बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( २१४ )
बराबर बना रहता है। यद्यपि वह जीवन में लाखों कमाता है परन्तु उसका व्यय
बढ़ा-चढ़ा होने के कारण लाखों खर्च भी कर डालता है। एक प्रकार से देखा जाय
तो ऐसे व्यक्ति के जीवन में बैंक बैलेंस नहीं के बराबर होता है। इतना होने पर भी
समाज में उसका सम्मान होता है तथा कई व्यक्ति उसके आदर्शों का अनुकरण करते हैं।
भास्कर योग :
परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य रेखा का बुध रेखा से सम्बन्ध हो, बुध रेखा
का चन्द्र रेखा से सम्बन्ध हो तथा गुरु पर्वत एवं गुरु रेखा अपने
आप में स्पष्ट दीर्घ एवं पुष्ट हो तो भास्कर योग बनता है।
फल : भास्कर योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति
आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सफल होता है। जीवन में उसे भौतिक
दृष्टि से किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। वह एक से
अधिक कलाएं जानता है जिसकी वजह से उसके आय के स्रोत
भी एक से अधिक होते हैं। शारीरिक दृष्टि से ऐसा व्यक्ति
पुष्ट तथा प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व लिये हुए होता है। शत्रु इससे
भयभीत रहते हैं तथा मित्र बनाने की कला में यह विशेष चतुर
[भास्कर योग] होता है। साहित्य, संगीत, कला आदि में यह व्यक्ति रुचि रखने
वाला होता है। तथा कलाकारों को धन एवं सहायता देकर समाज में यश, सम्मान
तथा वाहवाही भी लूटता है। ऐसे व्यक्ति के पास एक प्रकार से चुम्बकीय आकर्षण
होता है। जिसकी वजह से उसके जीवन में पुरुष मित्र एवं महिला मित्रों की कोई
कमी नहीं रहती।
टिप्पणी :—इस योग में गुरु सूर्य, बुध, तथा चन्द्र पर्वत पूर्ण विकसित होने
चाहिए, साथ ही साथ सूर्य रेखा तथा बुध रेखा अपने आप में निर्दोष होकर आपस में
मिलती हो। इसी प्रकार चन्द्र रेखा से बुध रेखा का सम्बन्ध बनता हो परन्तु चन्द्र
रेखा का सूर्य रेखा से सम्बन्ध होना उचित नहीं होता।
गन्धर्व योग :
परिभाषा :—यदि दाहिने हाथ तथा बायें हाथ की
हथेलियों में शुक्र पर्वत पूर्ण विकसित हो तथा उन पर वर्ग का
चिह्न हो, साथ ही सूर्य पर्वत एवं सूर्य रेखा पुष्ट एवं स्पष्ट हो
तो गंधर्व योग होता है।
फल :—जिसके हाथ में गंधर्व योग होता है वह व्यक्ति
प्रसिद्ध गायक, अथवा संगीतकार होता है। ऐसे व्यक्ति अपना
पूरा जीवन कला की साधना में लगा देते हैं और इस क्षेत्र में
पूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं। कला के माध्यम से ये व्यक्ति [गंधर्व]
( २१५ )
विदेशों में भी नाम कमाते हैं। इनके जीवन में धन, तथा यश की किसी प्रकार की
कोई न्यूनता नहीं रहती तथा जीवन में भौतिक दृष्टि से अपनी समस्त इच्छाएं पूर्ण
करता है ।
टिप्पणी : इस योग का अध्ययन करते समय इस बात का ध्यान रखना
चाहिए कि उसके हाथ में सूर्य रेखा तथा सूर्य पर्वत विकसित हो तथा सही हो ।
इसके अलावा शुक्र पर्वत दोनों ही हाथों में विकसित हो । आर्थिक दृष्टि से इन
व्यक्तियों के जीवन में कोई बाधा नहीं रहती ।
वसुमति योग :
परिभाषा : यदि उंगलियां बिना गांठ वाली तथा कुछ लम्बाई लिये हुए
होती है, साथ ही गुरु सूर्य शनि तथा बुध पर्वत अपने-अपने
स्थानों पर विकसित हों तो वसुमति योग बनता है ।
फल : ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में पूर्ण भौतिक सुख
प्राप्त करता है तथा उसके जीवन में धन की कोई कमी नहीं
रहती । ऐसा व्यक्ति अपने ही परिश्रम से धन उपार्जित कर
समाज में यश, तथा सम्मान प्राप्त करता है ।
टिप्पणी : इस योग में यह आवश्यक है कि हथेली मे
गुरु, सूर्य, शनि तथा बुध के पर्वत विकसित हों पर इसके साथ
ही साथ वे अपने स्थान से च्युत न हों। ऐसा होने पर ही वसु-
मति योग सम्भव हो सकता है ।
परइचतुस्सागर योग :
परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य, बुध, गुरु, तथा शनि
पर्वत दबे हुए हों या सभी पर्वत अपने-अपने स्थान से च्युत हों
तो परइचतुस्सागर योग बनता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जीवन
में आर्थिक अभावों से पीड़ित रहता है। साथ ही उसे अपने
जीवन में मानसिक संतुष्टि अथवा आराम नहीं मिलता । वह
जितना भी प्रयत्न करता है उतनी ही ज्यादा कठिनाइयां उसके
जीवन में आती रहती हैं। वस्तुतः ऐसा व्यक्ति अपने जीवन
को दरिद्रता के साथ ही व्यतीत करता है ।
परश्चतुस्सागर
( २१६ )
चतुस्सागर योग :
परिभाषा : यदि हथेली के सभी पर्वत विकसित हों
तथा सभी रेखाएं पुष्ट एवं सीधी, सरल, तथा स्पष्ट हों तो
ऐसे व्यक्ति के हाथ में चतुस्सागर योग बनता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
अपने ही कार्यों से प्रसिद्ध होते हैं और अपने प्रयत्नों से समाज
का अथवा देश का नेतृत्व करने में सफलता प्राप्त करते हैं ।
