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योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

३. श्लोक २१-२९: अमनस्क भाव, विदेह-मुक्ति एवं योगतारावली उपसंहार

( २५ )
। १. अमी हि चेन्द्राः ( पाठ० ) इन्द्राः शब्द का कोई स्वारस्य नहीं है;
यह भ्रष्ट पाठ है ।
२ सहजामनस्कात् ( पाठ० ) — सहज-अमनस्क के कारण । पर तब भाव-
प्रधान निर्देश मानकर अमनस्क से अमनस्कत्व रूप अर्थ लेना होगा ।
३. ममत्वम् (पाठ०) — यह लिपिकर-प्रमादजनित पाठ है । अहंममत्वे
(पाठ०) — इस पाठ में जो एकवचन है वह सुसंगत नहीं है ।
४. मनोगर्ति मारुतवृत्तिशून्यां गच्छन्त्यगम्यां गमनावशेषाम् (पाठ०) — जो
वायुवृत्तिहीन गमनावशेष अगम्य मनोगतिःहै, उसको प्राप्त करते हैं । मनोगति
का 'मन का चरम लक्ष्य' अर्थ करके तथा 'अगम्या' का 'दुष्प्रापा' अर्थ करके इस
पाठ को भी संगत माना जा सकता है । पर 'गमनावशेषा' का तात्पर्य क्या
होगा ? ।
अनुवाद — सहज ( = स्वाभाविक ) अमनस्क अवस्था प्राप्त होने के
कारण देह में ममत्व जिनका शिथिल हो गया है, ऐसे श्रेष्ठ योगी मन
का अगोचर तथा वायुवृत्ति ( = प्राण ) से शून्य आकाशमात्ररूप ( असीम )
भाव को प्राप्त करते हैं ।
व्याख्या -- अमनस्क का विशेषण सहज ( सह + ज ) है । यह विशेषण
बहुत ही प्रसिद्ध है । इसका तात्पर्य निरायासता से है — प्रयत्न के बिना उदित
होना — स्वयमेव उत्पद्यते -- 'उत्पद्यते निरायासात् स्वयमेवोन्मनी ( ह० यो० प्र०
१।४१ ) ।
भाव के तीन विशेषण हैं (१) मनोतिग, (२) मारुतवृत्तिशून्य तथा (३)
गगनावशेष । मनोऽतिग = मन की वृत्ति का अतिक्रमण करने वाला अर्थात
मन का अगोचर ।
मारुतवृत्ति-शून्य = प्राणवायु की वृत्तियों ( = क्रियायों ) से विरहित ।
प्राण की क्रियायें प्रसिद्ध हैं । प्राण पांच रूपों में अपने को विभक्त करके शरीर

( २६ )
का विधारण ( = निर्माण वर्धन, पोषण ) करता है। ये पाँच रूप हैं--प्राण,
उदान, व्यान, समान तथा अपान । हठयोग के ग्रन्थों मे इन पांचों की
क्रियाओं का विशद विवरण मिलता है।
गगनावशेष--गगन=आकाश । आकाश जिस प्रकार अमूर्त तथा बाधाहीन
है, यह भाव उसी प्रकार का है--यह अभिप्राय है¹; तुल० शून्य, अतिशून्य,
महाशून्य ( ह० यो० प्र० ४।७१-७४ ) ।
निवर्तयन्तीं निखिलेन्द्रियाणि¹
प्रवर्तयन्तीं परमात्मयोगम् ।
संविन्मयीं तां सहजामवस्थां
कदा गमिष्यामि गतान्यभावः² । २३॥
[ १. निभृतेन्द्रियाणां (पाठ०)--भ्रष्ट पाठ है, क्योंकि षष्ठीविभक्ति का
का कोई स्वारस्य नहीं है ।
२. गतान्यभागः (पाठ०) = गत हुआ है अन्य भाग जिसका, वह ( बहु-
व्रीहि) । यह मैं ( अहम् ) का विशेषण है । इस विशेषण की संगति नहीं है । ]
अनुवाद—सभी इन्द्रियों को निवृत्त करने वाली, परमात्मयोग की
प्रवर्त्तिका तथा संविन्मयी उस सहज अवस्था को कब मैं अन्य भावों को
छोड़ कर प्राप्त करूँगा ।
१. 'आकाश-सदृश' होने पर भी वस्तुतः आकाश की तरह बहुयोजनव्यापी
नहीं है। उपमा जिसकी विवक्षा के लिए दी जाती है, उसका ही
ग्रहण करना चाहिए द्र०-'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्य इत्यपि प्रसिद्धमहत्त्वेन
आकाशेन उपमानं क्रियते निरतिशयमहत्त्वाय, नाकाशसमत्वाय । यथेषुरिव
सविता धावति इति क्षिप्रगतित्वाय उच्यते, नेषुतुल्यगतित्वाय तद्वत्'
( शारीरकभाष्य २।३।७ ) ।

