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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 70, कुल 475 में से

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पृष्ठ 70

मैं रामके रंगमें रँग गया हूँ, इसलिए मेरा भला तो कभी-न-कभी अवश्य ही
होगा—हाँ, यश लेना हो तो तू ले ले ॥५॥
विशेष
सुना जाता है कि एक बार उस समयके बादशाहने गुसाईंजीसे कुछ
करामात दिखानेके लिए कहा। गुसाईंजीने उत्तर दिया कि मैं राम-नामके सिवा
और कोई करामात नहीं जानता। बादशाहने समझा कि यह गुस्ताखी कर रहा
है। अतः उसने इन्हें जेलमें बन्द कर दिया। उसी समय गोस्वामीजीने यह
पद बनाया था। किन्तु हम इससे सहमत नहीं हैं। इस सम्बन्धमें हम अपनी
राय ऊपर कथा-प्रसंगमें व्यक्त कर चुके हैं।
( ३३ )
समरथ सुअन समीर के, रघुवीर-पियारे।
मोपर कीबी तोहि जो करि लेहि मिया रे ॥१॥
तेरी महिमा ते चलैं चिंचिनी-चिंया रे।
अँधियारो मेरी बार क्यों, त्रिभुवन उजियारे ॥२॥
केहि करनी जन जानि कै सनमान किया रे।
केहि अघ औगुन आपने करि डारि दिया रे ॥३॥
खाई खाँची माँगि मैं तेरो नाम लिया रे।
तेरे बल, बलि आजु लौं जग जागि जिया रे ॥४॥
जो तोसों होतौ फिरौ मेरो हेतु हिया रे।
तौ क्यों वदन देखावती कहि वचन इया रे ॥५॥
तोसों ज्ञान-निधान को सरबग्य बिया रे।
हौं समुझत सांई-द्रोह की गति छार छिया रे ॥६॥
तेरे स्वामी राम से, स्वामिनी सिया रे।
तहँ तुलसी के कौन को काको तकिया रे ॥७॥
शब्दार्थ—मिया = मैया। चिंचिनी = इमली। चिंया = बीज। खाँची = बाजारों या
देहातोंमें किसी व्यक्ति-विशेष, साधु-अभ्यागत अथवा मन्दिरके पुजारीके भोजनके लिए