बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
प'चांगुली देवी
पीछे के अध्यायों में मैंने हाथ की रेखाओं तथा पर्वतों के बारे में विस्तार से
स्पष्ट किया है । परन्तु पंचांगुली देवी के बारे में जानकारी स्पष्ट नहीं कर सका हूं ।
इस अध्याय में इससे सम्बन्धित संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूं । जिस व्यक्ति को
इसके बारे में विस्तार से अध्ययन करना हो उसे मेरी पुस्तक 'हस्तरेखा विज्ञान और
पंचांगुली साधना' का अध्ययन करना चाहिए ।
(चित्र शीर्षक: श्री पञ्चाङ्गुली देवी)
पंचांगुली देवी के बारे में अनेक प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है और
उसमें यह स्पष्ट किया गया है, कि यदि कोई व्यक्ति नियम पूर्वक पंचांगुली देवी की
साधना करे तो शीघ्र ही वह सफल भविष्यवक्ता बन सकता है । किसी भी व्यक्ति
का हाथ देखते ही उस व्यक्ति का भूत, वर्तमान और भविष्य उसके सामने साकार हो
जाता है । साथ ही वह अनेक सूक्ष्म रहस्यों से भी भली भांति परिचित हो जाता है ।
( १८६ )
यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य हस्तरेखा विशेषज्ञ कीरो या चीरियो भी पंचांगुली
देवी की साधना करते थे। कीरो भारत में लगभग ३ वर्ष तक रहा था और उसने
यहां के एक योगी से पंचांगुली साधना का अध्ययन किया था और इसी साधना की
वजह से वह विश्वविख्यात हो सका था। मेरा स्वयं का यह अनुभव है कि इसकी
साधना से व्यक्ति को हस्तरेखाओं का पूर्ण और सहज ज्ञान हो जाता है।
पंचांगुली साधना में शुभ मुहूर्त का होना आवश्यक है।
मास :
यह साधना किसी भी महीने से प्रारंभ की जा सकती है। पर बैसाख, कार्तिक,
आश्विन तथा माघ मास विशेष शुभ माने गये हैं।
तिथि :
यह साधना शुक्ल पक्ष की द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी, अथवा
पूर्णमासी से प्रारम्भ की जा सकती है।
वार :
रवि, बुध, गुरु, तथा शुक्रवार इस कार्य को प्रारम्भ करने के लिये श्रेष्ठ माने
गये हैं।
नक्षत्र :
कृतिका, रोहिणी, पुनर्वसु, हस्त, तीनों उत्तरा, अनुराधा, तथा श्रवण नक्षत्र
विशेष अनुकूल माने जाते हैं।
लग्न :
स्थिर लग्न, वृष, सिंह वृश्चिक, कुंभ।
स्थान :
तीर्थभूमि, गंगा यमुना संगम, नदी का तट, पर्वत गुफाएं तथा स्कंध देव
मन्दिर इसके लिये शुभ हैं। पर यदि ये स्थान सुलभ न हों तो घर के एकान्त कमरे
का उपयोग किया जा सकता है।
पंचांगुली यंत्र :
किसी भी तंत्र साधना में आवश्यकता पड़ने पर यंत्र का उपयोग करना आवश्यक
होता है। पंचांगुली साधना सिद्ध करने के लिये प्राण प्रतिष्ठा युक्त तंत्र सिद्ध पंचांगुली
यंत्र तथा पंचांगुली देवी का चित्र बहुत अधिक आवश्यक है। केन्द्र से सम्पर्क स्थापित
करने पर इस प्रकार का यंत्र अथवा चित्र भेजने की व्यवस्था की जा सकती है ।
( १८७ )
पद्मावती यन्त्र
पूजन सामग्री :
कुंकुम, नारियल जटा वाले दीपक
अबीर चावल दही
गुलाल बादाम शक्कर
मोड़ी अखरोट पान
सुपारियां काजू भोज-पत्र
केशर किसमिस पीपल के पत्ते
बताशा मिश्री कच्चा दूध
दुग्ध प्रसाद अगरबत्ती घृत
कपूर लोंग पुष्प
इलायची काली मिर्च पुष्पमाला
यज्ञोपवीत शहद गंगा जल
फल इत्र कुएं का शुद्ध जल
इस साधना में कुछ बातें अत्यन्त आवश्यक हैं जो कि निम्नलिखित हैं :
१. स्त्री संसर्ग तथा स्त्री चर्चा साधना काल में त्याज्य है ।
२. क्षौरकर्म न करें ।
३. संध्या गायत्री स्मरण निश्चित हो ।
( १८८ )
४. नग्नावस्था में, बिना स्नान के, अपवित्र हाथ से, सिर पर कपड़ा रख कर
भी जप करना निषिद्ध है।
५. जप के समय माला पूरी हुए बिना बातचीत नहीं करनी चाहिए।
६. छींक अस्पृश्य, उपान वायु होने पर हाथ धोवें तथा कानों के जल स्पर्श करें।
७. आलस्य, जमहाई, छींक, नींद, थकना, डरना, अपवित्र वस्त्र, बातचीत
क्रोध आदि जपकाल में वर्जित है।
८. पहले दिन जितना जप किया जाय रोज उतना ही जप करें। इसे घटाना
बढ़ाना उचित नहीं।
६. जपकाल में शौच जाने पर पुनः स्नान कर जप में बैठें।
जपकाल में नियम :
जपकाल में निम्न नियमों का भी पालन किया जाना चाहिए :—
१. भूमि शयन
२. ब्रह्मचर्य
३. नित्य स्नान
४. मौन
५. नित्य दान
६. गुरु सेवा
७. पापकर्म परित्याग
८. नित्य पूजा
६. देवतार्चन
१०. इष्टदेव व गुरु में श्रद्धा
११. जप निष्ठा एवं
१२. पवित्रता
अब मैं आगे के पृष्ठों में पंचांगुली मंत्र तथा काल ज्ञान मंत्र के साथ-साथ संकल्प
भी स्पष्ट कर रहा हूं। सबसे पहले साधक को संकल्प करना चाहिए। उसके बाद पांच
