बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( २७२ )
कुसुम योग :
परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य पर्वत अपने स्थान से
खिसक कर शनि पर्वत में मिल गया हो तो कुसुम योग होता
है।
फल : कुसुम योग रखने वाला व्यक्ति विद्वान भाग्य-
शाली तथा उच्च पद पर पहुंचने वाला माना गया है। ऐसे
व्यक्ति के जीवन में कई आकस्मिक क्षण आते हैं जबकि वह
जल्दी से जल्दी उन्नति करने में समर्थ होता है। ऐसे व्यक्ति के
जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती।
[चित्र: कुसुम योग]
अग्नि काण्ड योग :
परिभाषा : यदि मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो
तथा इस पर्वत से एक रेखा निकलकर राहू पर्वत पर जाती हो
तो अग्निकाण्ड योग होता है।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उस व्यक्ति की
मृत्यु आग से जलकर होती है।
[चित्र: अग्निकाण्ड योग]
मत्स्य योग :
परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत विकसित हो, अंगूठा
पतला, लम्बा और थोड़ा सा पीछे झुका हुआ हो, साथ ही यदि
सूर्य रेखा सीढ़ीदार हो तो मत्स्य योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में मत्स्य योग होता है वह
सही भविष्यवक्ता, समय का पाबन्द तथा सद्गुणों से
युक्त होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी बुद्धि के द्वारा उन्नति
करता है तथा जीवन में क्षमावान, दयावान तथा सद्गुण विवेक-
[चित्र: मत्स्य योग] युक्त माना जाता है।
( २७३ )
अग्रजघातक योग :
परिभाषा : यदि हथेली मे राहू तथा हर्षल पर्वत पर
त्रिकोण का चिह्न हो तो उसके जीवन में अग्रजघातक योग
होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अपने
बड़े भाई से वैमनस्य रखता है अथवा उसकी हत्या कर देता
है ।
अग्रजघातक
कूर्म योग :
परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य रेखा स्पष्ट चन्द्र
पर्वत से होती हुई जीवन रेखा के मध्य मिलती हो तथा भाग्य
रेखा बलवान हो तो कूर्मयोग होता है ।
फल : कूर्म योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने कार्यों
से विख्यात तथा कीर्तिवान होता है । साथ ही ऐसा व्यक्ति
विपत्ति मे धैर्य धारण करने वाला, भाषण देने में होशियार,
दूसरों को प्रभावित करने वाला तथा राजा के समान जीवन
व्यतीत करने वाला होता है ।
कूर्म योग
आत्मघात योग :
परिभाषा : यदि मध्यमा उंगली के सबसे निचले पौर पर
तारक चिन्ह हो तो आत्मघात योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में आत्मघात योग होता है उसकी
मृत्यु स्वयं के प्रयत्नों से होती है और वह आत्महत्या करके
मरता है ।
आत्मघात योग
( २७४ )
देवेन्द्र योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में कमल का चिह्न हो और
विशेषकर ऐसा चिह्न जीवन रेखा के पास में चन्द्र पर्वत से कुछ
हटकर हो परन्तु जिससे कोई प्रसिद्ध रेखा कटती न हो तो
देवेन्द्र योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में देवेन्द्र योग होता है वह ध्यमित
सूझ-बूझ वाला तथा चतुराई से काम करने वाला होता है ।
वह आकर्षक व्यक्तित्व रखता है तथा सामने वाले व्यक्तियों
को पूरी तरह से प्रभावित करने की क्षमता रखता है । ऐसा
व्यक्ति दीर्घायु, शासन प्रिय, सुन्दर, कुशल, तथा दक्ष होता है । (चित्र: देवेन्द्र योग)
खंग योग :
परिभाषा : यदि हथेली मे बुध पर्वत अपने स्थान से
खिसक कर सूर्य पर्वत मे मिल गया हो और सूर्य पर्वत अपने
आप मे दृढ़ एवं श्रेष्ठ हो तो खंग योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह साधारण
