विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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असम्भव । सुघट = सम्भव । विघटन = बिगाड़ देनेवाले । विरुदावलि = गुणावली । आनकी =
दूसरेकी । चितवन = विलोकनि ।
भावार्थ—जिसे केवल हनुमानजीका ही सहारा है, जिसकी प्रतिज्ञा सदासे
पूरी होती आयी है; यह सिद्धान्त वज्र या पत्थरके ऊपरकी लकीरके समान
अमिट है ॥१॥ हनुमानजी अघटित या असम्भव घटनाको सम्भव और सम्भवको
असम्भव करनेवाले हैं; ऐसी गुणावली दूसरे किसीकी नहीं है। आनन्द-निधान
श्रीहनुमानजीकी मूर्तिका स्मरण करते ही तमाम संकट और शोक नष्ट हो जाते
हैं ॥२॥ हे तुलसीदास ! हनुमान्जीकी कृपापूर्ण चितवन सब प्रकारके कल्याणोंकी
खानि है; क्योंकि (जिसपर इनकी कृपा-दृष्टि रहती है) उसपर पार्वती, शिव,
लक्ष्मण, राम और जानकीकी कृपा रहती है ॥३॥
राग गौरी
( ३१ )
ताकिहै तमकि ताकी ओर को ।
जाको है सब भाँति भरोसो कपि केसरी-किसोर को ॥१॥
जन-रंजन अरिगन-गंजन मुख-भंजन खल बरजोर को ।
वेद-पुरान-प्रगट पुरुषारथ सकल-सुभट-सिरमोर को ॥२॥
उथपे-थपन, थपे उथपन पन, बिबुध वृन्द बंदिछोर को ।
जलधि लाँघि दहि लंक प्रबल बल दलन निसाचर घोर को ॥३॥
जाको बाल-विनोद समुझि जिय डरत दिवाकर भोर को ।
जाकी चिबुक-चोट चूरन किय रद-मद कुलिस कठोर को ॥४॥
लोकपाल अनुकूल विलोकिवो चहत विलोचन-कोर को ।
सदा अभय, जय, मुद-मंगलमय जो सेवक रनरोर को ॥५॥
भगत-काम तरु नाम राम परिपूरन चंद चकोर को ।
तुलसी फल चारों करतल जस गावत गई बहोर को ॥६॥
शब्दार्थ—ताकिहै = देखेगा । तमकि = क्रुद्ध होकर । जनरंजन = भक्तोंको प्रसन्न करने-
वाला । अरिगन = शत्रुओं । गंजन = नाश करनेवाला । बरजोर = बलवान । को = कौन ।