बार काल ज्ञान मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और उसके बाद पंचांगुली यंत्र के
सामने पंचांगुली का ध्यान करके एक सौ आठ बार पंचांगुली मंत्र का जप करना
चाहिए, सबके अन्त में पंचांगुली ध्यान समाप्ति करनी चाहिए।
इस प्रकार ६० साठ दिन तक करने से निश्चय ही पंचांगुरी साधना मंत्र
सिद्ध होता है। या केवल एक लाख काल ज्ञान मंत्र जपने से भी भूत, भविष्य, सिद्धि
हो जाती है।
( १८१ )
पाठकों की सुविधा के लिये मैं पहले संकल्प फिर पंचांगुली ध्यान मंत्र तथा
अन्त में काल ज्ञान मंत्र स्पष्ट कर रहा हूं।
संकल्प :
ओ३म् अस्य श्री कस्यचित् सच्चिदानंद रूपस्य ब्रह्मणो निर्वाच्य मायाशक्ति
विजृंभिता विद्या योगात् कालकर्म स्व-भावाविर्भूत महत्सत्वो विताहं कारोद्भूत
वियदादि पंच महाभूतेन्द्रिय देवता निर्मिते अंडकटाहगे चतुर्दश लोकात्मके लीलया
तन्मध्यवर्तिनी भगवतः श्री नारायणस्य नाभि कमलोद्भूत सकल लोक पितामहस्य
ब्रह्मणः सृष्टिं कुर्वतस्तदुद्धरणाय प्रजापति प्रार्थितस्य श्री सित वाराह बतारेण ध्रिय
माणायां यस्यां धरित्र्याम भुवर्लोक संहितायां सप्तद्वीप मंडितायां क्षीरोदार्णब्व
द्विगुगतीय वलयिकृत लक्षयोजन विस्तीर्ण जम्बूद्वीपे स्वर्गस्थिता अमराणा-सा शितब-
तारे गंगादि सरिद्भिः प्रावितेः निखिल जन मुनिकृत निर्वसतिके नैमिषारण्ये कन्या
कुमारिके क्षेत्रे पुष्कराण्ये श्री मन्मार्तण्डस्य कृपापात्र कालत्रित यज्ञ गर्गवाराह गणितायां
संख्याया श्री ब्रह्मणो द्वितीय परार्द्धे श्री श्वेत वाराह नाम्नि प्रथम कल्पे, द्वितीये यामे
तृतीये मुहूर्त, चतुर्थ युगे, स्वायंभुवः स्वारोचितः उत्तमः तामसः रैवतः चाक्षुषेति
षण्मनुना मतिक्रमोष्यात् क्रम्यमाणे संप्रति वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति में वर्षं त्रिनवे
त्रिग्नेयाते कलियुगे कलि प्रथम चरणे श्री मल्लवणाख्ये उत्तरे तीरे गंगा यमुनयो
पश्चिमे तटे शालीवाहन बौद्धावतारे विक्रम भूपकृतः संवत्सरे संवत ..... नाम
संवत्सरे (एको न अशात्युत्तर द्वि सहस्र मे) वर्षं रविनारायण (उत्तरायने)...ऋतौ
महामांगल्यप्रद मासोत्तमे मासे शुभ मासे .मासे...पक्षे आद्य तिथौ......वाराधिपति
श्रीमद् ... वासरे यथा नक्षत्र योगकारण लग्न एवं ग्रह विशेषण विशिष्टायां
अमूक गशिस्थिते सूर्य अमुक राशिस्थिते चन्द्रे अमुक राशिस्थिते देवगुरौ शेषेषु
ग्रहेषु यथा-यथा राशिस्थिते सप्तसु एवं ग्रह गुण विशेषण विशिष्टायां शुभपुण्यस्थितौ
.... गोत्रस्य श्री ( यजमान का नाम ) यजमानस्य शरीरे आयु आरोग्य ऐश्वर्यवां-
छित फल प्राप्तये भार्यादि सर्व सम्पत्ये चिंतिताथंस्य आदि व्याधि जरा मृत्यु भय शोक
निवृत्तये परमेश्वर्य संपत्त्ये निष्पत्ये अमुक कर्मेण पंचांगुलीदेवी पूजन कर्मणी सांगता
सिद्धयर्थं ममः समस्त कुटुम्बस्य सपरिवारस्य सर्वविघ्नोपशांतये भूत भविष्यत्
वर्तमान त्रिविधोत्पात् शांतये भूरिभाग्याप्तये पुनः कृतस्य करिष्यमाणः कर्मणः साम्य
षृप्त महाफल वाप्तये नित्य नूतन आत्मनः क्षीरोदिपट फुलादिवास सुरभि चन्दनः
कर्पूरः कस्तूरी केत्याद्य नेक शरीर भूषण समृद्धयर्थं सुवर्णं रौप्य निखिल धातु प्रबाल
मौक्तिक माणिक्येन्द्र नीलवञ्च वैदूर्यादि नाना रत्न बहुल प्राप्तये यवः व्रीही गोधुम तिल
माष मुद्रमाद्य नेक धान्यानां संतताभि वृद्धये अश्वशाला गजशाला गौशाला सर्व
चतुष्पदशाला प्रपायादिक्षाला देवपूजास्थान, ब्राह्मण संतर्पणादि सर्वस्थानानाम् सर्व
विघ्नन्तेपशांतये ममः इह जन्मनि पंचांगुली प्रीति द्वारा सर्वापन्निवृत्ति पूर्वकः अल्पायु निवृत्ति
( १६० )
पूर्वंक जन्म लग्नात् वर्ष लग्नात् गोचारत् चतुरष्ट अष्ट द्वादश स्थान स्थित सूर्यादि क्रूर
ग्रह तज्जनितारिष्ट निवृत्ति पूर्वकं दशा अन्तर्दशा उपदशा जनितारिष्ट ज्वर दाह पीड़ा
नेत्रकर्णादियो पीड़ा निवृत्ति पूर्वकं अल्पायु निवृत्ति पूर्वकश्चाधि दैविक भौतिक
आध्यात्मिक जनितः क्लेशः कायिक वाचिक मानसिक त्रिविधागोध निवृत्ति पूर्वकं
शरीरारोग्यार्था धर्मार्थ काम मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिध्यर्थं राजद्वारतः व्यापारतश्च
लाभार्थं काम मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिध्यर्थं रजद्वारतः व्यापारतश्च लाभार्थं विजयर्थं
जयार्थं क्षेमार्थं गतवस्तु प्राप्त्यर्थं स्थिर लक्ष्मो सचिताथें पुत्र पौत्रा अविच्छिन्न धन
समृद्धयर्थं बेदशास्त्रोक्त फला वाप्तये कीर्तिलाभ शत्रु पराजय सद्विष्ट सिद्धयर्थं श्री
