विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
४४ विनय-पत्रिका
आकर मारा गया। इस प्रकार हनुमानजी उसकी मृत्युके कारण बने। रणमें
कुम्भकर्णको बलहीन करनेके भी मूल कारण हनुमानजी ही थे।—लक्ष्मणजीको
शक्तिबाणसे मूर्च्छित देखकर हनुमानजी संजीवनी बूटी लानेके लिए धौलागिरि-
को ही उठा लाये थे। उस बूटीके द्वारा मूच्र्छा दूर होनेपर लक्ष्मणजीने दूसरे ही
दिन मेघनादको मारा था। इससे वह मेघनादके भी वधके कारण माने जाते हैं।
१०—'कालनेमिहंता'—यह रावणके पक्षका बड़ा ही मायावी राक्षस था।
जब हनुमानजी लक्ष्मणजीके लिए संजीवनी लाने गये थे तो इसने मार्गमें
साधुका वेष धारण करके उन्हें छलनेका विचार किया। हनुमानजीको उसकी
माया मालूम हो गयी और तुरन्त ही उन्होंने उसकी जान ले ली, इसीसे वह
कालनेमिहंता कहलाते हैं।
११—'अघट घटना...विघटन'—समुद्रको लाँघना असम्भव है, किन्तु
हनुमानजीने उसे सम्भव कर दिखाया था। पूँछकी आगसे हनुमानजीके भस्म
हो जानेकी पूरी सम्भावना थी, पर उन्होंने उस सम्भव कार्यको असम्भव कर
दिया और उस आगसे लंकापुरीको जलाकर असम्भवको सम्भव भी कर दिया।
( २६ )
जयति मर्कटाधीस, मृगराज-बिक्रम,
महादेव, मुद-मंगलालय, कपाली।
मोद-मद-कोह-कामादि-खल-संकुला,
घोर संसार-निसि किरनमाली ॥१॥
जयति लसदंजनाऽदितिज, कपि-केसरी-
कश्यप-प्रभव, जगदार्त्तिहर्त्ता।
लोक-लोकप-कोक कोकनद-सोकहर,
हंस हनुमान कल्यान कर्त्ता ॥२॥
जयति सुविसाल-विकराल विग्रह,
वज्रसार सर्वांग भुजदंड भारी।
कुलिसनख, दसनवर लसत, बालधि वृहद,
बैरि-सस्त्रास्त्रधर कुधरधारी ॥३॥
विनय-पत्रिका ४५
जयति जानकी-सोच-संताप मोचन,
राम-लछमनानंद-वारिज-विकासी ।
कीस-कौतुक-केलि लूम-लंका-दहन,
दलन कानन तरुन तेजरासी ॥४॥
जयति पाथोधि-पाषान-जलजानकर,
जातुधान-प्रचुर-हर्ष-हाता ।
दुष्ट रावन-कुंभकरन-पाकारिजित-
मर्मभित्, कर्म-परिपाक-दाता ॥५॥
जयति भुवनैकभूपन, विभीषन-वरद,
विहित कृत राम-संग्राम साका ।
पुष्पकारूढ़ सौमित्रि-सीता-सहित,
भानु-कुल-भानु-कीरति-पताका ॥६॥
जयति पर-जंत्रमंत्राभिचार-ग्रसन,
कारमन-कूट-कृत्यादि-हंता ।
साकिनी-डाकिनी-पूतना-प्रेत-
बैताल-भूत-प्रमथ-जूथ-जंता ॥७॥
जयति वेदांतविद विविध-विद्या-विसद,
वेद-वेदांगविद ब्रह्मवादी ।
ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य-भाजन विभो,
विमल गुन गनसि सुक नारदादी ॥८॥
जयति काल-गुन-कर्म-माया-मथन,
निश्चल ग्यान व्रत-सत्यरत, धर्मचारी ।
सिद्ध-सुरवृंद-जोगींद्र सेवित सदा,
दास तुलसी प्रनत भय-तमारी ॥९॥
शब्दार्थ-मर्कटाधीश = बन्दरोंके राजा । मृगराज = सिंह । कपाली = शिवजी । कोह =
क्रोध । किरनमाली = सूर्य । लसदंजनऽदितिज = (लसत् + अंजना + अदिति + ज) अंजनी-
रूपी अदितिसे जायमान होकर सुशोभित । कोक = चकवा । कोकनद = कमल । हंस = सूर्य ।
बालधि = पूँछ । कुधर = पहाड़ । पयोधि = समुद्र । जातुधान = राक्षस । हाता = हन्ता ।
४६ विनय-पत्रिका
पाकारिजित = पाक नामक दैत्यके शत्रु इन्द्रको जीतनेवाला मेघनाद। मर्मभित् = मर्म
स्थानको भेदनेवाला। परिपाक = फल। वरद = वर देनेवाले। साका = यश। अभिचार =
मोहन-उच्चाटन आदि प्रयोग तथा जादू-टोना। कारमन = किसीको जंत्र-मंत्र द्वारा मार
डालनेके लिए प्रयोग। कृत्यादि = प्राणनाशिनी देवी आदि। जंता = जीतनेवाले। विभो =
समर्थ। तमारी = सूर्य।
भावार्थ—हे बन्दरोंके राजा हनुमानजी, तुम्हारी जय हो। तुम सिंहके
समान पराक्रमी, देवताओंमें श्रेष्ठ, आनन्द और कल्याणके स्थान तथा कपाल-
धारी शिवके अवतार हो। मोह, मद, क्रोध, काम आदि दुष्टोंसे परिपूर्ण घोर
संसाररूपी रात्रिके लिए तुम सूर्य हो ॥१॥ हे अंजनीरूपी अदिति (देव-माता)
से उत्पन्न होकर सुशोभित होनेवाले, तुम्हारी जय हो। तुम्हारा जन्म बन्दर
केशरीरूपी कश्यप प्रजापतिसे हुआ है। तुम संसारके दुःखोंको हरनेवाले हो।
हे कल्याणकारी हनुमानजी ! तुम लोक और लोकपालरूपी चकवा तथा कमल-
का शोक हरनेवाले सूर्य हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो। तुम्हारा शरीर बड़ा विशाल
और विकराल है; तुम्हारे भारी भुजदण्ड और सर्वांगकी रचना वज्रके सार
पदार्थसे हुई है। वज्रके समान तुम्हारे सुन्दर नख और दाँत सुशोभित हो रहे हैं।
तुम्हारी पूँछ बहुत लम्बी है; तुम शत्रुओंका संहार करनेके लिए अस्त्र-शस्त्र धारण
