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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

विनय-पत्रिका २८५
हरिहु और अवतार आपने, राखी वेद-बड़ाई ।
लै चिउरा निधि दई सुदामहिं, जद्यपि बाल-मिताई ॥३॥
कपि सबरी सुग्रीव बिभीषन, को नहिं कियो अजाची ।
अब तुलसिहि दुख देति दयानिधि दारुन आस-पिसाची ॥४॥
शब्दार्थ—सकृत = एक बार । चिउरा = चिवड़ा, कूटा हुआ धान । निधि = सम्पत्ति ।
भावार्थ—यह सही है कि दानियोंमें शिरोमणि एक ही है। जिस किसीने
उससे याचना की, उसे ही याचनाके कारण फिर बहुत नाच नाचना न पड़ा,
पूर्णकाम हो गया ॥१॥ दैत्य, देवता, मनुष्य, मुनि सब स्वार्थी हैं, बिना कुछ पाये
कोई कुछ नहीं देता । केवल कोशलपाल श्रीरामजी ही ऐसे कृपालु कल्पवृक्ष हैं जो
एक बार मस्तक नवाते (प्रणाम करते) ही पिघल जाते हैं ॥२॥ यद्यपि हे नाथ,
आपने भी अपने और अवतारोंमें वेदोंकी बड़ाईकी रक्षा की है; (कृष्णावतारमें)
बचपनकी मित्रता रहनेपर भी चिवड़ा लेकर सुदामाको सम्पत्ति दी है (मुफ्त
नहीं) ॥३॥ किन्तु (रामावतारमें आपने) बन्दर, शबरी, सुग्रीव, विभीषण आदि-
मेंसे किसे नहीं अयाच्य कर दिया, अर्थात् बिना कुछ लिये किसका मनोरथ पूरा
नहीं किया ? हे दयानिधि ! अब भयंकर आशारूपी पिशाचिनी तुलसीदासको
दुःख दे रही है ॥४॥
विशेष
१—'लै चिउरा···मिताई'—इसमें बड़ा ही मीठा व्यंग्य है । कुछ
लोगोंकी यह धारणा है कि गुसाईंजीने यहाँ पक्षपात किया है; इसीसे रामावतार
को कृष्णावतारसे अधिक उदार दिखाया है। किन्तु वास्तवमें यहाँ बात ही कुछ
और है। क्योंकि यहाँ रामको अधिक उदार ठहरानेपर "ऐसी कौन प्रभुकी
रीति" (पद संख्या २१४) में कृष्णको ही अधिक उदार मानना पड़ेगा ।
यहाँपर कविने कृष्णके बहाने रामको कहा है कि 'हरिहु और अवतार आपने
राखी वेद बड़ाई।' राम और कृष्णमें कविकी अभेद दृष्टि है (विनयपत्रिकाका
२१४ वाँ पद देखिये) । ग्रन्थकारकी इस उक्तिपर भगवान् अवश्य ही हँस पड़े
होंगे। उन्हें यह सोचकर हँसी आयी होगी कि यहाँपर कवि 'सिर काटे और
बालकी रक्षा करे' वाली कहावत को बड़े मजेदार ढंगसे चरितार्थ कर रहा है।

२८६ विनय-पत्रिका
इसमें कविका यह आशय है कि हे प्रभो, एक तो मेरे पास कुछ देनेके लिए है
ही नहीं, दूसरे यदि मैं सुदामाके चावलकी तरह माँग-जाँच कर कोई छोटी-मोटी
वस्तु आपको दूँ भी तो सुदामाके अतिरिक्त आपके लेनेका एक और उदाहरण
हो जायगा। किन्तु गोस्वामीजी महाराज ! आप भूल कर रहे हैं। दशरथके
लाड़ले भी यों ही कुछ देनेवाले नहीं हैं। सुग्रीव और विभीषणको ही उन्होंने
कौन-सा बिना कुछ लिये ही अयाच्य कर दिया था ? और कुछ नहीं तो सेवा ही
ली थी। वह हर अवतारमें भक्तोंके समक्ष पेट धोये बैठे रहते हैं।
२—'कपि'—अन्यान्य टीकाकारोंने इस शब्दका अर्थ ही छोड़ दिया है।
यह सुग्रीवके अतिरिक्त अन्यान्य बन्दरोंके लिए आया है। यहाँपर यह प्रश्न
किया जा सकता है कि कपिमें तो सुग्रीव भी आ गये, फिर अलगसे सुग्रीवका
नाम लिखनेकी क्या आवश्यकता थी ? उत्तरमें इतना ही कहना पर्याप्त होगा
कि सुग्रीव राजा था, इसलिए उसके नामका अलगसे उल्लेख करना सर्वथा
उचित है। इसी प्रकार रामायणमें सुग्रीवने भी रामसे कहा है—'हरि लीन्हेसि
सरबस अरु नारी'। अर्थात् वालिने मेरा सर्वस्व तो हरण कर ही लिया, स्त्री
भी छीन ली। तात्पर्य यह कि स्त्रीका छीन लेना घोर अन्याय है। वियोगी
हरिजीने भी 'कपि' शब्दका अर्थ लिखना जरूरी नहीं समझा।
३—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये।
[ १६४ ]
जानत प्रीति-रीति रघुराई।
नाते सब हाते करि राखत, राम सनेह-सगाई ॥१॥
नेह निबाहि देह तजि दशरथ, कीरति अचल चलाई।
ऐसेहु पितु तें अधिक गीधपर ममता गुन गरुआई ॥२॥
तिय-बिरही सुग्रीव सखा लखि प्रान-प्रिया बिसराई।
रन पर्यो बंधु विभीषण ही को, सोच हृदय अधिकाई ॥३॥
घर गुरु गृह प्रिय-सदन सासुरे भइ जब जहाँ पहुँनाई।
तब तहँ कहि सबरी के फलनिकी रुचि माधुरी न पाई ॥४॥