ऐसे व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः सुखी एवं सफल होते हैं ।
इनकी वाणी में ओज होता है तथा अपने भाषणों के माध्यम
से लोगों को प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखते हैं। ये व्यक्ति
अपने प्रयत्नों को अपने अनुकूल बनाकर विदेश यात्राएं करते
हैं तथा समुद्र पारीय देशों में भी ख्याति लाभ करते हैं। यदि ऐसे व्यक्ति राजकीय
सेवा में होते हैं तो उनकी नौकरी ऐसी होती है जिसकी वजह से इनके जीवन में
भ्रमण विशेष रूप से रहता है तथा उसमें सफलता प्राप्त कर लेते हैं। पारिवारिक
दृष्टि से ये व्यक्ति पूर्णतः सन्तुष्ट होते हैं ।
[चित्र-शीर्षक: चतुस्सागर]
टिप्पणी : इस योग में राहू और केतु पर्वतों पर विशेष ध्यान नहीं दिया
जाता, इसके अलावा सभी पर्वत अपने आप में पूर्ण विकसित अवस्था में होने चाहिए
और उन पर किसी प्रकार का बिन्दु व जाल नहीं होना चाहिए । पर इसके साथ ही
उस व्यक्ति की हथेली लचीली, कोमल तथा गुलाबीपन लिये हुए होनी आवश्यक है ।
रोग योग :
परिभाषा : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों के अनुसार
निम्नलिखित योग यदि हथेली में पाये जाएं तो रोग योग
होता है ।
१. दुर्बल शरीर : यदि नाखून पतले हों तथा जीवन
रेखा फीकी हो साथ ही वह जंजीरदार होकर
नीचे की ओर झुकी हुई हो ।
२. अकाल मृत्यु : यदि हृदय रेखा शनि पर्वत को
स्पर्श करती हो, साथ ही मस्तिष्क रेखा के बीच
में क्रॉस का चिह्न हो तथा जीवन रेखा कटी
हुई हो ।
[चित्र-शीर्षक: रोग योग]
( २१७ )
३. बचपन में दुर्बलता : यदि जीवन रेखा बहुत अधिक मोटी हो और गुरु
पर्वत के नीचे जंजीरदार हो गई हो ।
४. वंशगत रोग : जहां से जीवन रेखा प्रारम्भ हो रही हो वहीं पर द्वीप
का चिह्न हो तो उस व्यक्ति को वंशगत रोग होता है ।
५. कमजोर शरीर : यदि जीवन रेखा सीढ़ीदार तथा टूटी हुई हो ।
६. बचपन में दुर्घटना : यदि भाग्य रेखा के प्रारम्भ में कोई बिन्दु का
चिह्न हो ।
७. अविकसित शरीर : यदि जीवन रेखा के बीच में कई शाखाएं नीचे की
ओर बढ़ी हों तथा वह टूटी हुई हो ।
८. बुढ़ापे में कमजोरी : यदि स्वास्थ्य रेखा चौड़ी हो और अन्त में वह
जाकर गुच्छेदार हो गई हो अथवा टूट गई हो ।
६. आकस्मिक मृत्यु :-यदि हृदय रेखा शनि पर्वत के नीचे जाकर अचानक
से दिखाई देती हो या मस्तिष्क रेखा मणिबन्ध को स्पर्श करती हो ।
१०. हत्या : यदि जीवन रेखा मस्तिष्क रेखा तथा हृदय रेखा अपने
प्रारम्भिक स्थान पर परस्पर पूरी तरह से जुड़ी हुई हो और जंजीरदार
हो गई हो ।
११. पशु से दुर्घटना : यदि मस्तिष्क रेखा सूर्य पर्वत के नीचे या शनि पर्वत
के नीचे अचानक टूट गई हो ।
१२. सिर पर चोट : यदि मस्तिष्क रेखा पर लाल रंग के तारे का चिह्न
हो ।
१३. यौवनकाल में भयंकर दुर्घटना :-यदि मस्तिष्क रेखा नीचे की ओर
झुकी हुई हो तथा लहरदार दिखाई देती हो ।
१४. फांसी : यदि जीवन रेखा बीच में ही एकाएक समाप्त हो गई हो और
हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा तथा जीवन रेखा से बने हुए त्रिकोण में
क्रास या दो तारक चिह्न हों ।
१५. कारावास : यदि भाग्य रेखा के प्रारम्भ में कई रेखाएं निकल कर नीचे
की ओर जा रही हों और वह भाग्य रेखा मध्यमा के दूसरे पौर तक
पहुंच गई हो ।
१६. जल में मृत्यु : यदि चन्द्र पर्वत पर वृत्त का चिह्न हो अथवा चन्द्र पर्वत
पर त्रिकोण हो अथवा बुध पर्वत पर बिन्दु, त्रिकोण या तारक चिह्न
हो ।
( २१८ )
१७. यात्राकाल में मृत्यु : यदि यात्रा रेखाएं टूटी हुई तथा जरूरत से ज्यादा
चौड़ी हों।
१८. कैंसर : यदि दोनों हाथों में मंगल रेखा पर शाखाएं निकली हुई हों
या जीवन रेखा के प्रारम्भ में तारे का चिह्न हो।
१६. मिरगी : यदि हृदय रेखा पर क्रास हो या स्वास्थ्य रेखा कई रंगों की
दिखाई देती हो।
२०. पक्षाघात : यदि हृदय रेखा तथा चन्द्र पर्वत पर दो खड़ी लम्बी
लाइनें हों।
२१. मस्तिष्क रोग : यदि मस्तिष्क रेखा लहरदार या सीढ़ीदार हो तथा
उसका झुकाव स्वास्थ्य रेखा की ओर हो या मस्तिष्क रेखा स्वास्थ्य
रेखा से जुड़ी हुई हो या जुड़ने के स्थान पर रेखाओं का गुच्छा सा
बन गया हो।
२२. दमा : यदि हाथ लुजलुजा हो तथा जीवन रेखा पर द्वीप का चिह्न हो।
२३. अन्धा : यदि जीवन रेखा पर वृत्त हो या हृदय रेखा पर धब्बा हो
अथवा स्वास्थ्य रेखा पर क्रॉस हो या सूर्य रेखा के प्रारम्भ में बड़ा
काला धब्बा हो।
२४. मस्तिष्क रोग : यदि मस्तिष्क रेखा जरूरत से ज्यादा चौड़ी हो तथा
उस पर काला धब्बा हो।
२५. एनीमिया : यदि हृदय रेखा चौड़ी और कमजोर हो तथा नाखूनों का
रंग नीला सा हो।
२६. जुकाम या नजला : यदि चन्द्र पर्वत बहुत अधिक विकसित तथा उठा
हुआ हो।
२७. हृदय रोग : यदि हृदय रेखाएं दो हों तथा बीच-बीच में आपस में मिल
जाती हों अथवा हृदय रेखा शनि पर्वत पर पहुंच गई हो।
