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बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 350 में से

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पृष्ठ 233

( २३२ )
गुरुकृतोरिष्ट भंग योग :
परिभाषा : जीवन में गुरु का सबसे अधिक महत्व है ।
अतः यदि हथेली में गुरु पर्वत पूर्णतः विकसित हो तर्जनी उंगली
लम्बाई लिए हुए मध्यमा की ओर थोड़ी-सी ढली हुई हो तथा
पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तो उपर्युक्त योग होता है ।
फल : यदि हाथ में अन्य पर्वत या रेखाएं कमजोर
हों अथवा अविकसित हों और उससे जीवन में बाधाएं आ
रही हों परन्तु यदि ऊपर लिखा योग हथेली में होता है तो
वह सभी अनिष्टों का नाश करने में समर्थ होता है ।
(चित्र: गुरुकृतोरिष्टभंग)
राहुकृतोरिष्ट भंग योग :
परिभाषा : यदि हथेली में राहू पर्वत विकसित हो
तथा राहू रेखा की वजह से चन्द्र पर्वत या अन्य पर्वत कमजोर
हो गये हों पर यदि हथेली में राहू पर्वत पर त्रिकोण का चिह्न
हो तो उपर्युक्त योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति
प्रबल, प्रतापी सामर्थ्यवान एवं शत्रुहन्ता होता है ।
(चित्र: राहुकृतो रिष्टभंग योग)
अशुभकृतोरिष्ट भंग योग :
परिभाषा : हथेली में भाग्य रेखा सूर्य रेखा तथा चंद्र
रेखा पूर्णतः बलवान हो तो ऊपर लिखा योग होता है ।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसके जीवन
में अनिष्ट अपने आप शांत होते हैं और व्यक्ति अपने प्रयत्नों
से तथा मित्रों के सहयोग से पूर्ण उन्नति करता है ।
टिप्पणी : इस योग का तात्पर्य यह है कि यदि हथेली
में शनि, राहू, केतु या मंगल पर्वत अथवा रेखाएं कमजोर हों
या टूटी हुई हों अथवा अविकसित हों तो उन से सम्बन्धित जो
अनिष्ट होते हैं वे सभी अनिष्ट उपर्युक्त योग होने पर नाश अशुभकृतो रिष्टभंग योग
हो जाते हैं ।