किये रहते हो; तुम पर्वतको भी हाथमें लिये रहते हो ॥३॥ हे सीताजीकी चिन्ताओं
और दुःखोंको हरनेवाले, तुम्हारी जय हो। तुम राम-लक्ष्मणके आनन्दरूपी
कमलको प्रफुल्लित करनेवाले हो। तुम बन्दर स्वभावसे हँसी-खेलमें ही अपनी
पूँछसे लंका-दहन करने तथा अशोक-वनको बर्बाद करनेके लिए मध्याह्नकालीन
सूर्य हो ॥४॥ तुम्हारी जय हो ! तुम समुद्रपर पत्थरका जहाज (पुल) तैयार करके
राक्षसोंके बड़े भारी हर्षके हंता हो। तुम दुष्ट रावण, कुम्भकर्ण और मेघनादके
मर्मस्थानोंको भेदकर उन्हें उनके कर्मोंका फल देनेवाले हो ॥५॥ हे त्रिभुवनके
अपूर्व भूषण ! तुम्हारी जय हो ! तुम विभीषणको वर देनेवाले और संग्राममें
श्रीरामजीके साथ यशःपूर्ण कार्य करनेवाले हो। तुम पुष्पक विमानपर बैठे हुए
लक्ष्मण और सीताके सहित सूर्यवंशके सूर्य श्रीरामचन्द्रकी कीर्ति-पताका हो ॥६॥
तुम्हारी जय हो ! तुम दूसरोंके द्वारा किये गये यन्त्र-मन्त्र अभिचार (मोहन-उच्चा-
टन) प्रयोगोंको ग्रसनेवाले तथा किसीको मार डालनेके लिए गुप्त प्रयोगों तथा
प्राणघातिनी कृत्या आदि देवियोंका हनन करनेवाले हो । तुम शाकिनी, डाकिनी,
पूतना, प्रेत, बैताल, भूत और प्रमथ आदिके समूहको जीतनेवाले हो ॥७॥
तुम्हारी जय हो ! तुम वेदान्त शास्त्रके ज्ञाता, अनेक विद्याओंमें पारंगत, चारों
वेद (ऋक्, यजु, साम, अथर्वण) और वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त,
छन्द और ज्योतिष) के जानकार तथा ब्रह्म-निरूपण करनेवाले हो। हे
विभो ! तुम ज्ञान-विज्ञान और वैराग्यभाजन हो। शुकदेव और नारद आदि
तुम्हारे निर्मल गुणोंका गान करते हैं ॥८॥ तुम्हारी जय हो। तुम काल (क्षण,
दिन, मास, वर्ष आदि), गुण (सत्त्व, रज, तम), कर्म (कायिक, वाचिक, मान-
सिक अथवा संचित, प्रारब्ध, और क्रियमाण, या शुभ और अशुभ अथवा कर्म,
अकर्म और विकर्म) तथा मायाको दूर करनेवाले हो। तुम्हारा ज्ञान और व्रत
अचल है। तुम सत्यमें रत रहते और धर्मपर चलते हो। सिद्ध, देव-समूह तथा
बड़े-बड़े योगी तुम्हारी सदा सेवा किया करते हैं। हे भव-भयरूपी निशाका नाश
करनेके लिए सूर्यरूप हनुमानजी ! तुलसीदास तुम्हें प्रणाम करता है ॥९॥
विशेष
१—'विभीषण-वरद'—लंका-दहनके समय विभीषणने अपनी दुःख-गाथा
श्रीहनुमानजीको सुनायी थी, उसे सुनकर हनुमानजीने विभीषणको आशीर्वाद-
रूप वरदान देते हुए कहा था कि परम कृपालु श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारा दुःख
अवश्य दूर करेंगे ।
२—'माया'—क्या है, इसे गोस्वामीजीके ही शब्दोंमें देखिये:—
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहि बस कीन्हें जीव निकाया ॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई ॥
(रामचरितमानस)
( २७ )
जयति मंगलागार संसार-भारापहर, बानराकार विग्रह पुरारी ।
राम रोषानल-ज्वालमाला-मिष ध्वांतचर-सलभ-संहारकारी ॥१॥
जयति मरुदंजनामोद-मंदिर, नतग्रीव सुग्रीव-दुःखैक-बंधो।
जातुधानोद्धत-क्रुद्ध-कालाग्निहर, सिद्ध-सुर-सज्जनानंद-सिंधो ॥२॥
४८ विनय-पत्रिका
जयति रुद्राग्रनी, विश्व-विद्याग्रनी, विश्व विख्यात-भट चक्रवर्ती।
सामगाताग्रनी कामजेताग्रनी, रामहित, रामसेवकसुवर्ती ॥३॥
जयति संग्राम-जय, रामसंदेसहर, कौसला-कुसल-कल्यानभाषी।
राम-विरहार्क-संतप्त-भरतादि, नरनारि शीतल करन कल्पसाखी ॥४॥
जयति सिंहासनासीन सीतारमन, निरखि निर्भर हरष नृत्यकारी।
राम संभ्राज सोभा-सहित सर्वदा तुलसिमानस रामपुर-बिहारी ॥५॥
शब्दार्थ—मिष = बहानेसे। ध्वांतचर = राक्षस। सलभ = पतङ्ग, पतिंगे। मरुदंजना-
मोद (मरुत+अंजन+आमोद) पवन और अंजनीको प्रमुदित करनेवाले। नतग्रीव = गर्दन
झुकाये हुए। भट = योद्धा। चक्रवर्ती = सम्राट्। सामगाताग्रनी = सामवेदका गान करने-
वालोंमें श्रेष्ठ। संदेसहर = संदेशिया या संदेशा कहनेवाला। विरहार्क = विरहरूपी सूर्य।
निर्भर = पूर्ण, अत्यन्त। संभ्राज = सुशोभित।
भावार्थ—हे मंगलके गृह तथा संसारका भार हरनेवाले हनुमानजी, तुम्हारी
जय हो ! तुम्हारे शरीरका आकार बन्दरकी तरह है, पर हो तुम साक्षात् विश्व-
स्वरूप। तुम श्रीरामजीके क्रोधरूपी अग्निकी ज्वालमालाके बहाने निशाचर-रूपी
पतंगोंका संहार करनेवाले हो ॥१॥ हे पवन और अंजनीके आमोद-मन्दिर !
