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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 407

४०६ * गीता-संग्रह *


यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेषजम्।
केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः॥ ३८॥
जब उसे जन्म, बुढ़ापा, दुःख, रोग आदिकी एकमात्र औषधि ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह योगी साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है॥ ३८॥

यथा नदी नदा लोके सागरेणैकतां ययुः।
तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत्॥ ३९॥
जैसे संसारके (विभिन्न) नदियाँ और नद सागरमें जाकर एकरूप हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मा उस अक्षर, निष्कल परमात्मतत्त्वमें मिलकर एक हो जाता है॥ ३९॥

तस्माद्विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संस्थितिः।
अज्ञानेनावृतं लोके विज्ञानं तेन मुह्यति॥ ४०॥
इसलिये (यथार्थमें) ज्ञानकी ही सत्ता है, न तो प्रपंचकी और न सृष्टिकी कोई स्थिति है। संसारमें अज्ञानसे ज्ञान ढका रहता है, इस कारण लोगोंमें मोह उत्पन्न हो जाता है॥ ४०॥

तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम्।
अज्ञानमिति तत्सर्वं विज्ञानमिति मे मतम्॥ ४१॥
वह ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्प और अविनाशी है, शेष सभी (दृश्यमान प्रपंच) अज्ञानमात्र है। मूल सत्ता ज्ञानकी ही है—ऐसा मेरा मत है॥ ४१॥

एतत्ते परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम्।
सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता॥ ४२॥
मैंने यह उत्तम सांख्यरूप परम ज्ञान तुम्हें बताया है। यह समस्त वेदान्तका सार है और इसमें एकनिष्ठ चित्तवृत्ति होना ही योग है॥ ४२॥