ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
ब्राह्मणाच्छंसी का मंत्र यह है :—
तीसरा अध्याय ] ३७३
होता के याज्य में :—
ऋतुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितम् ।
ऋभुओं का स्पष्ट लेख है। लेकिन दूसरों में स्पष्ट लेख
नहीं।
मैत्रावरुण का याज्य यह है :—
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतम् । ( ऋ० ६।६८।१० )
इसमें एक पद है :—युवोरथो अध्वरं देववीतये । इसमें
बहुवचन है । यह ऋभुओं का रूप है ।
ब्राह्मणाच्छंसी का मंत्र यह है :—
इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पते...( ऋ० ४।५०।१० )
इसमें 'विशंत्विंदवः स्वाभुवः' पद आया है । यह बहुवचन
है । बहुवचन ऋभुओं का रूप है ।
पोता का याज्य मंत्र है :—
आ वो वहंतु सप्तयो रघुष्यदो...( ऋ० १।८५।६ )
इसमें "रघु पत्वानः प्रजिगात बाहुभिः' आया है । यह बहु-
वचन है । बहुवचन ऋभुओं का रूप है ।
नेष्टा का याज्य मंत्र यह है :—
अमेव नः सुहवा आ हि गंतन...( ऋ० २।३६।३ )
इसमें 'गंतन' बहुवचन है । यह बहुवचन ऋभुओं का रूप
है ।
अच्छावाक् का याज्य यह है :—
इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वोऽस्य...( ऋ० ६।६९।७ )
इसमें "आवामंधांसि मदिराय्यग्मन्"...बहुवचन है । बहु-
वचन ऋभुओं का रूप है ।
अग्नीध्र का याज्य यह है :—
इमं स्तोममहं ते जातवेदसे ( ऋ० १।९४।१ )
३७४ [ छठी पञ्चिका
इसमें 'रथमिव संमहेम' आया है। यह बहुवचन है। बहु-
वचन ऋतुओं का रूप है।
इस प्रकार यह सब मंत्र ऐन्द्र-आर्भव हो जाते हैं।
दूसरे देवतों के मंत्रों से उन उन देवतों को भी प्रसन्न करता
है। वह जगत् के विजेता हैं। इसलिये जगती छन्द की आव-
श्यकता होती है। तीसरे सवन की समृद्धि के लिये। (४)
१३—इस पर प्रश्न होता है कि कुछ होत्रों में उक्थ्य
(शस्त्र) होता है। कुछ में नहीं होता। फिर सब होत्र बराबर
और उक्थ्य वाले कैसे हो जाते हैं ? इसका उत्तर यह है कि
ये उक्थ्य वाले और अनुक्थ्य वाले साथ-साथ पाठ करते हैं।
इसलिये वे सब समान कहलाते हैं। और उनकी विषमता दूर
हो जाती है।
अब प्रश्न होता है कि होत्रक लोग प्रातः सवन और मध्य
सवन में ही शस्त्र पढ़ते हैं। फिर यह तीसरे सवन में पढ़े के
बराबर कैसे हो जाता है ? इसका उत्तर यह है कि वे मध्य सवन
में दो दो सूक्त पढ़ते हैं।
इस पर प्रश्न होता है कि होत्रक होता के बराबर दो सूक्त
क्यों पढ़ते हैं ? इसका उत्तर यह है कि वे दो देवतों के लिये
होते हैं। (५)
१४—शंका होती है कि जब तीन होत्रक ही उक्थ्य वाले
हैं अन्य नहीं। तो वे उक्थ्य वाले कैसे समझे जा सकते हैं?
इसका उत्तर यह है कि अग्नीध्र का उक्थ्य आज्य है। पोता
के याज्य का मरुत्वतीय। नेष्टा का वैश्वदेव। इस प्रकार यह
याज्य उक्थ्य वाले हो जाते हैं।
प्रश्न यह है कि अन्य होत्रकों को तो एक बार ही आदेश
दिया जाता है तो पोर्ता को और नेष्टा को क्यों दो बार आदेश
दिया जाता है ? (इसके लिये गाथा है) :—
तीसरा अध्याय ] ३७५
जब गायत्री ने सुपर्ण होकर सोम को निकाला तो इन्द्र ने
इन दोनों के उक्थ काट कर होता को दे दिये और कहा,
"तुम न बुलाना। तुम योग्य नहीं हो।" देवों ने कहा, "इन
दोनों को वाणां से प्रभावित कर दें।" (अर्थात् दो बार आदेश
देकर उसका बदला चुका दें) इसलिये इन (पोता और नेष्टा)
को दो बार आदेश दिये जाने लगे।
अग्नीध्र के याज्य में एक ऋचा वढ़ा दी। इसलिये उसके
याज्य में एक ऋचा अधिक होती है।
कुछ लोग पूछते हैं कि जब मैत्रावरुण आदेश देता है "होता
यक्षत्" "होता यक्षत्" (होता याज्य पढ़े) तो यह आदेश
केवल होता को ही क्यों नहीं देता। उनको क्यों देता है जो
होता नहीं होते, केवल होता के मंत्रों को उच्चारते मात्र हैं?
इसका उत्तर यह है कि होता प्राण है। सब ऋत्विज् भी प्राण
हैं। इस आदेश का प्रयोजन यह है कि "प्राण याज्य पढ़े",
"प्राण याज्य पढ़े।"
क्या यह आदेश उद्गाताओं के लिये भी हैं? हाँ, हैं।
क्योंकि मैत्रावरुण मंत्र जप कर के कहता है "तुम स्तुति करो।"
क्या अच्छावाक् का कुछ प्रवर (विशेषता) होता है?
हाँ होता है। क्योंकि अध्वर्यु उससे कहता है, "अच्छावाक्,
कह जो कुछ तुझे कहना है।"
जब मैत्रावरुण तीसरे सवन में इन्द्र-वरुण का शस्त्र कहता
हैं तो अग्नि के लिए स्तोत्रिय और अनुरूप क्यों पढ़े जाते हैं?
देवों ने अग्नि को मुख बना के ही असुरों को उक्थों से निकाल
दिया। इसलिये स्तोत्रिय और अनुरूप अग्नि के होते हैं।
अब प्रश्न है कि जब तीसरे सवन में ब्राह्मणाच्छंसी इन्द्र
और बृहस्पति के लिये शस्त्र बोलता है और अच्छावाक् इन्द्र
और विष्णु के लिये, तो तीसरे सवन में स्तोत्रिय और अनुरूप