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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 515 of 1063

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Page 515

इस वाणीरूपी गौ ने ही विश्व की रचना की है. यही जल का निर्माण करती है. मध्यम के
साथ एकत्व प्राप्त कर के यह सूर्य के साथ एकपदी, दिशाओं के साथ चतुष्पदी और
अंतर्दिशाओं के साथ अष्टपदी होती है. दिशाओं, विदिशाओं एवं सूर्य के साथ यह नवपदी हो
जाती है. यह अविभक्त आत्मा में मिल कर भुवन की रचना करती है. इसी के कारण मेघ
वर्षा करते हैं. (२१)
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति.
त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवीं व्युदुः.. (२२)
जल को लपेटती हुई किरणें आकाश में उछलती हैं. वे ही किरणें दक्षिणायन रूप में
सूर्यमंडल से लौटती हैं, तभी धरती जल से भीग जाती है. (२२)
अपादेति प्रथमा पद्धतीनां कस्तद् वां मित्रावरुणा चिकेत.
गर्भो भारं भरत्या चिदस्या ऋतं पिपर्त्यनृतं नि पाति.. (२३)
हे मित्र और वरुण! तुम्हारे रूप को कौन जानता है? बिना चरणों वाली किरणें चरणों
वाले प्राणियों से पहले इस जगत् में आ जाती हैं. धरती इन का भार धारण करती है तथा
सत्य बोलने वाले का पालन करती है. यह धरती झूठ बोलने वाले का विनाश कर देती है.
(२३)
विराड् वाग विराट् पृथिवी विराडन्तरिक्षं विराट् प्रजापतिः.
विराण्मृत्युः साध्यानामधिराजो बभूव तस्य भूतं भव्यं वशे स मे भूतं भव्यं
वशे कृणोतु.. (२४)
विराट् ही वाणी है, विराट् पृथिवी है, विराट् अंतरिक्ष है और विराट् प्रजापति है. विराट्
मृत्यु और साध्यों का स्वामी है. भूत और भविष्य उसी के वश में है. वही विराट् भूत और
भविष्य को मेरे वश में करे. (२४)
शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एना ऽ वरेण.
उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्.. (२५)
मैं ने विषुवत एवं ऐनावर यज्ञ के द्वारा सर्वत्र व्याप्त धूम को समीप से देखा. वीरों ने
शक्ति देने वाले सोमरस को पकाया. वे ही प्रमुख धर्म थे. (२५)
त्रयः केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्.
विश्वमन्यो अभिचष्टे शचीभिर्धाजिरेकस्य ददृशे न रूपम्.. (२६)
तीन ज्योतियों अर्थात् अग्नि, सूर्य एवं वायु ऋतुओं के अनुसार अपने कार्यों के रूप में
समयसमय पर संसार पर कृपा करती हैं. इन में से एक अर्थात् अग्नि संवत्सर में पृथ्वी को
भस्म करती है. इस प्रकार वह कर्म करने योग्य बनती है. इन में वायु का रूप अदृश्य है. उस
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