परमेश्वर प्रीत्यर्थं सद्विष्ट सिद्धयर्थं यथा संपादित सामग्रयां कलश स्थापन पंचांगुली
पूजन महं करिष्ये ।
तदंगतवेन निर्विघ्नतां परि समाप्त्यर्थं गणपति पंचौकार वास्तु दिव्यादि चतुः
षष्टी योगिनी अजरादि पंचानत् क्षेत्रपाल सप्त चिरंजीव सप्तवसोर्द्धारा सप्तऋषि
गंगादि षोड्श मातृका वरुण कलश सूर्यादि नवग्रह तदंगभूत अधिदेवता प्रत्यधि देवता
स्थापन पूजनांतर मित्ती पंचांगुली आवाहनं कलशस्थापनं तस्योपरि पंचांगुली यहं
पूजनं तदंगत्वैनादौ गणपति पूजनं महं करिष्ये ।
पंचांगुली ध्यान :
पंचांगुली महादेवी श्री सीमन्धर शासने ।
अधिष्ठात्री करस्यासो शक्तिः श्री त्रिदशेशितुः ।
पचांगुली मंत्र :
ओ३म् नमो पंचागुली पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल वशीकरणी
लोहमय दंडमषिनी चौसठ काम विहंडनी रणमध्ये राउलमध्ये शत्रु मध्ये दीवानमध्ये
भूतमध्ये पिशाचमध्ये झोंटंगमध्ये डाकिनीमध्ये शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषेणीमध्ये
शाकनीमध्ये गुणीमध्ये गारुडी मध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये दोषशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर
कष्ट मुझ उपरे बुरो जो कोई करावे जड़े जड़ाये तत चिन्ते चिन्ताबे तस माथे श्री
माता श्री पंचांगुली देवी तणो वज्र निर्धार पड़े ओ३म ठं ठं ठं स्वाहा ।
कालज्ञान मंत्र :
ओ३म् नमो भगवते ब्रह्मानन्द पदः गोलोकादि असंख्यो ब्रह्माण्ड भुवन नाथाय
शशांक शंख गोक्षीर कर्पूर धवल गात्राय नीलांभोधि जलद पटलाधि-व्यक्तस्वरूपाय
व्याधिकर्म निर्मूलोच्छेदन कराय, जाति जरायुमरण विनाशाय, संसारकान्तारोन्मूल-
नाय, अचिन्त्य बल पराक्रमाय, मतिप्रतिमाह चक्राय त्रैलोक्याधीश्वराय, शब्द के
( १६१ )
त्रैलोक्याधिपतिर्बल भुवन कारकाय सर्वसत्व हिताय, निज भक्ताय अभीष्ट फल प्रदाय,
भवत्याधीनाय सुरासुरेन्द्रादि मुकुटकोटि धृष्टपाद पीठाय अनन्त युग नाथाय, देवाधि-
देवाय, धर्मचक्राधीश्वराय, सर्व विद्या परमेश्वराय, कुविद्याविघ्न प्रदाय, तत्पादपंकजा
श्रयानि भवनी देवी सासन देवते त्रिभुवन संक्षोमनी, त्रैलोक्य शिवापहारकरिणीं श्री
अद्भुत भ्रातवेदा श्री महालक्ष्मी देवी (अमुकस्य) स्थावर जंगम कृत्रिम विषमूल
संहारिणी सर्वाभिचार कर्मापहारिणीं परविद्योच्छेदनी परमंत्र प्रनाशिनीं भ्रष्टमहानाम
कुलीञ्चाटनीं कालदष्ट्रं मृत कोत्यापिनीं (अमुकस्य) सर्वरोग प्रमोचनीं, ब्रह्मा विष्णु
रुद्रेन्द्र चन्द्रादित्यादिग्रह नक्षत्रोत्पात मरण भय पीड़ा मर्द्दिन त्रैलोक्य विश्वलोक
वशंकरि, भुविलोक हितकं महाभैरवि शस्त्रोपचारिणीं रौद्र, रौद्ररूप धारी प्रसिद्ध सिद्ध
विद्याधर यक्ष राक्षस गरुड़ गन्धर्व किन्नर किं पुरुषो दैत्योरेन्द्र पूजिते ज्वालापात
कराल दिगंतराले महावृषभ वाहिनीं, खेटक कृपाण त्रिशूल शक्ति चक्रपाश शरासन
शिव विराजमान षोडशाद्व मुजे एहि एहि लं ज्वाला मालिनीं ह्रीं ह्रीं ब्रूं ह्ली हीं हूं
हौं ह्रः देवान् आकर्षय आकर्षय नाग ग्रहान् आकर्षय आकर्षय यक्ष ग्रहान् आकर्षय
आकर्षयः गंधर्व ग्रहान् आकर्षय आकर्षय ब्रह्मग्रहान् आकर्षय आकर्षय राक्षस ग्रहान्
आकर्षय आकर्षय भूत ग्रहान आकर्षय आकर्षय दिव्यतर ग्रहान् आकर्षय आकर्षय
चतुराणि जैंन्य मार्ग ग्रहान् आकर्षय आकर्षय चतुर्विशति जिन ग्रहान् आकर्षय आकर्षय
सर्व जटिल ग्रहान् आकर्षय आकर्षय अखिल मुंडित ग्रहान् आकर्षय जंगम ग्रहान्
आकर्षय आकर्षय सर्व दुर्गशादि विद्याग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व नग निग्रह वासी
ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व जलाशय वासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्वस्थल वासी
ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्वतिस्थि ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व श्मशान वासी ग्रहान्
आकर्षय आकर्षय सर्व पवनी वासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व धर्म शापादि गौ
शाप ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व गिरिगुहा दुर्गवासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय श्रापित्
ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व दुष्ट ग्रहान् आकर्षय आकर्षय वक्र पिंड ग्रहान् आकर्षय
आकर्षय कट कट कंपय कंपय शीर्षं चालय शीर्षं चालय गात्रं चालय गात्रं चालय बाहुं
बाहुं चालय पादं चालय कर पल्लवान चालय बाहुं चालय पादं चालय पादं चालय
कर पल्लवान चालय कर पल्लवान चालय सर्वांगचालय सर्वांगचालय लोलय धुन धुन