विनय-पत्रिका २८७
सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई ।
केवट-मीत कहे सुख मानत वानर-बंधु बड़ाई ॥५॥
प्रेम-कनौड़ो राम सो प्रभु त्रिभुवन तिहुँकाल न भाई ।
तेरो रिनी हौं कह्यो कपि सों ऐसी मानिहि को सेवकाई॥६॥
तुलसी राम सनेह-सील लखि, जो न भगति उर आई ।
तौ तोहिं जनमि जाय जननी जड़ तनु-तरुनता गँवाई ॥७॥
शब्दार्थ—हाते = पृथक् । फलनिकी = फलोंकी, बेरोंकी । कनौड़ो = कृतज्ञ । जाय = व्यर्थ ।
भावार्थ—प्रीतिकी रीति श्रीरामजी जानते हैं। श्रीरामजी सब नातों-रिश्तोंको
दूर रखकर स्त्री स्नेह-सम्बन्ध रखते हैं ॥१॥ महाराज दशरथने स्नेहका निर्वाह
करनेमें अपना शरीर त्यागकर कीर्त्ति स्थापित की; किन्तु रामजीके गुणोंकी
गरिमा यह है कि उन्होंने ऐसे (स्नेही) पितासे भी अधिक ममता गीध (जटायु)
पर दिखायी ॥२॥ सुग्रीव सखाको स्त्रीके विरहमें देखकर (रामजीने) अपनी
अर्द्धाङ्गिनी महारानी जानकीजीको भुला दिया। रणभूमिमें तो भाई लक्ष्मण
(मूर्च्छित) पड़े थे, पर आपके हृदयमें विभीषणका ही सोच अधिक था ॥३॥
घरमें, गुरुके यहाँ, प्रियजनोंके यहाँ, ससुरालमें तथा और जब-जब जहाँ कहीं
मेहमानी हुई तब-तब वहाँ शबरीके बेरोंकी चर्चा करते हुए कहा कि वैसा स्वाद
और माधुर्य कहीं नहीं मिला ॥४॥ जब मुनि लोग आपके सहज स्वरूप (ईश्वरीय
स्वरूप) का वर्णन करते हैं, तब तो आप संकोचके मारे सिर झुका लेते हैं; किन्तु
केवटके मित्र कहनेपर आप आनन्दित हो जाते हैं और बानरोंके बन्धु कहे जाने-
में आप अपनी बड़ाई समझते हैं। अर्थात् जब मुनि लोग आपको सच्चिदानन्द
स्वरूप कहते हैं, तब तो आप सकुच जाते हैं पर जब वे यह कहते हैं कि आप
केवट (निषाद) के सखा हैं और वानरोंके बन्धु हैं, तब आप आनन्दित हो जाते
हैं—इसमें अपनी बड़ाई समझते हैं॥५॥ हे भाई ! तीनों लोक और तीनों कालमें
रामजीके समान प्रेम-परवश होनेवाला स्वामी दूसरा कोई नहीं है। (रामने)
हनूमान्‌जीसे कहा कि 'मैं तेरा ऋणी हूँ; भला ऐसी सेवकाई कौन मानेगा ?'
अर्थात् सेवककी सेवाओंपर इस प्रकार कृतज्ञता कौन प्रकट करेगा ? ॥६॥ हे
तुलसी ! रामजीका स्नेह और शील देखकर भी यदि तेरे हृदयमें उनके प्रति

२८८ विनय-पत्रिका
भक्ति पैदा न हुई, तो तेरी माताने तुझ जड़को व्यर्थ ही पैदा करके अपनी
युवावस्था खोयी ॥७॥
विशेष
१—'घर गुरु......'सासुरे'—इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है:—
"गुरुके घर, प्रियजनोंके यहाँ तथा ससुरालमें"।
२—'केवट मीत' 'बड़ाई' इसका अर्थ करनेमें वियोगी हरिजी गहरा गोता
खा गये हैं। आप लिखते हैं, "किन्तु जब केवट आपको अपना मित्र एवं बन्दर
अपना 'भाई' कहते हैं, तो अपनी बड़ाई समझते हैं।"
[ १६५ ]
रघुबर रावरि यहै बड़ाई ।
निदरि गनी आदर गरीब पर, करत कृपा अधिकाई ॥१॥
थके देव साधन करि सब, सपनेहु नहिं देत दिखाई ।
केवट कुटिल भालु कपि कौनप, कियो सकल सँग भाई ॥२॥
मिलि मुनिवृंद फिरत दंडक बन, सो चरचौ न चलाई ।
वारहि वार गीध सबरी की, वरनत प्रीति सुहाई ॥३॥
स्वान कहे तें कियो पुर बाहिर, जती गयंद चढ़ाई ।
तिय-निन्दक मतिमंद प्रजा रज, निज नय नगर वसाई ॥४॥
यहि दरबार दीन को आदर, रीति सदा चलि आई ।
दीनदयालु दीन तुलसी की, काहु न सुरति कराई ॥५॥
शब्दार्थ—निदरि = निरादर करके । गनी = धनी । कौनप = राक्षस (विभीषण) ।
नय = नीति ।
भावार्थ—हे रघुकुलमें श्रेष्ठ रामजी ! आपकी यही बड़ाई है कि आप धनी
पात्रोंका निरादर और गरीबोंका आदर करके उनपर अधिक कृपा करते हैं ॥१॥
देवता सब साधन करके थक गये, पर उन्हें आपने स्वप्नमें भी दर्शन नहीं दिया ।
किन्तु केवट, कुटिल भालु, बन्दर और राक्षस (विभीषण) आदिका साथ
किया और वे आपको बहुत भाये ॥२॥ मुनियोंके साथ मिलकर दंडक वनमें

विनय-पत्रिका २८९
घूमे, पर उसकी आपने कभी चर्चातक न चलायी; पर बारम्बार गीध और
शबरीके प्रेमका वर्णन करना आपको प्रिय है ॥३॥ कुत्तेके कहनेसे तो यतिको
(तीर्थसिद्ध नामक ब्राह्मणको) हाथीपर चढ़ाकर नगरके बाहर निकाल दिया,
किन्तु स्त्री-(जानकीजी) की निन्दा करनेवाले मन्दबुद्धि धोबीको अपनी प्रजा
समझकर नीतिसे नगरमें बसाया ॥४॥ इस (आपके) दरबारमें दीनोंका
आदर करनेकी रीति सदासे चली आ रही है। किन्तु हे दीनदयालु ! आपको इस
दीन तुलसीकी सुध किसीने नहीं करायी ॥५॥
विशेष
१—‘केवट’—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।
२—‘कौनप’—वियोगी हरिने इसका अर्थ लिखा है ‘राजा’ ।
३—‘कियो सकल सँग भाई’—इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि
“भाईके समान सबका साथ किया।” वियोगी हरिने ‘भाई’ का
अर्थ “भाई-चारा निवाहा” लिखा है।
४—‘गीध’—२१५ पदके विशेषमें देखिये ।
५—‘सबरी’—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।
६—‘स्वान’—१४६ पदके ‘विशेष’ विवरणमें देखिये । तीर्थसिद्ध नामक
ब्राह्मण हाथीपर चढ़ाकर बड़े समारोहके साथ कालिंजरका महन्त बनाया
गया था ।
[१६६]
ऐसे राम दीन-हितकारी ।
अति कोमल करुनानिधान बिनु कारन पर-उपकारी ॥१॥
साधन-हीन, दीन, निज अघ-बस, सिला भई मुनि-नारी ।
गृह तैं गवनि परसि पद पावन घोर साप तें तारी ॥२॥
हिंसारत निषाद तामस वपु, पसु-समान बनचारी ।
भेंट्यो हृदय लगाइ प्रेमबस, नहिं कछु जात विचारी ॥३॥
जद्यपि द्रोह कियो सुरपति-सुत, कहि न जाय अति भारी ।
सकल लोक अवलोकि सोकहत, सरन गये भय टारी ॥४॥
१९