२८. गठिया : यदि चन्द्र पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो और पूरे चन्द्र
पर्वत को कोई एक रेखा काटती हो या उसे दो भागों में विभाजित
करती हो। अथवा जीवन रेखा के अन्तिम स्थल पर छोटी-छोटी
रेखाओं का गुच्छा हो।
२६. मूर्च्छा का रोग : यदि स्वास्थ्य रेखा जीवन रेखा से प्रारम्भ हो रही हो
तथा मस्तिष्क रेखा हृदय रेखा की ओर बढ़ रही हो तो उसे जीवन में
मूर्च्छा के बार-बार दौरे आते हैं।
( २१६ )
३०. बहरापन : बृहस्पति पर्वत कमजोर हो तथा इस पर्वत के नीचे मस्तिष्क
रेखा पर बिन्दु का चिह्न हो।
३१. क्षय रोग : यदि नाखून लम्बे, पतले तथा मुड़े हुए हों साथ ही मस्तिष्क
रेखा पर कई छोटे-छोटे द्वीप हों।
३२. जलोदर : चन्द्र पर्वत जरूरत से ज्यादा उभरा हुआ हो और उस पर
एक से अधिक क्रॉस के चिह्न या बिन्दु के चिह्न हों।
३३. कम्प रोग : यदि मस्तिष्क रेखा पर काला धब्बा हो और जीवन रेखा
के प्रारम्भ में तारे का चिह्न हो तो उसके शरीर के अंग थोड़े बहुत
रूप में कांपते ही रहते हैं।
३४. डिफ्थीरिया : यदि जीवन रेखा तथा मस्तिष्क रेखा कटी हुई हो एवं
शनि पर्वत के नीचे चतुर्भुज तथा क्रॉस का चिह्न हो।
३५. मोटापा : यदि हृदय रेखा टूटी हुई हो और हाथ मोटा तथा गुदगुदा
हो।
३६. हिस्टीरिया : यदि हाथ सामान्य स्तर का हो तथा चन्द्र पर्वत पर एक
से अधिक तारे के चिह्न हों।
३७. घातक रोग : यदि जीवन रेखा टूटी हुई हो तथा उसका एक खण्ड
शुक्र पर्वत से सम्बन्धित हो।
३८. पाचनशक्ति में कमी : मस्तिष्क रेखा तंग हो तथा स्वास्थ्य रेखा
लहरदार हो।
३६. स्मृति नाश : यदि मस्तिष्क रेखा कई जगह से टूटी हुई हो तो उसकी
स्मरण शक्ति बिल्कुल नहीं होती।
४०. वायु रोग : यदि जीवन रेखा के अन्त में कई शाखाएं निकल कर नीचे
की ओर बढ़ रही हों।
४१. प्लूरिसी : यदि जीवन रेखा से कोई रेखा निकल कर शनि पर्वत पर
पहुंचती हो तथा वहां त्रिकोण का चिह्न हो अथवा दो तारक चिह्न
हों, तो ऐसे व्यक्ति को प्लूरिसी अर्थात् उसके फेफड़ों में पानी का
जमाव हो जाता है।
४२. हत्या : यदि अनामिका के नीचे से पौर पर तारक चिह्न हो तो पिस्तौल
की गोली खाकर उसकी मृत्यु होती है। गांधी जी के हाथ में यह चिन्ह
स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।
४३. आत्म हत्या : यदि दूसरी उंगली का पहला पौर बहुत ज्यादा लम्बा
हो या भाग्य रेखा के अन्त पर तारे का चिन्ह हो।
( २२० )
४४. दांत रोग : यदि हृदय रेखा तथा स्वास्थ्य रेखा लहरदार हो तो उसे
जीवन भर दांतों का रोग बना रहता है ।
४५. गुप्तांग रोग : यदि मंगल पर्वत पर बहुत अधिक बारीक-बारीक
लाइनें दिखाई दें तो उस व्यक्ति को गुप्तांगों के रोग रहते हैं ।
नपुंसक योग :
परिभाषा :—यदि शुक्र पर्वत दबा हुआ हो तथा उस
पर धब्बे का चिन्ह हो ।
फल : जिनके हाथ में ऐसा योग होता है उसके शुक्राणु या
तो बहुत अधिक कमजोर होते या मृतावस्था में होते हैं,
जिसकी वजह से उसको सन्तान लाभ नहीं रहता ।
नपुंसक योग :
चन्द्रमंगल योग :
परिभाषा : यदि व्यक्ति की हथेली में चन्द्र रेखा उभर कर
मंगल से मिलती हो या भाग्य रेखा तथा चन्द्र रेखा का निर्दोष
रूप से मिलन होता है तो उसके हाथ में चन्द्र मंगल योग होता
है ।
फल : जिसके हाथ में ऐसा योग दिखाई देता है वह अपने
जीवन में आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक सम्पन्न और सुखी होता
है । धन कमाने की कला उसको आती है। अपने संबंधियों
तथा भागीदारों के साथ चालाकी भरा व्यवहार होता है तथा
जीवन में कई स्त्रियों से सम्पर्क रहता है ।
चन्द्रमंगल योग
टिप्पणी : चन्द्र मंगल योग में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना
चाहिए कि ये दोनों रेखाएं अपने आप में पुष्ट तथा सही हों, तथा इन दोनों रेखाओं
का आपस में संबंध बना हो पर किसी प्रकार से जंजीर के समान आकृति न बन गई
हो ।
( २२१ )
सति योग :
परिभाषा : यदि किसी महिला के हाथ में गुरु पर्वत पूर्ण
विकसित हो तथा सभी उंगलियां लम्बी, सुन्दर तथा स्वस्थ हों
तो वह पतिव्रता होती है ।
फल : जिस महिला के हाथ में यह योग होता है वह
पतिव्रत धर्म को निभाने वाली जीवन में पति को सहयोग एवं
सुख देने वाली तथा पूर्णतः साध्वी महिला होती है ।
(चित्र : सति योग)
कुलटा योग :
(चित्र : कुलटा योग)
परिभाषा : विद्वानों ने नीचे लिखे योग कुलटा योग माने
हैं। जिन महिलाओं के हाथों में यह योग होता है वह पति के
अलावा अन्य पुरुष से पतिसम संबंध रखने वाली तथा पति को
धोखा देने वाली होती है ।
१. यदि हथेली में शुक्र पर्वत जरूरत से ज्यादा विक-
सित हो तथा हृदय रेखा जंजीरदार हो ।
२. यदि हृदय रेखा पर झुकती हुई दो समानान्तर
रेखाएं हों ।
३. यदि हृदय रेखा पर द्वीप का चिन्ह हो ।
४. यदि शुक्र पर्वत पर जाली हो तथा हृदय रेखा अत्य-
