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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages
Page 496Permalink

खा लेता है. संध्या आदि नित्य कर्म इष्ट और किसी प्रयोजन से किए जाने वाले यज्ञ आदि
कर्म आपूर्त कहलाते हैं. (१)
पयश्च वा एष रसं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वोऽतिथेरश्नाति.. (२)
जो अतिथियों से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों के दूध और रस को नष्ट करता
है. (२)
ऊर्जां च वा एष स्फातिं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (३)
जो व्यक्ति अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने घरों के बल और समृद्धि का
नाश करता है. (३)
प्रजां च वा एष पशूंश्च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (४)
जो अतिथि से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों की संतान और पशुओं का भक्षण
करता है. (४)
कीर्तिं च वा एष यशश्च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (५)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की कीर्ति और यश को समाप्त
करता है. (५)
श्रियं च वा एष संविदं च गृहाणामश्नाति यः पूर्वो ऽ तिथेरश्नाति.. (६)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की श्री और सौमनस्य का विनाश
करता है. (६)
एष वा अतिथिर्यच्छ्रोत्रियस्तस्मात् पूर्वो नाश्नीयात्.. (७)
श्रोत्रिय ब्राह्मण ही वास्तव में अतिथि है. यजमान को चाहिए कि उस से पूर्व भोजन नहीं
करे. (७)
अशितावत्यतिथावश्नीयाद् यज्ञस्य सात्मत्वाय यज्ञस्याविच्छेदाय तद्
व्रतम्.. (८)
अतिथि के भोजन कर लेने पर ही यजमान भोजन करे. यज्ञ के निर्वाह एवं यज्ञ का
विच्छेद न होने के लिए ही यह व्रत है. (८)
एतद् वा उ स्वादीयो यदधिगवं क्षीरं वा मांसं वा तदेव नाश्नीयात्.. (९)
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सूक्त-९ देवता—अतिथि, विद्या

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चाहे जितना स्वादिष्ट हो, पर यजमान को गाय का दूध और मांस नहीं खाना चाहिए.
(९)
सूक्त-९ देवता—अतिथि, विद्या
स य एवं विद्वान् क्षीरमुपसिच्योपहरति.. (१)
जो इस बात को जानता है, वह दूध का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (१)
यावदग्निष्टोमेनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (२)
यजमान अग्निष्टोम यज्ञ के द्वारा स्वर्ग में जितना समृद्धिपूर्ण स्थान पा सकता है, उतना
ही अतिथि सेवा के द्वारा प्राप्त कर सकता है. (२)
स य एवं विद्वान्सर्पिरुपसिच्योपहरति.. (३)
इस का ज्ञाता घी का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता है. (३)
यावदतिरात्रेणेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (४)
अतिरात्र यज्ञ के द्वारा यजमान स्वर्ग में जितना समृद्धि पूर्ण पद प्राप्त कर सकता है,
उतना ही अतिथि सेवा के द्वारा प्राप्त करता है. (४)
स य एवं विद्वान् मधूपसिच्योपहरति.. (५)
जो इस बात को जानता है, वह मधुर शहद का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन
लाता है. (५)
यावत् सत्रसद्येनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (६)
यजमान सत्र यज्ञ कर के स्वर्ग में जो समृद्धि पूर्ण स्थान प्राप्त करता है, उसे अतिथि की
सेवा के द्वारा पाया जा सकता है. (६)
स य एवं विद्वान् मांसमुपसिच्योपहरति.. (७)
जो इस बात को जानता है, वह मांस का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (७)
यावद् द्वादशाहेनेष्ट्वा सुसमृद्धेनावरुन्द्धे तावदेनेनाव रुन्द्धे.. (८)
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यजमान बारह दिन तक चलने वाले यज्ञ के द्वारा स्वर्ग में जितना समृद्धि पूर्ण स्थान
पाता है, वही अतिथि की सेवा के द्वारा पा सकता है. (८)
स य एवं विद्वानुदकमुपसिच्योपहरति.. (९)
जो इस बात को जानता है, वह जल का उपसेचन कर के अतिथि के लिए भोजन लाता
है. (९)
प्रजानां प्रजननाय गच्छति प्रतिष्ठां प्रियः प्रजानां भवति य एवं
विद्वानुदकमुपसिच्योपहरति.. (१०)
जो इस बात को जानता है और जल का उपसेचन कर के अतिथि के हेतु भोजन लाता
है, वह संतान को जन्म देने की क्षमता प्राप्त करता है, प्रतिष्ठा पाता है और प्रजाओं का प्रिय
बनता है. (१०)
सूक्त-१० देवता—अतिथि, विद्या
तस्मा उषा हिङ्कृणोति सविता प्र स्तौति.. (१)
उषा उस के लिए हुंकार करती है और सूर्य उस की स्तुति करता है. (१)
बृहस्पतिरूर्जयोद् गायति त्वष्टा पुष्ट्या प्रति हरति विश्वे देवा निधनम्..
(२)
अन्न के रस से उत्पन्न ऊर्जा से बृहस्पति उदगायन करते हैं, त्वष्टा पुष्टि प्रदान करते हैं
और विश्वे देव पूर्णता प्रदान करते हैं. (२)
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (३)
जो इस बात को जानता है, वह सेवकों, संतानों और पशुओं के पालन की पूर्णता प्राप्त
करता है. (३)
तस्मा उद्यन्सूर्यो हिङ्कृणोति संगवः प्र स्तौति.. (४)
उदय होते हुए सूर्य उस के लिए हुंकार करते हैं और किरणों वाले सूर्य उस की प्रशंसा
करते हैं. (४)
मध्यन्दिन उद्गायत्यपराह्नः प्रति हरत्यस्तंयन् निधनम्.