२१० विनय-पत्रिका
बिहँग जोनि आमिष अहार पर, गीध कौन व्रतधारी।
जनक-समान कृपा ताकी निज कर सब भाँति सँवारी ॥५॥
अधम जाति सबरी जोषित जड़, लोक-बेद तें न्यारी।
जानि प्रीति, दै दरस कृपानिधि, सोउ रघुनाथ उधारी ॥६॥
कपि सुग्रीव बंधु-भय-व्याकुल, आयो सरन पुकारी।
सहि न सके दारुन दुख जनके, हत्यो बालि, सहि गारी ॥७॥
रिपु को अनुज बिभीषन निसिचर, कौन भजन अधिकारी।
सरन गये आगे ह्वै लीन्हों भेंट्यो भुजा पसारी ॥८॥
असुभ होइ जिन्हके सुमिरे ते बानर रीछ बिकारी।
बेद-बिदित पावन किये ते सब, महिमा नाथ ! तुम्हारी ॥९॥
कहँ लगि कहौं दीन अगनित जिन्हकी तुम बिपति निवारी।
कलिमल-ग्रसित दास तुलसी पर, काहे कृपा बिसारी ॥१०॥
शब्दार्थ—वपु = शरीर। आमिष = मांस। जोषित = स्त्री। निवारी = दूर किया।
भावार्थ—रामजी दीनोंका ऐसा (जैसा कि पिछले पदमें कहा गया है और
आगे कहा जायगा) हित करनेवाले हैं। वह बड़े ही कोमल, करुणा-निधान
और बिना कारण ही परोपकार करनेवाले हैं ॥१॥ साधनोंसे रहित, दीन और
अपने पापके कारण गौतम-पत्नी अहल्या शिला हो गयी थी। उसे आपने घरसे
प्रस्थान करके अपने पवित्र चरणोंसे छूकर घोर पापसे मुक्त कर दिया ॥२॥
हिंसा करनेमें रत और तामसी शरीरवाला निषाद पशुओंके समान वनमें घूमा
करता था। उसे आपने प्रेमके वशमें होकर हृदयसे लगाकर भेंटा—जरा भी
जाति-पाँतिका विचार नहीं किया ॥३॥ यद्यपि इन्द्रके पुत्र जयन्तने आपसे इतना
बड़ा द्रोह किया था कि कहा नहीं जा सकता, तथापि जब वह सब लोकोंमें देख
आनेके (कहीं शरण न मिलनेके) बाद शोक-हत होकर आपकी शरणमें गया,
तो आपने उसका भय दूर कर दिया ॥४॥ पक्षी योनि और मांसहारी गीध ही
कौन-सा व्रतधारी था ? किन्तु उसका अन्त्येष्टि-संस्कार आपने पिताके समान
अपने हाथसे किया और उसका हर तरहसे सब काम बना दिया ॥५॥ नीच
जातिकी स्त्री शबरी मूर्खा और लोक-वेदसे पृथक् थी। किन्तु हे कृपानिधान

विनय-पत्रिका २९१
रघुनाथजी ! आपने उसका प्रेम समझकर दर्शन दिया और उद्धार कर दिया
॥६॥ बानर सुग्रीव अपने भाई वालिके भयसे व्याकुल होकर पुकारता हुआ
शरणमें आया । आप भक्त सुग्रीवका दारुण दुःख न सह सके और गालियाँ
सहकर वालिको मारा ॥७॥ शत्रु (रावण) का भाई विभीषण राक्षस था; भला
वह भगवद्भजनका कौन-सा अधिकारी था ? किन्तु ज्यों ही वह शरणमें गया,
आपने अगवानी करते हुए भुजा पसारकर उसे भेटा ॥८॥ बानर और रीछ ऐसे
विकारी हैं कि उनका स्मरण करनेसे (देखनेको कौन कहे) अशुभ होता है ।
किन्तु वेदोंमें विदित है कि आपने उन सबको भी पवित्र कर दिया—हे नाथ !
यह तुम्हारी ही महिमा है ॥९॥ कहाँतक कहूँ, जिन दीनोंकी आपने विपत्तियाँ
दूर की हैं वे असंख्य हैं । फिर कलिकालके पापोंसे ग्रसित इस तुलसीदासपर कृपा
करना आप क्यों भूल गये नाथ
१६७ ]
रघुपति-भगति करत कठिनाई ।
कहत सुगम करनी अपार जानै सोइ, जेहि बनि आई ॥१॥
जो जेहि कला कुसल ताकहँ, सोइ सुलभ सदा सुखकारी ।
सफरी सनमुख जल-प्रबाह सुरसरी बहै गज भारी ॥२॥
ज्यों सर्करा मिलै सिकता महँ, बलतें न कोउ बिलगावै ।
अति रसग्य सूच्छम पिपीलिका, बिनु प्रयास ही पावै ॥३॥
सकल दृस्य निज उदर मेलि, सोवै निद्रा तजि जोगी ।
सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैत-वियोगी ॥४॥
सोक मोह भय हरष दिवस-निसि देस-काल तहँ नाहीं ।
तुलसिदास यहि दसाहीन संसय निरमूल न जाहीं ॥५॥
शब्दार्थ—सफरी = मछली । सर्करा = चीनी । सिकता = बालू । पिपीलिका = चींटी ।
द्वैत-वियोगी = जिसे द्वैत भावसे वियोग हो गया हो ।
भावार्थ—रामभक्ति करनेमें बड़ी कठिनाई है। कहनेमें तो सुगम है, पर
करना अपार है। वही जानता है, जिससे करते बन गया ॥१॥ जो जिस कलामें
कुशल रहता है, उसके लिए वही सुलभ और सदा सुखकर है। देखिये न,