स्थिति में भी जन्म लेकर अत्यन्त ऊंचे स्तर तक पहुंचता है ।
ये जो भी बातें कहते हैं उसे अन्त समय तक निभाने का प्रयत्न
करते है । ऐसे व्यक्ति भविष्य कथन करने मे भी श्रेष्ठ एव
सफल होते हैं । आर्थिक दृष्टि मे इनके जीवन मे किसी प्रकार
(चित्र: खंग योग) की कोई न्यूनता नहीं रहती ।
नवलक्ष्मी योग :
परिभाषा : यदि हथेली में भाग्य रेखा, सूर्य रेखा तथा,
बुध रेखा तीनों ही मणिबन्ध मे निकलती हों तथा सीधी, सरल
और स्पष्ट हों तो नवलक्ष्मी योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है वह
अटूट सम्पत्ति का स्वामी, सम्पन्न, ऐश्वर्य युक्त तथा प्रसिद्धि
प्राप्त होता है ।
(चित्र: नव लक्ष्मी योग)
( २७५ )
ज्योतिर्विद योग :
[चित्र: ज्योतिर्विद योग]
परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत पर किसी प्रकार की
बाधक रेखाएं न हों तथा यह पर्वत अपने आप में पुष्ट हो तो
ज्योतिर्विद योग होता है ।
फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सफल
भविष्य वक्ता होता है ।
भूमि योग :
परिभाषा : यदि मंगल तथा शुक्र पर्वत के बीच पर-
स्पर रेखा संबन्ध हो तथा शुक्र पर्वत पर भाग्य रेखा की कोई
सहायक रेखा आकर मिलती हो तो भूमि योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह भूमि
सम्बन्धी कार्यों से विशेष लाभ उठाता है तथा अपने आप में
भूमिपति होता है ।
[चित्र: भूमि योग]
पुत्रतः धनाप्ति योग :
[चित्र: पुत्रतः धनाप्ति योग]
परिभाषा : यदि गुरु पर्वत से कोई पतली रेखा शुक्र
पर्वत तक जाती हो तथा तर्जनी और मध्यमा के बीच तिल
चिह्न हो तो यह योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसे जीवन
भर पुत्र से धन प्राप्ति होती रहती है तथा सन्तान सुख
मिलता है ।
( २७६ )
कोटीश योग :
परिभाषा : यदि हाथ में शनि वलय हो और वलय
रेखा से छोटी-छोटी रेखाएं ऊपर की ओर उठ रही हों, साथ ही
भाग्य रेखा मणिबन्ध से निकल कर शनि बिन्दु तक जाती हो
तो कोटीश योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में कोटीश योग होता है वह व्यक्ति
जीवन में निश्चय ही करोड़पति होता है ।
कोटीश योग
अरिष्ट योग :
परिभाषा : यदि शनि पर्वत पर तारे का चिह्न हो
तथा मध्यमा के सबसे ऊपरी पौर पर सफेद बिन्दु हो तो
अरिष्ट योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में अरिष्ट योग होता है वह
जीवन में कई बार जादू, टोना, मन्त्र तंत्र, भूत प्रेत आदि से
पीड़ित रहता है ।
अरिष्ट
कलह योग :
परिभाषा : यदि हथेली में चन्द्र पर्वत पर आड़ी तिरछी
रेखाओं से जाल बना हो तो कलह योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में कलह योग होता है
वह जीवन भर प्रत्येक से कलह करता रहता है तथा हर एक
से उसका मानसिक असंतुलन बना रहता है ।
कलह
( २७७ )
उन्माद योग :
परिभाषा : यदि चन्द्र, राहू, पर्वत का परस्पर रेखा
सम्बन्ध हो या सूर्य और राहू पर्वतों का परस्पर सम्बन्ध हो तो
उन्माद योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में उन्माद योग होता है
वह विक्षिप्त स्वभाव का तथा उन्मादी प्रकृति का होता है ।
उन्माद योग
विष योग :
परिभाषा : यदि हाथ में बुध रेखा के नीचे कई काले
बिन्दु हों तो विष योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है उसे
धोखे से या विश्वासघात से जहर दिया जाता है जिससे उसकी
मृत्यु होती है ।
विष योग
श्वान योग
परिभाषा : यदि शनि पर्वत पर काला धब्बा या काले
बिन्दु हों तो श्वान योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में श्वान योग होता है वह पागल
