अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextश्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नो ऽ भीद्धो घर्मस्तदु षु प्र वोचत्.. (४)
शोभन हाथ से गायों को दोहने वाला मैं सरलता से दुही जाने वाली गाय का दूध दुहता
हुआ उसे अपने समीप बुलाता हूं. सविता ने मुझे श्रेष्ठ गौ प्रदान की है. उन्हीं में तेजस्वी धर्म
का कथन किया गया है. (४)
हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसा ऽ भ्यागात्.
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्धता महते सौभगाय.. (५)
हुंकार करती हुई, धन से पालने योग्य एवं बछड़े की इच्छा करती हुई गौ धनवानों के
समीप पहुंची. हिंसा न करने योग्य यह गाय अश्विनीकुमारों के निमित्त दूध देती हुई हमें महान
सौभाग्य के लिए प्राप्त हो. (५)
गौरमीमेदभि वत्सं मिषन्तं मूर्धानं हिङ्ङकृणोन्मातवा उ
सृक्वाणं घर्ममभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः.. (६)
हुंकार करती हुई गाय उस बछड़े के समीप जा कर उसे सूंघती है जो उस की ओर
ताकता है. यह बताने के लिए कि यह बछड़ा मेरा ही है, यह गौ रंभाती है और अपने दूध से
उसे बढ़ाती है. (६)
अयं स शिङ्क्ते येन गौरभीवृता मिमाति मायुं ध्वसनावधि श्रिता.
सा चित्तिभिर्नि हि चकार मर्त्यान् विद्युद्भवन्ती प्रति वव्रिमौहत.. (७)
गरजते हुए मेघ ने वाणी को ढक लिया है. मेघ द्वारा ढकी हुई वाणी शब्द करती है. यही
वाणी मेघों से बिजली के रूप में प्रकट हो कर मनुष्यों को भयभीत करती है. (७)
अनच्छये तुरगातु जीवमेजद् ध्रुवं मध्य आ पस्त्यानाम्.
जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः.. (८)
यमलोक की पीड़ाओं के भय से कांपते हुए प्राणी के हृदय में जीव सांस लेता है.
मरणशील जीव अन्य मरणधर्मा प्राणियों का सयोनि अर्थात् समान शरीर वाला है एवं स्वधा
का भक्षण करता है. (८)
विधुं दद्राणं सलिलस्य पृष्ठे युवानं सन्तं पलितो जगार.
देवस्य पश्य काव्यं महित्व ऽ द्या ममार स ह्यः समान.. (९)
दमनशील एवं युवा चंद्रमा को सूर्य निगल जाता है. परमेश्वर की सृष्टि की महत्ता देखो
कि आज जो मर जाता है, कल वही जीवित हो कर सांस लेने लगता है. तात्पर्य यह है कि
आज छिप जाने वाला चंद्रमा दूसरे दिन फिर निकल आता है. (९)
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