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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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  • रामगीता ( २ ) * ४११

अनादि और अनन्त तत्त्व अव्यक्त आत्मामें स्थित रहते हैं ॥ ९ ॥

तदात्मकं तदन्यत्स्यात्तद्रूपं मामकं विदुः ।
महदाद्यं विशेषान्तं सम्प्रसूतेऽखिलं जगत् ॥ १० ॥
तदात्मक होकर भी उससे भिन्न होनेवाला स्वरूप मेरा ही जानो। महत्-तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि उसीसे होती है॥ १०॥

या सा प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्वदेहिनाम् ।
पुरुषः प्रकृतिस्थोऽपि भुङ्क्ते यः प्राकृतान् गुणान् ॥ ११ ॥
अहङ्कारविविक्तत्वात्प्रोच्यते पञ्चविंशकः ।
आद्यो विकारः प्रकृतेर्महानात्मेति कथ्यते ॥ १२ ॥
सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली प्रकृति कही गयी है। पुरुष उस प्रकृतिमें स्थित हुआ प्राकृत गुणोंका उपभोग करता है। अहंकारसे अलग होनेके कारण वह पच्चीसवाँ तत्त्व कहलाता है। प्रकृतिका प्रथम विकार महत् तत्त्व कहा जाता है॥ ११-१२॥

विज्ञानशक्तिर्विज्ञानादहङ्कारस्तदुत्थितः ।
एक एव महानात्मा सोऽहङ्कारोऽभिधीयते ॥ १३ ॥
विज्ञानसे विज्ञानशक्ति और उससे अहंकारकी उत्पत्ति होती है। महत् आत्मा एक ही है और उसीको अहंकार कहा जाता है॥ १३॥

स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्वचिन्तकैः ।
तेन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु ॥ १४ ॥
वही जीव और वही अन्तरात्मा नामसे तत्त्वज्ञोंद्वारा कहा जाता है। उसीके द्वारा जन्म-जन्मान्तरोंमें सुख-दुःखादि सभी प्रकारकी अनुभूति होती है॥ १४॥

स विज्ञानात्मकस्तस्य मनः स्यादुपकारकम् ।
तेनाविवेकतस्तस्मात्संसारः पुरुषस्य नु ॥ १५ ॥
वह विज्ञानस्वरूप है, उसका उपकारी (सहचर) मन है और