२९२ विनय-पत्रिका
मछली गंगाजीमें जल-प्रवाहके सामने जाती है, पर इतना बड़ा हाथी उसमें बह
जाता है ॥२॥ जैसे बालूमें चीनीके मिल जानेपर उसे बलपूर्वक कोई अलग नहीं
कर सकता; किन्तु उसका रस जाननेवाली छोटी चींटी उसे बिना प्रयास ही पा
जाती है ॥३॥ उसी प्रकार जो योगी सब दृश्योंको अपने पेटमें रखकर निद्राको
त्यागकर सोता है, वही द्वैतका घोर विरोधी हरिचरणोंमें परम सुखका अनुभव
करता है ॥४॥ न तो वहाँ देश-काल है और न शोक, मोह, भय, हर्ष और
दिन-रात ही है। तुलसीदास कहते हैं कि यह दशा प्राप्त हुए बिना संशयोंका
मूलोच्छेद नहीं होता ॥५॥
[ १६८ ]
जो पै राम-चरन-रति होती।
तौ कत त्रिबिध सूल निसिबासर सहते विपति निसौती ॥१॥
जो संतोष सुधा निसिवासर सपनेहुँ कबहुँक पावै।
तौ कत विषय बिलोकि झूठ जल मन-कुरंग ज्यों धावै ॥२॥
जो श्रीपति-महिमा विचारि उर भजते भाव बढ़ाए।
तौ कत द्वार-द्वार कूकर ज्यों फिरते पेट खलाए ॥३॥
जे लोलुप भये दास आस के ते सबही के चेरे।
प्रभु-विस्वास आस जीती जिन्ह, ते सेवक हरि केरे ॥४॥
नहिं एकौ आचरन भजन को, विनय करत हौं ताते।
कीजै कृपा दास तुलसी पर, नाथ नाम के नाते ॥५॥
शब्दार्थ-निसौती = शुद्ध, खालिस। कुरंग = हरिण। खलाये = पचकाकर, खलाकर ।
चेरे = दास ।
भावार्थ-यदि रामजीके चरणोंमें प्रेम होता, तो रात-दिन तीनों (दैहिक,
दैविक, भौतिक) दुःख शुद्ध विपत्ति क्यों सहते ? ॥१॥ यदि रातमें, दिनमें
अथवा स्वप्नमें भी सन्तोषामृत मिल जाय, तो यह मन-कुरंग मृग-जलरूपी
विषयोंको देखकर क्यों दौड़े ? ॥२॥ यदि हम लक्ष्मीनारायणकी महिमाको
हृदयमें विचारकर भाव बढ़ाकर उन्हें भजते, तो कुत्तेके समान पेट पचकाये
द्वार-द्वार क्यों फिरना पड़ता ? ॥३॥ जो लोग लोलुप हैं, आशाके दास हैं,

विनय-पत्रिका २९३
वे सबके गुलाम हैं। किन्तु जिन्होंने प्रभुपर विश्वास करके आशाको जीत
लिया है, वे केवल भगवान्‌के सेवक हैं—ईश्वर-भक्त हैं ॥४॥ मुझमें भजन-
भावका एक भी आचरण नहीं है, इसीसे विनती करता हूँ कि हे नाथ ! आप
अपने नामके नाते इस तुलसीदासपर कृपा कीजिये ॥५॥
[ १६९ ]
जो मोहिं राम लागते मीठे ।
तौ नवरस षटरस-रस अनरस् ह्वै जाते सब सीठे ॥१॥
बंचक विषय विविध तनु धरि अनुभवे सुने अरु डीठे ।
यह जानत हौं हृदय आपने सपने न अघाइ उबीठे ॥२॥
तुलसिदास प्रभु सों एकहि बल वचन कहत अति ढीठे।
नामकी लाज राम करुनाकर केहि न दिये कर चीठे ॥३॥
शब्दार्थ—सीठे = सीठीकी तरह, निस्तत्त्व, रस-रहित । डीठे = देखे । उबीठ = उबिठ
गया, जो भर गया, ऊब गया । ढीठे = ढिठाई ।
भावार्थ—यदि मुझे रामजी अच्छे लगते, तो नवरस और षड्रसके रस
नीरस और निस्तत्त्व जँचते ॥१॥ मैंने नाना प्रकारके शरीर धारणकर यह अनु-
भव किया है, (लोगोंसे) सुना है, और (अपनी आँखोंसे) देखा है कि (पाँचों)
विषय (भारी) ठग हैं। यद्यपि इसे मैं अपने दिलमें समझता हूँ (कि ये ठग हैं)
तथापि उनसे अघाकर (तृप्त होकर) स्वप्नमें भी मेरा जी नहीं ऊबा ॥२॥
तुलसीदास अपने स्वामीसे एक ही बलपर बड़ी ढिठाईसे बातें कह रहा है; (वह
यह कि) करुणाकी खानि श्रीरामजीने अपने नामकी लाज रखनेके लिए किसके
हाथमें चिट्ठी या परवाना नहीं दिया ? अर्थात् किसे मुक्त कर देनेका वचन नहीं
दिया ? कहनेका आशय यह है कि आपका जो ऐसा स्वभाव है, उसीका मुझे
पूर्ण भरोसा है ॥३॥
विशेष
१—'नवरस'—शृंगार, हास्य, करुण, वीर, रौद्र, भयानक, बीभत्स,
अद्भुत और शान्त ये नव-रस साहित्यमें माने गये हैं ।

२९४ विनय-पत्रिका
२—'षट्रस'—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय ये छ रस
खाने-पीनेकी वस्तुओंमें होते हैं।
३—'विषय'—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियों-
के विषय हैं।
[ १५० ]
यौं मन कबहुँ तुमहिं न लाग्यो।
ज्यौं छल छाँड़ि सुभाव निरन्तर रहत विषय अनुराग्यो ॥१॥
ज्यौं चितई परनारि, सुने पातक-प्रपंच घर-घर के।
त्यौं न साधु, सुरसरि-तरंग-निरमल गुनगन रघुवर के ॥२॥
ज्यौं नासा सुगन्धरस-बस, रसना षटरस-रति मानी।
राम-प्रसाद-माल जूठन लगि त्यौं न ललकि ललचानी ॥३॥
चन्दन चन्द्रबदनि-भूषन-पट ज्यौं चह पाँवर परस्यो।
त्यौं रघुपति-पद-पदुम-परस को तनु पातकी न तरस्यो ॥४॥
ज्यौं सब भाँति कुदेव कुठाकुर सेये वपु वचन हिये हूँ।
त्यौं न राम सुकृतग्य जे सकुचत सकृत प्रनाम किये हूँ ॥५॥
चंचल चरन लोभ लगि लोलुप द्वार-द्वार जग बागे।
राम-सीय-आस्रमनि चलत त्यौं भये न श्रमित अभागे ॥६॥
सकल अंग पद-विमुख नाथ मुख नाम की ओट लई है।
है तुलसिहिं परतीति एक प्रभु-मूरति कृपामई है ॥७॥
शब्दार्थ—चन्द्रवदनि = चन्द्र-वदनी युवती। पाँवर = नीच। सकृत = एक बार। बागे =
फिरे। ओट = आड़, भरोसा।
भावार्थ—मन इस प्रकार कभी भी तुमसे न लगा, जिस प्रकार वह कपट
छोड़कर स्वभावतः अभेद रूपसे विषयोंमें अनुरक्त रहता है ॥१॥ जैसे मैंने
परायी स्त्रीको देखा है, घर-घरके पाप और प्रपंचको सुना है, वैसे न तो किसी
साधुको देखा है, और न गंगाजीकी तरंगके समान निर्मल श्रीरामजीकी गुणावली
ही सुनी है ॥२॥ जैसे नाक सुगन्धके रसके वशमें है, और जीभने छ रसोंमें
अपनी प्रीति मान रखी है, वैसे ही यह नाक भगवान्‌को चढ़ायी हुई मालाकी