धिक कमजोर हो । ऐसे चिन्ह दोनों हाथों में हों ।
५. यदि हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा तथा स्वास्थ्य रेखा से बने त्रिकोण में
बिन्दु हों ।
६. यदि हाथ में विशेषकर दोनों हाथों में शुक्र पर्वत तथा सूर्य पर्वत का
लगभग अभाव सा हो ।
७. अंगूठे पर या अंगूठे के पहले पौर पर तारे का चिन्ह हो ।
८. यदि तर्जनी के पहले पौर पर तारक चिन्ह हो ।
९. यदि शुक्र पर्वत पर जरूरत से ज्यादा खड़ी और आड़ी रेखाएं हों ।
१०. यदि अंगूठे की जड़ पर क्रास हो ।
११. यदि शुक्र पर्वत पर तारे का चिन्ह हो ।
१२. यदि भाग्य रेखा के अन्त में कई शाखाएं निकल कर नीचे की ओर जा
रही हों ।
( २२२ )
१३. यदि हृदय रेखा बढ़ कर हथेली के दूसरी तरफ पहुंच गई हो ।
१४. यदि हृदय रेखा उंगलियों के पोरों को स्पर्श कर रही हो ।
१५. यदि जीवन रेखा तथा हृदय रेखा का उद्गम स्थान अलग-अलग हो तथा
दोनों रेखाएं चौड़ी हों ।
१६. यदि स्वास्थ्य रेखा बुध रेखा के समानान्तर चलती हो ।
१७. यदि शुक्र पर्वत सामान्य रूप से विकसित हो । उंगलियां नर्म हों तथा
उनके ऊपरी सिरे नुकीले हो ।
१८. यदि हृदय रेखा पर सफेद धब्बा हों ।
१९. यदि गुरु पर्वत पर क्रास न हो परन्तु शुक्र पर्वत पर क्रास का चिन्ह
हो ।
२०. यदि मस्तिष्क रेखा नीचे की ओर झुकी हुई हो तथा आगे चलकर
जीवन रेखा से मिल जाती हो ।
२१. यदि विवाह रेखा पर द्वीप हो ।
२२. यदि अंगूठा लम्बा हो तथा हृदय रेखा दोहरी हो ।
२३. यदि हृदय रेखा संकीर्ण होकर गुरु पर्वत पर पहुंचती हो ।
२४. यदि हृदय रेखा पर भाग्य रेखा से छोटी-छोटी रेखाएं आ रही हों ।
२५. यदि वृहस्पति पर्वत के नीचे हृदय रेखा तथा भाग्य रेखा मिल रही हो ।
२६. यदि शुक्र पर्वत से कोई एक रेखा निकल कर बुध पर्वत तक जाती हो ।
२७. यदि हृदय रेखा तथा भाग्य रेखा एक जगह मिलकर जंजीरदार हो गई
हो ।
२८. यदि शुक्र पर्वत से रेखाएं निकल कर स्वास्थ्य रेखा जीवन रेखा तथा
मस्तिष्क रेखा को काटती हों ।
२९. जीवन रेखा पर शुक्र पर्वत के आसपास दो या तीन तारे के चिन्ह हों ।
३०. यदि शुक्र पर्वत से दो समानान्तर रेखाएं चन्द्र पर्वत की ओर जा रही
हों ।
३१. यदि चन्द्र पर्वत पर स्वस्तिक का चिन्ह हो अथवा अर्द्धचन्द्र का चिन्ह
हो ।
३२. यदि भाग्य रेखा मणिबन्ध के पास जाकर समाप्त हो गई हो तथा शुक्र
पर्वत पर तारे का चिन्ह हो ।
३३. यदि भाग्य रेखा चन्द्र पर्वत से प्रारम्भ होती हो ।
३४. यदि अंगूठे के दूसरे पर्व पर तारक चिन्ह हो ।
( २२३ )
३५. यदि हाथ में चतुर्भुज का आकार हो तथा उसमें तारे का चिन्ह हो ।
३६. मस्तिष्क रेखा तथा हृदय रेखा मिलकर मेहराब का चिन्ह बनाती हों ।
फल : ऊपर लिखे कोई योग यदि किसी पुरुष या स्त्री की हथेली में पाये जायें तो
वह निश्चय ही पर पुरुष या स्त्री से संबंधित रहता है पर उसका प्रेम सामान्यतः
गोपनीय ही रहता है ।
अखण्ड साम्राज्यपति योग :
परिभाषा : यदि दोनों हाथों में भाग्य रेखा मणिबन्ध पर
मत्स्याकार बना कर शनि पर्वत से मिलती हो तथा सूर्य रेखा
लम्बी पतली स्पष्ट हो एवं चन्द्र पर्वत से पतली रेखा निकल
कर बुध पर्वत को स्पर्श करती हो तथा सूर्य शनि एवं शुक्र के
पर्वत पूर्ण विकसित हों तो उसके हाथ में अखण्ड साम्राज्यपति
योग होते हैं ।
फल : जिस व्यक्ति का जन्म इस योग में होता है वह
अपने जीवन में समस्त प्रकार के ऐश्वर्य तथा भोगों के भोग
करता है और अपने कार्यों से विश्व विख्यात होता है । ऐसा [चित्र-शीर्षक: अखण्ड साम्राज्यपति]
व्यक्ति उच्चस्तरीय समाज सुधारक, देश नेता, किसी विशेष क्षेत्र में विशेषज्ञ, साहसी,
और पराक्रमी होता है ।
टिप्पणी : इस योग के लिए यह आवश्यक है कि सूर्य, शनि तथा शुक्र के पर्वत
दोनों हाथों में विकसित हों तथा शनि रेखा एवं सूर्य रेखा दोनों हाथों में स्पष्ट तथा
सुदृढ़ हो । इसके साथ ही साथ उस व्यक्ति की हथेली लालिमा लिए हुए हो तथा
हथेली का आकार चौड़ाई की अपेक्षा कुछ लम्बाई लिए हुए होना चाहिए । यह योग
सामुद्रिक शास्त्र में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है ।
शश योग :
परिभाषा : हथेली में तीन मणिबन्ध हों । पहले मणिबन्ध
पर मत्स्याकार होकर वहां से भाग्य रेखा शनि पर्वत के बिन्दु
तक पहुँचती हो और शनि पर्वत पूर्ण विकसित अवस्था में हो
तो उसके हाथ में शश योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में शश या शशक योग होता है वह
व्यक्ति साधारण कुल में जन्म लेकर भी जीवन में अत्यन्त
उच्च पद पर पहुंचता है । राजनीति में यह व्यक्ति अत्यन्त
[चित्र-शीर्षक: शश] महत्वपूर्ण पद को सुशोभित करता है तथा राजनीति-विशारद
( २२४ )
माना जाता है। ऐसे व्यक्ति के घर में नौकर-चाकर पशु वाहन आदि का पूर्ण सुख
रहता है। बह गांव का प्रसिद्ध मुखिया नगरपालिकाध्यक्ष या देश का प्रसिद्ध नेता होता
