गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* रामगीता (२) * ४०३
उससे सम्बद्ध होनेके कारण कूटस्थ, निरंजन, अक्षरब्रह्मको तत्त्वतः नहीं जान पाते॥ २०-२१ ॥
अनात्मन्यात्मविज्ञानं तस्माद्दुःखं तथेतरत्।
रागद्वेषादयो दोषाः सर्वभ्रान्तिनिबन्धनाः॥ २२॥
अनात्मतत्त्वमें आत्माकी (भ्रान्ति) बुद्धि होनेसे ही दुःख और सुख होते हैं। राग-द्वेष आदि दोष भी उसी भ्रान्तिसे जुड़े रहते हैं॥ २२॥
कार्ये ह्यस्य भवेदेषा पुण्यापुण्यमिति श्रुतिः।
तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः॥ २३॥
इसी कारण कर्ममें पाप-पुण्यका समावेश शास्त्रानुसार हो जाता है और उसके वशीभूत सभीको देह धारण करना पड़ता है॥ २३॥
नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः।
एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः॥ २४॥
आत्मा तो नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ, दोषरहित और एक (अद्वितीय) है, किंतु मायाकी शक्तिसे उसमें भेद प्रतीत होता है, स्वभावतः नहीं॥ २४॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः।
भेदोऽव्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया॥ २५॥
इसलिये ज्ञानीजन यथार्थमें अद्वैतकी ही सत्ता कहते हैं, किंतु माया आत्माके साथ लगी रहनेके कारण वह अव्यक्त आत्मा भी स्वभावतः भेदवाली प्रतीत होती है॥ २५॥
यथा हि धूमसम्पर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत्।
अन्तःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्न लिप्यते॥ २६॥
जैसे धुएँके सम्पर्कसे आकाश मलिन नहीं हो जाता (स्वभावतः स्वच्छ बना रहता है), उसी प्रकार अन्तःकरणमें उठनेवाले (राग-द्वेषादि) भावोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता॥ २६॥