बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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शुभकृतोरिष्ट भंग योगः
परिभाषा : गुरु शुक्र और बुध पर्वतों में से कोई भी
एक पर्वत और उससे सम्बन्धित रेखा बलवान, पुष्ट एवं स्पष्ट
हो तो यह योग होता है ।
फल : शुभ ग्रहों से उत्पन्न यदि कोई अनिष्ट हो तो
इस योग के होने पर उसका संबंध हो जाता है ।
टिप्पणी : यदि हथेली में कोई भी शुभग्रह से सम्बन्धित
पर्वत दबा हुआ हो या शुभ ग्रह से सम्बन्धित कोई रेखा कम-
जोर अथवा टूटी हुई हो परन्तु ऊपर लिखा योग हो तो उस
शुभ ग्रह से सम्बन्धित न्यूनता के दोष का परिमार्जन यह योग
शुभकृतो रिष्ट भंग कर लेता है ।
कला योग :
परिभाषा : यदि हथेली में मस्तिष्क रेखा से कोई
सीधी रेखा अनामिका की जड़ तक पहुंची हो या दोनों हाथों
में सूर्य रेखा जीवन रेखा से प्रारम्भ होती हो तो यह योग होता
है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह कला के
माध्यम से जीविकोपार्जन करता है तथा सफलता प्राप्त करता
है । कला योग
टिप्पणी : यदि ऊपर लिखे अनुसार हाथ में कला योग हो परन्तु उंगलियों के
अग्रभाग चपटे हों तो वह कला में असफलता प्राप्त करता है । इसी प्रकार यदि सूर्य
पर्वत पर कई आड़ी-तिरछी रेखाएं हों तो भी वह इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं
कर पाता ।
व्यापार योग :
परिभाषा : यदि अनामिका का ऊपरी सिरा वर्गाकार
हो तथा बुध पर्वत विकसित हो तो व्यापार योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जीवन में
एक सफल व्यापारी बनता है ।
व्यापार योग