तुम्हारी जय हो ! नीची गर्दन किये हुए सुग्रीवके दुःखके तुम अद्वितीय साथी थे।
तुम उद्धत राक्षसोंके क्रुद्ध कालाग्निका नाश करनेवाले तथा सिद्धों, देवताओं
और सज्जनोंके लिए आनन्दके समुद्र हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो ! तुम एकादश
रुद्रमें अग्रणी, समस्त संसारकी विद्यामें अग्रगण्य तथा संसार-प्रसिद्ध योद्धाओंके
चक्रवर्ती राजा (सम्राट्) हो। तुम सामवेदका गान करनेवालोंमें अग्रणी हो,
कामदेवको जीतनेवालोंमें सबसे पहले गिने जाने योग्य हो। तुम श्रीरामजीके
हितकारी और रामभक्तोंकी रक्षा करनेवाले हो ॥३॥ तुम्हारी जय हो ! तुम
समरमें विजय-लाभ करनेवाले, श्रीरामजीका सन्देशा (जानकीके पास) ले जाने-
वाले, अयोध्याकी कुशल और कल्याण (भरतजी तथा अयोध्यापुर-वासियोंसे)
कहनेवाले हो। तुम रामचन्द्रके विरह-रूपी सूर्यसे सन्तप्त भरत आदि स्त्री-पुरुषोंको
शीतल करनेके लिए कल्पवृक्ष हो ॥४॥ हे राज्यसिंहासनपर सुशोभित जानकीनाथ
श्रीरामजीको देखकर अत्यन्त हर्षके साथ नृत्य करनेवाले ! तुम्हारी जय हो ! हे
विनय-पत्रिका ४९
रामकी पुरी अयोध्यामें विहार करनेवाले हनुमानजी ! तुम रामचन्द्रकी शोभाके
सहित (समाज-सहित) इस तुलसीदासके अन्तःकरणमें सदा विराजमान रहो ।
विशेष
१—'रुद्र'—एकादश रुद्रके नाम ये हैं:—अज, एकपात्, अहिब्रध्न, पिनाकी,
अपराजित, त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हरण, ईश्वर ।
२—'रामभक्तानुवर्त्ती—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हनुमान-
जी राम-भक्तोंकी अधीनतामें रहनेवाले हैं; अर्थात् वह अपनेको रामभक्तोंके
हाथमें बिका हुआ समझते हैं।
( २८ )
जयति वात-संजात, विख्यात विक्रम, बृहद्-
बाहु, बलविपुल, वालधि बिसाला ।
जातरूपाचलाकार विग्रह, लसल्लोम
विद्युल्लता ज्वालमाला ॥१॥
जयति बालार्क वर-वदन, पिंगल-नयन,
कपिस-कर्कस-जटाजूटधारी ।
विकट भृकुटी, बज्र दसन नख, बैरि-मद-
मत्त-कुंजर-पुंज-कुंजरारी ॥२॥
जयति भीमार्जुन-ग्याल सूदन-गर्व-
हर, धनंजय-रथ-त्राण-केतू ।
भीष्म द्रोण-कर्णादि-पालित, काल-
हक सुयोधन-चमू-निधन-हेतू ॥३॥
जयति गतराजदातार, हन्तार
संसार-संकट, दनुज-दर्पहारी ।
ईति अति भीति-ग्रह-प्रेत-चौरानल-
व्याधि-बाधा-शमन-घोरमारी ॥४॥
४
२. देवी, गंगा, यमुना व काशी-चित्रकूट स्तुति
५० विनय-पत्रिका
जयति निगमागम व्याकरण करन लिपि,
काव्य कौतुक-कला-कोटि-सिंधो ।
साम-गायक, भक्त-कामदायक,
वामदेव, श्रीराम-प्रिय-प्रेम-बंधो ॥५॥
जयति घर्मांसु-संदग्ध-संपाति,
नवपच्छ-लोचन-दिव्य-देहदाता ।
कालकलि-पाप संताप-संकुल सदा,
प्रनत तुलसीदास तात-माता ॥६॥
शब्दार्थ- वात = पवन । संजात = उत्पन्न। बालधि = पूँछ। जातरूपाचलाकार =
(जातरूप+अचल+अकार) सुवर्णके पर्वत (सुमेरु) का आकार। लसल्लोम (लसत्+
लोम) रोम सुशोभित है। पिंगल = पीला । कपिस = भूरा । जूट = जूड़ा। ब्यालसूदन =
गरुड़। धनंजय = अर्जुन । ईति = खेतीकी छ बाधाएँ-अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे,
पक्षी और राजाका आक्रमण। घोरमारी = महामारीकी बीमारी। घर्मांसु (घर्म+अंशु) प्रखर
किरनवाले। नवपच्छ = नया पंख। तात = पिता।
भावार्थ- हे पवन-कुमार ! तुम्हारी जय हो ! तुम्हारा पराक्रम विख्यात है,
भुजाएँ विशाल हैं, बल असीम है और पूँछ बड़ी लम्बी है। तुम्हारा शरीर सुमेरु
पर्वतके आकारका है, उसपर विद्युल्लताकी ज्वालमालाके समान रोम सुशोभित
हो रहे हैं ॥१॥ जय हो ! तुम्हारा श्रेष्ठमुख प्रभातकालीन सूर्यके समान है, नेत्र
पीले हैं और तुम भूरे रंगका कठोर जटाजूट धारण किये रहते हो । तुम्हारी
भौंहें टेढ़ी हैं, दाँत और नख वज्रके समान हैं। तुम शत्रुरूपी मदमत्त हाथियोंके
लिए सिंहके समान हो ॥२॥ तुम्हारी जय हो ! तुम भीम, अर्जुन और गरुड़के
गर्वको चूर्ण करनेवाले तथा अर्जुनके रथकी पताकापर बैठकर उसकी रक्षा करने-
वाले हो । तुम भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण आदिसे रक्षित, कालकी दृष्टिके समान
दुर्योधनकी सेनाका संहार करनेके मुख्य कारण हो ॥३॥ जय हो ! तुम सुग्रीवके
गये हुए राज्यको दिलानेवाले, सांसारिक संकटोंका नाश करनेवाले और दानवों-
के दर्पको कुचल डालनेवाले हो । ईति, अत्यन्त डर, ग्रह, प्रेत, चोर, आग तथा
रोगकी बाधाओं एवं महामारीका नाश करनेवाले हो ॥४॥ तुम्हारी जय हो ! तुम
वेद, शास्त्र और व्याकरणको लिपिबद्ध करनेवाले (अथवा उनपर भाष्य लिखने-
विनय-पत्रिका ५१
वाले) तथा काव्यके दस अंगों एवं करोड़ों कलाओंके समुद्र हो । तुम सामवेदका