कुत्ते के काटने से पीड़ित होता है या पागल हो जाता है अथवा
उसकी मृत्यु हो जाती है ।
श्वान योग
( २७८ )
बृहद् बीज योग :
परिभाषा : यदि राहू पर्वत पर काले धब्बे या काले
बिन्दु हों तो बृहद् बीज योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है
उसके अण्डकोष बढ़े हुए होते हैं तथा जीवन भर इस रोग से
ग्रसित रहता है ।
बृहद् बीज
विमल योग :
परिभाषा : यदि दो मणिबन्धों के बीच में सफेद
बिन्दु हो तो विमल योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
अत्यन्त सर्व गुण सम्पन्न समस्त प्रकार के ऐश्वर्य भोग भोगने
वाला, दयालु, परोपकारी तथा सुखी होता है ।
विमल
सरल योग :
परिभाषा : यदि सभी नाखूनों पर छोटे अर्द्धचन्द्र हों
तो सरल योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ मे सरल योग होता है
वह व्यक्ति दीर्घायु, शिक्षित, बात के मर्म को समझने वाला
तथा निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला व्यक्ति
होता है ।
सरल
( २७६ )
हर्ष योग :
परिभाषा : यदि हथेली के मध्य में चन्द्र पर्वत और
ऊर्ध्व रेखा के बीच में तिल का चिह्न हो तो हर्ष योग होता
है ।
फल : हर्ष योग वाला व्यक्ति भाग्यवान गुणी, चतुर,
दृढ़, तथा प्रसिद्ध होता है ।
प्रवृज्या योग :
परिभाषा : यदि आयु रेखा पर त्रिकोण का चिह्न
हो तो प्रवृज्या योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में प्रवृज्या योग होता है
वह किसी साधु से दीक्षा ले लेता है और गृहस्थ छोड़कर सन्यासी बन जाता है ।
टिप्पणी : विद्वानो ने निम्नलिखित योग भी प्रवृज्या योग से संबंधित माने हैं :
१. यदि सूर्य रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो ।
२. यदि पूरा हाथ लचकदार हो । सभी उंगलियां लम्बी और सुन्दर हों
तथा भाग्य रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो ।
३. यदि बुध पर्वत के नीचे त्रिकोण या जाल हो ।
४. यदि संतान रेखाओं एवं प्रणय रेखाओं पर जाल का चिह्न हो ।
शुक्र योग :
परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत बलवान पुष्ट, उठा हुआ
तथा सुन्दर हो एवं उस पर बाधक रेखाओं का जाल न हो तो
शुक्र योग होता है ।
फल : शुक्र याग वाला व्यक्ति धनवान, विद्वान विख्यात
तथा कीर्तिवान होता है । ऐसा व्यक्ति दीर्घायु तथा सुखी
परिवार से युक्त होता है ।
( २८० )
दुर्योग :
परिभाषा : यदि स्वास्थ्य रेखा पर त्रिकोण का चिह्न
हो तो दुर्योग होता है ।
फल : जिस जातक की हथेली में दुर्योग होता है
वह व्यक्ति कमजोर शरीर वाला अपने स्वास्थ्य के प्रति लापर-
वाह दरिद्री जीवन व्यतीत करने वाला, स्वार्थी तथा अपने
जन्म स्थान से दूर रहने वाला होता है ।
दुर्योग
गोल योग :
परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत हथेली के बाहर की ओर
निकला हुआ सा हो तो गोल योग होता है ।
फल : ऐसा व्यक्ति परिश्रमी, भाग्यहीन, तथा बराबर
धन की चिन्ता करने वाला तथा तुच्छ बुद्धि का होता है ।
गोल योग
युग योग :
परिभाषा : यदि स्वास्थ्य रेखा हथेली के पार जाती
हो तथा जीवन रेखा से उसका सम्बन्ध बना हो तो युग योग
होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति चंचल
स्वभाव वाला पाखण्डी एवं व्यभिचारी होता है । ऐसे व्यक्ति
को समाज में किसी प्रकार का कोई सम्मान नहीं मिलता ।
युग योग
( २८१ )
शूल योग :
परिभाषा : यदि मंगल रेखा चन्द्र पर्वत से होकर सूर्य
पर्वत तक जाती हो तो शूल योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में शूल योग होता है वह व्यक्ति