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (५)
सूर्य माध्यंदिन अर्थात् दोपहर के समय उस की प्रशंसा करते हैं और दोपहर के बाद उस
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की मृत्यु का विनाश करते हैं. जो इस बात को जानता है, वह समृद्धि की प्रजाओं और
पशुओं को प्राप्त करता है. (५)
तस्मा अभ्रो भवन् हिङ्कृणोति स्तनयन् प्र स्तौति.. (६)
उत्पन्न होने वाला बादल उस के लिए हुंकार करता है और गर्जन करता हुआ उस की
प्रशंसा करता है. (६)
विद्योतमानः प्रति हरति वर्षन्नुद्गायत्युद्गृह्णन् निधनम्.
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (७)
बादल दमकता हुआ उस का प्रतिहार करता है, बरसता हुआ उद्गान करता है तथा
उद्ग्रहण करता हुआ उसे पूर्णता प्रदान करता है. जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजाओं और
पशुओं की संपन्नता प्राप्त करता है. (७)
अतिथीन् प्रति पश्यति हिङ्कृणोत्यभि वदति प्र स्तौत्युदकं
याचत्युद्गायति.. (८)
वह अतिथियों को देखता है तो उन्हें बुलाता है, अभिवादन करता है, जल प्रस्तुत करता
है और उन की प्रशंसा करता है. (८)
उप हरति प्रति हरत्युच्छिष्टं निधनम्.. (९)
वह अशेष पूर्णता का उपहार और प्रतिहार करता है. (९)
निधनं भूत्याः प्रजायाः पशूनां भवति य एवं वेद.. (१०)
जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजा और पशुओं की समृद्धि की अंतिम अवस्था को
प्राप्त करता है. (१०)
सूक्त-११ देवता—अतिथि, विद्या
यत् क्षत्तारं ह्वयत्या श्रावयत्येव तत्.. (१)
जो क्षत्ता अर्थात् इच्छित कार्य करने वाले का आह्वान करता है, वह श्रुति को ही सुनाता
है. (१)
यत् प्रतिशृणोति प्रत्याश्रावयत्येव तत्.. (२)
जो प्रतिज्ञा करता है, वही श्रुति को सुनाने का आग्रह करता है. (२)
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यत् परिवेष्टारः पात्रहस्ताः पूर्वे चापरे च प्रपद्यन्ते चमसाध्वर्यव एव ते..
(३)
हाथों में पात्र लिए जो परोसने वाले आगेपीछे चलते हैं, वे ही यज्ञ के चमस और अध्वर्यु
हैं. (३)
तेषा नं कश्चनाहोता.. (४)
उन अतिथियों में कोई भी ऐसा नहीं है जो होता अर्थात् हवन करने वाला न हो. (४)
यद् वा अतिथिपतिरतिथीन् परिविष्य गृहानुणेदैत्यवभृथमेव तदुपावैति..
(५)
जो अतिथि सत्कार कर्ता अतिथियों को भोजन परोस कर घरों में आता है, वह यज्ञ के
पश्चात होने वाले अवभृथ स्नान का फल प्राप्त करता है. (५)
यत् सभागयति दक्षिणाः सभागयति यदनुतिष्ठत उदवस्यत्येव तत्.. (६)
जो यजमान भोज्य पदार्थों को अलगअलग करता हुआ तथा दक्षिणा देता हुआ
अनुष्ठान करता है, वह उदवास करता है. (६)
स उपहूतः पृथिव्यां भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यत् पृथिव्यां विश्वरूपम्.. (७)
वह बुला कर पृथिवी के समस्त प्राणियों को भोजन कराता है, उस अतिथि सत्कार में
मानो विश्वरूप ही बुलाए जाते हैं. (७)
स उपहूतो ऽ न्तरिक्षे भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यदन्तरिक्षे विश्वरूपम्.. (८)
वह बुलाने पर स्वर्ग में भोजन करता है. अंतरिक्ष में जो विश्वरूप है, वह उस के यहां
बुलाया जाता है. (८)
स उपहूतो दिवि भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद् दिवि विश्वरूपम्.. (९)
वह बुलाए जाने पर स्वर्ग में भक्षण करता है. स्वर्ग में जो विश्वरूप है, उस में वह बुलाया
जाता है. (९)
स उपहूतो देवेषु भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद् देवेषु विश्वरूपम्.. (१०)
वह बुलाए जाने पर देवों के मध्य भोजन करता है. देवों में जो विश्वरूप है, उस में वह
बुलाया जाता है. (१०)
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स उपहूतो लोकेषु भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यल्लोकेषु विश्वरूपम्.. (११)
वह बुलाया गया लोकों में भोजन करता है. लोकों में जो विश्वरूप है, उस में वह बुलाया
जाता है. (११)
स उपहूत उपहूत:.. (१२)
वह इस लोक और परलोक दोनों में आदर से बुलाया जाता है. (१२)
आप्नोतीमं लोकमाप्नोत्यमुम्.. (१३)
वह इस लोक को और परलोक को प्राप्त करता है. (१३)
ज्योतिष्मतो लोकान्जयति य एवं वेद.. (१४)
जो इस बात को जानता है, वह ज्योतिर्मय लोकों को जीतता है. (१४)
सूक्त-१२ देवता—गौ
प्रजापतिश्च परमेष्ठी च शृङ्गे इन्द्रः शिरो अग्निर्ललाटं यमः कृकाटम्.. (१)
इस गाय के दोनों सींग प्रजापति और परमेष्ठी हैं. इंद्र ही इस का सिर, अग्नि ललाट और
यम कृकाट अर्थात् गले के नीचे लटकता हुआ भाग है. (१)
सोमो राजा मस्तिष्को द्यौरुत्तरहनुः पृथिव्यधरहनुः.. (२)
सोम राजा गाय का मस्तक है, द्यौ ऊपर की ठोड़ी और धरती ठोड़ी का ऊपर वाला
भाग है. (२)
विद्युज्जिह्वा मरुतो दन्ता रेवतीर्ग्रीवाः कृत्तिका स्कन्धा घर्मो वहः.. (३)
बिजली गाय की जीभ, मरुद्गण, दांत, रेवती नक्षत्र गरदन, कृत्तिका नक्षत्र कंधा और
धर्म रक्त का प्रवाह है. (३)
विश्वं वायुः स्वर्गो लोकः कृष्णद्रं विधरणी निवेश्यः.. (४)
विश्व वायु, स्वर्गलोक तथा कृष्णाद्रि विधरणी (धारक शक्ति) निवेश्य (पृष्ठ भाग) है. (४)
श्येनः क्रोडो ३ न्तरिक्षं पाजस्यं १ बृहस्पतिः ककुद् बृहतीः कीकसाः..