( २७ )
व्याख्या--परमात्मयोग--परमात्मा के साथ संयोग । 'आत्मयोग' शब्द
भी योगग्रन्थों में प्रयुक्त होता है। तुल० अध्यात्मयोग (कठ-उप० १।२।१२) !
योग = चित्त का किसी अभीष्ट पर समाधान ( = समाहित होना ) ।
प्रत्यग्विमर्शातिशयेन पुंसां
प्राचीनसंगेषु¹ पलायितेषु ।
प्रादुर्भवेत्काचिदजाड्यनिद्रा²
प्रपञ्चचिन्तां परिवर्जयन्ती³ ॥२४॥
[ १ प्राचीनगन्धेषु ( पाठ०) । 'संबन्ध' 'सम्पर्क' 'संयोग' अर्थ में गन्ध
शब्द का उल्लेख कोशों में मिलता है; पर संग अर्थ में इसका प्रयोग शायद ही
कहीं मिलना हो ।
२ प्रादुर्भवत् क्वापि न जाड्यनिद्रा पाठ०)— भ्रष्ट पाठ । 'क्वापि' की
कोई संगति नहीं है ।
३. प्रपञ्च एको विलयं प्रयाति ( पाठ०)--यदि यह मूल पाठ हो तो इसे
एक स्वतन्त्र वाक्य मानना होगा । प्रपञ्च का 'एक' विशेषण क्यों दिया गया—
यह विचारणीय है । प्रपञ्च का विलय होना शास्त्रसंमत है । ]
अनुवाद—प्रत्यगात्मसंबन्धी विमर्श के अतिशय के कारण जीवों की
प्राक्तन विषयासक्ति हट जाती है ( नष्ट हो जाती है ) । ऐसा होने पर
एक प्रकार की अजाड्यनिद्रा का आविर्भाव होता है तो प्रपञ्च विषयक
चिन्तन का परित्याग-कारिणी है ।
अनुवाद--प्रत्यक् ( प्रति + अञ्चधातु + क्विप् प्रत्यय ) शब्द की प्रायेण
दो व्याख्यायें की जाती हैं--(१) प्रत्येक वस्तु में अनुस्यूत; (२) विपरीत भाव
का ज्ञाता । आत्मा में प्रत्यक् शब्द उपर्युक्त दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है
( यथायोग्य स्थलों में ); कहीं कहीं स्पष्टता के लिए प्रत्यगात्मा या प्रत्यक्-
चेतन शब्द भी प्रयुक्त होता है ।