है। ऐसे व्यक्ति का स्वभाव अत्यन्त सरल तथा विवेकशील होता है। इसके व्यक्तित्व
में कई प्रकार के गुणों का अद्भुत समन्वय होता है।
टिप्पणी : इस योग में शनि को बहुत अधिक प्रधानता दी गई है। अतः शनि
पर्वत तथा शनि रेखा जितनी ही ज्यादा श्रेष्ठ होगी वह व्यक्ति उतना ही ज्यादा
ऊंचा उठेगा। ऐसा व्यक्ति यद्यपि धीरे-धीरे उन्नति करता है परन्तु उसकी जो भी
उन्नति होती है वह स्थाई होती है।
मालव्य योग :
परिभाषा : यदि हथेली मे शुक्र पर्वत न तो दबा हुआ हो
और न अधिक विकसित हो परन्तु सामान्यतः विकसित चमकीला
तथा स्वस्थ हो साथ ही जीवन रेखा मणिबन्ध की ओर आते
हुए शुक्र पर्वत को पूर्ण विस्तार दिया हुआ हो तथा अंगूठा लम्बा
किंचित पीछे की ओर झुका हुआ हो, शुक्र पर्वत पर किसी
प्रकार का बिन्दु या जाल या बाधक रेखाओं के चिन्ह न हों तो
उसके हाथ में मालव्य योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति की हथेली में मालव्य योग होता है वह
अत्यन्त सुन्दर तथा आकर्षक होता है। उसके व्यक्तित्व में कुछ
ऐसी विशेषता होती है कि जिससे वह लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल
हो जाता है। ऐसे जातक सुन्दर और आकर्षक चेहरे वाले लाल वर्ण पतली कमर चन्द्रमा
के समान ओज एवं कांतिवाला लम्बी नाक, प्रकाशित नेत्र, सुदर्शन व्यक्तित्व का धनी
होता है। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान एवं चतुर भी होता है तथा कठिन से कठिन परि-
स्थितियों मे भी विचलित नहीं होता। धन इसके पास स्वतः ही खिंचा चला आता है
और बहुत कम परिश्रम करने पर आय के स्रोत एक से अधिक बना लेता है। इसे
जीवन भर वाहन सुख बना रहता है तथा जीवन में सभी प्रकार के भोगों को भोगता
है। सभ्यता की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति उच्च कोटि के होते हैं तथा अपने कार्यों से देश
तथा विदेश में सम्मानित होते हैं।
टिप्पणी : जिस व्यक्ति की हथेली में मालव्य योग होता है वह मूलतः कलाकार
होता है। यदि शुक्र पर्वत तथा शुक्र रेखा दोनों ही पुष्ट एवं स्वस्थ हों तो व्यक्ति काव्य
संगीत नृत्य आदि के क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति कला के क्षेत्र में भी
घुस जाते हैं उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त करके ही रहते हैं। हृदय से ये व्यक्ति उदार,
( २२५ )
तथा परोपकारी होते हैं। इनके जीवन में शुक्र से सम्बन्धित किसी प्रकार की कोई
न्यूनता नहीं रहती ।
हंस योग :
परिभाषा : यदि हथेली में तर्जनी उंगली अनामिका से लम्बी
हो, गुरु पर्वत पूर्णतः विकसित तथा लालिमा लिए हुए हो उस
पर क्रॉस के चिन्ह के अलावा और अन्य कोई चिन्ह न हो तो
उसके जीवन में हंस योग का निर्माण होता है ।
फल :
जिस व्यक्ति के हाथ में हंस योग होता है वह व्यक्ति
लम्बे तथा आकर्षक डीलडौल का स्वस्थ सुन्दर पुरुष होता है । उसका
व्यक्तित्व हर समय खिला हुआ रहता है । हंसमुख चेहरा उन्नत
ललाट, तीखी नासिका, विशाल वक्षस्थल तथा सुन्दर व्यक्तित्व
वाला ऐसा व्यक्ति दूरदर्शी होने के साथ-साथ मित्रों परिचितों
एवं संबन्धियों का सहायक होता है । यह सभी के साथ श्रेष्ठ व्यवहार करता है तथा
समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त करने में सफल होता है । नौकरी के क्षेत्र में यह
व्यक्ति अत्यन्त उच्च पद को प्राप्त करके ही रहते हैं ।
टिप्पणी : यह योग गुरु की वजह से बनता है तथा यह पंचमहापुरुष योग में से एक
योग है ऐसे व्यक्ति सफल न्यायाधीश होते हैं तथा निष्पक्ष निर्णय देने की वजह से
समाज में उनका सम्मान रहता है । ऐसे व्यक्ति प्रलोभन या दबाव में आकर किसी
प्रकार का कोई गलत समझौता अपने जीवन में नहीं करते । इसके साथ ही साथ ऐसे
व्यक्ति अत्यन्त आकर्षक होते हैं तथा उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी विशेषता होती है
जिससे इनके परिचितों की संख्या जरूरत से ज्यादा रहती है । इनका बुढ़ापा अत्यन्त
सुखदायक होता है ।
रुचक योग :
परिभाषा : यदि हथेली में मंगल पर्वत पूर्णतः विकसित
स्पष्ट तथा लालिमा लिए हुए हो साथ ही मंगल रेखा सीधी
पतली तथा सुन्दर हो तो उस व्यक्ति के हाथ मे रुचक योग
होता है ।
फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति शारीरिक दृष्टि
से बलवान तथा पुष्ट होता है । यह अपने कार्यों से समाज और
देश का नाम रोशन करता है तथा समय पड़ने पर यह देश का
नेतृत्व करने की भी क्षमता रखता है। इसका जीवन राजा के
समान ही व्यतीत होता है । अपने देश के प्रति देश की संस्कृति
और कला के प्रति यह हरदम जागरूक रहता है तथा अपने देश
४
( २२६ )
की प्रतिष्ठा को ऊंचा उठाने में बराबर सहायक बना रहता है । ऐसे व्यक्ति का जीवन
