गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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रहता हूँ, मुझ सर्वसाक्षीको लोग नहीं जान पाते॥३॥
यस्यान्तरा सर्वमिदं यो हि सर्वान्तरः परः।
सोऽहं धाता विधाता च लोकेऽस्मिन् विश्वतोमुखः॥४॥
जिसके भीतर यह सब कुछ और जो इस सबके भीतर है, वह सर्वत्र व्याप्त, सर्वनियन्ता, सबका पोषक मैं ही हूँ॥४॥
न मां पश्यन्ति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः।
ब्राह्मणा मनवः शक्रा ये चान्ये प्रथितौजसः॥५॥
मुझे सभी ऋषि-मुनि और देवता भी नहीं जानते तथा ब्राह्मण, मनु, इन्द्रादि और अन्य तेजस्वी भी नहीं पहचानते॥५॥
गृणन्ति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम्।
यजन्ति विविधैरग्निं ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः॥६॥
वेद निरन्तर मुझ एक परमेश्वरकी ही स्तुति करते हैं। ब्राह्मण वैदिक यज्ञों और विविध अग्निविधानोंसे मेरा ही यजन करते हैं॥६॥
सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मलोके पितामहम्।
ध्यायन्ति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम्॥७॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रदः।
सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वसंस्तुतः॥८॥
सभी लोग ब्रह्मलोकमें पितामह ब्रह्माको नमन करते हैं। योगीजन भूताधिपति महेश्वरका ध्यान करते हैं, किंतु सभी देवताओंके रूपमें सभीसे पूजित, सर्वात्मा मैं ही सभी यज्ञानुष्ठानोंका भोक्ता और फल प्रदान करनेवाला हूँ॥७-८॥
मां पश्यन्तीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः।
तेषां सन्निहितो नित्यं ये भक्ता मामुपासते॥९॥
वेदज्ञ धार्मिक विद्वान् मुझे जानते हैं। जो भक्त मेरी उपासना करते हैं, उनके मैं सदा ही सन्निकट रहता हूँ॥९॥