गान करनेवाले तथा भक्तोंकी कामना पूरी करनेवाले शिवरूप हो और रामजीके
प्रिय प्रेमी बन्धु हो ॥५॥ तुम्हारी जय हो ! तुम सूर्यकी प्रखर किरणोंसे जले हुए
सम्पाति नामक गीधको नवीन पर (पंखे) नेत्र और दिव्य शरीर देनेवाले हो ।
कलिकालके पाप-सन्तापोंसे सदा परिपूर्ण यह तुलसीदास तुम्हें प्रणाम करता है;
क्योंकि पिता-माता तुम्हीं हो ! ॥६॥
विशेष
१—'जटाजूटधारी'—हनुमान्जी भगवान् शिवजीके अवतार हैं, इसीसे
उन्हें जटाजूटधारी कहा गया है । अन्यथा वानर रूपके लिए जटाजूटधारी कहना
असंगत होता ।
२—'भीमार्जुन-ब्यालसूदन गर्वहर'—महाभारतमें कथा है कि पाण्डवोंके
वनवासकालमें एक दिन भीम अपने बलके मदमें मस्त कहीं जाँ रहे थे । रास्तेमें
उन्हें एक बन्दर मिला । भीमने उससे रास्ता छोड़नेके लिए कहा । बन्दरने
कहा,—मैं बूढ़ा हूँ, उठने बैठनेमें कष्ट होता है, तुम्हीं मेरी पूँछ हटाकर चले
जाओ । भीमसेनने क्रुद्ध होकर उसे घसीटकर रास्तेसे दूर कर देना चाहा । पर
पूरी शक्ति लगानेपर भी उस बन्दरकी पूँछ नहीं हिली । इससे भीमको मन ही
मन बहुत लज्जित होना पड़ा । पीछे जब उन्हें यह मालूम हुआ कि यह बन्दर
हनुमान् है, तो उन्होंने उन्हें नम्रतापूर्वक प्रणाम किया । इसी प्रकार एक बार
भीमने हनुमान्जीसे कहा कि आपने जिस रूपसे राम-रावण युद्धमें भाग लिया
था, उस रूपका मुझे दर्शन दें । हनुमानने कहा,—मेरा वह रूप बड़ा ही
विकराल है, अतः तुम उसे देखकर डर जाओगे । यह सुनकर भीमने गर्वके
साथ फिर आग्रह किया । तुरन्त ही हनुमानजीने वह रूप धारण कर लिया ।
भयके कारण भीमसेनकी आँखें बन्द हो गयीं । वह थर-थर काँपने लगे । दो
बार हनुमानजीकी महिमा देखकर उनका गर्व मिट गया ओर वह हाथ जोड़कर
उनके चरणोंपर गिर पड़े ।
इसो प्रकार एक बार अर्जुनका गर्व भी चूर हुआ था । महाभारत-युद्धमें
जब अर्जुन महापराक्रमी कर्णके रथपर बाण चलाते, तब उसका रथ बहुत दूर
चला जाता था, किन्तु कर्णके बाणसे अर्जुनका रथ कई अंगुलमात्र हटकर रह
जाता था। इसपर सारथी रूपमें बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण हर बार कहा करते,
धन्य हो कर्ण ! भगवान्का यह वचन अर्जुनके लिए असह्य हो उठा। उन्होंने
सोचा कि मेरे बाणसे कर्णका रथ इतनी दूर चला जानेपर भी श्रीकृष्णने मुझे
एक बार भी शाबासी नहीं दी, किन्तु उनके बाणसे मेरा रथ कुछ अंगुल
खिसकनेपर ही यह हर बार उसकी प्रशंसा करते हैं। अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण
अर्जुनका यह भाव समझ गये। उन्होंने हनुमानजीसे ध्वजा छोड़कर हट जानेके
लिए इशारा किया। हनुमानजीके हटते ही कर्णके बाणसे अर्जुनका रथ बहुत दूर
जा गिरा। अर्जुनने व्याकुल होकर भगवान्से इसका कारण पूछा। भगवान्ने
कहा,-हनुमानजीके पराक्रमसे तुम्हारा रथ स्थिर रहता है, इस समय वह
ध्वजाके ऊपरसे हट गये हैं। कुशल थी कि मैं बैठा हुआ था; नहीं तो तुम्हारा
रथ न-जानें कहाँ जाकर गिरता। भगवान्की बात सुनकर अर्जुनका अभिमान
दूर हो गया।
स्कन्दपुराणमें लिखा है कि एक बार विष्णु भगवान्ने हनुमानजीको बुलाने-
के लिए गरुड़से कहा। हनुमानने गरुड़से कहा,-आप चलें, मैं थोड़ी देरके
बाद यहाँसे चलूँगा। गरुड़ने साथ ही चलनेके लिए कहा। हनुमानने कहा,-
पीछे चलनेपर भी मैं आपसे पहले वहाँ पहुँच जाऊँगा। गरुड़को यह बात बहुत
बुरी लगी, क्योंकि उन्हें अपनी तीव्र गतिका बड़ा गर्व था। वह शीघ्र पहुँचनेके
लिए बड़ी तेजीसे चले। उन्होंने भगवान्के पास पहुँचकर देखा :-हनुमानजी
विराजमान हैं। यह देखकर वह बहुत लज्जित हुए।
३-'करनलिपि'-हनुमानजीने सूर्य भगवान्से विद्याध्ययन किया था।
इन्होंने वेदों और शास्त्रोंपर भाष्य, पिंगलकी टीका तथा वेदांगोंपर भी कई ग्रंथ
लिखे थे। हनुमन्नाटक, हनुमत् ज्योतिष आदि कई ग्रंथ आज भी संस्कृत
साहित्यमें उपलब्ध हैं।—चित्रकाव्यके आदि आविष्कारक भी यही थे।
४-'सम्पाति'-यह गीधराज जटायुका छोटा भाई था। एक दिन दोनों
भाई होड़ लगाकर सूर्यको छूनेके लिए आकाशमें उड़े। जटायु बुद्धिमान् था,
इसलिए वह सूर्यमण्डलके समीप जाकर उनका तेज न सह सकनेके कारण
लौट आया—; परन्तु अभिमानी सम्पाति आगे ही बढ़ता गया। परिणाम यह
हुआ कि सूर्यकी उत्तप्त किरणोंसे उसके पर जल गये और वह माल्यवान पर्वत-
पर आ गिरा। उसी समय सुग्रीवकी आज्ञासे बानर और रीछ महारानी सीता-
जीकी खोजमें निकले थे। सम्पातिने जानकीजीका पता बतलाया। हनुमानजी-
की कृपासे उसे नये पंख, नवीन नेत्र प्राप्त हो गये और साथ ही उसका शरीर
भी दिव्य हो गया।
( २९ )
जयति निर्भरानंद-संदोह कपिकेसरी,
