ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextदूसरा पाद
पहले पादमें उपासनाविषयक निर्णय करके जिन जीवन्मुक्त महापुरुषोंका
ब्रह्मलोकादिमें गमन नहीं होता, उनको किस प्रकार परमात्माकी प्राप्ति होती है,
इस विषयपर विचार किया गया। अब इस दूसरे पादमें, जो ब्रह्मविद्याके उपासक
ब्रह्मलोकमें जाते हैं, उनकी गतिका प्रकार बताया जाता है। साधारण मनुष्यों-
की और ब्रह्मविद्याके उपासककी गतिमें कहाँतक समानता है, यह स्पष्ट करनेके
लिये पहले साधारण गतिके वर्णनसे प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ॥ ४ । २ । १ ॥
वाक्=वाणी; मनसि=मनमे स्थित हो जाती है; दर्शनात्=प्रत्यक्ष देखनेसे;
च=और; शब्दात्=वेद-वाणीसे भी यह बात सिद्ध होती है।
व्याख्या—श्रुतिमे यह कहा गया है कि—'अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो
वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्।' 'इस
मनुष्यके मरकर एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाते समय वाणी मनमे स्थित होती है,
मन प्राणमे और प्राण तेजमे तथा तेज परदेवतामे स्थित होता है।' (छा० उ०
६ । ८ । ६) इस वाक्यमे जो वाणीका मनमे स्थित होना कहा गया है, वह
वाक्-इन्द्रियका ही स्थित होना है, केवल उसकी वृत्तिमात्रका नहीं; क्योंकि यह
प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मरणासन्न मनुष्यमे मन विद्यमान रहते हुए ही वाक्-इन्द्रिय-
का कार्य बंद हो जाता है तथा श्रुतिमे तो स्पष्ट शब्दोंमें यह बात कही ही है।
सम्बन्ध—'वाणी मनमें स्थित हो जाती है', यह कहनेके बाद वहाँ अन्य
इन्द्रियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा गया। केवल मनकी प्राणमे स्थिति बतायी
गयी, अतः अन्य इन्द्रियोंके विषयमें क्या समझना चाहिये ? इसपर कहते हैं—
अत एव च सर्वाण्यनु ॥ ४ । २ । २ ॥
अत एव=इसीसे; च=यह भी (समझ लेना चाहिये कि); अनु=उनके
साथ-साथ; सर्वाणि=समस्त इन्द्रियाँ (मनमें स्थित हो जाती हैं)।
व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्मे कहा है कि—'तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भव-
मिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः।' 'अर्थात् जिसके शरीरकी गरमी शान्त हो चुकी है,