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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 60

विनय-पत्रिका ४९
रामकी पुरी अयोध्यामें विहार करनेवाले हनुमानजी ! तुम रामचन्द्रकी शोभाके
सहित (समाज-सहित) इस तुलसीदासके अन्तःकरणमें सदा विराजमान रहो ।
विशेष
१—'रुद्र'—एकादश रुद्रके नाम ये हैं:—अज, एकपात्, अहिब्रध्न, पिनाकी,
अपराजित, त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हरण, ईश्वर ।
२—'रामभक्तानुवर्त्ती—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हनुमान-
जी राम-भक्तोंकी अधीनतामें रहनेवाले हैं; अर्थात् वह अपनेको रामभक्तोंके
हाथमें बिका हुआ समझते हैं।
( २८ )
जयति वात-संजात, विख्यात विक्रम, बृहद्-
बाहु, बलविपुल, वालधि बिसाला ।
जातरूपाचलाकार विग्रह, लसल्लोम
विद्युल्लता ज्वालमाला ॥१॥
जयति बालार्क वर-वदन, पिंगल-नयन,
कपिस-कर्कस-जटाजूटधारी ।
विकट भृकुटी, बज्र दसन नख, बैरि-मद-
मत्त-कुंजर-पुंज-कुंजरारी ॥२॥
जयति भीमार्जुन-ग्याल सूदन-गर्व-
हर, धनंजय-रथ-त्राण-केतू ।
भीष्म द्रोण-कर्णादि-पालित, काल-
हक सुयोधन-चमू-निधन-हेतू ॥३॥
जयति गतराजदातार, हन्तार
संसार-संकट, दनुज-दर्पहारी ।
ईति अति भीति-ग्रह-प्रेत-चौरानल-
व्याधि-बाधा-शमन-घोरमारी ॥४॥
४