( २८ )
अजाड्यनिद्रा—निद्रा (=सुषुप्ति) तमोगुण-प्रधान है—प्रस्वापनं तु तमसा
(भागवत ११।२५।२०) । श्लोकोक्त निद्रा जाड्यहीन है, अर्थात् तत्त्वतः यह
निद्रा नहीं है। निद्रा का बाह्य सादृश्य मात्र इसमें है, अतः निद्रा शब्द का प्रयोग
किया गया है। निद्रा की स्थिरता, आयासहीनता एवं विश्रान्ति -इस 'निद्रा' में
भी हैं; साथ ही इसमें आत्मबोध अनावृत रहता है, अतः यह अजाड्यनिद्रा है।
इसका नामान्तर 'योगनिद्रा' है। यह निद्रा जाग्रत्-स्वप्न से विलक्षण है--यह
स्पष्टतया जानना चाहिये। 'प्रादुर्भवेत्' में प्रादुस् अव्यय है जो प्राकाश्यवाचक
है (गणरत्न० १।१५)--प्रादुर्भवेत् = प्रकाशितो भवेत्।
योगनिद्रा में मनोगति आत्माभिमुख ही रहती है; अतः 'प्रपञ्चचिन्तां-
परिवर्जयन्ती' कहा गया है। निद्रा के विभिन्न भेदों के लिए मेरा 'निद्रा या
सुषुप्ति' ग्रन्थ द्रष्टव्य है।
विच्छिन्नसंकल्पविकल्पमूले
निःशेषनिर्मूलितकर्मजाले ।
निरन्तराभ्यासनितान्तभद्रा¹
सा जृम्भते² योगिनि योगनिद्रा ॥२५॥
[ १. निरन्तराभ्यासिनि नित्यभद्रे (पाठा०)। इस पाठ में इन दोनों पदों को
'योगिनि' का विशेषण मानना होगा। यह विशेषण असंगत नहीं है, पर हमारी
दृष्टि में योगनिद्रा के विशेषण के रूप में 'निरन्तराभ्यासनितान्तभद्रा' का उल्लेख
करना अधिक समीचीन है।
२. विराजते (पाठा०) ]
अनुवाद—जिन योगी में संकल्प और विकल्प का मूल नष्ट हो गया
है तथा जिसके सभी कर्म पूर्णतया समूल नष्ट हो गये हैं उनमें निरन्तर-
अभ्यास-हेतुक नित्यमङ्गलकारिणी योगनिद्रा प्रकाशित होती है।

( २९ )
व्याख्या - 'निर्मूलितकर्मजाल' कहने का तात्पर्य है—प्रारब्धकर्म का भी
निर्मूल होना। देहारम्भक कर्म का भी नाश योग से होता है, यह ज्योत्स्नाटीका
(३।८२) में [ विष्णुधर्मपुराण ( यह अमुद्रित है ) का वाक्य उद्धृत कर ]
प्रतिपादित हुआ है। कर्मनाश-सम्बन्धी विशेष विचार के लिए विज्ञानभिक्षुकृत
सांख्यसार का प्रथम परिच्छेद द्रष्टव्य है।
विश्रान्तिमासाद्य तुरीयतत्त्वे¹
विश्वाद्यवस्था-त्रितयोपरिस्थे² ।
संविन्मयीं कामपि सर्वकालं
निद्रां सखे³ निर्विश निर्विकल्पाम् ॥२६॥
[ १. तुरीयतल्पे (पाठा०) (तल्प = शय्या)। प्रतीत होता है कि
'विश्रान्ति' शब्द को देखकर किसी ने तल्प शब्द का प्रयोग कर दिया है। 'तत्त्व'
पाठ ही उचित है, क्योंकि वही 'विश्वाद्यवस्थात्रितयोपरिस्थ' है।
२. सर्वकालाम् (पाठा०)। इस पाठ को मानने पर यह 'निद्राम्' का
विशेषण होगा ('संविन्मयीम्' की तरह), जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है।
क्रियाविशेषण के रूप में 'सर्वकालम्'-पाठ अधिक संगत है।
३. भज (पाठा०)। इस पाठ में दो क्रियापद (भज तथा निर्विश) होते
हैं, जिनकी कोई सार्थकता नहीं है। इस पाठ में छन्दोदोष भी होता है।]
अनुवाद--हे सखा, विश्व आदि तीन अवस्थाओं के अतीत तुरीय
तत्त्व में विश्राम लाभ करके (अर्थात् उसमें संस्थित होकर) निर्विकल्प,
संविन्मयी एवं अनिर्वचनीय अवस्था रूप निद्रा (अर्थात् योगनिद्रा) के सुख
का सदैव अनुभव करो।
व्याख्या--आत्मा को तुरीय मानने की परम्परा बहुत प्राचीन है (तुरीय=
चतुर्थ)। माण्डूक्य उपनिषद् (३-७) में स्थूल-सूक्ष्म क्रम से आत्मभाव
को चार भागों में बाँटा गया है--विश्व (जाग्रत्-अवस्था-सम्बन्धी),