कंपय कंपय शीघ्रं भव तारय तारय प्रहि प्रहि ग्राह ग्राह भक्षय अक्षय आवेशेय
प्रावेशेय ज्वलू ज्वालामालिनीं ह्रां वक्रीं ब्लू द्रां द्रां ज्वल ज्वल र र र र र र र
प्रज्वल प्रज्वल धग धग धूमाक्ष करणीं ज्वल विशेषय विशेषय देवग्रहान् दह दह नाग
ग्रहान् दह दह यक्ष ग्रहान् दह दह गंधर्व ग्रहान् दह दह ब्रह्म ग्रहान् दह दह राक्षस
ग्रहान् दह दह भूत प्रहान् दह दह दिव्यन्तर ग्रहान् दह दह चतुराशि जैंन्य मार्ग ग्रहान्
दह दह चतुर्विश जिन ग्रहान् दह दह सर्व जटिल ग्रहान् दह दह अखिल मुंडित ग्रहान्
दह दह जंगम ग्रहान् वह दह सर्व दुर्गशादि विद्या ग्रहान् वह दह सर्व नवनिग्रह बासी
( १६२ )
ग्रहान् दह दह सर्वस्थलवासी ग्रहान् दह दह सर्वान्तरिक्ष वासी ग्रहान् दह दह श्मशान
वासी ग्रहान् दह दह सर्व गिरिगुहा दुर्गवासी ग्रहान् दह दह श्रापित ग्रहान् दह दह
सर्वनाथ पंथि ग्रहान् दह दह सर्वभूवासी प्रेत ग्रहान् दह दह (अमुक गृहे) असद्गति
ग्रहान् दह दह वक्रपिण्ड ग्रहान् दह दह सर्वदुष्ट ग्रहान् दह दह शतकोटि योजने दोष-
दायी ग्रहान् दह दह सहस्र कोटि योजनान् दोषदायि ग्रहान् दह दह शतकोटि दोष
कोष दह दह सहस्रकोटि दोष दह दह आसमुद्रात् पृथ्वी मध्ये देवभूत पिशाचादि (अमु-
कस्यो) परिकृत दोषान् तस्य दोषान् दह दह शत्रुकृतभिचार दोषान् दह दह घे घे
स्फोटय स्फोटय मारय मारय धगि थगि धागत मुखे ज्वालामालिनी हां हीं हूं हैं
हौं हः सर्व ग्रहाणां हृदये दह दह पच पच छिदि छिदि भिदिभिदि दह दह हा हा स्फुट
स्फुट घे घे ।
क्ष्म्लुं क्षां क्षीं क्षुं क्षैं क्षौं क्षः स्तंभयः स्तंभपः । म्भ्लुं म्भ्रां म्भ्रीं म्भ्रू ं म्भ्रैं म्भ्रौं म्भ्रं
अः बाडय बाडय । म्स्नूं म्श्रां म्श्रीं म्श्रू ं म्श्रैं म्श्रौं म्नः नेत्रं स्फोटय स्फोटय दर्शय दर्शय ।
य्म्लूं यां यीं यू यें यौं यः प्रेषय प्रेषय । ष्म्लुं ध्रा धी धू ं ध्रैं ध्रौं ध्रः जठेर भेदय ।
ग्लुं ग्रां ग्रीं गुं ग्रैं ग्रो ग्रः मुखं बंधयः बंधयः । र्लू ं खां खीं खू ं खैं , खौं खः ग्रीवां
मंजय मंजयः । छप्लुं छां छीं छू ं छैं छौं छः मंत्रान् भेदय भेदयः । ढ्प्लुं ढां ढीं ढू ं
द्रौं ढू ः महाविद्युत्पाषापाणा स्त्रैहन स्त्रैहन । म्प्रु द्रा व्रीं द्रं भ्रैं द्रौं द्रः समुद्रे भंजय
मंजय । द्म्रूं द्रां द्री द्रू द्रौ द्रः सर्व डाकिनी सुन्दरी मर्दय मर्दय सर्व योगिनीं स्वञ्जय
स्वञ्जय । सर्व शत्रु ग्रासय ग्रासय ख ख ख ख ख ख ख खादय खादय सर्व दैत्यान्
विध्वंसय विध्वंसय सर्व मृत्युं नाशय नाशय सर्वोपद्रवान् स्तंभय स्तंभय जः जः जः जः
जः जः जः ज्वरान् दह दह पच पच घुमु घुमु घुरु घुरु घुरु घुरु खरु खरु खंग रावण
सुविघायां घातय प्रखिन्न रुजान् दोषोदयान् कृत कार्याणामिचारोत्थान (अमुकस्य) देहे
स्थितान् अधुना रुज कारकान् चन्द्रहास शस्त्रेण छेदय छेदय भेदय भेदय उरु उरु छरु
छरु स्फुट स्फुट घे श्रां क्रौं क्षीं क्षं क्षैं क्षौं क्षः ज्वाला मालिनीं (अमुकस्य) सौख्यं कुरु
कुरु निरूजं कुरु कुरु अभिलाषित कामना देहि देहि ज्वाला मालिनीं विज्ञापयते स्वाहा ।
हस्त-परिचय
संसार में जितने भी पुरुष हैं उनके हाथों में कुछ न कुछ विशेषता पाई जाती
है । परन्तु अनुभव में ऐसा आया है कि एक विशेष वर्ग के व्यक्तियों के हाथों में एक
रूपता या समानता पाई जाती है । नीचे की पंक्तियों में मैं समाज के विभिन्न वर्गों से
सम्बन्धित हाथ की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय स्पष्ट कर रहा हूं ।
१. व्यवसायी :
जो व्यक्ति व्यापार या व्यवसाय करता है उसके हाथ
का अंगूठा सीधा तथा पीछे की तरफ किंचित् झुका हुआ होता है
इसके साथ ही हथेली में उसकी मस्तिष्क रेखा सीधी और
स्पष्ट होती है एवं बुध पर्वत सामान्यतः उभरा हुआ होता है ।
यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि एक सफल व्यवसायी
के बुध पर्वत पर किसी प्रकार का कोई जाल नहीं होता । बुध
की उंगली अर्थात् कनिष्ठिका कुछ लम्बाई लिये हुए होती है ।
बुध पर्वत की ओर यदि मस्तिष्क रेखा की कोई शाखा
आ रही हो तो यह तुरन्त समझ लेना चाहिए कि यह व्यक्ति
अपने क्षेत्र में पूर्ण सफल सम्पन्न व्यक्ति है । इसके साथ ही
जिसके हाथ की उंगलियां हथेली की अपेक्षा लम्बाई लिये हुए
हों तो उसके जीवन में व्यवसाय की दृष्टि से किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती ।
[चित्र: व्यवसायी]
२. लखपती :