विनय-पत्रिका २९५
सुगन्धके लिए और जीभ भगवान्‌के जूठनके लिए ललककर कभी नहीं ललची
॥३॥ जैसे यह नीच शरीर (बड़े चावसे) चन्दनको, चन्द्रवदनी युवतीको,
आभूषणोंको और वस्त्रोंको स्पर्श करना चाहता है, वैसे यह भगवत्पादारविन्दों-
को छूनेके लिए कभी न तरसा ॥४॥ जैसे मैंने शरीर, वचन और मनसे सब
तरहकी सेवा बुरे देवताओं और बुरे स्वामियोंकी की, वैसी ही सेवा मैंने रामजीकी
नहीं की जो एक बार प्रणाम करते ही कृतज्ञ होकर सकुच जाते हैं ॥५॥ जिस
प्रकार ये चंचल पैर लोभवश लोलुप होकर संसारमें द्वार-द्वार फिरे, वैसे ये अभागे
राम-जानकीके आश्रमोंमें चलकर नहीं थके ॥६॥ हे नाथ ! मेरे सब अंग आपके
चरणोंसे विमुख हैं; केवल मैंने मुखसे आपके नामकी ओट ले रखी है । (और
यह इसलिए कि) तुलसीको एक यही विश्वास है कि प्रभुजीकी मूर्ति कृपा-
मयी है ॥७॥
[ १७१ ]
कीजै मोको जम जातनामई ।
राम ! तुमसे सुचि सुहृद साहिबहिं, मैं सठ पीठि दई ॥१॥
गरभवास दस मास पालि पितु-मातु रूप हित कीन्हों ।
जड़हिं विवेक, सुसील खलहिं, अपराधिहिं आदर दीन्हों ॥२॥
कपट करौं अंतरजामिहुँ साँ, अघ व्यापकहिं दुरावौं ।
ऐसेहु कुमति कुसेवक पर रघुपति न कियो मन वावौं ॥३॥
उदर भरौं किंकर कहाइ बेंच्यौ विषयनि हाथ हियो है।
मोसे वंचक को कृपालु छल छाँड़ि कै छोह कियो है ॥४॥
पल-पल के उपकार रावरे जानि बूझि सुनि नीके ।
भिद्यो न कुलिसहुँ ते कठोर चित कबहुँ प्रेम सिय-पीके ॥५॥
स्वामीकी सेवक-हितता सब, कछु निज साईँ-दोहाई ।
मैं मति-तुला तौलि देखी, भइ मेरेहि दिसि गरुआई ॥६॥
एतेहु पर हित करत नाथ मेरो, करि आये, अरु करिहैं ।
तुलसी अपनी ओर जानियत प्रभुहि कनौड़ौ भरिहैं ॥७॥
शब्दार्थ—विवेक = ज्ञान । सिय-पीके = सीतापति, रामजी । वावौं = वाम, प्रति-
कूल । गरुआई = भारीपन । कनौड़ो = कृतज्ञ ।

२९६ विनय-पत्रिका
भावार्थ—हे नाथ ! मुझे यम-यातनामें ही डाल दीजिये । क्योंकि हे
रामजी ! मैं ऐसा शठ हूँ कि आप जैसे पवित्र और सुहृद स्वामीकी ओर मैंने
पीठ कर दी है (आपसे विमुख हो गया हूँ) ॥१॥ गर्भवासके समय दस महीने-
तक पालकर आपने पिता-माताके रूपमें मेरा हित किया । इस मूर्खको आपने
विवेक दिया । इस दुष्टको आपने सुशीलता दी ! इस अपराधीको आपने आदर
दिया ! ॥२॥ किन्तु मैं अन्तर्यामी प्रभुसे भी कपट करता हूँ, व्यापक पापोंको
छिपाता हूँ। किन्तु हे रघुनाथजी ! आपने ऐसे दुर्बुद्धि और बुरे सेवकपर भी
अपना मन वाम नहीं किया ॥३॥ पेट तो भरता हूँ आपका दास कहाकर;
किन्तु मैंने अपने हृदयको विषयोंके हाथ बेच दिया है। हे कृपालु ! भला मुझ-सा
वंचक कौन है जिसपर आपने छल छोड़कर (या मेरे छल-भावपर ध्यान न देकर)
छोह किया है ? ॥४॥ आपके पल-पलके किये हुए उपकारोंको अच्छी तरह जान-
बूझकर तथा सुनकर भी, वज्रसे भी अधिक कठोर मेरे चित्तमें कभी श्रीसीतानाथ-
का प्रेम न धँसा ॥५॥ हे स्वामी ! मैंने अपनी बुद्धिरूपा तराजूपर एक ओर
आपकी सब भक्त-वत्सलता रखी और दूसरी ओर थोड़ा-सा अपना स्वामि-द्रोह
रखकर देखा, तो मेरी ओरका पलड़ा भारी रहा अर्थात् मेरा स्वामि-द्रोह अधिक
हुआ । ॥६॥ इतनेपर भी हे नाथ ! आप मेरा हित करते आये हैं, कर रहे हैं
और करेंगे । तुलसी अपनी ओरसे जानता है कि इस एहसानको स्वामी ही
भरेंगे । अर्थात् रामजी ही पूरा करेंगे ॥७॥
[ १७२ ]
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।
श्री रघुनाथ-कृपालु-कृपा तें संत-सुभाव गहौंगो ॥१॥
जथा लाभ सन्तोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो ।
पर-हित-निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निवहाँगो ॥२॥
परुष बचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो ।
बिगत मान, सम सीतल मन, पर-गुन नहिं दोष कहौंगो ॥३॥
परिहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि, अबिचल हरि-भगति लहौंगो ।४।
शब्दार्थ—निरत = संलग्न । परुष = कठोर । दहौंगो = जलूँगा । लहौंगो = प्राप्त करूँगा ।