तथा चरित्र उच्चकोटि का होता है और किसी के दबाव में आकर कोई कार्य नहीं
करता । आर्थिक दृष्टि से इस व्यक्ति के जीवन में कोई कमी नहीं रहती । ऐसा व्यक्ति
दीर्घायु प्राप्त करता है तथा सेना, मिलिट्री या पुलिस विभाग में अत्यन्त ऊंचे पद पर
पहुंचता है तथा अपनी योग्यता सूझबूझ तथा नेतृत्व करने की क्षमता के कारण
सम्मानित होता है ।
टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र में इस योग को भी पंचमहापुरुष योग में से एक माना
है । ऐसे व्यक्ति देश और विदेश में सम्मानित होते हैं तथा पूर्ण लाभ प्राप्त करते हैं ।
भद्र योग :
परिभाषा : यदि हथेली में बुध पर्वत पूर्णतः विकसित
हो तथा बुध रेखा सीधी पतली, गहरी तथा लालिमा युक्त हो
तो उसके हाथ में भद्र योग होता है ।
फल : भद्र योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति साहसी
निर्भीक तथा पराक्रमी होता है । इसके सामने शत्रु टिकते ही
नहीं हैं और एक हिसाब से यह प्रबल शत्रुहन्ता होता है ।
शत्रुओं को भी मित्र बनाने की कला इस व्यक्ति को अच्छी
तरह से आती है । इसका व्यक्तित्व अपने आप में प्रभाव पूर्ण
होता है तथा यह निरन्तर ऊंचा उठने की भावना रखता है
इसके संपर्क में जो भी आता है उसकी सहायता करने को यह हर समय तैयार रहता
है । इस व्यक्ति का मस्तिष्क अत्यन्त पैना और उर्वर होता है जिसकी वजह से
यह पेचीदा से पेचीदा कार्य भी सुगमता से कर लेता है । जो कार्य दूसरो को अत्यन्त
जटिल और असंभव लगते हैं उस कार्य को भी ये आसानी से सम्पन्न कर लेते हैं ।
यद्यपि ये व्यक्ति जीवन में धीरे २ प्रगति करते हैं परन्तु अन्त में ये सर्वोच्च पद पर ही
विश्राम लेते हैं । व्यापार की दृष्टि से इनके हाथ में प्रबल योग होता है तथा अपने
प्रयत्नों से यह अपने व्यापार को विदेशों में भी फैलाने में समर्थ होता है ।
टिप्पणी - यह योग मुख्यतः बुध पर्वत की वजह से बनता है । बुध व्यापार
एवं बुद्धि का कारक ग्रह माना गया है । अतः यह बात निश्चित है कि ऐसा व्यक्ति
प्रखर बुद्धि का स्वामी होता है तथा व्यापार के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करता
है । ऐसे व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते और बाधाओं के बीच
भी अपना पथ चुन लेते हैं । तुरन्त निर्णय करने की क्षमता इनमें विशेष रूप में होती
है ।
( २२७ )
वस्तुतः सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार रुचक योग, भद्र योग, हंस योग, मालव्य
योग तथा शश योग ये पांचों योग पंचमहापुरुष योग के नाम से जाने जाते हैं।
ब्रह्मचर्य योग :
परिभाषा : यदि कनिष्ठिका उंगली के पहले पर्व पर
क्रॉस का चिन्ह हो तो ब्रह्मचर्य का योग होता है।
फल : जिसके हाथ में ब्रह्मचर्य योग होता है वह
व्यक्ति जीवन भर स्त्रियों से दूर रहता है। विवाह नहीं करता
तथा साधुवत् जीवन ही व्यतीत करने में सफल होता है।
सन्तानहीन योग :
परिभाषा : यदि हथेली में स्वास्थ्य रेखा पर तारे का
चिन्ह हो तो सन्तानहीन योग होता है। इसी प्रकार मध्यमा
उंगली के तीसरे पर्व पर भी तारक चिन्ह ऐसा ही योग बनाता
है।
फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है उसे जीवन में
सन्तान सुख प्राप्त नहीं होता। यदि पति तथा पत्नी दोनों ही
के हाथों में ऐसा योग हो तो निश्चय ही उसको सन्तान सुख का
अभाव रहता है।
विवाह योग :
परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत तथा गुरु पर्वत विकसित
हो तो विवाह योग बनता है पर विद्वानो ने इसके अलावा
अन्य तथ्य इस प्रकार से स्पष्ट किये हैं :
सुखी विवाह : १. यदि हथेली में भाग्य रेखा का
उद्गम स्थान चन्द्र पर्वत हो।
२. यदि भाग्य रेखा हृदय रेखा पर
समाप्त हो।
३. यदि गुरु पर्वत पर क्रास हो।
सुखहीन विवाह : १. यदि शुक्र पर्वत कम उभरा
हुआ हो।
( २२८ )
२. यदि शुक्र पर्वत पर लाल रंग का तारक चिन्ह हो ।
३. यदि विवाह रेखा पर द्वीप का चिन्ह हो ।
४. यदि भाग्य रेखा पर क्रॉस हो ।
अनमेल विवाह : १. यदि सूर्य रेखा तथा विवाह रेखा आपस में काटती हो ।
२. यदि शुक्र पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो ।
व्यापारी से विवाह : यदि मणिबन्ध से शुक्र पर्वत को कोई रेखा जाती हो ।
२. यदि मणिबन्ध से कोई रेखा बुध पर्वत तक पहुंचती हो ।
३. यदि सूर्य रेखा का शुक्र रेखा से सम्बन्ध हो ।
बूढ़े व्यक्ति से विवाह : १. यदि कोई रेखा मणिबन्ध से निकल कर
शुक्र पर्वत तथा शनि पर्वत पर जाती हो ।
२. यदि हाथ कमजोर एवं संकीर्ण हो तथा भाग्य रेखा एवं प्रणय
रेखा दूषित हो ।
विवाह में बाधा : १. यदि विवाह रेखा कई स्थानों पर कटती हो ।
२. यदि चन्द्र पर्वत पर आड़ी-तिरछी रेखाएं हों ।
३. यदि शुक्र पर्वत पर दो तारक चिन्ह हो ।
तलाक : १. शुक्र रेखा से हृदय रेखा को कोई रेखा जाती हो ।