जिसके हाथ में सूर्य रेखा अपने आप में प्रबल हो,
साथ ही जिसका शुक्र पर्वत विकसित हो और उस पर किसी
प्रकार का कोई जाल या टूटी हुई रेखा न हो तो समझ लेना
चाहिए कि यह व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अनुकूल है परन्तु जब
भाग्य रेखा सीधी स्पष्ट और लालिमा लिये हुऐ हो तथा उसकी
कोई एक शाखा सूर्य पर्वत की ओर जा रही हो तथा मस्तिष्क
रेखा पूर्णतः विकसित हो तो निश्चय ही वह व्यक्ति लखपति
होता है तथा आर्थिक दृष्टि से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त कर पूर्ण
सुख उपभोग करता है ।
[चित्र: लखपति]
( १६४ )
३. एकाउन्टेन्ट :
एकाउन्टेन्ट या मुनीम के हाथ में यह विशेषता
होती है कि उसका बुध पर्वत अपने आप में विकसित तथा
ऊंचा उठा हुआ होता है । साथ ही उसका सूर्य पर्वत भी उभरा
हुआ होता है एवं उस पर सूर्य रेखा पूरी तरह से देखी जा सकती
है । साथ ही साथ भाग्य रेखा का भी अध्ययन किया जाना
चाहिए । यदि भाग्य रेखा बिना कहीं से कटे मध्यमा के मूल
में स्थित शनि पर्वत पर सफलता के साथ जा रही हो तो ऐसा
व्यक्ति एक सफल एकाउन्टेन्ट होता है ।
यदि ऊपर लिखे तथ्य हों और मध्यमा उंगली एवं
कनिष्ठिका उंगली सामान्यतः कुछ लम्बाई लिये हुए हो साथ
ही अंगूठे मजबूत हों तो वह व्यक्ति बैंक में महत्वपूर्ण पद पर [Image Caption: एकाउन्टेन्ट]
होता है । ऐसा व्यक्ति इनकमटैक्स अधिकारी भी हो सकता है ।
यदि इन लक्षणों के अलावा चन्द्र रेखा पूर्णतः विकसित हो तथा भाग्य रेखा
भी सहायक हो तो वह व्यक्ति चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट होता है ।
४. न्यायाधीश :
जिस व्यक्ति के हाथ में तर्जनी उंगली अनामिका
से कुछ लम्बाई लिये हुए हो तथा कनिष्ठिका उंगली अनामिका
के तीसरे पोर से ऊपर उठी हुई हो, साथ ही साथ सभी
उंगलियां सुन्दर हों, गुरु पर्वत पूर्णतः विकसित हो तथा उस पर
क्रॉस का चिह्न हो तो ऐसा व्यक्ति विख्यात् वकील होता है ।
ऊपर लिखे गुण होने के साथ-साथ यदि व्यक्ति की
हथेली में भाग्य रेखा निर्दोष पतली तथा स्पष्ट हो, साथ सूर्य
पूर्ण प्रभाव युक्त हो और अंगूठा लम्बा तथा पीछे की तरफ
झुका हुआ हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही सफल न्यायाधीश
होगा ।
ऊपर लिखे गुण होने के साथ-साथ यदि भाग्य रेखा
[Image Caption: न्यायाधीश] से कोई शाखा गुरु पर्वत पर पहुंचती हो तो वह व्यक्ति निश्चय
ही मुख्य न्यायाधीश होता है ।
( १२५ )
५. शिल्पकार :
यदि हाथ की उंगलियां लम्बी हों तथा ऊपर के सिरे
चौकोर हों साथ ही सूर्य रेखा पूर्णतः विकसित स्पष्ट तथा
गहरी हो एवं शनि क्षेत्र पर किसी प्रकार की बाधक रेखाएं
न हों और उसका अंगूठा पतला तथा कुछ लम्बाई लिये हुए
हो तो निश्चय ही ऐसा व्यक्ति एक सफल मूर्तिकार अथवा
शिल्पकार होता है ।
शिल्पकार
६. सैनिक :
जिस व्यक्ति का शरीर अपने आप में स्वस्थ, पुष्ट,
प्रबल तथा पूरी लम्बाई लिये हुए हो और उसके हाथ सामा-
न्यतः लम्बे हों तो ऐसे व्यक्ति में सैनिक के चिह्न देखने को
मिलते हैं ।
इसके साथ ही साथ उसकी हथेली में यदि मंगल क्षेत्र
विस्तार लिये हुए हो तथा मंगल पर किसी उज्ज्वल तारे का
चिह्न हो साथ ही उसकी भाग्य रेखा विकसित तथा स्पष्ट हो
तो वह व्यक्ति निश्चय ही एक सफल स्थल सैनिक बनता है ।
यदि ऊपर लिखे हुए गुणों के साथ-साथ दोनों मंगल
हथेली मे बहुत अधिक विकसित हों एवं सूर्य पर्वत पर सूर्य
सैनिक रेखा स्पष्ट और निर्दोष रूप से अंकित हो तथा अंगूठा मजबूत
लम्बाई लिये हुए तथा सामान्यतः पीछे की तरफ झुका हुआ हो तो वह व्यक्ति
निश्चय ही जनरल या ब्रिगेडियर होता है ।
ऊपर लिखे गुणों के अलावा यदि सूर्य रेखा पर सुन्दर त्रिकोण का चिह्न हो
तथा सभी उंगलियां अपने आप में पूर्ण लम्बाई लिये हुए हों तो ऐसा व्यक्ति निश्चय
ही स्थल सेनाध्यक्ष होता है ।
( १६६ )
७. आई० ए० एस० :
आई० ए० एस० व्यक्ति कलेक्टर, सेक्रेटरी या
प्रशासन के महत्वपूर्ण पद पर रहते हैं और ऐसे व्यक्ति शासन
में बहुत अधिक सहायक होते हैं ।
जिनके हाथों में बुध की उंगली अर्थात् कनिष्ठिका
लम्बाई लिये हुए हो और उसका अन्तिम सिरा अनामिका के
तीसरे पोर से आगे अर्थात् आधे से अधिक हिस्से तक पहुंच
चुकी हो इसके साथ ही साथ सूर्य रेखा अत्यन्त उच्च कोटि की
हो तो वह व्यक्ति आई० ए० एस० अधिकारी होता है ।
यदि सूर्य रेखा में कमजोरी होती है, या कटी हुई
होती है, तो वह व्यक्ति मात्र आई० ए० एस० अधिकारी
आई. ए. एस. ही होकर रह जाता है ।