क्रोधी, क्रोध के आवेश में बना बनाया काम बिगाड़ने वाला,
लड़ाकू स्वभाव वाला, दरिद्री तथा घमण्डी होता है ।
[चित्र: शूल योग]
केदार योग :
परिभाषा : यदि सूर्य रेखा शनि पर्वत की ओर झुकी
हुई तथा स्वास्थ्य रेखा से संबन्ध स्थापित करती है तो हाथ में
केदार योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
आलसी, बन्धु-बान्धवों की सहायता करने वाला, कामी और
कृषि कार्य मे निपुण होता है ।
टिप्पणी : इस योग में व्यक्ति में अच्छे और बुरे गुणों
का मिश्रण होता है ।
[चित्र: केदार योग]
पाश योग :
परिभाषा : यदि गुरु पर्वत पर तिल का चिह्न हो तो
पास योग होता है ।
फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है वह व्यक्ति
मित्रों में लोकप्रिय, नौकरी द्वारा सुख भोगने वाला, तथा धन-
वान होता है ।
[चित्र: पाश]
( २८२ )
दामिनी योग :
परिभाषा : यदि मध्यमा और अनामिका उंगली के
बीच तिल का चिह्न हो दामिनी योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
उच्च चरित्रवान, दूसरों का सहायक तथा बुद्धिमान व्यक्ति
होता था ।
दामिनी
मुकुट योग :
परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में मंगल पर्वत विकसित
हो तथा वहां से एक रेखा सूर्य पर्वत की ओर जाती हो और
उस पर स्वस्तिक का चिह्न हो तो मुकुट योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में मुकुट योग होता है वह व्यक्ति
अपने जीवन में श्रेष्ठ खिलाड़ी होता है । जीवन में खिलाड़ी के
रूप में ही उसे मान्यता मिलती है तथा वह समाज में प्रसिद्ध
होता है । ऐसे व्यक्ति में वैर की भावना अत्यन्त प्रबल होती
है । ऐसा जातक शिकारी और अपने लक्ष्य को सही रूप में
पहिचानने वाला होता है ।
मुकुट
ऋण योग :
परिभाषा : यदि हथेली में शनि रेखा के दाहिनी ओर
काले रंग का तिल हो तो ऋण योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह थोड़े
बहुत रूप में जीवन भर ऋणी बना रहता है तथा उसके जीवन
में आय की अपेक्षा व्यय हमेशा बढ़ा-चढ़ा रहता है ।
ऋण योग
( २८३ )
कारक योग :
परिभाषा : यदि गुरु रेखा के वाम भाग में लाल या
काला तिल हो तो उसके हाथ में कारक योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जातक
अपने जीवन को सुख पूर्वक व्यतीत करता है । ऐसा जातक अपने
व्यापार में उच्च स्तर प्राप्त करने में सफल रहता है । आर्थिक
दृष्टि से तथा भौतिक दृष्टि से इसके जीवन में किसी प्रकार
की कोई बाधा या परेशानी नहीं होती ।
कारक योग
वल्लकी योग :
परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में मंगल रेखा के नीचे
या उसके दाहिनी ओर लाल तिल का चिन्ह हो तो वल्लकी
योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह शात,
गम्भीर, जीवन में कई मित्रों का सहयोग प्राप्त करने वाला,
प्रसन्नचित एवं अपने हुनर में ख्याति प्राप्त व्यक्ति होता है ।
वल्लकी योग
शारदा योग :
परिभाषा : यदि बुध पर्वत के नीचे या उसके बाईं
ओर काला तिल हो तो शारदा योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में शारदा योग होता है वह व्यक्ति
स्त्री, पुरुष, बन्धु आदि से सम्पन्न उन्नतिशील होता है । देवताओ
का यह आदर करता है तथा विद्वान चतुर, एवं धार्मिक
पुरुष होता है ।
शारदा
( २८४ )
समुद्र योग :
परिभाषा : यदि सूर्य रेखा के नीचे या उसके दाहिनी
ओर काले तिल का चिह्न हो तो समुद्र योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
विख्यात्, धार्मिक कार्य में आगे रहने वाला, राजा के समान
सुख भोगने वाला तथा चिन्ता मुक्त होता है ।
अर्द्ध चन्द्र योग :
