १५ ॥
वह विज्ञानस्वरूप है, उसका उपकारी (सहचर) मन है और

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४१२

  • गीता-संग्रह *

उसके अविवेकसे ही पुरुषको इस संसारकी प्राप्ति होती है॥ १५॥
स चाविवेकः प्रकृतौ सङ्गात्कालेन सोऽभवत्।
कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ॥ १६ ॥
सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद्वशे।
सोऽन्तरा सर्वमेवेदं नियच्छति सनातनः ॥ १७ ॥
वह अविवेक (दीर्घ कालतक) प्रकृतिका संग करनेके कारण हो जाता है। काल ही सभी प्राणी-पदार्थोंका सृजन करता है और वही सृष्टिका संहार भी करता है। सभी कालके वशीभूत रहते हैं। काल किसीके वशमें नहीं होता। वही सनातन सबके भीतर प्रवेश करके सबका नियन्त्रण करता है॥ १६-१७॥
प्रोच्यते भगवान् प्राणः सर्वज्ञः पुरुषः परः।
सर्वेन्द्रियेभ्यः परमं मनः प्राहर्मनीषिणः ॥ १८ ॥
मनसश्चाप्यहङ्कारमहङ्कारान्महान् परः।
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ॥ १९ ॥
वही भगवान् प्राण, सर्वज्ञ और परम पुरुष कहा जाता है। विज्ञजनोंद्वारा मनको सभी इन्द्रियोंसे परे कहा गया है। मनसे परे अहंकार और अहंकारसे परे महत् तत्त्व, महत्से परे अव्यक्त और उससे परे पुरुष कहे जाते हैं॥ १८-१९॥
पुरुषाद्भगवान् प्राणस्तस्य सर्वमिदं जगत्।
प्राणात्परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः ॥ २० ॥
पुरुषसे परे भगवान् प्राण हैं। उन्हींका (विस्तार) यह सारा जगत् है। प्राणसे परे आकाश है और आकाशसे परे मैं अग्निरूपी परमेश्वर हूँ॥ २० ॥
सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः।
नास्ति मत्परमं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते ॥ २१ ॥
वह परमेश्वर मैं सर्वव्यापी, शान्त और ज्ञानस्वरूप हूँ। मुझसे परे कुछ नहीं है। मुझे जानकर जीव मुक्त हो जाता है॥ २१॥

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  • रामगीता ( २ ) * ४१३

नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।
ऋते मामेकमव्यक्तं व्योमरूपं महेश्वरम्॥ २२॥
मुझ एक अव्यक्त आकाशरूप महेश्वरको छोड़कर इस संसारमें कोई स्थावर-जंगम पदार्थ नित्य नहीं है॥ २२॥
सोऽहं सृजामि सकलं संहरामि सदा जगत्।
मायी मायामयो देवः कालेन सह सङ्गतः॥ २३॥
मायापति मैं लीलापूर्वक कालके सहयोगसे इस सम्पूर्ण जगत्की सदा सृष्टि और इसका संहार करता रहता हूँ॥ २३॥
मत्सन्निधावेष कालः करोति सकलं जगत्।
नियोजयत्यनन्तात्मा ह्येतद्वेदानुशासनम्॥ २४॥
मेरे सान्निध्यसे यह काल सारे जगत्की सृष्टि करता है और वही अनन्तात्मा उसका नियमन करता है—यही वेदोंका अनुशासन है॥ २४॥
॥ इति श्रीअद्भुतरामायणे रामगीतायां द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


तीसरा अध्याय

भगवान् श्रीरामद्वारा भक्तियोगका वर्णन

वक्ष्ये समाहितमनाः शृणुष्व पवनात्मज।
येनेदं लभ्यते रूपं येनेदं सम्प्रवर्तते॥ १॥
हे पवनात्मज! जिससे यह रूप प्राप्त होता है और जिससे यह क्रियाशील होता है, उसे बताता हूँ, ध्यानसे सुनो॥ १॥
नाहं तपोभिर्विविधैर्न दानेन न चेज्यया।
शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमाम्॥ २॥
उत्तम भक्तिके सिवा लोग मुझे तप, दान या यज्ञादिसे नहीं जान सकते॥ २॥
अहं हि सर्वभावानामन्तस्तिष्ठामि सर्वगः।
मां सर्वसाक्षिणं लोका न जानन्ति प्लवङ्गम॥ ३॥
हे वानरश्रेष्ठ! मैं सर्वव्यापी ही सभी प्राणियोंके अन्तरमें स्थित

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४१४ * गीता-संग्रह *


रहता हूँ, मुझ सर्वसाक्षीको लोग नहीं जान पाते॥३॥
यस्यान्तरा सर्वमिदं यो हि सर्वान्तरः परः।
सोऽहं धाता विधाता च लोकेऽस्मिन् विश्वतोमुखः॥४॥
जिसके भीतर यह सब कुछ और जो इस सबके भीतर है, वह सर्वत्र व्याप्त, सर्वनियन्ता, सबका पोषक मैं ही हूँ॥४॥
न मां पश्यन्ति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः।
ब्राह्मणा मनवः शक्रा ये चान्ये प्रथितौजसः॥५॥
मुझे सभी ऋषि-मुनि और देवता भी नहीं जानते तथा ब्राह्मण, मनु, इन्द्रादि और अन्य तेजस्वी भी नहीं पहचानते॥५॥
गृणन्ति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम्।
यजन्ति विविधैरग्निं ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः॥६॥
वेद निरन्तर मुझ एक परमेश्वरकी ही स्तुति करते हैं। ब्राह्मण वैदिक यज्ञों और विविध अग्निविधानोंसे मेरा ही यजन करते हैं॥६॥
सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मलोके पितामहम्।
ध्यायन्ति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम्॥७॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रदः।
सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वसंस्तुतः॥८॥
सभी लोग ब्रह्मलोकमें पितामह ब्रह्माको नमन करते हैं। योगीजन भूताधिपति महेश्वरका ध्यान करते हैं, किंतु सभी देवताओंके रूपमें सभीसे पूजित, सर्वात्मा मैं ही सभी यज्ञानुष्ठानोंका भोक्ता और फल प्रदान करनेवाला हूँ॥७-८॥
मां पश्यन्तीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः।
तेषां सन्निहितो नित्यं ये भक्ता मामुपासते॥९॥
वेदज्ञ धार्मिक विद्वान् मुझे जानते हैं। जो भक्त मेरी उपासना करते हैं, उनके मैं सदा ही सन्निकट रहता हूँ॥९॥