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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

( ङ )
भगवान् श्री पार्श्वनाथ जी की पूर्ण कृपा से ट्रस्ट कमेटी के
मनोरथ सफल होगे । उनके परमभक्त भैरव जी महाराज हमे सदा
ही इस तीर्थ क्षेत्र की नानाविध उन्नति में निरन्तर प्रेरणा व
उत्साह देते रहे है और हमे पूर्ण आशा है कि भविष्य मे भी वे
हमारे प्रयत्नो को सफलीभूत करेंगे ।
सुल्तानमल जैन
अध्यक्ष
वाडमेर, श्री जैन श्वेताम्बर नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ
दिनाक २-९-७८ मेवानगर (राजस्थान)

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भगवान् पार्श्वनाथ, नाकोडा तीर्थ

श्री भैरुजी नाकोडा तीर्थ

(१)
श्री जैन श्वेताम्बर नाकोडा पार्श्वनाथ तीर्थ

जैनमन्दिर शत्रुञ्जय महातीर्थ, पालीताना (सौराष्ट्र)
(जैन भवन, कलकत्ता के सौजन्य से)

जैनमन्दिर गिरनार महातीर्थ, जूनागढ (सौराष्ट्र)
(जैन भवन, कलकत्ता के सौजन्य से)

लूणिगवसही-तेजपाल वस्तुपाल जिनालय, आबू (राजस्थान)
(जैन भवन, कलकत्ता के सौजन्य से)

श्री महावीर निर्वाण स्थान-चरणपादुका गाँवमन्दिर पावापुरी (बिहार)
(जैन श्वे० सेवासमिति कलकत्ता के सौजन्य से)

महाबोधि मन्दिर, गया (बिहार)

प्राचीन शान्तिनाथ प्रतिमा, नालन्दा (बिहार)

जलमंदिर पावापुरी महातीर्थ (बिहार)

श्री वासुपूज्य जिनालय, चम्पापुरी तीर्थ (बिहार)

श्री कुल्पाक जी तीर्थ जिनालय का शिखर (आन्ध्र प्रदेश)

श्री पद्मप्रभु जिनालय, प्रतिमाएँ, कौशाम्बी तीर्थ (उ० प्र०)
आयागपट्ट, मथुरा स्तूप

श्री महावीर स्वामी
(पिरोजे की प्रतिमा)
६
• ऋषभ देव (माणिक्य स्वामी)
कुल्पाक जी तीर्थ (आन्ध्रप्रदेश)

पद्मप्रभु जिनालय, कौशाम्बी तीर्थ (उ० प्र०)
कौशाम्बी के भग्नावशेष व प्राचीन स्तम्भ

भ० महावीर स्वामी, वैभारगिरि गजगृह (बिहार)
(जैन भवन, कलकत्ता के मौजन्य से)

विविध तीर्थ-कल्प के सम्बन्ध में
मुनि जिनविजय का वक्तव्य
१ श्री जिनप्रभसूरिरचित कल्प-प्रदीप
कल्प-प्रदीप अथवा विशेषतया प्रसिद्ध विविध तीर्थ-कल्प नामक
यह ग्रंथ जैन साहित्य की एक विशिष्ट वस्तु है। ऐतिहासिक और
भौगोलिक दोनों प्रकार के विषयों की दृष्टि से इस ग्रंथ का बहुत कुछ
महत्त्व है। जैन साहित्य ही मे नही, समग्र भारतीय साहित्य मे भी इस
प्रकार का कोई दूसरा ग्रन्थ अभी तक ज्ञात नही हुआ। यह ग्रन्थ,
विक्रम १४वी गताब्दी मे, जैनधर्म के जितने पुरातन और विद्यमान
प्रसिद्ध-प्रसिद्ध तीर्थ स्थान थे उनके संबंध की प्राय एक प्रकार
की 'गाईड-वुक' है। इसमे वर्णित उन उन तीर्थों का संक्षिप्त रूप
से स्थान-वर्णन भी है और यथाज्ञात इतिहास भी है।
२ ग्रंथकार आचार्य
ग्रन्थकार अपने समय के एक वडे भारी विद्वान् और प्रभाव-
शाली जैन आचार्य थे। जिस तरह, विक्रम की १७वी गताब्दी मे,
मुगलसम्राट अकवर वादशाह के दरवार मे जैन जगद्गुरु हीर-
विजय सूरि ने गाही सम्मान प्राप्त किया था, उसी तरह जिनप्रभ
सूरि ने भी १४वी गताब्दी मे तुघलक सुलतान महम्मद शाह के
दरवार मे बड़ा गौरव प्राप्त किया था। भारत के मुसलमान
वादगाहो के दरवार मे, जैन धर्म का महत्व बतलाने वाले और
उसका गौरव वढाने वाले, गायद, सबसे पहले ये ही आचार्य हुए।
इनको प्रस्तुत रचना के अवलोकन से ज्ञात होता है, कि
इतिहास और स्थल-भ्रमण से इनको बडा प्रेम था। इन्होंने अपने
जीवन में भारत के बहुत से भागो मे परिभ्रमण किया था।

४ विविध तीर्थ-कल्प
गुजरात, राजपूताना, मालवा, मध्यप्रदेश, वराड, दक्षिण,
कर्णाटक, तेलग, विहार, कोशल, अवध, युक्तप्रांत, और पजाव
आदि के कई पुरातन और प्रसिद्ध स्थानो की उन्होने यात्रा की
थी। इस यात्रा के समय, उस-उस स्थान के वारे मे जो-जो
साहित्यगत और परपराश्रुत बाते उन्हे ज्ञात हुई उनको उन्होने
सक्षेप मे लिपिबद्ध कर लिया और इस तरह उस स्थान या तीर्थ
का एक कल्प बना दिया। और साथ-ही मे ग्रन्थकार को सस्कृत
और प्राकृत दोनो भाषाओ, गद्य और पद्य दोनो ही प्रकार से, ग्रन्थ-
रचना करने का एकसा अभ्यास होने के कारण, कभी कोई कल्प
उन्होने सस्कृत भाषा मे लिख लिया तो कोई प्राकृत मे, और इसी
कभी किसी कल्प की रचना गद्य मे कर ली तो किसी की पद्य मे।
किसी एक स्थान के बारे मे पहले एक छोटी सी रचना कर ली
और फिर पीछे से कुछ अधिक वृत्त ज्ञात हुआ और वह लिपिबद्ध
करने जैसा प्रतीत हुआ, तो उसके लिये परिशिष्ट के तौर पर
एक कल्प या प्रकरण और लिख लिया गया। इस प्रकार भिन्न-
भिन्न समय मे और भिन्न-भिन्न स्थानो मे, इन कल्पो की रचना
होने से, इनमे किसी प्रकार का कोई क्रम नही रह सका।
३ ग्रन्थ की रचना की कालावधि
ग्रन्थ की इस प्रकार खण्डशः रचना होते रहने के कारण सारे
ही सग्रह के सम्पूर्ण होने मे बहुत दीर्घ समय व्यतीत हुआ मालूम
देता है। कम से कम ३० से अधिक वर्ष जितना काल लगा हुआ
होगा। क्योकि, जिन कल्पो मे रचना का समय-सूचन करने वाला
सवत् आदि का उल्लेख है, उनमे सबसे पुराना सवत् १३६४
मिलता है, जो वैभारगिरि-कल्प [क० ११, पृ० २३] के अन्त मे
दिया हुआ है। ग्रन्थकार का किया हुआ ग्रन्थ की समाप्ति का
सूचक जो अन्तिमोल्लेख है, उसमें सवत् १३८९ का निर्देश है।