विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४८७
चित्र
नं०
७
४८८ आनन्द मन्दिर
चित्र नं० ८
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४८६
चित्र नं० ९
४६० आनन्द मन्दिर
चित्र नं० १०
कभी कभी अनियम आहार विहार के कारण तथा रति
क्रिया से गर्भ का बालक योनिमार्ग में आकर अटक जाता है।
इसलिये प्रसव के समय बड़ा कष्ट होता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६१
चित्र नं० ११
गर्भवती के कुपथ्य तथा गर्मी अवस्था मे रतिक्रिया होने के
कारण गर्भ उलट जाता है और प्रसव के समय प्रसव होना
कठिन होजाता है तब काटकर निकाला जाता है इससे जच्चा
और बच्चा दोनो का कभी २ प्राणान्त तक होजाता है ।
४६२ आनन्द मन्दिर
चित्र नं० १२
कभी कभी अनियम से गर्भ के बालक का सिर टेढ़ा तिरछा
हो जाता है इससे गर्भवती को बड़ा कष्ट होता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६३
चित्र नं० १३
गर्भवती स्त्रियो को बडी सावधानी और पथ्य से रहना
चाहिए। प्रसंग से बहुत बचना चाहिये अनियम आहार विहार
तथा इस दशा मे रतिक्रिया होने से गर्भ को अनेक प्रकार से
हानि पहुँचती है।
१६१ आनन्द मन्दिर
चित्र नं० १४
गर्भ का बालक अनियम रतिक्रिया से दबाव पड़ने के
कारण उलटा सुलटा टेढा तिरछा होजाता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६५
चित्र नं० १५
४६६ आनन्द मन्दिर
चित्र नं० १६
धाय का कर्तव्य है, यदि वह चतुर हुई तो उलटे सुलटे तिरछे
गर्भ को ठीक कर सकती है। देखिये दूसरा भाग।
आनन्द
मन्दिर
उन्नीसवां अध्याय
— ० —
३२
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४६६
गर्भिणी और गर्भ को हानि
पहुंचने का कारण
जो गर्भवती स्त्रियां ऊ चे नीचे स्थान पर चढ़ती उतरती हैं
और बहुधा उकडू बैठा करती हैं जो धमक कर तेजी से चलती
हैं, जो सवारी पर बैठती हैं और जो बहुधा तख्त, चौकी अथवा
पृथ्वी आदि कठोर स्थान पर बैठी रहती है जो एक ही करवट
से बैठी रहती हैं और जो अधोवायु, दिशा, पेशाव आदि वेगों
को रोकती हैं जो कठिन परिश्रम करती है और जो अपनी शक्ति
से अधिक काम करती हैं जो बोझा उठाती हैं, जो गरम वस्तुएं
अधिक सेवन करती हैं, अथवा उपवास अधिक करती हैं ।
ऊपर के इन कारणों से और अधिक कलह चिंता और
शोक से उनका गर्भ पेट मे ही मरजाता है अथवा उलटा तिरछा
टेढ़ा होकर गर्भवती के प्राणों को नष्ट करता है और आप भी
नष्ट होता है ।
अधिक दिन का गर्भ होने से टेढ़ा हो जाने से गर्भिणी को
बड़ा कष्ट पहुंचता है जो गर्भवती स्त्री सदैव चित्त लेटा करती है
उसके गर्भ के बालक को बड़ी भारी हानि पहुंचती है इस कारण
गर्भवती को सब प्रकार से सावधान रहना चाहिये ।
यदि गर्भवती को ऊपर लिखे अनुसार किसी प्रकार का कष्ट
हो जावे तो किसी चतुर दाई को बुलाकर ठीक कराले । इस पुस्तक
के दूसरे भाग मे यह विषय भी विस्तार पूर्वक समझाया जावेगा ।
५७० आनन्द मन्दिर
पति पत्नी की प्रेम वार्ता
उत्तम सन्तान की इच्छा रखने वाले पतियों को चाहिये