परिभाषा : यदि चन्द्र रेखा के नीचे या दाहिनी ओर
काले तिल का या लाल तिल का चिह्न हो तो अर्द्धचन्द्र योग
होता है ।
फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है वह व्यक्ति
जीवन भर प्रसन्नचित् रहने वाला, आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न,
सहृदय, सुन्दर आकर्षक व्यक्तित्व वाला तथा निरंतर उन्नति
करने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार
की कोई न्यूनता नहीं रहती ।
छत्र योग :
परिभाषा : यदि शुक्र रेखा के पास में या उसके नीचे
लाल तिल अथवा काले तिल का चिह्न हो तो छत्र योग होता
है।
फल : यदि हाथ में छत्र योग हो तो ऐसा व्यक्ति
साहसी, रसिक पूर्ण, गृहस्थ सुख को भोगने वाला तथा आनन्द
पूर्ण जीवन व्यतीत करने वाला होता है ।
( २८५ )
कूट योग :
परिभाषा : यदि हाथ के मध्य में दो से अधिक तिल
हो और मुट्ठी बन्द करने पर उसमें आते हैं तो कूट योग होता
है ।
फल : जिसके हाथ में कूट योग होता है वे व्यक्ति अत्यन्त
साहसी पराक्रमी तथा निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर होने
वाले होते हैं । विपरीत परिस्थितियों को देखकर व्यक्ति घब-
राते नहीं, अपितु उनसे संघर्ष कर उन विपरीत परिस्थितियों
को अपने अनुकूल बनाने की क्षमता रखते हैं ।
[चित्र: कूट]
इषु योग :
परिभाषा : यदि अंगूठे के ऊपरी पौर पर काले तिल
का चिह्न हो तो इषु योग होता है ।
फल : इस योग मे जन्म लेने वाला व्यक्ति राजपत्रित
अधिकारी होता है । ऐसे व्यक्ति सामान्यतः जेल अधिकारी या
पुलिस सुपरिटेंडेंट होते हैं । अपने जीवन में ये व्यक्ति अपने
उद्देश्यों में पूर्णतः सफलता प्राप्त करते हैं ।
[चित्र: इषु योग]
दिग्बल योग :
परिभाषा : यदि शनि पर्वत को छोड़कर अन्य तीन
पर्वत अर्थात् सूर्य, बुध, और गृह पर्वत पर या इनसे संबंधित
रेखाओं के नीचे काले या लाल तिल का चिन्ह हो तो दिग्बल
योग होता है ।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में दिग्बल योग होता है वह
व्यक्ति अपने जीवन में अत्ययन्त ऊंचे स्तर पर पहुंचता है तथा
अपने कार्यों से समाज में सम्मानित होता है ।
[चित्र: दिग्बल योग]
( २८६ )
नीच भंग राज योग :
परिभाषा : यदि हाथ में शुक्र वलय हो और उस पर
क्रॉस का चिह्न हो तो नीच भंग राज योग होता है।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
अपने प्रयत्नों से उन्नति करता है तथा आर्थिक, सामाजिक
एवं राजनीतिक क्षेत्र में सुख प्राप्त करता है।
टिप्पणी : विद्वानों ने इसके अलावा निम्नलिखित योग
भी नीच भंग राजयोग से संबंधित बताए हैं ।
१. यदि हाथ के मध्य में स्वस्तिक का चिह्न हो।
२. यदि मध्यमा उंगली के तीनों ही पर्वतों पर काले नीचभंग राज योग
तिल का चिह्न हो।
३. यदि गुरु वलय हो तथा गुरु पर्वत पर क्रॉस का चिह्न भी हो।
४. यदि बुध वलय हो पर चन्द्रमा से कोई रेखा निकल कर बुध पर्वत तक
पहुंची हो।
५. यदि हाथ के सभी पर्वत सामान्यतः उन्नत तथा श्रेष्ठ हों।
६ यदि भाग्य रेखा सीढ़ीदार हो।
७. यदि जीवन रेखा पूर्ण हो तथा उस पर किसी प्रकार की बाधक रेखाएं
न हों।
८. यदि शुक्र पर्वत उभरा हुआ हो और उस पर बाधक रेखाएं न हों।
६. यदि चार मणिवन्ध हों तथा पहला मणिबन्ध जंजीरदार हो।
चण्डिका योग :
परिभाषा : यदि हथेली चौड़ाई की अपेक्षा कुछ
अधिक लम्बाई लिये हुए हो, हाथ की उंगलियां बिना गांठ की
हों तथा हाथ में जीवन रेखा के प्रारम्भ से एक रेखा निकल कर
सूर्य पर्वत अथवा बुध पर्वत तक जाती हो तो चण्डिका योग
होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में चण्डिका योग होता है