२. भाग्य रेखा पर द्वीप हो ।
३. विवाह रेखा के अन्त में रेखाओं का गुच्छा हो ।
क्लीव योग :
परिभाषा : १. यदि शुक्र पर्वत जरूरत से ज्यादा
दबा हुआ हो ।
२. यदि हथेली में ‘गर्डल आफ वीनस’ हो तथा बुध
रेखा का शनि रेखा से सम्बन्ध हो ।
३. हथेली के बीच में त्रिकोण हो तथा उस पर बिन्दु
हो ।
४. शुक्र पर्वत पर पीले रंग का तारक चिन्ह हो ।
५. चन्द्र पर्वत अत्यन्त कमजोर हो तथा उस पर
त्रिकोण का चिन्ह हो ।
क्लीव योग
६. शनि रेखा तथा चन्द्र रेखा का परस्पर हो उंगलियां मध्यम आकार की हों ।
( २२६ )
फल : क्लीव योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति कायर, कमजोर तथा नपुंसक
होता है। वह काम कला में अपनी पत्नी को सन्तुष्ट नहीं कर पाता तथा उस पर
पत्नी का व्यक्तित्व हावी रहता है। ऐसा व्यक्ति जोखिम भरे कार्यों से दूर रहता है
तथा कोई भी नया कार्य करते समय मन ही मन हिचकिचाता रहता है। यह व्यक्ति
लड़ाई झगड़ों में विश्वास नहीं करता तथा दूसरों की अधीनता में कार्य कर अपने
जीवन को गुजार देता है।
टिप्पणी : यदि हथेली में उत्तम राज योग अथवा पंचमहापुरुष योग में से भी
कोई योग हो परन्तु उसके हाथ में क्लीव योग भी हो तो वह क्लीब योग उसके सभी
श्रेष्ठ योगों का नाश कर देता है। ऐसा व्यक्ति अत्यन्त साधारण जीवन व्यतीत करने
के लिए बाध्य होता है।
दत्तक पुत्र योग :
परिभाषा : यदि हथेली में शनि रेखा का मंगल रेखा
से सम्बन्ध हो और ये दोनों ही पर्वत पूर्णतः विकसित हों तो
दत्तक पुत्र योग बनता है।
फल : दत्तक पुत्र योग रखने वाला व्यक्ति कुछ विशेष
कारणों से लालचवश या पालन पोषण हेतु अथवा किसी अन्य
कारण से दूसरे पुरुष की गोद चला जाता है। तथा उसके
द्वारा उसे अपने पिता से अथवा उसके पिता को उसके द्वारा
कोई विशेष सुख नहीं मिलता।
टिप्पणी : गोद लेने की अथवा गोद देने की प्रथा दत्तक पुत्र
भारतीय समाज में प्रचलित है। स्वयं के पुत्र न होने पर या पुत्र की मृत्यु हो जाने
के कारण वह अपने संबंधियों में से ही किसी के पुत्र को गोद ले लेता है। और इस
प्रकार वह उसकी सम्पत्ति का पूर्ण रूप से अधिकारी हो जाता है।
मातृत्यक्त योग :
परिभाषा : यदि मंगल सूर्य तथा चन्द्र रेखाएं परस्पर
मिलती हों तथा सूर्य पर्वत अपने आप में कमजोर एवं दबा
हुआ हो तो मातृत्यक्त योग बनता है।
फल : जिस व्यक्ति की हथेली में मातृत्यक्त योग होता
है उसके जन्म लेने के बाद उसकी माता किसी कारण से उस
बालक को त्याग देती है तथा उसका जीवन अनाथ की तरह
व्यतीत होता है।
टिप्पणी : भारतीय समाज में कई बार कँआरी के पुत्र
मातृत्यक्त हो जाने के कारण या विधवा हो जाने के बाद पुत्र हो जाने के
( २३० )
कारण लोक-लज्जा के भय से माता अपने पुत्र को त्याग देती है । कई बार गरीबी की
स्थिति में या कोई अचानक घटना घटित हो जाने के कारण भी नवजात शिशु को
त्यागना पड़ता है । ऐसा बालक बिना माता के ही बड़ा होता है ।
मातृमरण योग :
परिभाषा : यदि हथेली में मंगल रेखा आगे बढ़कर
चन्द्र पर्वत तथा चन्द्र रेखा को दो भागों में विभाजित करती
हो तो उसके हाथ में मातृमरण योग होता है ।
फल : इस योग में बालक के जन्म लेने के कुछ समय
बाद ही उसकी माता की मृत्यु हो जाती है । ऐसा समझना
चाहिए ।
पादजातत्वप्रद योग : मातृमरण
परिभाषा : यदि हथेली में राहू पर्वत तथा चन्द्र पर्वत
विकसित हों एवं राहू रेखा तथा चन्द्र रेखा का परस्पर सम्बन्ध
बन गया हो तो पादजातत्व प्रद योग बनता है ।
फल : जिसकी हथेली में यह योग होता है वह माता के
गर्भ से पैरों द्वारा उत्पन्न होता है ।
पाद जातत्वप्रद
अनूढ़ापत्यत्व साधक योग :
परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत एवं चन्द्र पर्वत विकसित
हो तथा हथेली के शुक्र पर्वत के ऊपर से कोई रेखा निकलकर
चन्द्र पर्वत पर स्थापित चन्द्र रेखा से मिलती हो एवं सूर्य रेखा
कमजोर हो तो अनुढापत्यत्व साधक योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में उपर्युक्त योग होता है वह कुमारी
लड़की का पुत्र होता है या उसके कुंआरावस्था में अर्थात्
अविवाहितावस्था में पुत्र हो जाता है ।
टिप्पणी : यदि यह योग पुरुष के हाथों में होता है तो
वह अपने पिता की संतान नहीं होता, किसी और की सन्तान अनूढापत्यत्व
होता है, या वह बालक कुमारी के गर्भ से उत्पन्न तथा त्याज्य होता है । इसी प्रकार
यदि यह योग स्त्री के हाथों में हो तो वह परपुरुष से गर्भ धारण करती है अथवा
अविवाहिता अवस्था में गर्भ रह जाता है ।
( २३१ )
बंचना चोरभेती योग :
परिभाषा : यदि हथेली में राहू तथा शनि मंगल
रेखाओं का परस्पर संबंध हो तथा ये तीनों ही पर्वत पूर्णतः
विकसित हों पर साथ में गुरु और सूर्य पर्वत अपने स्थान से
च्युत या दबे हुए हों तो उपर्युक्त योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह अपने मन