केवल विषय वासना की तृप्ति के लिये ही स्त्री से प्रेम न करके
प्रतिदिन हृदय से प्रेम करे और स्त्री को अपने जीवन की साथिन
समझ कर गृहस्थी के कार्य और व्यवहार में सम्मति लिया करे ।
जिन दिनों स्त्री गर्भवती हो उन दिनों इस बात का नियम
करले कि प्रतिदिन कुछ देरी के लिये स्त्री के पास बैठकर स्त्री से प्रेम
वार्ता और धर्म चर्चा किया करे और इस बात का ध्यान रक्खे
कि स्त्री पति के प्यार और प्रेमवार्ता से अधिक प्रसन्न रहती है किसी
स्त्री का पति चाहे जितना धनवान और सुन्दर हो स्त्री को चाहे
जितना वस्त्राभूषणों से प्रसन्न रक्खे परन्तु प्रेम न करता हो तो
स्त्री सब व्यर्थ समझती है ।
पति का प्यार संसार के बहुमूल्य
आभूषणों से भी बढ़कर है
याज्ञवल्क्य ऋषि के दो स्त्रियां थी कात्यायनी और मैत्रेयी
इन दोनों पत्नियो से में मैत्रेयी में पति का प्यार कुछ अधिक था
जब याज्ञवल्क्य सन्यास लेकर तपस्या करने के लिये घर से जाने
लगे तब उन्होंने अपना कुल गृहस्थी का सामान वस्त्राभूषण
आदि दोनों स्त्रियों को दो हिस्से बराबर बराबर करके बांट दिया
और आप तपस्या के लिये वन को चल दिये ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ५०१
एक पत्नी कात्यायनी तो अपने हिस्से के वस्त्राभूषण सम्हालने
मे लगी, आभूषणो की देख रेख मे मग्न हुई पत्नी को पति के
वन जाने का अर्थात् विछोह का कुछ भी ख्याल न रहा, परन्तु
दूसरी पत्नी मैत्रेयी जो पति के प्यार का मूल्य समझती थी उसने
उन बहुमूल्य आभूषणों की ओर देखा भी नही और हाथ जोड
कर पति के सामने खडी होकर प्रार्थना करने लगी कि हे प्राण-
नाथ ! प्राणधन !! इस झूठे धन को लेकर मैं क्या करूंगी क्या
इस धन से मुझे शान्ति मिल जायगी ? क्या आप तत्वदर्शी
विद्वान होकर भी यह नहीं जानते कि स्त्री के लिये पति से बढ़-
कर ससार मे दूसरा कोई धन नहीं है जब पत्नी के प्राणो का
धन पति ही छूट रहा है तो यह ससार के बहुमूल्य आभूषणो
को लेकर ही मै क्या करूंगी मेरे लिये अब संसार का कोई
अधिक से अधिक बहुमूल्य पदार्थ प्रसन्न नहीं कर सकता यह
सब व्यर्थ है मै भी आपके साथ चलूंगी ।
पति पत्नी मे सच्चा प्रेम हो तो उत्तम सुन्दर सुशील माता
पिता की आज्ञा कारिणी सन्तान उत्पन्न होती है इस विषय को
आनन्द मन्दिर के दूसरे भाग मे विस्तार से पढ़िये ।
जवानी और बुढ़ापा
स्त्री हो या पुरुष जवानी की अवस्था मे मदान्ध होकर
बुढापे को भूल न जाना चाहिये बुढ़ापा बुरा होता है इस लिये
ऐसे उपाय और साधन काम मे लाने चाहिये जिससे बुढ़ापा शीघ्र
न आघेरे क्योंकि जो मनुष्य नियम पूर्वक नहीं रहते मदान्धता
५०२ आनन्द मन्दिर
से समय कुसमय न देखकर विषयाग्नि की शान्ति मे ही लीन
रहते हैं वे अपनी अमूल्य जवानी को विषयाग्नि मे शीघ्र ही
भस्म करदेते हैं और समय के पहिले ही बुढ़ापे के चंगुल मे फस-
कर कष्ट और दुःखमय जीवन व्यतीत करते हैं ।
याद रखिये बुढ़ापा आकर फिर नही जाता और जवानी
जाकर फिर नही आती ।
