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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 406

* रामगीता (२) * ४०५

बना रहता है, तब उसे आत्मतत्त्वकी उपलब्धि होती है॥ ३२॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते स्वयम्॥ ३३॥
जब वह (योगी) सभी प्राणी-पदार्थोंको स्वयं अपने भीतर और स्वयंको सभीमें देखने लगता है, तब वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ ३३॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभि पश्यति।
एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः॥ ३४॥
जब वह अन्य प्राणी-पदार्थोंको अपने भीतर ही देखता, तब अन्य की सत्तासे रहित परमात्मासे एकीभूत हुआ वह योगी केवलीभावको प्राप्त हो जाता है॥ ३४॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः।
तदासाममृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः॥ ३५॥
जब उस योगीके हृदयसे सम्पूर्ण कामनाओंका लोप हो जाता है, तब वह प्रज्ञासम्पन्न अमृतत्वको प्राप्त होकर परम कल्याणका भागी हो जाता है॥ ३५॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ ३६॥
जब विभिन्न भूत-पदार्थोंमें योगीकी एकत्व दृष्टि हो जाती है, तब उसी (दृष्टि)-का विस्तार होकर उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है॥ ३६॥
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः।
मायामात्रं जगत्कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः॥ ३७॥
जब वह योगी यथार्थ रूपमें केवल आत्माके अस्तित्वको देखने लगता है और सम्पूर्ण (बाह्य) जगत्को मायामात्र जान लेता है, तब उसे परमशान्ति प्राप्त होती है॥ ३७॥