(५)
श्येन गाय का क्रोड अर्थात् कोख अथवा बगल, अंतरिक्ष पाजस्य (उदर), बृहस्पति
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ककुद, अर्थात् ठाट तथा बृहती छंद हड्डियां हैं. (५)
देवानां पत्नी: पृष्टय उपसद: पर्शव:.. (६)
देवों की पत्नियां गाय की पसलियां हैं और उपसद उस की कोखें हैं. (६)
मित्रश्च वरुणश्चांसौ त्वष्टा चार्यमा च दोष्णी महादेवो बाहू.. (७)
मित्र और वरुण गाय के कंधे हैं, त्वष्टा तथा अर्यमा गाय की भुजाएं अर्थात् अगले पैर हैं
तथा महादेव बाहु हैं. (७)
इन्द्राणी भसद् वायु: पुच्छं पवमानो बाला:.. (८)
इंद्राणी गाय की कमर है. वायु पूंछ है और पवमान बाल हैं. (८)
ब्रह्म च क्षत्रं च श्रोणी बलमूरू.. (९)
ब्राह्मण और क्षत्रिय गाय के नितंब हैं तथा बल उस की जंघाएं हैं. (९)
धाता च सविता चाष्ठीवन्तौ जङ्घा गन्धर्वा
अप्सरस: कुष्ठिका अदिति: शफा:.. (१०)
धाता और सविता गाय के होंठ, गंधर्व जंघाएं, अप्सराएं कोखें और अदिति शफ अर्थात्
खुर हैं. (१०)
चेतो हृदयं यकृन्मेधा व्रतं पुरीतत्.. (११)
चेत गाय का हृदय, यकृत अर्थात् जिगर मेधा अर्थात् बुद्धि है तथा व्रत पुरीतत (आंत)
नाड़ी है. (११)
क्षुत् कुक्षिरिरा वनिष्ठ: पर्वता: प्लाशय:.. (१२)
पर्वत बैल की प्लाशि (छोटी आंत) है, इरा उस की बड़ी आंत है और भूख के अभिमानी
देवता इस की कोख हैं. (१२)
क्रोधो वृक्कौ मन्युराण्डौ प्रजा शेप:.. (१३)
क्रोध इस के गुरदे हैं, मन्यु इस के अंडकोष हैं और प्रजा इस का जननांग है. (१३)
नदी सूत्री वर्षस्य पतय स्तना स्तनयित्नुरूध:.. (१४)
नदी इस गाय का मूत्र, वर्ष के स्वामी इस के थन और मेघगर्जन इस का एन है. (१४)
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विश्वव्यचाश्चर्मौषधयो लोमानि नक्षत्राणि रूपम्.. (१५)
विश्वव्यचा इस का चर्म है, जड़ीबूटियां इस के लोम हैं तथा नक्षत्र इस का रूप है. (१५)
देवजना गुदा मनुष्या आन्त्रान्यत्रा उदरम्.. (१६)
देवजन इस की गुदा, मनुष्य आंतें तथा अन्न उदर है. (१६)
रक्षांसि लोहितमितरजना ऊबध्यम्.. (१७)
राक्षस इस के लोहित अर्थात रक्त और अन्य जन इस के ऊवध्य हैं. (१७)
अभ्रं पीबो मज्जा निधनम्.. (१८)
बादल इस का मोटापा है तथा निधन मज्जा अर्थात् चरबी है. (१८)
अग्निरासीन उत्थितो ऽ श्विना.. (१९)
अग्नि इस की बैठी हुई दशा और दोनों अश्विनीकुमार इस की उठी हुई दशा हैं. (१९)
इन्द्रः प्राङ् तिष्ठन् दक्षिणा तिष्ठन् यमः.. (२०)
इंद्र इस का पूर्व दिशा में तथा यम इस का दक्षिण दिशा में ठहरना है. (२०)
प्रत्यङ् तिष्ठन् धातोदङ् तिष्ठन्त्सविता.. (२१)
पूर्व दिशा में गाय का ठहरना इंद्र तथा दक्षिण दिशा में ठहरी हुई गाय यम है. (२१)
तृणानि प्राप्तः सोमो राजा.. (२२)
पश्चिम दिशा में ठहरी हुई गाय और उत्तर दिशा में ठहरी हुई गाय सविता हैं. (२२)
मित्र ईक्षमाण आवृत्त आनंदः.. (२३)
गाय को घास के तिनकों की प्राप्ति सोम राजा है. (२३)
युज्यमानो वैश्वदेवो युक्तः प्रजापतिर्विमुक्तः सर्वम्.. (२४)
गाय का देखना मित्र और लौटना आनंद है. (२४)
एतद् वै विश्वरूपं सर्वरूपं गोरूपम्.. (२५)
विश्व का यह रूप ही गाय का रूप है. (२५)
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उपैनं विश्वरूपाः सर्वरूपाः पशवस्तिष्ठन्ति य एवं वेद.. (२६)
जो इस बात को जानता है, वह सारे संसार के सभी रूपों वाले पशुओं का स्वामी बनता है. (२६)
सूक्त-१३ देवता—सर्व शीर्षामय
दूरीकरण
शीर्षक्तिं शीर्षामयं कर्णशूलं विलोहितम्.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (१)
हम तेरे शीश के रोगों अर्थात् शीर्षोक्ति, शीर्षामय और कर्ण शूल तथा विलोहित को तुझ से दूर करते हैं. (१)
कर्णाभ्यां ते कङ्कूषेभ्यः कर्णशूलं विसल्पकम्.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (२)
मैं तेरे कानों से तथा कानों के गड़ढों से कर्णशूल अर्थात् कानों के दर्द को तथा विसल्पक (विशेष कष्ट देने वाले)को दूर करता हूं. इस प्रकार मैं तेरे शीश संबंधी सभी रोगों को दूर करता हूं. (२)
यस्य हेतोः प्रच्यवते यक्ष्मः कर्णात आस्यतः.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (३)
जिस सिर रोग के कारण यक्ष्मा रोग, कानों और मुख से प्रकाश में आता है, हम तेरे उस सिर रोग को पूर्णतया बाहर निकालते हैं. (३)
यः कृणोति प्रमोतमन्धं कृणोति पूरुषम्.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (४)
जो रोग पुरुष को शक्तिहीन बनाता है और अंधा कर देता है, तेरे उन सभी शीश संबंधी रोगों को मैं तुझ से बाहर निकालता हूं. (४)
अङ्गभेदमङ्गञ्च्वरं विश्वाङ्ग्यं विसल्पकम्.
