विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३०१
कुत्ते और सूअरके समान व्यर्थ जीता है ॥१॥ यों तो काम, क्रोध, मद, लोभ,
नींद, भय, भूख और प्यास सबमें है, किन्तु जिस कारणसे देवता और साधु लोग
मानव-शरीरकी सराहना करते हैं वह केवल जानकीनाथके स्नेहके कारण ॥२॥
कोई कितना ही वीर, चतुर, सुपुत्र, सुन्दर लक्षणोंवाला तथा गुण और गम्भीरता-
में गणना करने योग्य क्यों न हो, भगवद्भजनके बिना वह इन्दारुन (इन्द्रायण)
फलके समान है, जो अपना कड़वापन नहीं छोड़ता ॥३॥ कीर्ति, कुल, करतूत
(कर्तव्य) और अच्छी विभूति हो, शील हो, सलोना स्वरूप हो, किन्तु
तुलसीदास कहते हैं कि यदि प्रभुजीमें अनुराग नहीं है तो यह ठीक वैसे ही है
जैसे अलोना (बिना नमकके) साग और कढ़ी ॥४॥
विशेष
१—'तौ नर……माहीं'—गुसाईंजीने ऐसी ही फटकार कवितावलीमें भी
सुनायी है:—
तिन तें खर सूकर स्वान भले जड़ता बस ते न कहै कछु वै ।
तुलसी जेहि रामसों नेह नहीं सो सही पसु पूँछ विषानन द्वै ॥
जननी कत भार मुई दस मास भई किन बाँझ गई किन च्वै ।
जरि जाउ सो जीवन जानकिनाथ रहै जग में तुम्हरो बिनु ह्रै ॥
२—'इन्दारुन'—का फल देखनेमें बड़ा सुन्दर, पर कड़वा होता है।
३—वियोगी हरिजीने 'सालन साग' का अर्थ 'साग भाजी' किया है।
किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं। 'सालन' कहते हैं 'कढ़ी' को। इलाहाबादके पश्चिमी
भागमें 'सालन' 'दाल' को भी कहते हैं।
[ १७६ ]
राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेहु न नातो।
एते अनादर हूँ तोहि ते न हातो ॥१॥
जोरे नये नाते नेहु फोकट फीके।
देह के दाहक, गाहक जीके ॥२॥
अपने अपने को सब चाहत नीको।
मूल दुहूँको दयालु दूलह सी को ॥३॥