यदि कनिष्ठिका लम्बी हो, सूर्य रेखा भी अपने आप में पुष्ट हो तथा मस्तिष्क
रेखा पूर्ण विकसित हो और उसके साथ ही साथ भाग्य रेखा लम्बी निर्दोष तथा पूर्ण
हो तो वह व्यक्ति केन्द्रीय सरकार में उच्च पदस्थ अधिकारी होता है ।
भाग्य रेखा तथा गुरु पर्वत बहुत अधिक श्रेष्ठ हों तो वह व्यक्ति निश्चय ही
केन्द्रीय सेवा में सेक्रेटरी या अत्यन्त उच्च पदस्थ व्यक्ति होता है, जिसके कार्यों का
प्रशासन पर पूरा-पूरा प्रभाव पड़ता है ।
८. नाविक :
( जल सेना ) :-जो नाव पर या जहाज पर कार्य
करने वाले होते हैं अथवा नेवी में उच्चपदस्थ अधिकारी होते
हैं उनको यहां नाविक के नाम से सम्बोधित कर रहा हूं । एक
श्रेष्ठ तथा कुशल जलसेना नायक का हाथ पूर्ण लम्बाई लिये
हुए होता है तथा उस पर चन्द्र पर्वत पूर्ण विकसित अवस्था में
होता है । जिसकी हथेली में चन्द्र पर्वत विकसित हो तथा
चन्द्रमा के पर्वत से रेखा निकलकर सूर्य की तरफ जा रही हो
एवं भाग्य रेखा तथा मस्तिष्क रेखा अपने आप में पूर्ण विक-
सित हो तो वह व्यक्ति निस्संदेह जल सेनाध्यक्ष होता है ।
यदि चन्द्र पर्वत कम उभरा हुआ हो या चन्द्र रेखा
कमजोर हो और अन्य सभी गुण हथेली में हों तो वह नेवी में
नाविक
उच्च पद पर कार्य करने वाला होता है ।
( १५७ )
यदि चन्द्र पर्वत अत्यन्त दबा हुआ हो तथा भाग्य रेखा कमजोर हो तो वह
केवल नाव चलाने वाला नाविक होता है।
६. डाक्टर :
जिस की हथेली में बुध पर्वत पूर्ण विकसित हो तथा
कनिष्ठिका पूरी लम्बाई लिये हुए हो जिसका सिरा अनामिका
के ऊपरी पौर के मध्य तक जाता हो तथा बुध क्षेत्र पर तीन
चार खड़ी रेखाएं हों तो ऐसा व्यक्ति एक सफल डाक्टर
होता है।
यदि ऊपर लिखे गुण हथेली में हों पर इसके साथ ही
साथ मंगल पर्वत अत्यन्त विकसित हो तथा मंगल रेखा भी
पुष्ट एवं प्रबल हो तो वह व्यक्ति एक सफल सर्जन होता है।
यदि मंगल पर्वत दबा हुआ हो इसके अलावा अन्य
सभी गुण हथेली में हों तथा बृहस्पति पूर्ण विकसित हो और
उस पर वर्ग का चिह्न हो तो वह व्यक्ति ख्याति प्राप्त वैद्य
होता है।
[चित्र: डाक्टर]
१०. इंजीनियर :
यहां इन्जीनियर से मेरा तात्पर्य वैज्ञानिक एवं
मैकेनिक से भी है। यदि किसी मनुष्य की सभी उंगलियां
पूरी लम्बाई लिये हुए हों तथा शनि पर्वत विकसित हो तथा
उस पर भाग्य रेखा निर्दोष रूप से आकर ठहरी हुई हो एवं
पर्वत पर तीन-चार खड़ी रेखाएं हों तो वह व्यक्ति एक
बुध सफल वैज्ञानिक होता है।
यदि ऊपर लिखे गुण हों पर बृहस्पति पर्वत कमजोर
हो तो वह एक सफल इन्जीनियर होता है। यदि इन्जीनियर
के चिह्न हों तथा चन्द्र पर्वत श्रेष्ठ हो तो वह वाटर वर्क्स में
इन्जीनियर होता है।
यदि ऊपर लिखे चिह्न हथेली में हों तथा मस्तिष्क
रेखा और शनि रेखा पूर्ण विकास लिये हुए हो तो वह एक [चित्र: इंजीनियर]
सफल वायुयान चालक होता है पर उसमें चन्द्र पर्वत तथा चन्द्र रेखा अत्यन्त श्रेष्ठ
होनी आवश्यक है।
( १६८ )
११. धर्माचार्य :
यदि किसी मनुष्य की हथेली में तर्जनी अनामिका से
लम्बी हो तथा गुरु पर्वत पूर्ण विकास लिये हुए हो और उस
पर क्रॉस का चिह्न हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही एक सफल
पुरोहित या धार्मिक व्यक्ति होता है।
यदि ऊपर लिखे चिह्न हों तथा सूर्य पर्वत और सूर्य
रेखा बहुत अधिक विकसित हो तो वह व्यक्ति प्रसिद्ध उपदेशक
या धर्माचार्य होता है।
यदि ऊपर लिखे चिन्ह हों तथा जीवन रेखा कटी हुई
हो तो ऐसा व्यक्ति निश्चय ही सन्यासी होता है और
सन्यासी होने के बाद ही उसको यश तथा सम्मान मिलता है। धर्माचार्य
१२. कलाकार :
जब किसी व्यक्ति की हथेलियां पूरी लम्बाई लिये
हुए तथा गांठ रहित हों एवं उसकी उंगलियां ढलवीं हों और
उंगली के ऊपर के सिरे नौकीले हों तो वह व्यक्ति सफल
कलाकार होता है।
यदि ऊपर लिखे गुण हों साथ ही चन्द्र पर्वत पूर्ण
विकसित हो तो वह व्यक्ति श्रेष्ठ चित्रकार माना जाता है।
यदि बुध पर्वत विकसित हो तथा बुध रेखा भी पूर्ण लम्बी
तथा निर्दोष रूप से बढ़ी हुई हो तो वह व्यक्ति सफल संगीतज्ञ
होता है। यदि ऊपर लिखे गुण हों तथा शुक्र पर्वत पूरी तरह
से विकास पर हो तथा उसका क्षेत्र अत्यन्त फैला हुआ हो तो
कलाकार वह व्यक्ति सफल नृत्यकार होता है तथा प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
इसके साथ-साथ भाग्य रेखा तथा सूर्य रेखा जितनी ही ज्यादा स्पष्ट, गहरी
तथा लालिमा लिये हुए होगी वह व्यक्ति उतना ही ज्यादा सफल लोकप्रिय तथा
विख्यात होगा।
( १६६ )