में हीनभावना अनुभव करता रहता है । उसे कोई भी व्यक्ति
आसानी से ठग लेता है तथा वह जीवन में कई बार धोखेबाज
के संपर्क में आकर अपना सब कुछ गंवा देता है ।
[चित्र: वचना चोरभति]
टिप्पणी : इस योग को रखने वाला व्यक्ति संशयालू
प्रकृति का होता है । वह हर सयम डरा-डरा-सा सशंकित और भयभीत रहता है कि
कोई उसे ठग न ले या उसे धोखा न दे दे । ऐसा व्यक्ति न तो खुल कर कोई कार्य
कर पाता है न किसी पर विश्वास करता है और न अपने मन की बात दूसरों
से कह पाता है । ऐसा व्यक्ति जीवन में पूर्ण विकास नहीं कर पाता ।
राज्यलक्ष्मी योग :
परिभाषा : यदि हथेली में गुरु, शुक्र, बुध और चन्द्रमा
के पर्वत पूर्ण विकसित हों तथा लालिमा लिए हुए हों तो उस
व्यक्ति के हाथ में राज्य लक्ष्मी योग होता है ।
फल : जिस जातक के हाथ में राज्य लक्ष्मी योग होता
है वह जीवन में अपने प्रयत्नों से बहुत अधिक उन्नति करता है
जीवन की सभी भौतिक इच्छाएं समय-समय पर पूरी होती हैं
और वाहन सुख, भवन सुख, तथा स्त्री सुख में किसी प्रकार
की कोई न्यूनता नहीं रहती । उसका व्यक्तित्व अपने आप में
भव्य और आकर्षक होता है ।
[चित्र: राज्य लक्षण]
टिप्पणी : वस्तुतः चन्द्रमा और बुध ये ग्रह ही व्यक्ति को सुन्दर एवं आक-
र्षक व्यक्तित्व देने में सहायक होते हैं । अतः जब हथेली में इन दोनों ग्रहों के पर्वत
पूर्णतः विकसित होते हैं तो निश्चय ही वह व्यक्ति सुन्दर और समर्थ होता ही है ।
यदि ये दोनों ग्रह कमजोर हों तो उसकी सुन्दरता और व्यक्तित्व में न्यूनता समझनी
चाहिए ।
( २३२ )
गुरुकृतोरिष्ट भंग योग :
परिभाषा : जीवन में गुरु का सबसे अधिक महत्व है ।
अतः यदि हथेली में गुरु पर्वत पूर्णतः विकसित हो तर्जनी उंगली
लम्बाई लिए हुए मध्यमा की ओर थोड़ी-सी ढली हुई हो तथा
पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तो उपर्युक्त योग होता है ।
फल : यदि हाथ में अन्य पर्वत या रेखाएं कमजोर
हों अथवा अविकसित हों और उससे जीवन में बाधाएं आ
रही हों परन्तु यदि ऊपर लिखा योग हथेली में होता है तो
वह सभी अनिष्टों का नाश करने में समर्थ होता है ।
(चित्र: गुरुकृतोरिष्टभंग)
राहुकृतोरिष्ट भंग योग :
परिभाषा : यदि हथेली में राहू पर्वत विकसित हो
तथा राहू रेखा की वजह से चन्द्र पर्वत या अन्य पर्वत कमजोर
हो गये हों पर यदि हथेली में राहू पर्वत पर त्रिकोण का चिह्न
हो तो उपर्युक्त योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
प्रबल, प्रतापी सामर्थ्यवान एवं शत्रुहन्ता होता है ।
(चित्र: राहुकृतो रिष्टभंग योग)
अशुभकृतोरिष्ट भंग योग :
परिभाषा : हथेली में भाग्य रेखा सूर्य रेखा तथा चंद्र
रेखा पूर्णतः बलवान हो तो ऊपर लिखा योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसके जीवन
में अनिष्ट अपने आप शांत होते हैं और व्यक्ति अपने प्रयत्नों
से तथा मित्रों के सहयोग से पूर्ण उन्नति करता है ।
टिप्पणी : इस योग का तात्पर्य यह है कि यदि हथेली
में शनि, राहू, केतु या मंगल पर्वत अथवा रेखाएं कमजोर हों
या टूटी हुई हों अथवा अविकसित हों तो उन से सम्बन्धित जो
अनिष्ट होते हैं वे सभी अनिष्ट उपर्युक्त योग होने पर नाश अशुभकृतो रिष्टभंग योग
हो जाते हैं ।
( २३१ )
शुभकृतोरिष्ट भंग योगः
परिभाषा : गुरु शुक्र और बुध पर्वतों में से कोई भी
एक पर्वत और उससे सम्बन्धित रेखा बलवान, पुष्ट एवं स्पष्ट
हो तो यह योग होता है ।
फल : शुभ ग्रहों से उत्पन्न यदि कोई अनिष्ट हो तो
इस योग के होने पर उसका संबंध हो जाता है ।
टिप्पणी : यदि हथेली में कोई भी शुभग्रह से सम्बन्धित
पर्वत दबा हुआ हो या शुभ ग्रह से सम्बन्धित कोई रेखा कम-
जोर अथवा टूटी हुई हो परन्तु ऊपर लिखा योग हो तो उस
शुभ ग्रह से सम्बन्धित न्यूनता के दोष का परिमार्जन यह योग
शुभकृतो रिष्ट भंग कर लेता है ।
कला योग :
परिभाषा : यदि हथेली में मस्तिष्क रेखा से कोई
सीधी रेखा अनामिका की जड़ तक पहुंची हो या दोनों हाथों
में सूर्य रेखा जीवन रेखा से प्रारम्भ होती हो तो यह योग होता
है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह कला के
माध्यम से जीविकोपार्जन करता है तथा सफलता प्राप्त करता
है । कला योग
टिप्पणी : यदि ऊपर लिखे अनुसार हाथ में कला योग हो परन्तु उंगलियों के
अग्रभाग चपटे हों तो वह कला में असफलता प्राप्त करता है । इसी प्रकार यदि सूर्य
पर्वत पर कई आड़ी-तिरछी रेखाएं हों तो भी वह इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं
कर पाता ।
व्यापार योग :
परिभाषा : यदि अनामिका का ऊपरी सिरा वर्गाकार
हो तथा बुध पर्वत विकसित हो तो व्यापार योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जीवन में
एक सफल व्यापारी बनता है ।
व्यापार योग