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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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रामगीता-( २ )

[एक रामगीता अद्भुतरामायणके अन्तर्गत भी प्राप्त होती है, वहाँ इसका विस्तार अध्याय ११ से अध्याय १४ तक है। सीताहरणके पश्चात् ऋष्यमूकपर्वतपर विराजमान भगवान् श्रीराम हनुमान्‌जीके द्वारा जिज्ञासा करनेपर अपने तात्त्विक स्वरूपका जो उन्हें उपदेश देते हैं, वही रामगीताके नामसे विख्यात है, इसीके साथ ही इसमें सांख्य, योग एवं वेदान्ततत्त्वका प्रतिपादन करनेके बाद भक्तियोगका विवेचन किया गया है। अन्तिम अध्यायमें भगवान्‌ने अपनी विभूतियोंका प्रभावी वर्णन किया है। इस रामगीताको भी यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है—]

पहला अध्याय

भगवान् श्रीरामद्वारा हनुमान्‌जीको सांख्ययोगका उपदेश

रामः प्राह हनूमन्तमात्मानं पुरुषोत्तमः ।
वत्स वत्स हनूमंस्त्वं भक्तो यत्पृष्टवानसि ॥ १ ॥
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मम ।
अवाच्यमेतद्विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम् ॥ २ ॥

पुरुषोत्तम श्रीरामने अपने भक्त हनुमान्‌से कहा—हे वत्स हनुमान्! तुम मेरे भक्त हो, अतः जो तुमने पूछा है, उसे मैं बता रहा हूँ। मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो। यह सनातन विज्ञान अपनेमें गोपनीय और यत्र-तत्र कहनेयोग्य नहीं है ॥ १-२ ॥

यन्न देवा विजानन्ति यतन्तोऽपि द्विजातयः ।
इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूता द्विजोत्तमाः ॥ ३ ॥

इस विज्ञानको देवता और प्रयत्नशील द्विज साधक भी नहीं जानते। इसी ज्ञानका आश्रय लेकर श्रेष्ठ ब्राह्मण ब्रह्मस्वरूप हो गये ॥ ३ ॥