१३. साहित्यकार :
जिस व्यक्ति की हथेली में गुरु पर्वत तथा चन्द्र पर्वत
पूर्ण उभार लिये हुए हो तथा सूर्य की उंगली तर्जनी से लम्बी
हो और उंगलियों में गांठें नहीं हों तो वह व्यक्ति एक सफल
साहित्यकार होता है ।
इसके साथ ही साथ सूर्य रेखा यदि लम्बी हो, निर्दोष
हो तथा सूर्य पर्वत अपने स्थान पर हो तो वह लेखन के
माध्यम से प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
यदि ऊपर लिखे गुण हों और चन्द्र रेखा धनुष
रूप में होकर बुध पर्वत की ओर आ रही हो तो वह
व्यक्ति एक सफल कवि होता है ।
इसके साथ ही साथ यदि भाग्य रेखा तथा मस्तिष्क
रेखा पूर्ण विकसित एवं स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही
अपने क्षेत्र में यश, सम्मान, तथा प्रसिद्धि प्राप्त करता है ।
साहित्यकार
१४. अभिनेता अभिनेत्री :
यदि हाथ की सभी उंगलियां कोमल तथा ढलवीं हों
तथा सूर्य की उंगली विशेष लम्बी हो तथा ऊपर से नौकदार
हों तथा मस्तिष्क रेखा एवं भाग्य रेखा पूरी लम्बाई
लिये हो तो वह व्यक्ति सफल अभिनेता या अभिनेत्री
होती है ।
यदि सूर्य रेखा विशेष रूप से सुन्दर, लम्बी, स्पष्ट,
मुलायम और निर्दोष रूप से लम्बाई लिये हुए हो तो वह
अद्वितीय कलाकार होता है ।
यदि सूर्य रेखा पर नक्षत्र का चिह्न हो तो वह कला-
कार या अभिनेत्री विश्वविख्यात होती है ।
अभिनेता
( २०० )
१५. कामी हाथ :
यदि हथेली में शुक्र क्षेत्र बेडौल, जरूरत से ज्यादा उभरा
हुआ, कोमल तथा फला हुआ हो इसके साथ ही अंगूठे का पोरु
अधिक लम्बा हो तथा शुक्र पर्वत पर नक्षत्र चिह्न अंकित हो तो
वह व्यक्ति जरूरत से ज्यादा कामी होता है ।
यदि इसके साथ ही शनि रेखा पर बिन्दु या क्रॉस हो तो
वह इस क्षेत्र में बदनामी उठाता है ।
कामी हाथ
१६. हत्यारा :
यदि हथेली में हृदय रेखा का अभाव हो तथा शुक्रवलय दोहरा
हो इसके साथ ही साथ पूरा हाथ सख्त तथा मजबूत हो और
अंगूठा ठिगना, मोटा तथा थुलथुला हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही
हत्यारा होता है ।
यदि इसके साथ ही साथ हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा और
जीवन रेखा तीनों मंगल पर्वत पर मिलती हों तो वह व्यक्ति
निश्चय ही क्रूर और निर्दयी हत्यारा होगा तथा जीवन में एक
से अधिक हत्याएं करेगा ।
हत्यारा
१७. गुप्तचर :
यदि हथेली मे शनि पर्वत अविकसित हो तथा बुध
पर्वत दबा हुआ हो पर भाग्यरेखा पूरी लम्बाई लिए हुए हो
और मंगल पर्वत पर त्रिभुज का चिह्न लिए हुए हो तो वह
व्यक्ति सफल गुप्तचर होता है ।
गुप्तचर
( २०१ )
१८. शिक्षक :
१८. शिक्षक हाथ :—जिसके हाथ में जीवन रेखा,
भाग्यरेखा तथा सूर्य रेखा विकसित हो तथा गुरु पर्वत विकसित
हो और उस पर क्रॉस का चिह्न हो तथा अनामिका से तर्जनी
उंगली लम्बी हो तो वह सफल शिक्षक (लेक्चरार) होता है।
शिक्षक
हस्तरेखा योग
गजलक्ष्मी योग :
यदि दोनों हाथों में भाग्यरेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर सीधी शनि पर्वत
पर जा रही हो तथा सूर्य पर्वत विकसित होने के साथ-साथ
उस पर सूर्य रेखा भी पतली लम्बी तथा लालिमा लिये हुए
हो। इसके साथ ही साथ मस्तिष्क रेखा, स्वास्थ्य रेखा तथा
आयु रेखा पुष्ट हो तो उसके हाथ में गजलक्ष्मी योग बनता है।
फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति साधारण
घराने में जन्म लेकर के भी अत्यन्त उच्चस्तरीय सम्मान प्राप्त
करता है। इसके साथ ही साथ वह अपने कार्यों से पहिचाना
जाता है। आर्थिक एवं भौतिक दृष्टि से ऐसे व्यक्तियों के
जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। ऐसे व्यक्ति
स्वभाव से नम्र, विवेकवान तथा गुणवान होते हैं। व्यापार तथा विदेशों में कार्य करने
से वे व्यक्ति विशेष सफल होते हैं। वस्तुतः गजलक्ष्मी योग रखने वाला व्यक्ति जीवन
में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है तथा मृत्यु के बाद भी उसकी कीर्त्ति अपने क्षेत्र में
अक्षुण्य रहती है।
टिप्पणी : इस योग मे यह ध्यान रखने की बात है कि यदि ऐसी स्थिति दोनों
ही हाथों में हो तभी यह योग पूर्ण माना जाता है। यदि एक ही हाथ में हो तो इसका
आधा फल समझना चाहिए ।
अमलायोग :
यदि हाथ में चन्द्र पर्वत विकसित हो और उसके साथ ही साथ सूर्य पर्वत तथा
शुक्र पर्वत भी अपने पूर्ण उभार पर हो तथा चन्द्र रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो
तो ऐसी स्थिति होने पर उसके हाथ में अमला योग बनता है ।
( २०६ )