केसरी-सुवन भुवनैकभर्त्ता।
दिव्य भूम्यंजना-मंजुलाकर-मने,
भक्त-संताप-चिंतापहर्त्ता ॥१॥
जयति धर्मार्थ-कामापवर्गद विभो,
ब्रह्मलोकादि-वैभव-विरागी।
वचन-मानस-कर्म सत्य-धर्मव्रती,
जानकीनाथ-चरनानुरागी ॥२॥
जयति बिहगेस-बलबुद्धि-वेगाति-
मद-मथन, मनमथ-मथन, ऊर्ध्वरेता।
महानाटक-निपुन, कोटि-कविकुल-
तिलक, गान गुन-गर्व-गंधर्वजेता ॥३॥
जयति मंदोदरी-केस-कर्षण,
विद्यमान दसकंठ भट-मुकुट मानी।
भूमिजा दुःख-संजात-रोषांतकृत
जातना जंतु कृत जातुधानी ॥४॥
जयति रामायन-श्रवन-संजात-रोमांच,
लोचन सजल, सिथिल बानी।
रामपदपद्म-मकरंद-मधुकर, पाहि,
दास तुलसी सरन, सूल पानी ॥५॥
५४ विनय-पत्रिका
शब्दार्थ—संदोह = समूह । मंजुलाकरमने = (मंजुल+आकर-मने) खानसे निकली
हुई मनोहर मणि। कामापवर्गद = (काम + अपवर्ग+द) काम और मोक्षके दाता।
कर्षण = खींचनेवाले। विद्यमान = मौजूदगीमें। भूमिजा = जानकीजी। रोषांतकृत = (रोष+
अन्तकृत) क्रोधके कारण प्रलय करनेवाले (अन्तकृत) यम। जातुधानी = राक्षसी।
मकरंद = पुष्परस, मधु। मधुकर = भ्रमर। पाहि = त्राहि या रक्षा करो।
भावार्थ—तुम्हारी जय हो ! तुम अतिशयानन्दके समूह, बानरोंमें साक्षात्
सिंह, केशरीके पुत्र और संसारके एकमात्र स्वामी हो। तुम अंजनीरूपी दिव्य
पृथिवीकी खानसे निकली हुई मनोहर मणि हो और भक्तोंके सन्तापों और
चिन्ताओंको हरनेवाले हो ॥१॥ हे विभो ! तुम्हारी जय हो ! तुम धर्म, अर्थ, काम
और मोक्षके देनेवाले हो और तुम्हें ब्रह्मलोक आदिके वैभवसे भी विराग है।
तुमने मन, वचन और कर्मसे सत्यको ही अपना धर्मव्रत बना रखा है। तुम
श्रीरामजीके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले हो ॥२॥ जय हो ! तुम गरुड़के बल,
बुद्धि और वेगके बड़े भारी गर्वको हरनेवाले तथा कामदेवका नाश करनेवाले
ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हो। तुम महानाटकके निपुण रचयिता और अभिनेता हो,
करोड़ों महाकवियोंके कुल-तिलक हो और गान-विद्याके गुणका गर्व करनेवाले
गन्धर्वोंको जीतनेवाले हो ॥३॥ जय हो ! तुम वीरोंके सिरमौर महा अभिमानी
रावणकी उपस्थितिमें उसकी स्त्री मन्दोदरीका केश पकड़कर खींचनेवाले हो।
तुमने जगज्जननी जानकीजीके दुःखसे उत्पन्न क्रोधके वश हो राक्षसियोंकी ऐसी
यातना की थी, जैसी यमराज तमाम प्राणियोंकी किया करता है ॥४॥ तुम्हारी
जय हो ! रामायण सुननेसे तुम्हारा शरीर पुलकित हो जाता है, नेत्र सजल हो
जाते हैं और कंठ गद्गद हो जाता है। हे श्रीरामजीके चरण-कमलोंके रसके
भ्रमररूप हनुमानजी ! त्राहि, त्राहि ! हे त्रिशूलधारी रुद्ररूप हनुमानजी ! तुलसी-
दास तुम्हारी शरण है।
विशेष
१—'ऊर्ध्वरेता'—ऋग्वेदमें दो तरहके ब्रह्मचारियोंका उल्लेख है; ऊर्ध्व-
रेतस् और अमोघवीर्य। जिस ब्रह्मचारीका वीर्य नीचेकी ओर न आकर ऊर्ध्व-
गामी हो जाता है, उसे ऊर्ध्वरेता कहते हैं। यह साधना सर्वश्रेष्ठ और दुर्लभ
है। अमोघवीर्य उसे कहते हैं जिस ब्रह्मचारीका वीर्य कभी भी निष्फल न
विनय-पत्रिका ५५
जाय । अर्थात् उससे गर्भाधान अवश्य हो जाय। हनुमानजी सर्वोच्च कोटिके
अखंड ब्रह्मचारी माने जाते हैं।
२—'महानाटक'—हनुमानजीने एक बृहद्नाटकमें राम-चरित वर्णन किया
था। कोई अधिकारी न मिलनेके कारण उन्होंने उसे समुद्रमें डाल दिया।
दामोदर मिश्रने उसके रहे-सहे अंशका संकलन करके वर्त्तमान हनुमन्नाटक
निर्माण किया।
३—'मन्दोदरी-केस-कर्षण'—हनुमानजीके आदर्श-चरितके वर्णनमें यह
प्रसंग यानी एक स्त्रीका केश पकड़कर खींचना खटकता है। पर वास्तवमें यहाँ
खटकनेकी कोई बात नहीं है। क्योंकि वह प्रभुकी आज्ञासे रावणका यज्ञ भंग
करने गये थे और उसीपर रावणका परास्त होना निर्भर था। जब उन्होंने यज्ञ
भंग करनेकी और कोई सूरत न देखी, तो यह काम करनेके लिए उन्हें विवश
होना पड़ा। उन्होंने सोचा कि रावण अपनी स्त्रीका अपमान कदापि न देख
सकेगा और यज्ञ छोड़कर अवश्य उठ खड़ा होगा। वही हुआ भी। विवश
होनेपर अनन्य भक्तके लिए अनुचित और उचितका विचार छोड़कर प्रभुकी
आज्ञा-पालन करना स्वाभाविक है। इसके सिवा कहींपर यह उल्लेख पाया
जाता है कि हनुमानजीने जिस मन्दोदरीका केस कर्षण किया था, वह
मायाकी बनी हुई कल्पित मन्दोदरी थी।
राग सारङ्ग
( ३० )
जाके गति है हनुमान की।
ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषान की ॥१॥
अघटित-घटन, सुघट-विघटन; ऐसी विरुदावलि नहिं आन की।
सुमिरत संकट-सोच विमोचन, मूरति मोद निधान की ॥२॥
तापर सानुकूल गिरिजा, हर, लषन, राम अरु जानकी।
तुलसी कपि की कृपा विलोकनि, खानि सकल कल्यान की ॥३॥