( ३० )
तैजस ( स्वप्न-अवस्था-सम्बन्धी ), प्राज्ञ (सुषुप्ति-अवस्था-सम्बंधी ) तथा तुरीय
(-स्वरूपस्थ-आत्म-सम्बन्धी ) ।
तुरीयतत्त्व का निर्देश ह० यो० प्र० ४।४८ में है । तुरीय-स्थिति शिवरूप
ईश्वर की है अथवा सुखरूप आत्मा की है। आत्माकार या शिवाकार वृत्ति ही
इस अवस्था में रहती है, अतः इसमें चित्त के वैषयिक चाञ्चल्य का सर्वथा
अभाव हो जाता है—यह मृत्यु या काल की अतीत स्थिति है ।
योगनिद्रा की स्थिति विकल्पहीन है अर्थात् आत्मविषयक कोई भी भ्रान्त
धारणा इस अवस्था में नहीं रहती ।
प्रकाशमाने परमात्मभानौ
नश्यत्यविद्यातिमिरे समस्ते ।
अहो बुधा निर्मलदृष्टयोऽपि
किञ्चिन्न पश्यन्ति जगत् समग्रम् ।। २७ ।।
अनुवाद—अहो ! परमात्मा-रूप सूर्य का उदय तथा अविद्या रूप पूर्ण
अन्धकार का नाश होने पर विद्वान् ( = आत्मज्ञ ) निर्मलदृष्टियुक्त होने
पर भी समस्त जगत् में कुछ भी नहीं देख पाते हैं ।
व्याख्या--हठयोग के प्रतिपादक ग्रन्थों में परमात्मा शब्द प्रयुक्त होता है—
द्र० ह० यो० प्र० ४।१०१; योगियाज्ञवल्क्य ९।१० ।
परमात्मा सबका प्रकाशक ( निर्विकार रूप से ) है, इसलिये भानु का
दृष्टान्त दिया गया । तुल० तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ( श्वेताश्व० ६।१४ ) ।
अन्धकार के कारण वस्तुओं का ज्ञान नहीं हो पाता; अविद्या के कारण वस्तु का
तत्त्वज्ञान नहीं होता, इसलिये अविद्या के साथ तिमिर ( = अन्धकार ) का प्रयोग
पूर्वाचार्य करते हैं । इस श्लोक से यह ध्वनित होता है कि दर्शन-क्रिया के लिए
सूर्यलोक, अन्धकारनाश तथा दृष्टिशक्ति--ये तीन आवश्यक हैं ।

( ३१ )
किञ्चिन्न पश्यन्ति--जगत् सत्ता का कोई ज्ञान उनमें नहीं रहता--यह
इस वाक्य से जाना जाता है ।
सिद्धिं तथाविधमनोविलयां समाधौ¹
श्रीशैलशृङ्गकुहरेषु कदोपलप्स्ये² ।
गात्रं यदा³ मम लताः⁴ परिवेष्टयन्ति
कर्णे यदा⁵ विरचयन्ति⁶ खगाश्च नीडम् ॥ २८॥
[ १. समर्थाम् (पाठा०)--इस विशेषण का कोई स्वारस्य नहीं है ।
२. कदोपलभ्ये पाठा०) । यह भ्रष्ट पाठ है ।
३ कदा पाठा०) । इस पाठ में भी अर्थसंगति होती है । २, ३, ४ चरणों
में 'कदा' पाठ मानकर 'कब ऐसी ऐसी स्थिति होगी' यह अर्थ किया जा सकता है ।
४. गात्रे यथामरलताः पाठा०)--यह अशुद्ध पाठ है ।
५. द्र० टि० ३ ।
६. विरचन्ति ( पाठा० ) । इस पाठ में छन्दोदोष होता है तथा यह
व्याकरणदुष्ट शब्द है ।
अनुवाद - ( साधक स्वयं को कह रहे हैं ) श्री शैलपर्वत की गुहा में
रह कर कब मैं समाधि में मनोलयकारिणी सिद्धि को प्राप्त करूँगा ? जब
लतायें मेरे शरीर का वेष्टन करेंगी तथा पक्षियाँ मेरे कान में नीडों का
निर्माण करेंगी ( तब उपर्युक्त सिद्धि मुझे प्राप्त होगी ) ।
व्याख्या-लता द्वारा गात्रवेष्टन तथा कर्ण में नीडनिर्माण--एकासन में
दीर्घकाल पर्यन्त निश्चल रूप से अवस्थान करने पर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो
सकती है । इतिहासपुराण में ऐसी स्थिति का वर्णन मिलता है ।¹
१. जटाटवीकोटरान्तः कृतनीडाण्डजाश्च ये । १९ । लताप्रतानैः परितो
वेष्टितावयवाश्च ये । शस्यानि च प्ररूढानि यदङ्गेषु चिरस्थितिः ॥ ३०
(काशीखण्ड अ० २२); द्र० शान्तिपर्व २६१।१३-३७ में वर्णित जाजलि का
तपश्चरण ।