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में अमला योग होता है, वह व्यक्ति
बुद्धिमान चतुर तथा प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति माना
जाता है। आर्थिक एवं भौतिक दृष्टि से ऐसा व्यक्ति पूर्ण सफल
होता है तथा अपने जीवन में व्यापारिक कार्यों से कई बार
विदेश यात्राएं करता है। यदि हाथ में शुक्र पर्वत पूर्ण विकास
पर होता है तथा उस पर बाधक रेखाएं नहीं होतीं तो निश्चय
ही ऐसा व्यक्ति भौतिक सुख प्राप्त करता है तथा उसके जीवन
में पत्नी के अलावा भी अन्य स्त्रियों से सम्बन्ध रहते हैं।
जीवन में उसे बदनामी का सामना नहीं करना पड़ता।
अमला योग
शुभ योग :
परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में शनि का पर्वत विकसित
हो तथा उस पर स्पष्ट भाग्य रेखा आकर बनी हो तो उसके
हाथ में शुभ योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में शुभ योग होता है वह
प्रसिद्ध वक्ता, तथा जनता को सम्मोहित करने की क्षमता रखने
वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के हाथ में इस प्रकार का योग
होता है कि वह जो कुछ भी चाहता है जनता से प्राप्त कर
लेता है। उसकी वाणी में मंत्र मुग्ध करने की शक्ति होती है।
तथा जनता की भावनाओं को अपने पक्ष में करने की उसे पूर्ण शुभ योग
कला आती है। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व अपने आप में आकर्षक एवं भव्य होता है।
टिप्पणी : शुभ योग से सम्पन्न व्यक्ति का भाग्योदय अपने जन्म स्थान
से दूर जाने पर ही होता है।
बुध योग :
परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में बुध पर्वत अपने आप में
विकसित हो और चन्द्र पर्वत से धनुषाकार रेखा बुध पर्वत पर
पहुंचती हो और वह रेखा मार्ग में कहीं पर भी टूटी हुई या
कमजोर न हो अथवा जंजीरदार एवं बहुत अधिक मोटी न
हो तो ऐसे व्यक्ति के हाथ में बुध योग बनता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में बुध योग होता है वह
व्यापार के माध्यम से जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है।
उसके जीवन में धन का तथा सम्मान का किसी प्रकार का कोई
बुध योग अभाव नहीं रहता। शारीरिक दृष्टि से वह पूर्णतः स्वस्थ एवं
( २०४ )
आकर्षक होता है तथा वह अपने प्रयत्नों से अपने व्यापार का विस्तार विदेशों में भी
करता है। ऐसा व्यक्ति शीघ्र निर्णय करने वाला तथा स्वस्थ मस्तिष्क का धनी होता
है। शत्रुओं का प्रबल रूप से संहार करने वाला बुद्धिमान तथा चतुर होता है।
टिप्पणी : इस योग में यह बात ध्यान रखने की है कि उसके हाथ में बुध पर्वत
विकसित हो, लालिमा लिए हुए तथा अपने स्थान पर स्थित हो। वह न तो हथेली
के बाहर निकला हुआ हो और न सूर्य की ओर झुका हुआ हो ।
इन्द्र योग :
परिभाषा : जिसके हाथ में मंगल पर्वत अपने स्वाभाविक
रूप से विकसित हो तथा मस्तिष्क रेखा तथा भाग्य रेखा पूर्ण
लम्बाई लिए हुए सीधी और स्पष्ट हो तो उस व्यक्ति की हथेली
इन्द्र में योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में इन्द्र योग होता है वह व्यक्ति
बलिष्ठ, चतुर तथा सफल रणनीतिज्ञ होता है। ऐसा व्यक्ति
मिलिट्री में या पुलिस में उच्च पद प्राप्त करता है एवं राजा के
समान अपना जीवन व्यतीत करता है। ऐसा व्यक्ति बातचीत
करने में चतुर एवं सरल स्वभाव का होता है तथा उसका भाग्यो-
दय २८वें साल के बाद ही विशेष रूप से होता देखा गया है।
टिप्पणी : यह योग राज योग के समान है ऐसा अनुभव हुआ है कि जिसके हाथ में
यह योग होता है, उसकी आयु बहुत अधिक बड़ी नहीं होती परन्तु फिर भी ऐसा
व्यक्ति छोटी आयु में ही पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त करके अपना नाम चारों ओर फैला देता
है। भौतिकता की दृष्टि से देखा जाय तो इनके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी
नहीं रहती। ऐसे व्यक्ति जीवन में पूर्ण यश, सम्मान, तथा प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।
मरुत योग :
यदि हाथ में शुक्र पर्वत पूर्ण विकसित हो और उस पर
किसी प्रकार की बाधक रेखाएं न हों साथ ही गुरु पर्वत स्पष्ट
हो और उस पर क्रास का चिह्न हो एवं चन्द्र रेखा बलवान एवं
सीधी व स्पष्ट हो तो ऐसे व्यक्ति के हाथ में मरुत् योग होता है।
फल : जिस व्यक्ति के हाथ में मरुत् योग्य होता है वह व्यक्ति
बातचीत की कला में अत्यधिक निपुण तथा योग्य होता है।
उसका हृदय विशाल और दूसरों की सहायता करने में आनन्द