सर्वं शीर्षण्यां ते रोगं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (५)
अंग भेद, अंग ज्वर, विश्वांग्य एवं विसल्पक—ये सभी शीश संबंधी रोग हैं. हम इन्हें पूर्ण रूप से तुझ से दूर करते हैं. (५)
यस्य भीमः प्रतीकाश उद्वेपयति पूरुषम्.
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तक्मानं विश्वशारदं बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (६)
जिस का भयानक आवेश मनुष्य को कंपित कर देता है, शरद ऋतु में होने वाले उस
ज्वर को हम तुझ से पूर्ण रूप से दूर करते हैं. (६)
य ऊरू अनुसर्पत्यथो एति गवीनिके.
यक्ष्मं ते अन्तरङ्गेभ्यो बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (७)
जो गवीनिका नाम की नाड़ियों में तथा जंघाओं में घूमता है, उस यक्ष्मा रोग को हम तेरे
अंतरंग अंगों से बाहर निकालते हैं. (७)
यदि कामादपकामाद्धृदयाज्जायते परि.
हृदो बलासमङ्गेभ्यो बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (८)
हृदय की शक्ति कम करने वाला जो रोग काम के वश में होने अथवा न होने से उत्पन्न
होता है, उस बलास (कफ) रोग को हम तेरे अंगों से बाहर निकालते हैं. (८)
हरिमाणं ते अङ्गेभ्यो ऽ प्वामन्तरोदरात्. यक्ष्मोधामन्तरात्मनो
बहिर्निर्मन्त्रयामहे.. (९)
हम तेरे अंगों से हरिमा (रक्तहीनता) रोग को, तेरे उदर से अप्वा (जलोदर) रोग को तथा
तेरी अंतरात्मा से यक्ष्मा रोग को पूर्णतया बाहर निकालते हैं. (९)
आसो बलासो भवतु मूत्रं भवत्वामयत्.
यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१०)
बलास रोग नष्ट हो तथा मूत्र रोग समाप्त हो. सभी रोगों का विष यक्ष्मा रोग है, उसे मैं
तुझ से दूर करता हूं. (१०)
बहिर्बिलं निर्द्रवतु काहाबाहं तवोदरात्.
यक्ष्माणां सर्वेषां विष निरवोचमहं त्वत्.. (११)
काहावाह नामक (फड़फड़ाने वाला) रोग तेरे पेट से बाहर निकल जाए. मैं सभी प्रकार
के यक्ष्मा रोगों के विष को तुझ से बाहर करता हूं. (११)
उदरात् ते क्लोम्नो नाभ्या हृदयादधि.
यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१२)
हम तेरे उदर से, क्लोम से, नाभि से और हृदय से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालते हैं जो
सभी विषों का विष है. (१२)
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याः सीमानं विरुजन्ति मूर्धानं प्रत्यर्षणीः.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१३)
जो अंडकोषों को पीड़ित करने वाली एवं मस्तक का निर्माण करने वाली हड्डियां
विकार रहित हैं, वे तेरे शरीर का त्याग न करें. (१३)
या हृदयमुपर्षन्त्यनुतन्वन्ति कीकसाः.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१४)
कीकस नाम की जो अस्थियां हृदय के ऊपरी और निचले भाग में फैली हुई हैं, वे रोग
रहित अस्थियां हिंसा न करती हुई तुम्हारे शरीर से बाहर न जाएं. (१४)
याः पार्श्वे उपर्षन्त्यनुनिष्खन्ति पृष्टीः.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१५)
जो अस्थियां दोनों पसलियों की ओर जाती हैं तथा पीठ वाले भाग को सशक्त बनाती
हैं, वे रोगरहित रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१५)
यास्तिरश्चीरुपर्षन्त्यर्षणीर्वक्षणासु ते.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१६)
जो अस्थियां तिरछी स्थित हैं एवं वक्षणाओं (पेड़ू और जांघों के बीच के भाग) से
संबंधित हैं, वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई एवं नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें.
(१६)
या गुदा अनुसर्पन्त्यान्त्राणि मोहयन्ति च.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१७)
गुदा के पीछे फैली एवं आंतों को सहारा देने वाली जो अस्थियां हैं, वे रोग रहित रहती
हुई तथा तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१७)
या मज्ज्ञो निर्धयन्ति परूंषि विरुजन्ति च.
अहिंसन्तीरनामया निर्द्रवन्तु बहिर्बिलम्.. (१८)
जो अस्थियां गांठों का निर्माण करती हैं तथा जो मज्जा अर्थात् चर्बी से स्निग्ध होती हैं,
वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई और नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१८)
ये अङ्गानि मदयन्ति यक्ष्मासो रोपणास्तव.
यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (१९)
मैं ने तुझे वे सभी ओषधियां बता दी हैं जो अंगों को स्वस्थ बनाती हैं एवं यक्ष्मा रोग को
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समाप्त करती हैं. मैं ने यक्ष्मा रोग के समस्त विषों का निवारण करने वाली ओषधियां भी तुझे
बता दी हैं. (१९)
विसल्पस्य विद्रधस्य वातीकारस्य वालजेः.
यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत्.. (२०)
मैं तेरे लिए विसल्प (पीड़ा), विद्ध (सूजन), वातीकार एवं वालजि (संधि) नामक समस्त
यक्ष्मा रोगों के विषयों को नष्ट करने वाले मंत्रों का उच्चारण कर चुका हूं. (२०)
पादाभ्यां ते जानुभ्यां श्रोणिभ्यां परि भंससः.
अनूकादर्षणीरुष्णिहाभ्यः शीर्ष्णो रोगमनीनशम्.. (२१)
मैं ने तेरी जंघाओं, पैरों, घुटनों, अनूक, उष्णिहा एवं शीश संबंधी समस्त रोगों का
विनाश कर दिया है. (२१)
सं ते शीर्ष्णः कपालानि हृदयस्य च यो विधुः.
उद्यन्नादित्य रश्मिभिः शीर्ष्णो रोगमनीनशो ऽ ङ्गभेदमशीशमः.. (२२)
तेरे शीश पर

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इमं रथमधि ये सप्त तस्थुः सप्तचक्रं सप्त वहन्त्यश्वाः.
सप्त स्वसारो अभि सं नवन्त यत्र गवां निहिता सप्त नामा.. (३)
सूर्य के सात पहियों वाले रथ को सात घोड़े खींचते हैं. सात ऋषि इस रथ के समीप
खड़े रहते हैं. सात बहनें सूर्य की स्तुति करती हैं. किरणों रूपी सात गाएं सूर्य के रथ से
संबंधित हैं, जो इसे रस युक्त बनाती हैं. (३)
को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति.
भूम्या असुरसृगात्मा क्वस्वित् को विद्वांसमुप गात् प्रष्टुमेतत्.. (४)
सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाले अस्थिरहित को किस ने देखा था जो समस्त विश्व को धारण
करता है? भूमि को प्राणवंत करने वाले जल की आत्मा कहां स्थित है? इस बात को पूछने
के लिए विद्वान् के समीप कौन गया था? (४)
इह ब्रवीतु य ईमङ्ग वेदास्य वामस्य निहितं पदं वेः.
शीर्ष्णः क्षीरं दुहते गावो अस्य वव्रिं वसाना उदकं पदा ऽ पुः.. (५)
इन सूर्य के विषय में जो जानता हो, वह बताए कि इन के चरण आकाश में कहां स्थित
हैं? गाएं इन्हीं सूर्य के मंडल में दूध दुहाती हैं तथा वे गाएं इन्हीं सूर्य की किरणों के द्वारा जल
पीती हैं. (५)
पाकः पृच्छामि मनस ऽ विजानन् देवानामेना निहिता पदानि.
वत्से बष्कये ऽ धि सप्त तन्तून् वि तत्निरे कवय ओतवा उ.. (६)
सूर्य के रूप को पूर्ण रूप से न जानता हुआ मैं अपने मन से पूछता हूं कि समस्त देवों
के रक्षासाधन इन सूर्य में ही निहित हैं. विद्वानों ने सूर्य देव के विस्तार के हेतु सात तंतु
स्थापित कर दिए हैं. (६)
अचिकित्वांश्र्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मनो न विद्वान्.
वि यस्तस्तम्भ षडिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम्.. (७)
अज्ञानी मैं विद्वानों और ज्ञानियों से पूछता हूं कि जिस ने छः रजोगुणी तत्त्वों को स्तंभित
किया है, वह अजन्मा क्या एक ही है? मैं संदेह में पड़ा हूं. और संदेहरहित जनों से अपना
संदेह निवारण करना चाहता हूं. (७)
माता पितरमृत आ बभाज धीत्यग्रे मनसा सं हि जग्मे.
सा बीभत्सुर्गर्भरसा निविद्धा नमस्वन्त इदुपवाकमीयुः.. (८)
सूर्य के जन्म लेते समय ही उन की माता उन के पिता की सेवा करती है. इस के फल
स्वरूप वह बुद्धि और मन से युक्त हो जाती है एवं गर्भरूपी रस से निबद्ध हो जाती है. हवि
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का अन्न लिए हुए मनुष्य इस कथा के समीप पहुंच जाते हैं. (८)
युक्ता मातासीद् धुरिदक्षिणाया अतिष्ठद् गर्भो वृजनीष्वन्तः.
अमीमेद् वत्सो अनु गामपश्यद् विश्वरूप्यं त्रिषु योजनेषु.. (९)
माता दक्षिण दिशा में स्थित हुई. इस के पश्चात बलवती नारियों में गर्भ स्थापित हुआ.
जन्म लेने के पश्चात बछड़ा गाय की ओर देखता हुआ रंभाने लगा. विश्वरूप तीन योजनों में
व्याप्त हुआ. (९)
तिस्रो मातृस्त्रीन् पितॄन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्त.
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदो वाचमविश्वविन्नाम्.. (१०)
तीन माताओं और तीन पिताओं को धारण करता हुआ सूर्य इन के मध्य में स्थित है.
विश्व का ज्ञान रखने वाले आकाश के पृष्ठ पर यही वाणी बोलते हैं, जिसे दूसरे लोग नहीं सुन
पाते. (१०)
पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने यस्मिन्नातस्थुर्भुवनानि विश्वा.
तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न च्छिद्यते सनाभिः.. (११)
पांच अरों वाला पहिया चलता है. उस में समस्त भुवन स्थित हैं. उस के अधिक भार को
सहने वाली धुरी स्वयं स्थापित नहीं होती. वह धुरी रूपी नाभि पुरानी होने पर टूटती नहीं है.
(११)
पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्.
