चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति जे जन बिछुटे राम सूँ, ते दिन मिले न राति
रात में बिछुड़ी चकवी सुबह अपने साथी से मिल जाती है, पर जो लोग राम से बिछुड़ गए, वे न दिन में मिलते हैं न रात में।
पंद्रहवीं सदी के संत कवि। उनकी साखियाँ, सबद और रमैनी गुरु-भक्ति, सच्चे प्रेम और पाखंड के विरोध की सीख देती हैं।
चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति जे जन बिछुटे राम सूँ, ते दिन मिले न राति
रात में बिछुड़ी चकवी सुबह अपने साथी से मिल जाती है, पर जो लोग राम से बिछुड़ गए, वे न दिन में मिलते हैं न रात में।
बिरहा बिरहा मति कहो, बिरहा है सुलतान जिहि घट बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान
विरह को छोटा मत समझो, विरह तो सुलतान है। जिस हृदय में प्रभु के विरह की पीड़ा नहीं, वह सदा श्मशान जैसा सूना है।
कबीर प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय
प्रेम का प्याला भीतर लगा लिया तो उसका रस रोम-रोम में रम गया। अब किसी और नशे की क्या ज़रूरत।
हरि रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार मैमंता घूमत रहै, नाहीं तन की सार
हरि रस पीने की पहचान यह है कि उसका नशा कभी नहीं उतरता। ऐसा भक्त मस्त होकर घूमता है, उसे शरीर की सुध नहीं रहती।
कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरष्या आइ अंतरि भीगी आतमाँ, हरी भई बनराइ
प्रेम का बादल आकर हम पर बरसा। भीतर तक आत्मा भीग गई और मन रूपी वन हरा-भरा हो गया।
गुरु धोबी शिष कापड़ा, साबुन सिरजनहार सुरति सिला पर धोइए, निकसे जोति अपार
गुरु धोबी है, शिष्य कपड़ा और प्रभु का नाम साबुन। ध्यान की शिला पर धोने से भीतर से अपार ज्योति प्रकट होती है।
सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक लागत ही भैं मिलि गया, पड्या कलेजै छेक
सतगुरु सच्चे योद्धा हैं। उन्होंने शब्द का एक ऐसा बाण चलाया कि लगते ही मैं धरती पर आ गिरा और हृदय में छेद हो गया, यानी अहंकार मिट गया।
सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग
सतगुरु ने प्रसन्न होकर एक ऐसी बात कही कि प्रेम का बादल बरस पड़ा और मेरा अंग-अंग उसमें भीग गया।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार धुआँ का सा धौरहरा, बिनसत लगै न बार
गुरु की भक्ति के बिना संसार में जीना व्यर्थ है। यह जीवन धुएँ के महल जैसा है, जिसे मिटने में देर नहीं लगती।
देह धरे का दंड है, सब काहू को होय ज्ञानी भुगते ज्ञान से, अज्ञानी भुगते रोय
शरीर मिला है तो कष्ट सबको होते हैं। ज्ञानी उन्हें समझ के साथ धैर्य से सहता है और अज्ञानी रो-रोकर।
कबीर चेरा संत का, दासनि का परदास कबीर ऐसैं होइ रह्या, ज्यूँ पाऊँ तलि घास
कबीर संतों के सेवक और दासों के भी दास हैं। वे ऐसे विनम्र होकर रहते हैं जैसे पैरों के नीचे की घास।
कबीर हरि रस यौं पिया, बाकी रही न थाकि पाका कलस कुंभार का, बहुरि न चढ़ई चाकि
हरि का रस ऐसे पिया कि कुछ बाकी नहीं रहा। जैसे कुम्हार का पका घड़ा फिर चाक पर नहीं चढ़ता, वैसे ही अब फिर जन्म नहीं होगा।
पढ़ि पढ़ि के पत्थर भया, लिख लिख भया जु ईंट कहे कबीरा प्रेम की, लगी न एको छींट
पढ़-पढ़कर मन पत्थर हो गया और लिख-लिखकर ईंट जैसा कठोर हो गया, पर उस पर प्रेम की एक छींट भी नहीं पड़ी।
बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार
वैद्य भी मरा, रोगी भी मरा, सारा संसार मरता है। पर जिसका आधार राम है, वह भक्त कभी नहीं मरता।
कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर
सच्चा पीर वही है जो दूसरों की पीड़ा समझे। जो दूसरों का दर्द नहीं समझता, वह निर्दयी है।
हंसा बगुला एक सा, मानसरोवर माहिं बगा ढिंढोरे माछरी, हंसा मोती खाहिं
मानसरोवर में हंस और बगुला एक जैसे दिखते हैं, पर बगुला मछली ढूँढता है और हंस मोती चुगता है। पहचान रूप से नहीं, स्वभाव से होती है।
जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल
जो तुम्हारे लिए काँटे बोए, तुम उसके लिए फूल बोओ। तुम्हें फूल ही मिलेंगे और उसे उसके काँटे ही चुभेंगे।
जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध अंधे अंधा ठेलिया, दोनूँ कूप पड़ंत
जिसका गुरु भी अज्ञानी हो और चेला भी पूरा अंधा, वहाँ अंधा अंधे को धकेलता है और दोनों कुएँ में गिर पड़ते हैं।
माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं मनुवा तो दहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं
हाथ में माला घूम रही है और मुँह में जीभ, पर मन दसों दिशाओं में भटक रहा है। ऐसा जप स्मरण नहीं कहलाता।
सुमिरन की सुधि यों करो, ज्यों गागर पनिहारि बोलत डोलत सुरति में, कहे कबीर बिचारि
प्रभु का स्मरण ऐसे करो जैसे पनिहारिन सिर पर गागर रखकर बात करती और चलती है, फिर भी उसका ध्यान गागर पर ही रहता है।
सुमिरन से मन लाइए, जैसे नाद कुरंग कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग
स्मरण में मन ऐसे लगाओ जैसे हिरण संगीत की ध्वनि में खो जाता है और उसे सुनते-सुनते प्राण तक दे देता है, पर उसे भूलता नहीं।
कबीर सुमिरन सार है, और सकल जंजाल आदि अंत सब सोधिया, दूजा देखौं काल
प्रभु का स्मरण ही सार है, बाकी सब जंजाल है। आरंभ से अंत तक सब खोजकर देख लिया, उसके सिवा सब कुछ काल के अधीन है।
साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं धन का भूखा जो फिरै, सो तो साधू नाहिं
सच्चा साधु भाव और प्रेम का भूखा होता है, धन का नहीं। जो धन के पीछे भागता है, वह साधु नहीं है।
वृच्छ कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर
पेड़ कभी अपने फल नहीं खाता और नदी अपना पानी जमा नहीं करती। वैसे ही सज्जन दूसरों की भलाई के लिए ही जन्म लेते हैं।