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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 408
  • रामगीता (२) * ४०७

योगात्सञ्जायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रजायते।
योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित्॥ ४३॥
योगसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और ज्ञानसे योग परिपुष्ट होता है। योग और ज्ञानसे युक्त साधकके लिये कुछ भी अप्राप्त नहीं रहता॥ ४३॥

यदेव योगिनो याति सांख्यं तदभिगम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित्॥ ४४॥
जिस परमपदको योगीजन प्राप्त करते हैं, ज्ञानी भी वही प्राप्त करते हैं। जो योग और सांख्यको एकरूप देखते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानी हैं॥ ४४॥

अन्ये च योगिनो वत्स ऐश्वर्यासक्तचेतसः।
मज्जन्ति तत्र तत्रैव सत्वात्मैक्यमिति श्रुतिः॥ ४५॥
[श्रीरामजी बोले—] हे वत्स! अन्य (दिखावटी) योगीजन तो धन-सम्पत्तिमें आसक्त-चित्तवाले होते हैं और वे उसीमें नष्ट हो जाते हैं। श्रुतिका कथन है कि आत्माकी एकताका बोध ही वास्तवमें प्राप्य परमपद है॥ ४५॥

यत्तत्सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत्।
ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात्॥ ४६॥
ज्ञानयोगसे युक्त साधक देहान्त होनेपर उस सर्वव्यापी, दिव्य, महान्, अचल परमैश्वर्य पदको प्राप्त करते हैं॥ ४६॥

एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः।
कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः॥ ४७॥
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धोऽजरोऽमरः।
सर्वतः पाणिपादोऽहमन्तर्यामी सनातनः॥ ४८॥
मैं अव्यक्त आत्मा हूँ, मैं मायापति परमेश्वर हूँ, मैं सर्वव्यापी और सबकी आत्मा हूँ—ऐसा सभी शास्त्रोंमें कहा गया है। मैं ही