अथेमे अन्य उपरे विचक्षणे सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितम्.. (१२)
बारह आकृतियों अर्थात् बारह मासों और पांच चरणों अर्थात् ऋतुओं वाले पिता अर्थात्
सूर्य को स्वर्ग के ऊपरी भाग में सोने वाला कहा गया है. अन्य चतुर जन इस में सात पहियों
और छः अरों को स्थित बताते हैं. (१२)
द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य.
आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विशतिश्च तस्थुः.. (१३)
बारह अरों वाला पहिया अर्थात् सूर्य स्वयं गति करता हुआ भी जीर्ण नहीं होता है. हे
अग्नि! सात सौ बीस युगल अर्थात् तीन सौ साठ दिन और रात के जोड़े उस के पुत्र रूप में
स्थित हैं. (१३)
सनेमि चक्रमजरं वि वावृत उत्तानायां दश युक्ता वहन्ति.
सूर्यस्य चक्षू रजसैत्यावृतं यस्मिन्नातस्थुर्भुवनानि विश्वा.. (१४)
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कभी प्राचीन न होने वाला बारह मासों रूपी अरों से युक्त सूर्य रूपी पहिया सदैव चलता
रहता है. दस घोड़े उस पहिए को आगे बढ़ाते हैं. सूर्य के नेत्र अंधकार से ढके होते हैं. उसी में
समस्त विश्व स्थित रहता है. (१४)
स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान् न वि चेतदन्धः.
कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत यस्ता विजानात् स पितुष्पिता ऽ सत्.. (१५)
सभी स्त्रियां उसी को ज्ञानी पुरुष कहती हैं, जो उन्हें क्षयहीन प्रतीत होता है. इस के
विपरीत दशा वाले पुरुष को वे ज्ञान शून्य समझती हैं. जो विद्वान् पुत्र इस बात को जानता है,
वह पालकों का भी पालन करता है. (१५)
साकंजानां सप्तथमाहुरेकजं षडिद्यमा ऋषयो देवजा इति.
तेषामिष्टानि विहितानि धामश स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः.. (१६)
देवों के साथ उत्पन्न ऋषि छः बताए गए हैं. ऋषि और देव बताते हैं कि यह छः एक से
ही उत्पन्न हुए हैं. इस के मनचाहे स्थान निश्चित हैं. ये अनेक प्रकार से विराजमान होते हैं.
(१६)
अवः परेण पर एना ऽ वरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्.
सा कद्रीची कं स्विदर्धं परागात् क्व स्वित् सूते नहि यूथे अस्मिन्.. (१७)
धवल वर्ण की गौ अगले पैर से अन्न को तथा पिछले पैर से अपने बछड़े को धारण
करती हुई उड़ती है. वह किसी आधे भाग में गई थी. वह इस झुंड में बच्चा नहीं देती. (१७)
अवः परेण पितरं यो अस्य वेदावः परेण पर एनावरेण.
कवीयमानः क इह प्र वोचद् देवं मनः कुतो अधि प्रजातम्.. (१८)
अगले पैरों के द्वारा इस के पिता अन्न को जानने वाला एवं पिछले पैरों के द्वारा पर को
जानने वाला दिव्य मन कहां से प्रकट हुआ? यह बात प्रजापति ने कही. (१८)
ये अर्वाञ्चस्ताँ उ पराच आहुर्ये पराञ्चस्ताँ उ अर्वाच आहुः.
इन्द्रश्च या चक्रथुः सोम तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति.. (१९)
जो नवीन हैं, वे प्राचीन के विषय में बताते हैं और जो प्राचीन हैं, वे नवीनों का परिचय
देते हैं. हे सोम! तुम और सोम जिन्हें स्थापित करते हैं, वे लोक को धारण करने में समर्थ
बनते हैं. (१९)
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते.
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति.. (२०)
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सुंदर पंखों वाले दो पक्षी अर्थात् आत्मा और परमात्मा एक ही संसार रूपी वृक्ष पर बैठे
हैं. इन में से एक अर्थात् आत्मा पीपल के स्वादिष्ट फलों को खाता है. दूसरा अर्थात् परमात्मा
पीपल के फलों को न खाता हुआ अपने दूसरे साथी को देखता है. (२०)
यस्मिन् वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते सुवते चाधि विश्वे.
तस्य यदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद.. (२१)
वृक्ष पर मधु का भक्षण करने वाले जो पक्षी बैठते हैं, वे विश्व का विस्तार करते हैं. जो
पीपल के फलों को स्वादिष्ट बताते हैं तथा जो अपने पालक पिता को नहीं जानते, वे विनाश
को प्राप्त होते हैं. (२१)
यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भक्षमनिमेषं विदथा ऽ भिस्रवन्ति.
एना विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश.. (२२)
जहां पक्षी कर्मों के अमृत के समान स्वादिष्ट फल समझते हैं, वे ही संसार की रक्षा करते
हैं और अंत में सूर्यलोक में प्रवेश करते हैं. (२२)
सूक्त-१५ देवता—गौ
यद् गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभं वा त्रैष्टुभान्निरतक्षत.
यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इत् तद् विदुस्ते अमृतत्त्वमानशुः.. (१)
गायत्र में गायत्र छिपा हुआ है और त्रैष्टुभ में त्रैष्टुभ व्याप्त है. जो लोग जगती में छिपे हुए
जगत् को जानते हैं, वे अमृत का उपभोग करते हैं. (१)
गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम्.
वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदा ऽ क्षरेण मिमते सप्त वाणीः.. (२)
गायत्र से अर्क अर्थात् सूर्य का निर्माण होता है. अर्क से साम का और त्रैष्टुभ से वाक का
निर्माण होता है. वाक् से वाक् को तथा द्विपदा एवं चतुष्पदा तथा अविनाशी ब्रह्म से
सप्तवाणी अर्थात् सात प्रकार के वेद के छंद निर्मित होते हैं. (२)
जगत् सिन्धुं दिव्यस्कभायद रथंतरे सूर्य पर्यपश्यत्.