विनय-पत्रिका २९७
भावार्थ—क्या कभी मैं भी इस रहन या रीतिसे रहूँगा ? क्या कभी कृपालु
श्रीरघुनाथजीकी कृपासे मैं भी सन्त-स्वभाव ग्रहण करूँगा ? ॥१॥ जो कुछ प्राप्त
हो जायगा, उसीसे सदा सन्तोष करूँगा, किसीसे कुछ न माँगूँगा ? निरन्तर
दूसरोंकी भलाईमें लगा रहूँगा और मन, वचन, कर्मसे नेम, निबाहूँगा ? ॥२॥
अत्यन्त दुःसह और कठोर वचन अपने कानोंसे सुनकर उसकी आगमें न
जलूँगा ? मानकी इच्छा न करूँगा, मनको एक रस और शीतल रखूँगा तथा
दूसरोंके गुण-दोष या स्तुति-निन्दाकी चर्चा न करूँगा ? ॥३॥ देह-जनित
चिन्ताओंको छोड़कर सुख और दुःखको समबुद्धिसे सहूँगा ? हे प्रभो ! क्या यह
तुलसीदास इस पथपर रहकर अविचल (अटल) भगवद्भक्ति प्राप्त करेगा ? ॥४॥
विशेष
१ इस पदमें कविकी कल्पना नहीं बल्कि मनकी आन्तरिक कामना है ।
जरा 'रसखान' कविका भी ऐसा ही विचरण देखिये :-
मानुष हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँवके ग्वारन ।
जो पशु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नन्दकी धेनु मँझारन ॥
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यौ करछत्र पुरन्दर कारन ।
जो खग हौं तो बसेरो करौं वहि कालिंदी-कूल कदम्बकी डारन ॥
[ १७३ ]
नाहींन आवत आन भरोसो ।
यहि कलिकाल सकल साधनतरु है श्रम-फलनि फरो सो ॥१॥
तप, तीरथ, उपवास, दान, मख जेहि जो रुचै करो सो ।
पायेहि पै जानिबो करम-फल भरि भरि वेद परोसो ॥२॥
आगम बिधि जप-जाग करत नर सरत न काज खरो सो ।
सुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन, रोग बियोग घरो सो ॥३॥
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह मिलि ग्यान विराग हरो सो ।
बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो ॥४॥
बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँ-तहाँ झगरो सो ।
गुरु कह्यो राम भजन नीको मोहिं लगत राज-डगरो सो ॥५॥

२१८ विनय-पत्रिका
तुलसी बिनु परतीति प्रीति फिरि-फिरि पचि मरै मरो सो ।
रामनाम-बोहित भव सागर चाहै तरन तरो सो ॥६॥
शब्दार्थ—आगम = शास्त्र । सरत = पूरा होता है । नावत = डालनेसे । आम =
कच्चा । धरो = घड़ा । डगरो = मार्ग । बोहित = नौका ।
भावार्थ—मेरे मनमें (केवल रामजीको छोड़कर) दूसरेका भरोसा होता ही
नहीं। इस कलिकालमें सब साधन वृक्ष-से हैं, जिनमें परिश्रमरूपी फल लगे हैं॥१॥
तप, तीर्थ, उपवास, दान, यज्ञ आदि जो जिसे रुचे, वह उसे करे। किन्तु कर्म-
फल प्राप्त होनेपर ही जान पड़ेगा कि वेदोंने (केवल) भर-भरकर परोसा है;
अर्थात् इस कलिकालके प्रभावसे तप, तीर्थ आदि सब साधनोंमें विघ्न पड़ जाता
है, सफल नहीं होते— अतः साधकको परिश्रम तो बहुत करना पड़ता है किन्तु
विघ्न पड़ जानेके कारण मजदूरी बहुत कम मिलती है ॥२॥ शास्त्रोंकी बतायी
हुई विधिसे मनुष्य जप और यज्ञादि कर्म करता है, पर उनसे काम पूरा नहीं
होता, वे खरे नहीं उतरते । योग-सिद्धिके साधनोंमें स्वप्नमें भी सुख नहीं है ।
उनमें रोग और वियोग धरा हुआ-सा है ॥३॥ काम, क्रोध, मद, लोभ और
मोहने मिलकर ज्ञान-वैराग्यको हर-सा लिया है। और संन्यास लेनेपर मन वैसे
ही बिगड़ जाता है जैसे पानी डालनेसे कच्चा घड़ा ॥४॥ पुराणोंमें मुनियोंके
बहुत-से मत हैं और बहुत-से पन्थ। उनमें जहाँ-तहाँ झगड़ा-सा ही जान पड़ता
है। अर्थात् कोई कुछ कहता है और कोई कुछ। मेरे गुरुने कहा कि रामजीका
भजन करना अच्छा है और मुझे भी वह राजमार्ग-सा प्रतीत हो रहा है ॥५॥
तुलसीदास कहते हैं कि जिसे विश्वास और प्रेमके बिना बारम्बार पचकर मरना
हो, वह मरे; किन्तु संसार-सागरसे पार होनेके लिए रामजीका नाम जहाजके
समान है; जो लोग पार उतरना चाहें, वे उसपर चढ़कर पार हो जायँ ॥६॥
विशेष
१—'बिगरत मन संन्यास लेत'—संन्यासमार्ग तलवारकी धार है। उस-
पर बड़ी सावधानीसे चलना पड़ता है। जरा भी चूके कि गये। फिर तो कहीं
भी ठौर नहीं मिल सकता । इसलिए जबतक पूर्ण रीतिसे इन्द्रियोंका दमन न
हो जाय, संसारसे स्वाभाविक ही विराग न उत्पन्न हो जाय, तबतक संन्यास
लेना लाभदायक नहीं बल्कि घातक और अनिष्टकर है ।

विनय-पत्रिका २९९
[ १७४ ]
जाके प्रिय न राम-वैदेही ।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही ॥१॥
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बन्धु, भरत महतारी ।
बलि गुरु तज्यो, कन्त ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी ॥२॥
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं ।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥३॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रान ते प्यारो ।
जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो ॥४॥
शब्दार्थ—कन्त = पति । बनितन्हि = स्त्रियाँ । सुसेव्य = पूज्य, सेवा करने योग्य ।
भावार्थ—जिसे राम-जानकी प्रिय न हों, उसे करोड़ों शत्रुओंके समान छोड़
देना चाहिये—चाहे वह अत्यन्त स्नेही क्यों न हो ॥१॥ (देखिये न) प्रह्लादने
अपने पिताको, विभीषणने अपने भाई रावणको, भरतने अपनी माताको, राजा
बलिने अपने गुरु (शुक्राचार्य) को और व्रजांगनाओंने अपने-अपने पतियोंको
त्याग दिया था । (और इस प्रकार स्वजनोंके त्यागनेसे वे बुरे नहीं कहे जाते
बल्कि) वे आनन्ददायक और कल्याणकारी माने जाते हैं ॥२॥ जितने सुहृद् और
पूज्य हैं, वे सब रामजीके ही नाते और स्नेहसे माने जाते हैं । बहुत-सा कहाँतक
कहूँ, (इतना ही समझ लो कि) यह अंजन ही क्या (किस काम), जिससे
आँखें फूट जायें ? ॥३॥ तुलसीदासका कथन है कि सब प्रकारसे परम हितू,
पूज्य और प्राणसे भी बढ़कर प्यारा वही है जिससे (जिसके द्वारा) रामजीके
चरणोंमें प्रेम हो । बस, यही हमारा मत है ॥४॥
विशेष
१—‘बलि गुरु तज्यो’—वामन भगवान्‌के तीन पैर पृथिवी माँगने पर
शुक्राचार्यने बलिसे कहा कि दान न दो, इसमें छल है। किन्तु दृढ़प्रतिज्ञ बलिने
अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और अपने गुरु शुक्राचार्यको त्याग दिया ।
२—कहते हैं कि गोस्वामीजीने यह पद मीराबाईके पत्रका उत्तर देनेके

