योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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। १. अमी हि चेन्द्राः ( पाठ० ) इन्द्राः शब्द का कोई स्वारस्य नहीं है;
यह भ्रष्ट पाठ है ।
२ सहजामनस्कात् ( पाठ० ) — सहज-अमनस्क के कारण । पर तब भाव-
प्रधान निर्देश मानकर अमनस्क से अमनस्कत्व रूप अर्थ लेना होगा ।
३. ममत्वम् (पाठ०) — यह लिपिकर-प्रमादजनित पाठ है । अहंममत्वे
(पाठ०) — इस पाठ में जो एकवचन है वह सुसंगत नहीं है ।
४. मनोगर्ति मारुतवृत्तिशून्यां गच्छन्त्यगम्यां गमनावशेषाम् (पाठ०) — जो
वायुवृत्तिहीन गमनावशेष अगम्य मनोगतिःहै, उसको प्राप्त करते हैं । मनोगति
का 'मन का चरम लक्ष्य' अर्थ करके तथा 'अगम्या' का 'दुष्प्रापा' अर्थ करके इस
पाठ को भी संगत माना जा सकता है । पर 'गमनावशेषा' का तात्पर्य क्या
होगा ? ।
अनुवाद — सहज ( = स्वाभाविक ) अमनस्क अवस्था प्राप्त होने के
कारण देह में ममत्व जिनका शिथिल हो गया है, ऐसे श्रेष्ठ योगी मन
का अगोचर तथा वायुवृत्ति ( = प्राण ) से शून्य आकाशमात्ररूप ( असीम )
भाव को प्राप्त करते हैं ।
व्याख्या -- अमनस्क का विशेषण सहज ( सह + ज ) है । यह विशेषण
बहुत ही प्रसिद्ध है । इसका तात्पर्य निरायासता से है — प्रयत्न के बिना उदित
होना — स्वयमेव उत्पद्यते -- 'उत्पद्यते निरायासात् स्वयमेवोन्मनी ( ह० यो० प्र०
१।४१ ) ।
भाव के तीन विशेषण हैं (१) मनोतिग, (२) मारुतवृत्तिशून्य तथा (३)
गगनावशेष । मनोऽतिग = मन की वृत्ति का अतिक्रमण करने वाला अर्थात
मन का अगोचर ।
मारुतवृत्ति-शून्य = प्राणवायु की वृत्तियों ( = क्रियायों ) से विरहित ।
प्राण की क्रियायें प्रसिद्ध हैं । प्राण पांच रूपों में अपने को विभक्त करके शरीर