गायत्रस्य समिधस्तिस्र आहुस्ततो मह्ना प्र रिरिचे महित्वा.. (३)
संसार के द्वारा सिंधु को द्यौलोक की ओर प्रेरित किया गया. ज्ञानियों ने रथंतर में सूर्य
का दर्शन किया. उन्होंने गायत्र यज्ञ की तीन समिधाएं बताईं. इस के पश्चात वे अपनी महत्ता
से ही वृद्धि को प्राप्त हुए. (३)
उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम्.

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श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नो ऽ भीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचत्.. (४)
शोभन हाथ से गायों को दोहने वाला मैं सरलता से दुही जाने वाली गाय का दूध दुहता
हुआ उसे अपने समीप बुलाता हूं. सविता ने मुझे श्रेष्ठ गौ प्रदान की है. उन्हीं में तेजस्वी धर्म
का कथन किया गया है. (४)
हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसा ऽ भ्यागात्.
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धता महते सौभगाय.. (५)
हुंकार करती हुई, धन से पालने योग्य एवं बछड़े की इच्छा करती हुई गौ धनवानों के
समीप पहुंची. हिंसा न करने योग्य यह गाय अश्विनीकुमारों के निमित्त दूध देती हुई हमें महान
सौभाग्य के लिए प्राप्त हो. (५)
गौरमीमेदभि वत्सं मिषन्तं मूर्धानं हिङ्ङकृणोन्मातवा उ
सृक्वाणं घर्ममभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः.. (६)
हुंकार करती हुई गाय उस बछड़े के समीप जा कर उसे सूंघती है जो उस की ओर
ताकता है. यह बताने के लिए कि यह बछड़ा मेरा ही है, यह गौ रंभाती है और अपने दूध से
उसे बढ़ाती है. (६)
अयं स शिङ्क्ते येन गौरभीवृता मिमाति मायुं ध्वसनावधि श्रिता.
सा चित्तिभिर्नि हि चकार मर्त्यान् विद्युद्भवन्ती प्रति वव्रिमौहत.. (७)
गरजते हुए मेघ ने वाणी को ढक लिया है. मेघ द्वारा ढकी हुई वाणी शब्द करती है. यही
वाणी मेघों से बिजली के रूप में प्रकट हो कर मनुष्यों को भयभीत करती है. (७)
अनच्छये तुरगातु जीवमेजद् ध्रुवं मध्य आ पस्त्यानाम्.
जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः.. (८)
यमलोक की पीड़ाओं के भय से कांपते हुए प्राणी के हृदय में जीव सांस लेता है.
मरणशील जीव अन्य मरणधर्मा प्राणियों का सयोनि अर्थात् समान शरीर वाला है एवं स्वधा
का भक्षण करता है. (८)
विधुं दद्राणं सलिलस्य पृष्ठे युवानं सन्तं पलितो जगार.
देवस्य पश्य काव्यं महित्व ऽ द्या ममार स ह्यः समान.. (९)
दमनशील एवं युवा चंद्रमा को सूर्य निगल जाता है. परमेश्वर की सृष्टि की महत्ता देखो
कि आज जो मर जाता है, कल वही जीवित हो कर सांस लेने लगता है. तात्पर्य यह है कि
आज छिप जाने वाला चंद्रमा दूसरे दिन फिर निकल आता है. (९)
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य ईं चकार न सो अस्य वेद य ईं ददर्श हिरुगिन्नु तस्मात्.
स मातुर्र्योना परिवीतो अन्तर्बहुप्रजा निर्ऋतिरा विवेश.. (१०)
जिस ने इस की रचना की है, वह इस के गर्भ को नहीं देखता. जो इस के गर्भ में जाता
है, वही इस को देखता है. माता की योनि से उत्पन्न बालक अनेक बार जन्ममरण रूपी पाप
देवता निर्ऋति के जाल में फंसता है. (१०)
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्.
स सध्रीची: स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (११)
मैं ने रक्षा करने वाली आत्मा को जन्ममरण के चक्र में घूमते देखा. मैं ने उसे इहलोक
और परलोक में एवं सत्व, रज, तम तीन गुणों में भ्रमण करते देखा. आत्मा अपने में व्याप्त
लोकों एवं इंद्रियों में भ्रमण करती है. (११)
द्यौर्नः पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्नो माता पृथिवी महीयम्.
उत्तानयोश्चम्वो ३ योनिरन्तरत्रा पिता दुहितुर्गर्भमाधात्.. (१२)
सृष्टि की रचना करने वाला एवं वीर्योत्पादक द्यौ भी हमारा पिता है. नाभि अर्थात् धरती
और आकाश का मध्य भाग मेरा भाई है. महीयसी पृथ्बी मेरी माता है. यह वर्षा के जल को
ओषधि के रूप में धारण करती है. आकाश और पृथ्वी सूत्र रूप में वायु को धारण करते हैं.
पिता रूपी द्यौ पृथ्वी में वर्षा रूपी गर्भ धारण करता है. (१२)
पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्याः पृच्छामि वृष्णो अश्वस्य रेतः.
पृच्छामि विश्वस्य भुवनस्य नाभिं पृच्छामि वाचः परमं व्योम.. (१३)
मैं तुम से पृथ्वि के अंतिम स्थान के विषय में पूछता हूं. मैं इच्छा पूर्ण करने वाले एवं
व्यापक परमेश्वर के विषय में पूछता हूं. मैं संपूर्ण भुवन की नाभि अर्थात् केंद्र के विषय में
पूछता हूं. मैं वाक् के परमव्योम में व्याप्त होने के विषय में भी पूछता हूं. (१३)
इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतः
अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिर्ब्रह्मा ऽ यं वाचः परमं व्योम.. (१४)
यह देवी पृथ्वी का परम अंत है. यह सोम इच्छापूर्ण करने वाले व्यापक विष्णु का वीर्य
है. यह यज्ञ समस्त भुवनों की नाभि अर्थात केंद्र है. ब्रह्म इस वाणी का परम व्योम है. (१४)
न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः संनद्धो मनसा चरामि.
