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सर्वकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 42

( २८ )
अजाड्यनिद्रा—निद्रा (=सुषुप्ति) तमोगुण-प्रधान है—प्रस्वापनं तु तमसा
(भागवत ११।२५।२०) । श्लोकोक्त निद्रा जाड्यहीन है, अर्थात् तत्त्वतः यह
निद्रा नहीं है। निद्रा का बाह्य सादृश्य मात्र इसमें है, अतः निद्रा शब्द का प्रयोग
किया गया है। निद्रा की स्थिरता, आयासहीनता एवं विश्रान्ति -इस 'निद्रा' में
भी हैं; साथ ही इसमें आत्मबोध अनावृत रहता है, अतः यह अजाड्यनिद्रा है।
इसका नामान्तर 'योगनिद्रा' है। यह निद्रा जाग्रत्-स्वप्न से विलक्षण है--यह
स्पष्टतया जानना चाहिये। 'प्रादुर्भवेत्' में प्रादुस् अव्यय है जो प्राकाश्यवाचक
है (गणरत्न० १।१५)--प्रादुर्भवेत् = प्रकाशितो भवेत्।
योगनिद्रा में मनोगति आत्माभिमुख ही रहती है; अतः 'प्रपञ्चचिन्तां-
परिवर्जयन्ती' कहा गया है। निद्रा के विभिन्न भेदों के लिए मेरा 'निद्रा या
सुषुप्ति' ग्रन्थ द्रष्टव्य है।
विच्छिन्नसंकल्पविकल्पमूले
निःशेषनिर्मूलितकर्मजाले ।
निरन्तराभ्यासनितान्तभद्रा¹
सा जृम्भते² योगिनि योगनिद्रा ॥२५॥
[ १. निरन्तराभ्यासिनि नित्यभद्रे (पाठा०)। इस पाठ में इन दोनों पदों को
'योगिनि' का विशेषण मानना होगा। यह विशेषण असंगत नहीं है, पर हमारी
दृष्टि में योगनिद्रा के विशेषण के रूप में 'निरन्तराभ्यासनितान्तभद्रा' का उल्लेख
करना अधिक समीचीन है।
२. विराजते (पाठा०) ]
अनुवाद—जिन योगी में संकल्प और विकल्प का मूल नष्ट हो गया
है तथा जिसके सभी कर्म पूर्णतया समूल नष्ट हो गये हैं उनमें निरन्तर-
अभ्यास-हेतुक नित्यमङ्गलकारिणी योगनिद्रा प्रकाशित होती है।