प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय
प्रेम न खेत में उगता है, न बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे चाहिए वह अपना अहंकार रूपी सिर देकर ले जाए।
पंद्रहवीं सदी के संत कवि। उनकी साखियाँ, सबद और रमैनी गुरु-भक्ति, सच्चे प्रेम और पाखंड के विरोध की सीख देती हैं।
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय
प्रेम न खेत में उगता है, न बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे चाहिए वह अपना अहंकार रूपी सिर देकर ले जाए।
जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग
जैसे तिल में तेल और चकमक पत्थर में आग छिपी है, वैसे ही तेरा प्रभु तेरे भीतर है। जाग सकते हो तो जागो।
कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहिं ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखै नाहिं
कस्तूरी हिरण की नाभि में ही होती है, पर वह उसे जंगल में ढूँढता है। वैसे ही राम हर हृदय में हैं, पर दुनिया उन्हें बाहर खोजती है।
आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर
राजा हो, गरीब हो या फकीर, जो आया है वह जाएगा। फर्क इतना है कि कोई अपने कर्मों से सम्मान पाकर जाता है और कोई बंधनों में बँधकर।
माली आवत देख के, कलियन करे पुकार फूली फूली चुन लिए, काल हमारी बार
माली को आता देखकर कलियाँ कहती हैं कि आज खिले फूल चुन लिए गए, कल हमारी बारी है। मृत्यु से कोई नहीं बचता।
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय
चलती चक्की देखकर कबीर रो पड़े, क्योंकि दो पाटों के बीच कोई दाना साबुत नहीं बचता। वैसे ही जन्म-मरण के चक्र में सब पिस जाते हैं।
माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय
मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तुम मुझे रौंद रहे हो, पर एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुम्हें अपने में मिला लूँगी। मृत्यु सबको आती है।
साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय
हे प्रभु, बस इतना देना कि मेरे परिवार का पालन हो जाए, मैं भी भूखा न रहूँ और द्वार पर आया साधु भी भूखा न जाए।
दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय
दुख में सब भगवान को याद करते हैं, सुख में कोई नहीं। जो सुख में भी याद करे, उसे दुख क्यों हो?
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब
कल का काम आज और आज का काम अभी करो। पल भर में सब कुछ मिट सकता है, फिर कब करोगे?
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर
खजूर के पेड़ की तरह बड़ा होने से क्या लाभ, जो न राही को छाया देता है और जिसके फल भी बहुत ऊँचे लगते हैं। बड़प्पन दूसरों के काम आने में है।
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय
अहंकार छोड़कर ऐसी मीठी वाणी बोलो जो सुनने वालों को शांति दे और स्वयं को भी शीतल कर दे।
माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख माँगन से मरना भला, यह सतगुरु की सीख
माँगना मरने के समान है, इसलिए कोई भीख न माँगे। सतगुरु की सीख है कि माँगने से मर जाना अच्छा है।
माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर
शरीर बार-बार मरते रहे, पर न माया मरी, न मन। आशा और तृष्णा कभी नहीं मरतीं।
कबीर सो धन संचिये, जो आगे को होय सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय
वह धन इकट्ठा करो जो आगे साथ जाए, यानी भक्ति और अच्छे कर्म। सिर पर गठरी रखकर संसार से कोई धन ले जाता नहीं दिखा।
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ
शरीर से जोगी का वेश तो सब बना लेते हैं, पर मन को जोगी कोई विरला ही बनाता है। मन जोगी हो जाए तो सब सिद्धियाँ सहज मिल जाती हैं।
कबीर तन पंछी भया, जहाँ मन तहाँ उडी जाइ जो जैसी संगति करै, सो तैसा ही फल पाइ
शरीर पक्षी की तरह वहीं उड़ जाता है जहाँ मन ले जाए। जो जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।
संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत
करोड़ों दुष्ट मिल जाएँ तो भी सज्जन अपनी सज्जनता नहीं छोड़ता, जैसे चंदन पर साँप लिपटे रहें तब भी वह शीतलता नहीं छोड़ता।
ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस
कोई ऐसा सच्चा गुरु मिले जो उपदेश दे और संसार-सागर में डूबते हुए को बाल पकड़कर बाहर निकाल ले।
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद खलक चबैना काल का, कुछ मुँह में कुछ गोद
मनुष्य झूठे सुखों को सुख मानकर प्रसन्न होता है, पर पूरा संसार काल का चबैना है; कुछ उसके मुँह में हैं और कुछ गोद में।
जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं
जो उगा है वह डूबेगा, जो खिला है वह मुरझाएगा, जो बना है वह गिरेगा और जो आया है वह जाएगा। संसार में कुछ भी स्थायी नहीं।
हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी, केस जलै ज्यूँ घास सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास
चिता पर हड्डियाँ लकड़ी की तरह और बाल घास की तरह जलते हैं। शरीर का यह अंत देखकर कबीर का मन संसार से विरक्त हो गया।
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात
मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले जैसा है। जैसे सुबह होते ही तारा छिप जाता है, वैसे ही यह भी एक दिन मिट जाएगा।
कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस
किस बात का घमंड करते हो? मृत्यु ने तुम्हारे बाल पकड़ रखे हैं। पता नहीं वह घर में मारेगी या परदेस में।