३०० विनय-पत्रिका
लिए बनाया था। मीराबाईने अपने घरवालोंसे तङ्ग आकर गुसाईंजीके पास
निम्नलिखित पद्यात्मक पत्र भेजा था :—
‘स्वस्तिश्री तुलसी गुनभूषन, दूषन हरन गुसाईं।
बारहिं बार प्रणाम करौं अब हरहु सोक-समुदाई ॥
घर के सजन हमारे जेते सबनि उपाधि बढ़ाई।
साधु-सङ्ग अस भजन करत मोहि देत कलेस महाई ॥
बालपने ते मीरा कीन्ही गिरिधरलाल मिताई।
सो तौ अब छूटत नहिं क्यों हू लगी लगन बरियाई ॥
मेरे मातु पिताके सम हो हरि भक्तन सुखदायी।
हमको कहा उचित करिबो है सो लिखिये समुझाई ॥’
इस पत्रके उत्तरमें गोस्वामीजीने मीराके पास ‘जाके प्रिय न राम बैदेही’
यह पद लिखकर भेजा था। किन्तु पं० रामचन्द्र शुक्लने, तुलसी ग्रन्थावलीके
तीसरे खण्डमें लिखा है कि ‘उपर्युक्त कथा बिलकुल निर्मूल मनगढ़न्त समझ
पड़ती है। मीराबाईका गोलोक प्रयाण संवत् १६०३ में हो चुका था। उस
समय गुसाईंजी अधिकसे अधिक १३ वर्षके रहे होंगे।’ यही बात ठीक भी
जान पड़ती है।
[ १७१ ]
जौ पै रहनि राम सों नाहीं।
तौ नर खर कूकर सूकर सम वृथा जियत जग माहीं ॥१॥
काम, क्रोध, मद, लोभ, नींद, भय, भूख, प्यास सब ही के।
मनुज देह सुर-साधु सराहत, सो सनेह सिय-पी के ॥२॥
सूर, सुजान, सुपूत सुलच्छन गनियत गुन गरुआई।
बिनु हरिभजन इँदारुनके फल तजत नहीं करुआई ॥३॥
कीरति, कुल, कूरतूति, भूति भलि, सील सरूप सलोने।
तुलसी प्रभु-अनुराग-रहित जस सालन साग अलोने ॥४॥
शब्दार्थ—सलोने = लावण्यमय। सालन = कढ़ी। अलोने = बिना नमकका।
भावार्थ—यदि रामजीसे लगन नहीं है, तो वह मनुष्य इस संसारमें गधे,

विनय-पत्रिका ३०१
कुत्ते और सूअरके समान व्यर्थ जीता है ॥१॥ यों तो काम, क्रोध, मद, लोभ,
नींद, भय, भूख और प्यास सबमें है, किन्तु जिस कारणसे देवता और साधु लोग
मानव-शरीरकी सराहना करते हैं वह केवल जानकीनाथके स्नेहके कारण ॥२॥
कोई कितना ही वीर, चतुर, सुपुत्र, सुन्दर लक्षणोंवाला तथा गुण और गम्भीरता-
में गणना करने योग्य क्यों न हो, भगवद्भजनके बिना वह इन्दारुन (इन्द्रायण)
फलके समान है, जो अपना कड़वापन नहीं छोड़ता ॥३॥ कीर्ति, कुल, करतूत
(कर्तव्य) और अच्छी विभूति हो, शील हो, सलोना स्वरूप हो, किन्तु
तुलसीदास कहते हैं कि यदि प्रभुजीमें अनुराग नहीं है तो यह ठीक वैसे ही है
जैसे अलोना (बिना नमकके) साग और कढ़ी ॥४॥
विशेष
१—'तौ नर……माहीं'—गुसाईंजीने ऐसी ही फटकार कवितावलीमें भी
सुनायी है:—
तिन तें खर सूकर स्वान भले जड़ता बस ते न कहै कछु वै ।
तुलसी जेहि रामसों नेह नहीं सो सही पसु पूँछ विषानन द्वै ॥
जननी कत भार मुई दस मास भई किन बाँझ गई किन च्वै ।
जरि जाउ सो जीवन जानकिनाथ रहै जग में तुम्हरो बिनु ह्रै ॥
२—'इन्दारुन'—का फल देखनेमें बड़ा सुन्दर, पर कड़वा होता है।
३—वियोगी हरिजीने 'सालन साग' का अर्थ 'साग भाजी' किया है।
किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं। 'सालन' कहते हैं 'कढ़ी' को। इलाहाबादके पश्चिमी
भागमें 'सालन' 'दाल' को भी कहते हैं।
[ १७६ ]
राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेहु न नातो।
एते अनादर हूँ तोहि ते न हातो ॥१॥
जोरे नये नाते नेहु फोकट फीके।
देह के दाहक, गाहक जीके ॥२॥
अपने अपने को सब चाहत नीको।
मूल दुहूँको दयालु दूलह सी को ॥३॥