( ३२ )
श्रीशैलपर्वत--करनाल जिले के अन्तर्गत कृष्णा नदी के दक्षिण तीर में;
कृष्णा-स्टेशन से ५० मील । यहाँ द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में अन्यतम लिङ्ग
विद्यमान है। यह योगिजन-निवास के रूप में प्रसिद्ध है ।
ब्रह्मरन्ध्रगते वायौ गिरेः प्रस्रवणं भवेत् ।
शृणोति श्रवणातीतं नादं मुक्तिर्न संशयः १ ॥२९॥
[ १. कई संस्करणों में यह श्लोक नहीं मिलता । इसके प्रक्षिप्त होने
की सम्भावना है । प्रस्तुत ग्रन्थ उपजाति-छन्द में रचित है । २८ वें श्लोक में
अन्य छन्द (वसन्ततिलक) का व्यवहार है, जिससे ज्ञात होता है कि यह इस ग्रन्थ
का अन्तिम श्लोक है । २८ वें श्लोक का भाव भी ऐसा है कि इसके बाद
अभ्यास के विषय में कुछ कहने के लिए रह नहीं जाता । ]
अनुवाद-वायुके ब्रह्मरन्ध्र में स्थिर होने पर गिरि का प्रस्रवण
होता है (गिरि से धारा निकलती है), इस अवस्था में श्रवणातीत
( = अश्राव्य ) नाद सुना जाता है, अतः मुक्ति होती है—इसम कोई
संशय नहीं है ।
व्याख्या-ब्रह्मरन्ध्र - आधुनिक शारीर शास्त्र में यह anterior fon-
tanelle कहलाता है; भेलसंहिता में इसे शिरस्तालु कहा गया है । शरीर में कई
छिद्र (रन्ध्र) हैं; जिनमें ब्रह्मरन्ध्र दशम है--यह आयुर्वेदीय मत प्रसिद्ध है (दशमं
रन्ध्रं मस्तके चोक्तम् । तद् ब्रह्मरन्ध्रमित्याहुरेके; एतानि नव स्रोतांसि नराणां
बहिर्मुखानि भवन्ति, दशमं मस्तके प्रच्छन्नम् - शार्ङ्गधर पर आढमल्ल की
टीका) । वायु की ब्रह्मरन्ध्र की ओर गति के विषय में ब्रह्मानन्द का वाक्य
मननीय है-कुण्डलिनीबोधे सुषुम्नामार्गेण प्राणो ब्रह्मरन्ध्रं गच्छति; तत्र गते
चित्तस्थैर्यं भवन्ति, चित्तस्थैर्ये संयमाद् आत्मसाक्षात्कारो भवति (ज्योत्स्ना
१।४८) । प्राणायामाभ्यास की तृतीय अवस्था (जिसको 'उत्तम' कहा जाता है)
में प्राण ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचता है (ज्योत्स्नाटीका २।१२) ।
गिरिप्रस्रवण--यह 'गिरि' क्या है, यह स्पष्ट नहीं है । संभवतः यह भ्रूकूट