वह व्यक्ति चरित्रवान, धनपति, दूसरों की भलाई करने वाला,
निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला तथा मन्त्री के
चण्डिका योग समान जीवन व्यतीत करने वाला होता है।
( २८७ )
नाभस योग :
परिभाषा : यदि किसी भी उंगली के नीचे और
पर्वत के ऊपर छोटा स्वस्तिक का चिह्न हो तो नाभस योग
होता है।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
अत्यन्त श्रेष्ठ पूज्यनीय, ऐश्वर्यवान, परोपकारी तथा पूर्ण
भौतिक सुख भोगने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति निश्चय ही
अपने जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं।
(चित्र: नाभस योग)
जय योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में मगल पर्वत पर दो या दो
से अधिक तिल के चिह्न हो तो जय योग होता है।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
प्रबल, भाग्यशाली, अपने हर कार्य में पूर्ण विजय प्राप्त करने
वाला, शत्रुओ का तीव्रता से नाश करने वाला, क्षमता रखने
वाला, गुणवान, धैर्ययुक्त एवं दीर्घायु होता है।
(चित्र: जय योग)
विद्युत योग :
परिभाषा : मणिबन्ध के ऊपर तिल का चिन्ह हो तो
विद्युत योग होता है।
फल : ऐसा योग रखने वाला व्यक्ति राजा के समान
जीवन व्यतीत करने वाला, धनवान तथा पूर्ण सुख को भोगने
वाला होता है।
(चित्र: विद्युत योग)
( २८८ )
शिव योग :
परिभाषा : यदि हाथ के मध्य में कोई छोटी सी लह-
राती हुई रेखा हो तो शिव योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
उच्च कोटि का व्यापारी होता है या सेना में उच्च पद को
प्राप्त करने में सफल होता है । ऐसा व्यक्ति पुलिस आफिसर
या सन्तुष्ट जीवन व्यतीत करने वाला देखा गया है ।
[शिव योग]
विष्णु योग :
परिभाषा : यदि हथेली में कहीं पर कमल का सा
चिह्न हो तो विष्णु योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में विष्णु योग हो यह व्यक्ति
समस्त ऐश्वर्य का स्वामी, आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः सम्पन्न प्रबल
भाग्यशाली, सुखमय जीवन व्यतीत करने वाला, भाषण कला में
दूसरों पर प्रभाव डालने वाला तथा सभी प्रकार से सुखमय
जीवन व्यतीत करने वाला होता है ।
[सैनिक]
ब्रह्म योग :
परिभाषा : यदि हथेली में कहीं पर भी ध्वजा का
चिह्न हो तो उसके हाथ में ब्रह्म योग होता है । ऐसा विद्वान
कहते हैं ।
फल : ब्रह्म योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति समृद्ध
जीवन व्यतीत करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति देवताओं,
ब्राह्मणों तथा साधुओं पर पूर्ण श्रद्धा रखता है तथा चरित्रवान
होने के साथ-साथ वह निरन्तर समाज से संबंधित शुभ कार्यों
में रत रहता है ।
[ब्रह्म योग]
( २८१ )
हरि योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में अश्व का चिह्न हो वह
हरि योग सम्पन्न होता है ।
फल : हरि योग रखने वाला व्यक्ति जीवन में सुखी
ऐश्वर्य में जीवन व्यतीत करने वाला, विद्यावान चतुर, बात
चीत में होशियार तथा अपने व्यक्तित्व से दूसरों पर प्रभाव
डालने वाला होता है । इसके जीवन में आर्थिक दृष्टि से कोई
न्यूनता नहीं रहती ।
हरि योग
हर योग :
हर योग
परिभाषा : यदि जीवन रेखा के पास त्रिशूल का चिह्न
हो पर उससे जीवन रेखा कटती नहीं हो तो हर योग होता
है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह निरंतर
अपनी उन्नति करने वाला, धार्मिक कार्यों में पूर्ण रुचि लेने
वाला, परोपकारी, दयालु, सत्यवक्ता और निरंतर दूसरों का
सहायक होता है ।
ब्रह्मा योग .
