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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 305

२९४ विनय-पत्रिका
२—'षट्रस'—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय ये छ रस
खाने-पीनेकी वस्तुओंमें होते हैं।
३—'विषय'—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियों-
के विषय हैं।
[ १५० ]
यौं मन कबहुँ तुमहिं न लाग्यो।
ज्यौं छल छाँड़ि सुभाव निरन्तर रहत विषय अनुराग्यो ॥१॥
ज्यौं चितई परनारि, सुने पातक-प्रपंच घर-घर के।
त्यौं न साधु, सुरसरि-तरंग-निरमल गुनगन रघुवर के ॥२॥
ज्यौं नासा सुगन्धरस-बस, रसना षटरस-रति मानी।
राम-प्रसाद-माल जूठन लगि त्यौं न ललकि ललचानी ॥३॥
चन्दन चन्द्रबदनि-भूषन-पट ज्यौं चह पाँवर परस्यो।
त्यौं रघुपति-पद-पदुम-परस को तनु पातकी न तरस्यो ॥४॥
ज्यौं सब भाँति कुदेव कुठाकुर सेये वपु वचन हिये हूँ।
त्यौं न राम सुकृतग्य जे सकुचत सकृत प्रनाम किये हूँ ॥५॥
चंचल चरन लोभ लगि लोलुप द्वार-द्वार जग बागे।
राम-सीय-आस्रमनि चलत त्यौं भये न श्रमित अभागे ॥६॥
सकल अंग पद-विमुख नाथ मुख नाम की ओट लई है।
है तुलसिहिं परतीति एक प्रभु-मूरति कृपामई है ॥७॥
शब्दार्थ—चन्द्रवदनि = चन्द्र-वदनी युवती। पाँवर = नीच। सकृत = एक बार। बागे =
फिरे। ओट = आड़, भरोसा।
भावार्थ—मन इस प्रकार कभी भी तुमसे न लगा, जिस प्रकार वह कपट
छोड़कर स्वभावतः अभेद रूपसे विषयोंमें अनुरक्त रहता है ॥१॥ जैसे मैंने
परायी स्त्रीको देखा है, घर-घरके पाप और प्रपंचको सुना है, वैसे न तो किसी
साधुको देखा है, और न गंगाजीकी तरंगके समान निर्मल श्रीरामजीकी गुणावली
ही सुनी है ॥२॥ जैसे नाक सुगन्धके रसके वशमें है, और जीभने छ रसोंमें
अपनी प्रीति मान रखी है, वैसे ही यह नाक भगवान्‌को चढ़ायी हुई मालाकी