शब्दार्थ—गति = भरोसा, सहारा। पैज = प्रतिज्ञा। रेखा = लकीर, लीक। अघटित =
५६ विनय-पत्रिका
असम्भव । सुघट = सम्भव । विघटन = बिगाड़ देनेवाले । विरुदावलि = गुणावली । आनकी =
दूसरेकी । चितवन = विलोकनि ।
भावार्थ—जिसे केवल हनुमानजीका ही सहारा है, जिसकी प्रतिज्ञा सदासे
पूरी होती आयी है; यह सिद्धान्त वज्र या पत्थरके ऊपरकी लकीरके समान
अमिट है ॥१॥ हनुमानजी अघटित या असम्भव घटनाको सम्भव और सम्भवको
असम्भव करनेवाले हैं; ऐसी गुणावली दूसरे किसीकी नहीं है। आनन्द-निधान
श्रीहनुमानजीकी मूर्तिका स्मरण करते ही तमाम संकट और शोक नष्ट हो जाते
हैं ॥२॥ हे तुलसीदास ! हनुमान्जीकी कृपापूर्ण चितवन सब प्रकारके कल्याणोंकी
खानि है; क्योंकि (जिसपर इनकी कृपा-दृष्टि रहती है) उसपर पार्वती, शिव,
लक्ष्मण, राम और जानकीकी कृपा रहती है ॥३॥
राग गौरी
( ३१ )
ताकिहै तमकि ताकी ओर को ।
जाको है सब भाँति भरोसो कपि केसरी-किसोर को ॥१॥
जन-रंजन अरिगन-गंजन मुख-भंजन खल बरजोर को ।
वेद-पुरान-प्रगट पुरुषारथ सकल-सुभट-सिरमोर को ॥२॥
उथपे-थपन, थपे उथपन पन, बिबुध वृन्द बंदिछोर को ।
जलधि लाँघि दहि लंक प्रबल बल दलन निसाचर घोर को ॥३॥
जाको बाल-विनोद समुझि जिय डरत दिवाकर भोर को ।
जाकी चिबुक-चोट चूरन किय रद-मद कुलिस कठोर को ॥४॥
लोकपाल अनुकूल विलोकिवो चहत विलोचन-कोर को ।
सदा अभय, जय, मुद-मंगलमय जो सेवक रनरोर को ॥५॥
भगत-काम तरु नाम राम परिपूरन चंद चकोर को ।
तुलसी फल चारों करतल जस गावत गई बहोर को ॥६॥
शब्दार्थ—ताकिहै = देखेगा । तमकि = क्रुद्ध होकर । जनरंजन = भक्तोंको प्रसन्न करने-
वाला । अरिगन = शत्रुओं । गंजन = नाश करनेवाला । बरजोर = बलवान । को = कौन ।
विनय-पत्रिका ५७
उथपे = उखड़े हुए। रद = दाँत। विलोचन-कोर = हनुमानजी। रनरोर = युद्धक्षेत्रमें शोर
करनेवाले रणबाँकुरे। गयी-बहोर = गयी हुई वस्तुको फिरसे दिलानेवाले।
भावार्थ—जिसे सब प्रकारसे केशरी-कुमार हनुमानजीका ही भरोसा है,
उसकी ओर क्रुद्ध होकर कौन देखेगा ? ॥१॥ भक्तोंको प्रसन्न करने, शत्रुओंका
संहार करने तथा दुष्टोंका मुँह तोड़ने योग्य बलवान् और कौन है ? इनका
पुरुषार्थ वेदों और पुराणोंमें प्रकट है। सब शूरवीरोंमें शिरोमणि इनके समान
और कौन है ? ॥२॥ इनके सिवा उखड़े हुए (सुग्रीव, विभीषण-सरीखे) लोगोंको
राज्यसिंहासनपर स्थापित करनेवाला, सिंहासनपर स्थित (बालि, रावण आदि)
महा बलवान् राजाओंको राज्यच्युत करनेवाला, प्रणपूर्वक बन्दी देवताओंको
छुड़ानेवाला कौन है ? समुद्र लाँघकर लंकाको जलानेवाला तथा बड़े बलवान्
एवं भयानक राक्षसोंका नाश करनेवाला कौन है ? ॥३॥ जिनके बाल-विनोदका
मन ही मन स्मरण करके अब भी प्रातःकालीन सूर्य डरा करते हैं और जिनकी
ठुड्डीकी चोटने कठोर वज्रके दाँतोंका घमण्ड चूर कर दिया था ऐसा और कौन
है ? ॥४॥ लोकपाल भी उन हनुमानजीकी कृपादृष्टि चाहा करते हैं। रणमें
हल्ला करनेवाले हनुमानजीका जो सेवक है, वह सदा निर्भय रहता तथा आनन्द
मंगलमय विजय-लाभ करता है ॥५॥ पूर्णचन्द्रवत् श्रीरामजीकी मुखच्छविको
चकोरकी भाँति निहारनेवाले हनुमानजीका नाम भक्तोंके लिए कल्पवृक्षके समान
है। हे तुलसीदास ! गयी हुई वस्तुको फिरसे दिला देनेवाले श्रीहनुमानजीका
जो यश गाता है, उसकी हथेलीपर चारों फल (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) धरे
रहते हैं ॥६॥
विशेष
१—'विलोचन कोर'—यह हनुमानजीके लिए कहा गया है। इसका
शाब्दिक अनुवाद कोरदार आँखोंवाले किया जा सकता है। पर इसमें रसका
वह परिपाक कहाँ जो 'विलोचन कोर' में है ? साहित्य-रसज्ञ ही कविके इस
प्रयोगका ठीक-ठीक रसास्वादन कर सकते हैं।
२—'डरत दिवाकर' और 'रद-मद कुलिस' को २५ पदके विशेष विवरणमें
देखिये।
५८ विनय-पत्रिका
राग-बिलावल
( ३२ )
ऐसी तोहि न बूझिये हनुमान हठीले ।
साहेब कहूँ न राम से, तोसे न उसीले ॥१॥
तेरे देखत सिंह के सिसु मेढक लीले ।
जानत हौं कलि तेरेऊ मन गुनगन कीले ॥२॥
हाँक सुनत दसकन्ध के भये बन्धन ढीले ।
सो बल गयो किधौं भये अब गरब गहीले ॥३॥
सेवक को परदा फटे तू समरथ सीले ।
अधिक आपुते आपुनो सुनि मान सहीले ॥४॥
साँसति तुलसीदास की सुनि सुजस तुही ले ।
तिहूँकाल तिनको भलौ जे राम रँगीले ॥५॥
शब्दार्थ—उसीले = बसीला, सेगा; जिसके द्वारा राजाके पास किसीकी पहुँच होती
है, वह उसका वसीला कहलाता है। कीले = कील दिया, बाँध दिया। बंधन = अङ्गोंके जोड़।
सीले = सी दो, टाँके लगा दो। साँसति = कष्ट।
कथा-प्रसंग—जब गोस्वामीजी चिरकालतक अंजनी-ललाका भजन करते रह गये, किन्तु