"जवानी आनही सकती, बुढ़ापा जा नही सकता"
भर्तृहरि जी ने ठीक कहा है:—
व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती,
रोगाश्च शत्रु इव प्रहरन्ति देहम् ।
आयुःपरिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो,
लोकस्तथाप्यहितमा च रतीति चित्रम् ॥
अर्थात—वृद्धावस्था वाघिनी की समान जवानी को खालेने
के लिये सामने खड़ी है, सब रोग शत्रुओं की समान देहपर
दण्ड प्रहार कर रहे हैं, आयु (उम्र) प्रति दिन इस प्रकार
निकलती जाती है, जैसे कच्चे घडे से पानी निकलताजाय, तिस
पर भी मनुष्य जिसमे बुरा हो वही काम करते जाते हैं ।
प्रेस की प्रार्थना
पुस्तक का यह प्रथम भाग "आनन्द मन्दिर" अब समाप्त
होरहा है इसका दूसरा भाग शीघ्रही तैय्यार होगा । यहां हम
विवाह विज्ञ-कामशास्त्र ५०३
दाम्पत्य प्रेम के विषय मे कुछ लाइने और लिखकर पुस्तक
समाप्त करते हैं ।
पीछे बतलाया गया है इस बात को बड़े बड़े महर्षियो ने
भी माना है श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्णचन्द्र, शिव, ब्रह्मा इत्यादि देव-
ताओ ने भी पति पत्नी के प्रेम की महिमा गाई है वेदो से भी
दाम्पत्य प्रेम दृढ़ और जीवन पर्यन्त बने रखने के लिये बहुत
कुछ आज्ञा दी है इस विषय मे अब अधिक लिखना व्यर्थ हैः-
दाम्पत्य प्रेम स्वर्ग का भी दुर्लभ पदार्थ है वे ही पति पत्नी
स्वर्ग सुख भोगते है उन्ही को मनुष्य जीवन का सच्चा आनन्द
और सुख मिलता है जो एक दूसरे के प्रेम बन्धन मे रहकर उत्तम
सन्तान उत्पन्न करते हैंः—
एक साहसी वीर युवक भयकर वनो मे जाकर बड़े बड़े
बलवान् हाथी और सिहो को मारता है जिसके सामने बड़े बड़े
बली और भयकर जीव घबड़ा कर भागने का मार्ग तक भूल
जाते हैं परन्तु जब वह अपनी प्यारी पत्नी के पास घर पर आता
है और उसे किसी कारण से उदास मलिन मुख देखता है तो
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५०४ आनन्द मन्दिर
देश की सैकड़ा पीछे निन्नानवे स्त्रिया रोगी पाई जाती हैं और
यही कारण सन्तान के रोगी निर्बल दुर्बल और अकालमृत्यु होने
की अधिकता का है। इसी कारण सन्तान माता पिता का निरा-
दर करने वाली बुरे स्वभाव वाली साहस हीन और कुमार्गी
होती है। इस विषय मे प्रमाण देने की जरूरत नहीं क्योकि पता
लगाइये तो बहुत कम ऐसे घर मिलेंगे जिनमे स्त्री पुरुष या
बालक कोई रोगी न हो।
अनुभव की बात
मुझे इस बात का अनुभव है क्योकि मेरे पास २५ पच्चीस
वर्षों मे लाखो स्त्रियां इलाज के लिये आई उनकी जबानी
उनके पति और सन्तान के रोगी होने का हाल मालूम कर
उन स्त्रियो द्वारा उनके पति तथा सन्तान की भी चिकित्सा
की गई।
मेरे इलाज से अब तक लाखों स्त्रियां और इतने ही पुरुष
आराम होचुके है और हजारो सन्तान हीन स्त्रियां सन्तानवती
होगई हैं। इसी प्रकार अनुभव प्राप्त हुआ है कि स्त्रियो और
बालकों के रोगो का कारण पुरुष ही हैं।
आनन्द मन्दिर
बीसवां अध्याय
—०—
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