३०२ | विनय-पत्रिका
जीवको जीवन प्रान को प्यारो।
सुखहू को सुख राम सो बिसारो ॥४॥
कियो करैगो तोसे खल को भलो।
ऐसे सुसाहब सों तू कुचाल क्यों चलो ॥५॥
तुलसी तेरी भलाई अजहू बूझै।
राढ़उ राउत होत फिरिकै जूझै ॥६॥
शब्दार्थ—हातो = पृथक् हुआ। फोकट = मुफ्तमें, व्यर्थ ही। सी = जानकीजी। राढ़उ
= कायर भी। राउत = वीर। जूझै = लड़ता है।
भावार्थ—रे नीच! तूने राम-सरीखे अच्छे स्वामीसे न तो स्नेह ही किया
और न कोई नाता ही रखा। यद्यपि तूने उनका इतना निरादर किया,
फिर भी उन्होंने तुझे नहीं छोड़ा ॥१॥ तूने मुफ्तमें नये-नये फीके नाते और
स्नेह जोड़ लिये जो कि शरीरको जलानेवाले और जानके ग्राहक (मारने-
वाले) हैं ॥२॥ अपना और अपने प्रियजनोंका भला सब लोग चाहते हैं, पर
दोनोंके मूल कारण (कल्याण करनेवाले) दयालु जानकीनाथ ही हैं ॥३॥ तूने
राम-सरीखे जीवोंके जीवन, प्राणोंके प्यारे और सुखोंके सुखको भुला दिया ॥४॥
उन्होंने तुझ-सरीखे खलका भला किया है और भविष्यमें भी करेंगे। ऐसे अच्छे
स्वामीसे तूने कुचाल क्यों चली या उनके साथ बुरा बर्ताव क्यों किया ? ॥५॥
हे तुलसी! तेरे समझ जानेपर या चेत जानेपर अब भी तेरी भलाई हो सकती
है। क्योंकि लड़ाईसे भागा हुआ कायर पुरुष भी जब वापस आकर लड़ता है,
तो शूरवीर हो जाता है ॥६॥
[ १७७ ]
जो तुम त्यागो राम हौं तौ नहिं त्यागौं।
परिहरि पाँय काहि अनुरागौं ॥१॥
सुखद सुप्रभु तुम सो जग माहीं।
श्रवन-नयन मन-गोचर नाहीं ॥२॥
हौं जड़ जीव, ईस रघुराया।
तुम मायापति, हौं बस माया ॥३॥

विनय-पत्रिका ३०३
हौं तो कुजाचक, स्वामि सुदाता।
हौं कपूत, तुम हितु पितु-माता ॥४॥
जो पै कहुँ कोउ बूझत बातो।
तौ तुलसी बिनु मोल बिकातो ॥५॥
शब्दार्थ—हौ = मैं। अनुरागों = प्रेम करूँ। कुजाचक = निकृष्ट, भिखमंगा।
भावार्थ—हे रामजी ! यदि आप मुझे त्याग भी दें, तो भी मैं आपको नहीं
छोड़ सकता। (आप ही बतायें कि) मैं आपके चरणोंको छोड़कर और किससे
प्रेम करूँ? ॥१॥ संसारमें आपके समान सुख देनेवाले अच्छे स्वामी कान, आँख,
मन, इन्द्रियोंके विषय नहीं हुए। अर्थात् आप सरीखा स्वामी मैंने न तो कानोंसे
सुना है, न आँखोंसे देखा है, और न मनमें ही निश्चय होता है कि ऐसा कोई
दूसरा स्वामी है ॥२॥ मैं मूर्ख जीव हूँ और आप ईश्वर हैं। आप मायापति हैं,
और मैं मायाके अधीन हूँ ॥३॥ मैं निकृष्ट याचक (मंगन) हूँ, और आप
स्वामी हैं, अच्छे दाता हैं। मैं, आपका कपूत हूँ और आप हित करनेवाले मेरे
माता-पिता हैं ॥४॥ यदि कहीं कोई मेरी बात पूछता, तो मैं अर्थात् यह तुलसी
दास बिना मोल उसके हाथ बिक जाता। तात्पर्य यह है कि यदि कोई मेरा
ग्राहक होता, तो मैं आपको कष्ट न देता—उसीका हो जाता ॥५॥
[ १७८ ]
भयेहूँ उदास राम, मेरे आस रावरी।
आरत स्वारथी सब कहैं बात बावरी ॥१॥
जीवनको दानी घन कहा ताहि चाहिये।
प्रेम-नेमके निबाहे चातक सराहिये ॥२॥
मीन तें न लाभ-लेस पानी पुन्य पीन को।
जल बिनु थल कहा मीचु बिनु झीन को ॥३॥
बड़े ही की ओट बलि वाँचि आये छोटे हैं।
चलत खरे के सङ्ग जहाँ-तहाँ खोटे हैं ॥४॥
यहि दरबार भलो दाहिनेहु-वाम को।
मोको सुखदायक भरोसो राम-नाम को ॥५॥

३०४ विनय-पत्रिका
कहत नसानी है हैं हिये नाथ नीकी है।
जानत कृपानिधान तुलसीके जीकी है ॥६॥
शब्दार्थ—बावरी = पागलोंकी तरह । घन = मेघ । जीवन = पानी । मीन = मछली ।
पीन = पुष्ट । मीच = मृत्यु । दाहिना = अनुकूल ।
भावार्थ—हे रामजी ! आपके उदासीन हो जानेपर भी मुझे तो केवल आप
हीकी आशा है। दुःखी और स्वार्थी मनुष्य सारी बातें पागलोंकी तरह कहता
है ॥१॥ जो मेघ (पपीहेका) जीवनदाता है, उस पपीहेको किस बातकी चाहना
है ? किन्तु प्रेमका नेम निबाहनेके कारण चातककी सराहना होती है। भाव यह
कि मेघ बिना किसी स्वार्थके पपीहेको स्वातिका जल देकर जीवनदान देता है,
फिर भी उसकी तारीफ नहीं होती, किन्तु अपूर्व प्रेम देखकर प्रशंसा होती है
पपीहेकी ॥२॥ पवित्र और पुष्टिकारक जलको मछलीसे लेशमात्र भी
लाभ नहीं है; किन्तु क्या मछलीके लिए जलको छोड़कर कोई ऐसा स्थल है जहाँ
वह मौतसे बच सके ? तात्पर्य यह कि परमात्माका इस जीवसे कोई लाभ नहीं
है, पर यह जीव परमात्माको छोड़कर कहीं रक्षा नहीं पा सकता ॥३॥ मैं आपकी
बलैया लेता हूँ। छोटे लोग हमेशा बड़ोंकी ही ओटमें रक्षा पाते आये हैं। जहाँ-
तहाँ खरेके साथ खोटे भी चल जाते हैं (जैसे खरे रुपयोंके साथ खोटे ,रुपये)
॥४॥ इस दरबारमें अनुकूल और प्रतिकूल सबका भला होता आया है। इसीसे
मुझे तो शुभ दायक केवल राम-नामका भरोसा है ॥५॥ हे नाथ ! कहनेमें
खराबी होगी (कहते न बनेगा), उसे हृदयमें ही रखना अच्छा है। क्योंकि हे
कृपानिधान ! आप तो तुलसीके दिलकी बातको जानते ही हैं (अतः कहनेकी
कोई जरूरत नहीं) ॥६॥
राग बिलावल
[ १७९ ]
कहाँ जाउँ, कासों कहौं, कौन सुनै दीन की।
त्रिभुवन तुही गति सब अङ्गहीन की ॥१॥