विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २८९
घूमे, पर उसकी आपने कभी चर्चातक न चलायी; पर बारम्बार गीध और
शबरीके प्रेमका वर्णन करना आपको प्रिय है ॥३॥ कुत्तेके कहनेसे तो यतिको
(तीर्थसिद्ध नामक ब्राह्मणको) हाथीपर चढ़ाकर नगरके बाहर निकाल दिया,
किन्तु स्त्री-(जानकीजी) की निन्दा करनेवाले मन्दबुद्धि धोबीको अपनी प्रजा
समझकर नीतिसे नगरमें बसाया ॥४॥ इस (आपके) दरबारमें दीनोंका
आदर करनेकी रीति सदासे चली आ रही है। किन्तु हे दीनदयालु ! आपको इस
दीन तुलसीकी सुध किसीने नहीं करायी ॥५॥
विशेष
१—‘केवट’—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।
२—‘कौनप’—वियोगी हरिने इसका अर्थ लिखा है ‘राजा’ ।
३—‘कियो सकल सँग भाई’—इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि
“भाईके समान सबका साथ किया।” वियोगी हरिने ‘भाई’ का
अर्थ “भाई-चारा निवाहा” लिखा है।
४—‘गीध’—२१५ पदके विशेषमें देखिये ।
५—‘सबरी’—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।
६—‘स्वान’—१४६ पदके ‘विशेष’ विवरणमें देखिये । तीर्थसिद्ध नामक
ब्राह्मण हाथीपर चढ़ाकर बड़े समारोहके साथ कालिंजरका महन्त बनाया
गया था ।
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ऐसे राम दीन-हितकारी ।
अति कोमल करुनानिधान बिनु कारन पर-उपकारी ॥१॥
साधन-हीन, दीन, निज अघ-बस, सिला भई मुनि-नारी ।
गृह तैं गवनि परसि पद पावन घोर साप तें तारी ॥२॥
हिंसारत निषाद तामस वपु, पसु-समान बनचारी ।
भेंट्यो हृदय लगाइ प्रेमबस, नहिं कछु जात विचारी ॥३॥
जद्यपि द्रोह कियो सुरपति-सुत, कहि न जाय अति भारी ।
सकल लोक अवलोकि सोकहत, सरन गये भय टारी ॥४॥
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