३ ( ३३ )
पाठ है। योगियाज्ञवल्क्य में 'गिरिप्रस्रवणं यथा' कहकर गिरिप्रस्रवण की उपमा
दी गई है—गिरिप्रस्रवण को एक घटना के रूप में नहीं कहा गया (आमूर्धो वर्तंते
नादो वीणादण्डवदुत्थितः। शङ्खध्वनिनिभस्त्वादौ मध्ये मेघध्वनिर्यथा ॥५७।
व्योमरन्ध्रगते नादे गिरिप्रस्रवणं यथा, ६।५७-५८ क०)। तुल० मेरुशृङ्गे
स्थितश्चन्द्रो द्विरष्टकल्यान्वितः। अहर्निशं त्वसौ आत्मसुधां वर्षत्यधोमुखः।
(योगचिन्ता० पृ० १०७ में उद्धृत अमृतसिद्धि-नामक योगग्रन्थ का वाक्य)।
क्या गिरि = पूर्णगिरि है ? (द्र० योगचि० पृ० १२२)।
जो ध्वनि आघातजन्य नहीं होती वह इस शास्त्र में नाद कहलाती है
( नाद = अनाहतध्वनि; ज्योत्स्नाटीका ३।६४ ।¹
नमो योगाय योगेश्वराय च
१. निम्नोक्त श्लोक कुछ संस्करणों में अन्तिम श्लोक के रूप में पठित हुआ है—
विचरतु मतिरेषा निर्विकल्पे समाधौ
कुचकलशयुगे वा कृष्णसारेक्षणानाम्।
चरतु जडमते वा सज्जनानां मते वा
मतिकृतगुणदोषा मां विभुं न स्पृशन्ति।
[ अवश्य ही यह श्लोक अर्वाचीन काल में संयोजित हुआ है। प्रस्तुत
ग्रन्थ के प्रतिपाद्य विषय से श्लोकोक्त दृष्टि की संगति नहीं है ]

परिशिष्ट

योगतारावली तथा उसकी व्याख्या में प्रयुक्त प्रमुखशब्दों की सूची

( शब्द के बाद दी गई संख्या ग्रन्थगत श्लोक की संख्या है )
अजाड्यनिद्रा .... २४   उरगाङ्गना (कुण्डलिनी) .... ६
अनाहत ( चक्र ) .... ९   ओड्डयानबन्ध .... ५,६
अनाहत ( पद्म ) .... ३   कर्मजाल .... २५
अन्यभाव .... २३   कालपाश .... ५,६
अपानवायु .... ७   कुण्डलिनी (उरगाङ्गना) .... ६
अमनस्क .... २२   कुण्डली .... १२
अमनस्कमुद्रा .... २१   कुम्भ ( कुम्भक ) .... ३,१०
अमृतधारा   कुम्भोत्तम .... १०
(पीयुषधारा) .... ७   केवलकुम्भक .... १०,११,१२
अर्धनिमीलितनेत्र .... २१   केवलकुम्भरूपा विद्या .... ८,९
अवधान .... १९   केवलसंविद् .... १६
अविद्या .... २७   ख .... ११
अहंममत्व .... १६   खग .... २८
आकुञ्चन .... ७   गगनावशेष .... २२
आत्मसुखावबोध .... १   गन्धवाह ( वायु ) .... ६
आधार (मूलाधार) .... ७   गात्र .... २८
आलम्ब .... २०   गिरिप्रस्रवण .... २९
इडापिङ्गलानाडी .... ११   गुरु .... १
इन्द्रियनिवृत्ति .... २३   चन्द्रमाः .... ७
इन्द्रियवृत्ति .... १३   चरणारविन्द .... १
उड्डियानबन्ध .... ५,६   चितबन्ध् .... १४
उदासीनदृश् .... १९   चेतः .... २०
उन्मनी अवस्था .... १६   जगत् .... २७
उन्मेषनिमेषशून्य (नेत्र) .... १७   जागर .... १५