यदा मागन् प्रथमजा ऋतस्यादिद् वाचो अश्रुवे भागमस्याः.. (१५)
मैं यह नहीं जानता कि मैं ही जानने योग्य परम ब्रह्म हूं तथा मैं द्वैताद्वैत संदेह में पड़ा
हुआ उसी के मध्य विचरण करता हूं. अतएव जो बुद्धि समस्त इंद्रियों में प्रमुख है, उस के
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द्वारा मैं यह जानता हूं कि मैं कार्य हूं अथवा कारण हूं. उसी के अनुसार मैं वाणी का उपयोग
करता हूं. (१५)
अपाङ् प्राङेति स्वधया गृभीतो ऽ मर्त्यो मर्त्येना सयोनिः.
ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य १ न्यं चिक्युर्न नि चिक्युरन्यम्.. (१६)
मरणधर्मिता से रहित अर्थात् अमर आत्मा मरणधर्मा मन के साथ गर्भ से प्रकट होती है.
इन में से आत्मा ब्रह्म में मिल कर तदाकार हो जाती है. (१६)
सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि.
ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परि भवन्ति विश्वतः.. (१७)
व्यापक ब्रह्म की सात किरणें वीर्य के रूप में वर्तमान रहती हैं. वे किरणें कर्म की
उत्पत्ति के रूप से समस्त जगत् में विस्तृत होती हैं. (१७)
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः.
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत् तद् विदुस्ते अमी समासते.. (१८)
परम व्योम में ओंकार का अक्षर है. उस में समस्त देव निवास करते हैं. जो इस बात को
नहीं जानता, वह वेद मंत्रों को जान कर भी क्या करेगा? जो इस बात को जानते हैं, वे उसी
ब्रह्म में निवास करते हैं. (१८)
ऋचः पदं मात्रया कल्पयन्तो ऽ र्धर्चेन चाक्लृपुर्विश्वमेजत्.
त्रिपाद् ब्रह्म पुरुरूपं वि तष्ठे तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः.. (१९)
ओंकार के पद की कल्पना करते हुए जनों ने उसी अर्थ में इस चैतन्य और गतिशील
विश्व की कल्पना की. निश्चल ब्रह्म तीन मात्राओं से निज रूप में स्थित रहता है और इस की
एक मात्रा से चारों दिशाएं अर्थात् चारों दिशाओं में वर्तमान प्राणी जीवित रहते हैं. (१९)
सूयवसाद् भगवती हि भूया अधा वयं भगवन्तः स्याम.
अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती.. (२०)
हे भूमि! तू जलमय सूर्य के संपर्क के कारण जल रूप ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकी. हम
भी तेरे जल रूप ऐश्वर्य से संपत्तिशाली बनें. हे हिंसित न होने वाली पृथ्वी! तू मेघों को चूरचूर
कर के शुद्ध जल का सेवन कर एवं सूर्य की किरणों के द्वारा जल का सेवन कर. (२०)
गौरिन्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी.
अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याः समुद्रा
अधि वि क्षरन्ति.. (२१)
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इस वाणीरूपी गौ ने ही विश्व की रचना की है. यही जल का निर्माण करती है. मध्यम के
साथ एकत्व प्राप्त कर के यह सूर्य के साथ एकपदी, दिशाओं के साथ चतुष्पदी और
अंतर्दिशाओं के साथ अष्टपदी होती है. दिशाओं, विदिशाओं एवं सूर्य के साथ यह नवपदी हो
जाती है. यह अविभक्त आत्मा में मिल कर भुवन की रचना करती है. इसी के कारण मेघ
वर्षा करते हैं. (२१)
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति.
त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवीं व्युदुः.. (२२)
जल को लपेटती हुई किरणें आकाश में उछलती हैं. वे ही किरणें दक्षिणायन रूप में
सूर्यमंडल से लौटती हैं, तभी धरती जल से भीग जाती है. (२२)
अपादेति प्रथमा पद्धतीनां कस्तद् वां मित्रावरुणा चिकेत.
गर्भो भारं भरत्या चिदस्या ऋतं पिपर्त्यनृतं नि पाति.. (२३)
हे मित्र और वरुण! तुम्हारे रूप को कौन जानता है? बिना चरणों वाली किरणें चरणों
वाले प्राणियों से पहले इस जगत् में आ जाती हैं. धरती इन का भार धारण करती है तथा
सत्य बोलने वाले का पालन करती है. यह धरती झूठ बोलने वाले का विनाश कर देती है.
(२३)
विराड् वाग विराट् पृथिवी विराडन्तरिक्षं विराट् प्रजापतिः.
विराण्मृत्युः साध्यानामधिराजो बभूव तस्य भूतं भव्यं वशे स मे भूतं भव्यं
वशे कृणोतु.. (२४)
विराट् ही वाणी है, विराट् पृथिवी है, विराट् अंतरिक्ष है और विराट् प्रजापति है. विराट्
मृत्यु और साध्यों का स्वामी है. भूत और भविष्य उसी के वश में है. वही विराट् भूत और
भविष्य को मेरे वश में करे. (२४)
शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एना ऽ वरेण.
उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्.. (२५)
मैं ने विषुवत एवं ऐनावर यज्ञ के द्वारा सर्वत्र व्याप्त धूम को समीप से देखा. वीरों ने
शक्ति देने वाले सोमरस को पकाया. वे ही प्रमुख धर्म थे. (२५)
त्रयः केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्.
विश्वमन्यो अभिचष्टे शचीभिर्धाजिरेकस्य ददृशे न रूपम्.. (२६)
तीन ज्योतियों अर्थात् अग्नि, सूर्य एवं वायु ऋतुओं के अनुसार अपने कार्यों के रूप में
समयसमय पर संसार पर कृपा करती हैं. इन में से एक अर्थात् अग्नि संवत्सर में पृथ्वी को
भस्म करती है. इस प्रकार वह कर्म करने योग्य बनती है. इन में वायु का रूप अदृश्य है. उस
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