कबीर के दोहे
कबीर गुरु की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार धुआँ का सा धौरहरा, बिनसत लगै न बार
अर्थ
गुरु की भक्ति के बिना संसार में जीना व्यर्थ है। यह जीवन धुएँ के महल जैसा है, जिसे मिटने में देर नहीं लगती।
रोमन अक्षरों में
kabir guru ki bhakti bin, dhik jivan sansaar dhuaan ka sa dhaurahra, binsat lagai na baar
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