( ३५ )
जाङ्गलिक .... १ निश्चलाङ्ग .... १८
जालन्धरबन्ध .... ५ निश्वासलोप .... २१
जीवित .... १५ नेत्र ( अर्धनिमीलित ) .... २१
जृम्भते .... ९, १६, २५ नेत्र (उन्मेषनिमेषशून्य) .... १७
तत्त्वपद .... ४ परमात्मयोग .... २३
तुरीयतत्त्व .... २६ परमात्मा .... २७
तैजस .... २६ पवन ( प्राणवायु ) .... ४
त्रिकूट .... ११ पीयूषधारा (अमृतधारा) .... ७
दृश्यभाव .... १६ प्रत्याहृत .... १२
दृश्योज्झित दृक् .... १५ प्रतीचीनपथ .... १२
दृष्टि .... २७ प्रत्यग्विमर्श .... २४
दृष्टिलक्ष्य .... १४ प्रत्यङ्मुख .... ६
देशकाल .... १४ प्रपञ्च .... १९
द्रष्टृता .... १६ प्रपञ्चचिन्ता .... २४
धन्य .... ७ प्राकृत ( रेचक ) .... १०
धारणा .... १४ प्राचीनसंग .... २४
ध्यान .... १४ प्राज्ञ .... २६
नाडी .... ३ प्राण .... १०, १२
नाडी ( भानु-शशाङ्क ) .... ११ प्राणानिल .... ११
नाडीविशुद्धि .... ३ बन्धत्रय .... ८
नाद .... २९ बोध .... ३
नादानुसन्धानसमाधि .... २, ४ ब्रह्मरन्ध्र .... २९
निग्रह (चित्तेन्द्रियों का) .... १८ भद्रा .... २५
निद्रा ( योगनिद्रा ) .... २६ भानु-शशाङ्कनाडी .... ११
निरङ्कुश .... १३ भाव .... २२
निरोधन .... १३ मनः .... १७
निर्वातदीप .... १८ मनोऽतिग .... २२
निर्विकल्प .... २६ मनोन्मनी .... १७, १८

( ३६ )
मनोलय .... ४ विष्णुपद .... ४
मनोविलय .... २८ विष्णुपदान्तराल .... १२
ममत्व .... २२ वैकृत (पूरक) .... १०
मरण .... १५ शरीर (निभृत) .... २१
मरुत्-लय .... १३ शान्ति .... २०
महामति .... १३ श्रीराजयोग .... १६
मारुतवृत्ति .... २२ श्रीशैल .... २८
मुनि .... २१ श्वसन .... १३
मूलबन्ध .... ५,६ श्वासप्रचार .... १८
मूलाधार (आधार) .... ७ संकल्प .... १९,२०
मोह .... १ संकल्प-विकल्प .... २५
यमीन्द्र .... २२ संकल्पशून्य (मनः) .... १७
योगनिद्रा (अजाड्यनिद्रा .... २४ सदाशिव .... २
योगनिद्रा .... २५ सन्तापित चन्द्रमाः .... ७
राजयोग .... १४,१५,१६ समाधि .... २८
रेच (रेचक) .... ३ संविद् (केवलसंविद्) .... १६
लता .... २८ संविन्मयी .... २३,२६
लय .... २ संसार .... १
लयावधान .... २ संस्तम्भितश्वासः .... ९
वायु ( गन्धवाह ) .... ६ संस्तम्भितावास .... ९
वायु (वर्जितरेचपूर) .... १७ सहज .... २२
वायुरोध .... १४ सहजावस्था .... २३
वायुलय (मरुल्लय) .... १३ सावधान .... ६,१६,२०
विकल्प .... २५ सिद्धि .... २८
विकल्पशून्य (मन) .... १७ सुषुप्ति .... १५
विलय .... ११,१२ सुषुम्ना .... ६
विश्रान्ति .... २६ स्वात्मावगम्य .... ३
विश्वादि-अवस्था .... २६ हठ .... १०
विषयप्रवाह .... ८ हालाहल .... १

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