विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २९७
भावार्थ—क्या कभी मैं भी इस रहन या रीतिसे रहूँगा ? क्या कभी कृपालु
श्रीरघुनाथजीकी कृपासे मैं भी सन्त-स्वभाव ग्रहण करूँगा ? ॥१॥ जो कुछ प्राप्त
हो जायगा, उसीसे सदा सन्तोष करूँगा, किसीसे कुछ न माँगूँगा ? निरन्तर
दूसरोंकी भलाईमें लगा रहूँगा और मन, वचन, कर्मसे नेम, निबाहूँगा ? ॥२॥
अत्यन्त दुःसह और कठोर वचन अपने कानोंसे सुनकर उसकी आगमें न
जलूँगा ? मानकी इच्छा न करूँगा, मनको एक रस और शीतल रखूँगा तथा
दूसरोंके गुण-दोष या स्तुति-निन्दाकी चर्चा न करूँगा ? ॥३॥ देह-जनित
चिन्ताओंको छोड़कर सुख और दुःखको समबुद्धिसे सहूँगा ? हे प्रभो ! क्या यह
तुलसीदास इस पथपर रहकर अविचल (अटल) भगवद्भक्ति प्राप्त करेगा ? ॥४॥
विशेष
१ इस पदमें कविकी कल्पना नहीं बल्कि मनकी आन्तरिक कामना है ।
जरा 'रसखान' कविका भी ऐसा ही विचरण देखिये :-
मानुष हौं तो वही रसखान बसौं ब्रज गोकुल गाँवके ग्वारन ।
जो पशु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नन्दकी धेनु मँझारन ॥
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यौ करछत्र पुरन्दर कारन ।
जो खग हौं तो बसेरो करौं वहि कालिंदी-कूल कदम्बकी डारन ॥
[ १७३ ]
नाहींन आवत आन भरोसो ।
यहि कलिकाल सकल साधनतरु है श्रम-फलनि फरो सो ॥१॥
तप, तीरथ, उपवास, दान, मख जेहि जो रुचै करो सो ।
पायेहि पै जानिबो करम-फल भरि भरि वेद परोसो ॥२॥
आगम बिधि जप-जाग करत नर सरत न काज खरो सो ।
सुख सपनेहु न जोग-सिधि-साधन, रोग बियोग घरो सो ॥३॥
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह मिलि ग्यान विराग हरो सो ।
बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो ॥४॥
बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँ-तहाँ झगरो सो ।
गुरु कह्यो राम भजन नीको मोहिं लगत राज-डगरो सो ॥५॥