परिभाषा : जिसके हाथ में मणिबन्ध के पास शुक्र पर्वत
पर हाथी का चिन्ह हो तो उसके हाथ में ब्रह्मा योग होता है ।
फल : हथेली में ब्रह्मा योग रखने वाला व्यक्ति तेजस्वी
और प्रखर बुद्धि का धनी होता है । ऐसा व्यक्ति धीर, गम्भीर
समाज सुधारक और अपने आप पर पूरा भरोसा रखने बाल
होता है । उसमें आत्म विश्वास जरूरत से ज्यादा होता है ।
ब्रह्मा योग
( २६० )
रवि योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में सूर्य का चिह्न दिखाई दे
योग होता है ।
फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है वह विज्ञान
अनुसंधान आदि कार्यों में रुचि लेने वाला तथा तीव्र मस्तिष्क
का स्वामी होता है । ऐसा व्यक्ति सादा जीवन उच्च विचार
के सिद्धांत को मानता है । इसका व्यक्तित्व भले ही साधारण
होता है; परन्तु इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक होती है और
अपने जीवन में पूर्ण यश तथा सम्मान प्राप्त करता है ।
रवि योग
पति त्याग योग :
परिभाषा : जिस स्त्री के हाथ में गुरु पर्वत पर चक्र
का निशान हो तो पति त्याग होता है ।
फल : जिस स्त्री के हाथ मे ऐसा योग होता है उस
स्त्री को उसका पति या तो छोड़ देता है या तलाक दे देता
है ।
टिप्पणी : यदि पुरुष के हाथ में ऐसा चिन्ह हो तो
पत्नी उसे छोड़ देती है और पत्नी आगे बढ़ कर उससे तलाक
ले लेती है ।
पतित्याग योग
गर्भपात योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में शुक्र पर्वत पर रेखाओं से
पर्वत का चिह्न बना हो तो गर्भपात योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह स्त्री कुछ
विशेष कारणो से गर्भपात करा देती है ।
टिप्पणी : इसके अलावा इससे सम्बन्धित निम्न योग
भी है :
१. यदि संतान रेखा पर सफेद बिन्दु हो ।
२. यदि सन्तान रेखा पर एक आड़ी रेखा हो ।
गर्भपात योग
( २६१ )
यूप योग :
परिभाषा : यदि हथेली में कहीं पर वृक्ष का चिन्ह
दिखाई दे तो यूप योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
आत्म केन्द्रित, निस्वार्थ भाव रखने वाला, थोड़े में ही संतोष
रखने वाला तथा कमजोर चरित्र वाला व्यक्ति होता है ।
नव योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में कही पर भी स्तम्भ का
चिन्ह हो तो नव योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
जीवन में सुखी, सफल एवं गृहस्थ जीवन में पूरी तरह से संतुष्ट
रहने वाला व्यक्ति होता है ।
दण्ड योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में कही पर भी तलवार का
चिन्ह हों तो उसके हाथ में दण्ड योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसके जीवन
में पत्नी से बराबर मतभेद बना रहता है । पूर्ण संतान सुख उसे
प्राप्त नहीं होता तथा एक प्रकार से उसके गृहस्थ सुख में
न्यूनता रहती हैं ।