उनपर श्रीरामजीकी कृपा न हुई, तब उन्होंने खिन्न होकर ऊपरके पदकी रचना की थी।
भावार्थ—हे हठीले हनुमान ! तुझे ऐसा नहीं चाहिये । रामजीके समान
कहीं स्वामी नहीं हैं और तेरे समान वसीला नहीं है ॥१॥ तेरे देखते-देखते
मुझ सिंह-शावकको कलियुगरूपी मेढक निगले जा रहा है। मैं जानता हूँ कि
कलिने तेरे मन और गुणोंको भी कील दिया है ॥२॥ तेरी हुंकार सुनते ही
रावणके बन्धन ढीले पड़ गये थे; कह नहीं सकता कि अब तुझमें वह बल
रहा ही नहीं अथवा तू गर्वीला हो गया ॥३॥ सेवकका पर्दा फटनेपर तू उसे
सी लेनेमें समर्थ है; अर्थात् सेवककी पोल खुलती देखकर तू उसकी रक्षा कर
सकता है; क्योंकि तू अपनेसे अधिक अपने सेवककी सुनता और उसका मान
सहनेवाला है ॥४॥ तुलसीदासका कष्ट सुनकर उसे दूर करनेका यश तू ही ले।
क्योंकि जो रामके रँगीले हैं, उनका तो तीनों कालमें कल्याण ही है अर्थात् अब
मैं रामके रंगमें रँग गया हूँ, इसलिए मेरा भला तो कभी-न-कभी अवश्य ही
होगा—हाँ, यश लेना हो तो तू ले ले ॥५॥
विशेष
सुना जाता है कि एक बार उस समयके बादशाहने गुसाईंजीसे कुछ
करामात दिखानेके लिए कहा। गुसाईंजीने उत्तर दिया कि मैं राम-नामके सिवा
और कोई करामात नहीं जानता। बादशाहने समझा कि यह गुस्ताखी कर रहा
है। अतः उसने इन्हें जेलमें बन्द कर दिया। उसी समय गोस्वामीजीने यह
पद बनाया था। किन्तु हम इससे सहमत नहीं हैं। इस सम्बन्धमें हम अपनी
राय ऊपर कथा-प्रसंगमें व्यक्त कर चुके हैं।
( ३३ )
समरथ सुअन समीर के, रघुवीर-पियारे।
मोपर कीबी तोहि जो करि लेहि मिया रे ॥१॥
तेरी महिमा ते चलैं चिंचिनी-चिंया रे।
अँधियारो मेरी बार क्यों, त्रिभुवन उजियारे ॥२॥
केहि करनी जन जानि कै सनमान किया रे।
केहि अघ औगुन आपने करि डारि दिया रे ॥३॥
खाई खाँची माँगि मैं तेरो नाम लिया रे।
तेरे बल, बलि आजु लौं जग जागि जिया रे ॥४॥
जो तोसों होतौ फिरौ मेरो हेतु हिया रे।
तौ क्यों वदन देखावती कहि वचन इया रे ॥५॥
तोसों ज्ञान-निधान को सरबग्य बिया रे।
हौं समुझत सांई-द्रोह की गति छार छिया रे ॥६॥
तेरे स्वामी राम से, स्वामिनी सिया रे।
तहँ तुलसी के कौन को काको तकिया रे ॥७॥
शब्दार्थ—मिया = मैया। चिंचिनी = इमली। चिंया = बीज। खाँची = बाजारों या
देहातोंमें किसी व्यक्ति-विशेष, साधु-अभ्यागत अथवा मन्दिरके पुजारीके भोजनके लिए
६० विनय-पत्रिका
घरघरसे थोड़ा-थोड़ा अन्नादि देनेका जो प्रबन्ध किया जाता है उसे खोंची कहते हैं, इया =
यार अथवा दोस्त। बिया = दूसरा। छार = राख। छिया = छिः छिः, छीलालेदर, नरक।
भावार्थ—हे सामर्थ्यवान पवनकुमार ! हे रघुनाथजीके प्यारे ! तुम्हें मुझपर
जो कुछ करना हो सो भैया कर लो ॥१॥ तुम्हारी महिमासे इमलीके चिये भी
सिक्केकी जगह चल जाते हैं। फिर मेरे ही लिए हे तीनों लोकके उजागर, तुमने
इतना अन्धेर क्यों कर रखा है ॥२॥ पहले तुमने मेरी किस करनीसे अपना भक्त
जानकर मेरा सम्मान किया था, और अब किस पाप और अवगुणसे मुझे अपने
हाथसे छोड़ दिया ? ॥३॥ मैंने तो तुम्हारा ही नाम लेकर खोंचीका अन्न माँगा
और खाया । तुम्हारी बलैया लेता हूँ, मैं तो तुम्हारे ही बलपर आजतक संसारमें
उजागर होकर जीवित रहा हूँ ॥४॥ यदि तुमसे विमुख होनेका कारण मेरा
हृदय होता, तो फिर मैं यह वचन कहकर तुम्हें अपना मुँह कैसे दिखाता ? ॥५॥
तुम्हारे समान महाज्ञानी और सर्वज्ञ दूसरा कौन है, मैं जानता हूँ कि स्वामीके
'साथ शत्रुता करनेका परिणाम बर्बाद होना है ॥६॥ तुम्हारे स्वामी रामजी और
स्वामिनी जानकीजी सरीखी हैं। वहाँ (उनके दरबारमें) तुलसीदासको तुम्हारे
सिवा किसका और किस बातका सहारा है ॥७॥
विशेष
१—'भिया'—यह बनारसी और मिर्जापुरी बोलीका ठेठ शब्द है।
२—'खोंची'—का अर्थ शब्दार्थमें लिखा गया है। कई टीकाकारोंने इसका
अर्थ 'भीख' लिखा है। पर वास्तवमें यह शब्द उक्त अर्थसे कुछ भिन्न है।
( ३४ )
अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन-दुखारी।
इनको बिलगु न मानिये, बोलहिं न बिचारी ॥१॥
लोक-रीति देखी सुनी, ब्याकुल नर-नारी।
अति बरषे अनबरषे हूँ, देहिं दैवहिं गारी ॥२॥
नाकहिं आये नाथ सों, साँसति भय भारी।
कहि आयो कीबी छमा, निज ओर निहारी ॥३॥
समै साँकरे सुमिरिये, समरथ हितकारी।
सो सब विधि ऊबर करै, अपराध बिसारी ॥४॥
विगरी सेवक की सदा, साहबहिं सुधारी।
तुलसी पर तेरी कृपा, निरुपाधि निनारी ॥५॥
शब्दार्थ - बिलगु = बुरा। नाकहिं = नाकोंदम। निहारी = देखकर। साँकरे = कष्टकर।
ऊबर करै = उबारता या उद्धार करता है। निरुपाधि = उपाधि-रहित, विघ्न-बाधा-रहित।
निनारी = स्पष्ट।
