विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुआ कि सूर्यकी उत्तप्त किरणोंसे उसके पर जल गये और वह माल्यवान पर्वत-
पर आ गिरा। उसी समय सुग्रीवकी आज्ञासे बानर और रीछ महारानी सीता-
जीकी खोजमें निकले थे। सम्पातिने जानकीजीका पता बतलाया। हनुमानजी-
की कृपासे उसे नये पंख, नवीन नेत्र प्राप्त हो गये और साथ ही उसका शरीर
भी दिव्य हो गया।
( २९ )
जयति निर्भरानंद-संदोह कपिकेसरी,
केसरी-सुवन भुवनैकभर्त्ता।
दिव्य भूम्यंजना-मंजुलाकर-मने,
भक्त-संताप-चिंतापहर्त्ता ॥१॥
जयति धर्मार्थ-कामापवर्गद विभो,
ब्रह्मलोकादि-वैभव-विरागी।
वचन-मानस-कर्म सत्य-धर्मव्रती,
जानकीनाथ-चरनानुरागी ॥२॥
जयति बिहगेस-बलबुद्धि-वेगाति-
मद-मथन, मनमथ-मथन, ऊर्ध्वरेता।
महानाटक-निपुन, कोटि-कविकुल-
तिलक, गान गुन-गर्व-गंधर्वजेता ॥३॥
जयति मंदोदरी-केस-कर्षण,
विद्यमान दसकंठ भट-मुकुट मानी।
भूमिजा दुःख-संजात-रोषांतकृत
जातना जंतु कृत जातुधानी ॥४॥
जयति रामायन-श्रवन-संजात-रोमांच,
लोचन सजल, सिथिल बानी।
रामपदपद्म-मकरंद-मधुकर, पाहि,
दास तुलसी सरन, सूल पानी ॥५॥