जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई
गुण की कदर करने वाला मिले तो गुण लाखों का होता है; कदर करने वाला न हो तो वही कौड़ी के भाव चला जाता है।
पंद्रहवीं सदी के संत कवि। उनकी साखियाँ, सबद और रमैनी गुरु-भक्ति, सच्चे प्रेम और पाखंड के विरोध की सीख देती हैं।
जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई
गुण की कदर करने वाला मिले तो गुण लाखों का होता है; कदर करने वाला न हो तो वही कौड़ी के भाव चला जाता है।
कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी चुनी खाई
समुद्र की लहरें किनारे पर मोती बिखेर देती हैं। बगुला उनका मोल नहीं जानता, पर हंस उन्हें चुन लेता है। ज्ञान को गुणी ही पहचानता है।
कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन
कहते-सुनते सारा जीवन बीत गया, पर उलझा मन नहीं सुलझा। मनुष्य अब भी नहीं जागा, वह वहीं है जहाँ पहले दिन था।
कबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर
कबीर संसार के बीच खड़े होकर सबका भला चाहते हैं। उनका न किसी से विशेष मोह है, न किसी से वैर।
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार
मनुष्य जन्म बड़ी कठिनाई से मिलता है, बार-बार नहीं। जैसे पेड़ से गिरा पत्ता फिर डाल पर नहीं लगता, वैसे ही यह अवसर लौटकर नहीं आता।
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय
अपनी निंदा करने वाले को पास रखो। वह हमारी कमियाँ बताकर बिना पानी और साबुन के हमारा स्वभाव निर्मल कर देता है।
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप
न बहुत बोलना अच्छा है, न बहुत चुप रहना; जैसे न बहुत वर्षा अच्छी है, न बहुत धूप। हर बात में संतुलन रखें।
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि
वाणी अनमोल है। बोलने से पहले बात को मन के तराजू पर तौल लो, फिर मुँह से निकालो।
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ
जो गहरे पानी में उतरकर खोजते हैं, वही मोती पाते हैं। जो डूबने के डर से किनारे बैठा रहे, उसे कुछ नहीं मिलता।
दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत
मनुष्य दूसरों के दोष देखकर हँसता है, पर उसे अपने अनगिनत दोष याद नहीं आते।
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान
सज्जन की जाति नहीं, उसका ज्ञान देखो। मोल तलवार का होता है, म्यान का नहीं।
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर
युगों तक माला फेरने पर भी मन नहीं बदला। हाथ की माला छोड़कर अपने मन को बदलो, वही सच्ची साधना है।
धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय
हे मन, धैर्य रखो, हर काम अपने समय पर होता है। माली चाहे सौ घड़े पानी डाले, फल तो मौसम आने पर ही लगते हैं।
तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँवन तर होय कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय
पैरों तले पड़े तिनके को भी छोटा मत समझो; वह उड़कर आँख में पड़ जाए तो बहुत पीड़ा देता है। किसी को भी तुच्छ न समझें।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय सार सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय
सज्जन व्यक्ति सूप जैसा होना चाहिए, जो अनाज रख लेता है और भूसा उड़ा देता है; वैसे ही वह अच्छी बातें रखे और व्यर्थ बातें छोड़ दे।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
केवल किताबें पढ़कर कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बनता। जो प्रेम के ढाई अक्षर को समझ लेता है, वही असली विद्वान है।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय
दूसरों में बुराई ढूँढने निकला तो कोई बुरा नहीं मिला; जब अपने मन को टटोला तो पाया कि सबसे बड़ा दोषी मैं स्वयं हूँ।
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय
गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही भगवान तक पहुँचने का रास्ता दिखाया है।