विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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भावार्थ—हे नाथ ! मुझे यम-यातनामें ही डाल दीजिये । क्योंकि हे
रामजी ! मैं ऐसा शठ हूँ कि आप जैसे पवित्र और सुहृद स्वामीकी ओर मैंने
पीठ कर दी है (आपसे विमुख हो गया हूँ) ॥१॥ गर्भवासके समय दस महीने-
तक पालकर आपने पिता-माताके रूपमें मेरा हित किया । इस मूर्खको आपने
विवेक दिया । इस दुष्टको आपने सुशीलता दी ! इस अपराधीको आपने आदर
दिया ! ॥२॥ किन्तु मैं अन्तर्यामी प्रभुसे भी कपट करता हूँ, व्यापक पापोंको
छिपाता हूँ। किन्तु हे रघुनाथजी ! आपने ऐसे दुर्बुद्धि और बुरे सेवकपर भी
अपना मन वाम नहीं किया ॥३॥ पेट तो भरता हूँ आपका दास कहाकर;
किन्तु मैंने अपने हृदयको विषयोंके हाथ बेच दिया है। हे कृपालु ! भला मुझ-सा
वंचक कौन है जिसपर आपने छल छोड़कर (या मेरे छल-भावपर ध्यान न देकर)
छोह किया है ? ॥४॥ आपके पल-पलके किये हुए उपकारोंको अच्छी तरह जान-
बूझकर तथा सुनकर भी, वज्रसे भी अधिक कठोर मेरे चित्तमें कभी श्रीसीतानाथ-
का प्रेम न धँसा ॥५॥ हे स्वामी ! मैंने अपनी बुद्धिरूपा तराजूपर एक ओर
आपकी सब भक्त-वत्सलता रखी और दूसरी ओर थोड़ा-सा अपना स्वामि-द्रोह
रखकर देखा, तो मेरी ओरका पलड़ा भारी रहा अर्थात् मेरा स्वामि-द्रोह अधिक
हुआ । ॥६॥ इतनेपर भी हे नाथ ! आप मेरा हित करते आये हैं, कर रहे हैं
और करेंगे । तुलसी अपनी ओरसे जानता है कि इस एहसानको स्वामी ही
भरेंगे । अर्थात् रामजी ही पूरा करेंगे ॥७॥
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कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।
श्री रघुनाथ-कृपालु-कृपा तें संत-सुभाव गहौंगो ॥१॥
जथा लाभ सन्तोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो ।
पर-हित-निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निवहाँगो ॥२॥
परुष बचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो ।
बिगत मान, सम सीतल मन, पर-गुन नहिं दोष कहौंगो ॥३॥
परिहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि, अबिचल हरि-भगति लहौंगो ।४।
शब्दार्थ—निरत = संलग्न । परुष = कठोर । दहौंगो = जलूँगा । लहौंगो = प्राप्त करूँगा ।