भावार्थ - अत्यन्त आर्त, अत्यन्त स्वार्थी, अति दीन और अति दुखिया,
इनकी बातोंपर बुरा नहीं मानना चाहिए; क्योंकि ये सोच-विचारकर नहीं
बोलते ॥१॥ लोककी यह रीति देखने और सुननेमें आयी है कि व्याकुल स्त्री-पुरुष
अधिक वर्षा होनेपर और बिलकुल ही वर्षा न होनेपर दैवको गालियाँ देते हैं ॥२॥
हे नाथ, विशेष कष्ट और भयसे नाकोंदम आ जानेपर ही मैंने तुम्हें इतनी (खरी-
खोटी) सुनायी है। अब तुम अपनी दयालुताकी ओर देखकर मुझे क्षमाकर
दो ॥३॥ कष्टकर समयमें लोग अपने हितू और सामर्थ्यवान्का स्मरण किया
करते हैं, और वह हितू सब अपराधोंको भूलकर उसकी सब प्रकारसे रक्षा करता
है ॥४॥ सेवककी बिगड़ी हुई बातोंको सदैव स्वामीको ही सुधारना पड़ता है।
फिर तुलसीदासपर तो तुम्हारी कृपा स्पष्ट है, उसमें किसी तरहकी विघ्न-बाधा
नहीं है, यह स्पष्ट है ॥५॥
( ३५ )
कटु कहिये गाढ़े परे, सुनि समुझि सुसाँईं।
करहिं अनभलेउ को भलो, अपनी भलाई ॥१॥
समरथ सुभ जो पाइये, पीर पीर-पराई।
ताहि तकैं सब ज्यों नदी, वारिधि न बुलाई ॥२॥
अपने अपने को भलौ; चहैं लोग-लुगाई।
भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ-असुभ सगाई ॥३॥
बाँह बोलिदै थापिये, जो निज बरिआई।
बिन सेवा सों पालिये, सेवक की नाईं ॥४॥
६२ विनय-पत्रिका
चूक चपलता मेरियै, तू बड़ो बड़ाई ।
होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥५॥
बंदिछोर विरुदावली, निगमागम गाई ।
नीको तुलसी दासको, तोरियै निकाई ॥६॥
शब्दार्थ—सुभ = मंगलरूप । पीर पराई = दूसरोंकी व्यथा । लोग = पुरुष । लुगाई = स्त्री
(राजस्थानका शब्द है) । सगाई = सम्बन्ध । बोलिदै = बल या सहारा देकर । बरिआई =
जबर्दस्ती ।
भावार्थ—अच्छा स्वामी सुन और समझ कर ही क्लेशके समय कठोर वचन
कहा जाता है, और अच्छे स्वामी अपने स्वभावानुसार बुरे सेवकका भी भला
कर देते हैं ॥१॥ यदि समर्थ, मंगलरूप और दूसरोंकी व्यथा दूर करनेमें बहादुर
स्वामी मिल जाते हैं, तो उन्हें सब लोग वैसे ही देखते हैं जैसे नदी बिना बुलाये
ही समुद्रकी ओर दौड़ती है (अर्थात् जैसे नदियाँ समुद्रसे मिलनेकी स्वाभाविक
ही इच्छा करती हैं, वैसे ही सबलोग अच्छे स्वामीका सेवक होनेके इच्छुक होते
हैं) ॥२॥ जितने स्त्री-पुरुष हैं, सब अपनी-अपनी भलाई चाहते हैं । जिसे जो
अच्छा लगता है, शुभ और अशुभके सम्बन्धसे वह उसीको भजता है । तात्पर्य
यह कि जो जैसी शुभ-अशुभ कामना करता है, वैसे ही देवताकी वह पूजा करता
है ॥३॥ जब तुमने जबर्दस्ती अपनी भुजाओंका सहारा देकर मुझे रख लिया है,
तो सेवा न करनेपर भी तुम्हें सेवकहीकी तरह उसका पालन करना चाहिये ॥४॥
भूल-चूक और चंचलता सब मेरी ही है, —तुम तो बड़े और बड़ाईके योग्य हो ।
आदर करनेसे नीच लोग नीचता करनेमें ढीठ हो जाते हैं ॥४॥ हे बन्दियोंको
छुड़ानेवाले हनुमान्जी ! वेद और शास्त्रने तुम्हारी गुण-गाथा गायी है । तुलसी
दासको केवल तुम्हारी ही अच्छाई भली है । यानी तुम दयालु हो, अतः तुलसी
दासका कल्याण हो जायगा ।
राग गौरी
( ३६ )
मंगल-मूरति मारुत-नंदन । सकल-अमंगल-मूल-निकंदन ॥१॥
पवनतनय संतन हित-कारी । हृदय विराजत अवध-विहारी ॥२॥
विनय-पत्रिका ६३
मातु-पिता, गुरु, गनपति, सारद । सिवा-समेत संभु, सुक, नारद ॥३॥
चरन बंदि बिनवौं सब काहू । देहु रामपद-नेह-निबाहू ॥४॥
बंदौं राम-लखन-वैदेही । जे तुलसी के परम सनेही ॥५॥
शब्दार्थ—निकंदन = उखाड़नेवाला। सिवा = पार्वती। सुक = शुकदेवजी। निबाहू =
निर्वाह।
भावार्थ—हे पवनकुमार ! तुम मंगलमूर्त्ति हो और सब संकटोंको जड़से
उखाड़ देनेवाले हो ॥१॥ हे हनुमानजी ! तुम साधु पुरुषोंका हित करनेवाले हो ।
तुम्हारे हृदयमें रामचन्द्रजी सदा निवास करते हैं ॥२॥ माता, पिता, गुरु, गणेश,
सरस्वती, पार्वतीके सहित शिव, शुकदेव तथा नारदके ॥३॥ चरणोंकी वन्दना
करके सब लोगोंसे मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि रामजीके चरणोंमें मेरा जो प्रेम
है, उसका निर्वाह हो जाय ॥४॥ मैं राम, लक्ष्मण और जानकीजीकी वन्दना
करता हूँ, क्योंकि ये तुलसीदासके परम स्नेही हैं ॥५॥
विशेष
१—गुसाईंजीने इस पदमें हनुमानजी, माता-पिता, गुरु, गणेश, शारदा,
शिवपार्वती, शुकदेव, नारदादिके चरणोंकी वन्दना करके रामपद-प्रेम माँगा है ।
अन्तमें उन्होंने राम-लक्ष्मण-सीताकी भी वन्दना कर सूचित किया है कि अब
आगेके पदोंमें केवल लक्ष्मण, जानकी और रामकी बन्दना की जायगी ।
लक्ष्मण-स्तुति
दण्डक
( ३७ )
लाल लाड़िले लखन, हित हौ जनके ।
सुमिरे संकटहारी, सकल सुमंगलकारी,
पालक कृपालु अपने पनके ॥१॥