विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१. गणेश, सूर्य व शिव स्तुति
१० विनय-पत्रिका
ये दुष्ट तुलसीदलको थूहड़की डालियोंसे रुँधना चाहते हैं, तुलसीदासको आधि-
भौतिक बाधाएँ कुचल डालना चाहती हैं ॥ ४ ॥
विशेष
१—'अधिभौतिक'—ताप तीन तरहके माने गये हैं, आधिदैविक, आधि-
भौतिक और आध्यात्मिक । शारीरिक रोगादि आधिदैविक ताप हैं । किसी प्राणीसे
जो कष्ट पहुँचता है, उसे आधिभौतिक ताप कहते हैं; इसी प्रकार प्रारब्धवशात्
दैवेच्छासे जो कुछ भोगना पड़ता है उसे आध्यात्मिक ताप कहते हैं ।
'तुलसी'—यहाँ तुलसी शब्दसे तुलसीदास और तुलसी-वृक्ष दोनोंका ही
बोध होता है ।
( ९ )
सिव सिव होइ प्रसन्न करु दाया ।
करुनामय उदार कीरति, वलि जाउँ, हरहु निज माया ॥१॥
जलज-नयन, गुन-अयन मयन-रिपु, महिमा जान न कोई ।
बिनु तव कृपा राम-पद-पंकज, सपनेहुँ भगति न होई ॥२॥
ऋषय, सिद्ध, मुनि, मनुज, दनुज, सुर अपर जीव जग माहीं ।
तव पद बिमुख न पार पाव कोउ, कलप कोटि चलि जाहीं ॥३॥
अहि-भूषन, दूषन-रिपु-सेवक, देव-देव, त्रिपुरारी ।
मोह-निहार-दिवाकर संकर, सरन सोक-भयहारी ॥४॥
गिरिजा-मन-मानस-मराल, कासीस, मसान-निवासी ।
तुलसिदास हरि-चरन-कमल-बर, देहु भक्ति अविनासी ॥५॥
शब्दार्थ—मयन = कामदेव । अपर = दूसरे । अहि = सर्प । निहार = पाला । मराल =
हंस । कासीस = काशीके ईश, शंकरजी ।
भावार्थ—हे शिव ! हे शिव ! प्रसन्न होकर दया करो । आप करुणामय
हैं, आपकी यश-कीर्ति सब ओर फैली हुई है । मैं आपकी बलि जाता हूँ, अपनी
माया हर लो ॥ १ ॥ हे कमल-नेत्र ! आप सर्वगुणसम्पन्न हैं, और कामदेवको
भस्म करनेवाले हैं; आपकी महिमा कोई नहीं जानता । आपकी कृपाके बिना
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
विनय-पत्रिका ११
रामचन्द्रजीके चरण-कमलोंमें, स्वप्नमें भी भक्ति नहीं हो सकती ॥ २ ॥ ऋषि,
सिद्ध, मुनि, मनुष्य, दैत्य, देवता तथा संसारमें अन्य जितने जीव हैं, आपके
चरणोंसे विमुख होकर भव-सागरका पार नहीं पाते—कल्प-कल्पान्त बीतता
चला जाता है ॥ ३ ॥ सर्प आपके आभूषण हैं और दूषण दैत्यके मारनेवाले
श्रीरामजीके आप सेवक हैं। हे देवाधिदेव, आप त्रिपुरासुरके संहारकर्ता हैं।
हे शंकर ! आप अज्ञान-रूपी पालाके लिए सूर्य हैं, और शरणागतोंका शोक
और भय दूर करनेवाले हैं ॥ ४ ॥ हे काशीपुरीके स्वामी ! आप पार्वतीके मन-
रूपी मानसरोवरके हंस हैं, और श्मशान-निवासी हैं। तुलसीदासको श्रीहरिके
श्रेष्ठ चरणारविन्दोंमें अटल भक्ति दीजिये ॥ ५ ॥
विशेष
१—प्रारम्भमें दो बार 'सिव सिव' कहना आर्त्ति-सूचक है। इसे वीप्सा
कहते हैं।
राग धनाश्री
( १० )
मोह-तम तरनि, हर रुद्र संकर सरन, हरन मम सोक लोकाभिरामं ।
बाल-ससि भाल, सुविसाल लोचन-कमल, काम-सत-कोटि-लावन्य-धामं
कम्बु-कुन्देन्दु-कर्पूर-विग्रह रुचिर, तरुन-रबि कोटि तनु-तेज भ्राजै ।
भस्म सर्वांग अर्धांग सैलात्मजा, ब्याल-नृकपाल-माला विराजै ॥२॥
मौलि संकुल जटा-मुकुट विद्युच्छटा, तटिनि-बर-वारि हरि-चरन-पूतं
श्रवन कुंडल, गरल कंठ, करुनाकन्द, सच्चिदानन्द वन्देऽवधूतं ॥३॥
सूल-सायक-पिनाकासि कर, सत्रु-वन,दहन इव धूमध्वज, वृषभ-जानं
व्याघ्र-गज-चर्म-परिधान, विज्ञान-घन, सिद्ध-सुर-मुनि मनुज-सेव्यमानं
तांडवित-नृत्यपर, डमरु डिंडिम प्रवर, असुभ इव भाति कल्यानरासी
महा कल्पान्त ब्रह्मांड मंडल दवन, भवन कैलास आसीन कासी ॥५॥
तज्ञ, सर्वज्ञ, जज्ञेस, अच्युत, विभो, विस्व भवदस संभव पुरारी ।
ब्रह्मेन्द्र, चन्द्रार्क, वरुनाग्नि, वसु, मरुत, जम, अर्चि भवदंघ्रि सर्वाधिकारी
१२ विनय-पत्रिका
अकल, निरुपाधि, निर्गुन, निरंजन ब्रह्म, कर्म-पथमेकमज निर्विकारं।
अखिल विग्रह, उग्ररूप, सिव, भूप सुर, सर्वगत, सर्व, सर्वोपकारं ॥७॥
ज्ञान-वैराग्य धन-धर्म, कैवल्य-सुख, सुभग सौभाग्य सिव सानुकूलं।
तदपि नर मूढ़ आरूढ़ संसार-पथ, भ्रमत भव विमुख तव पाद मूलं॥८॥
नष्टमति, दुष्ट अति, कष्ट-रत खेद-गत, दास तुलसी संभु सरन आया।
देहि कामारि ! श्रीरामपदपंकजे, भक्ति अनवरत गत भेद माया ॥९॥
शब्दार्थ-मम = मेरा। लोकाभिरामं = समूचे संसारको प्रसन्न करनेवाले। बाल ससि =
द्वितीयाके चन्द्रमा। कम्बु = शंख। कुन्देन्दु = कुन्द+इन्दु। विग्रह = शरीर। रुचिर =
सुन्दर। ब्याल = सर्प। मौलि = मस्तक। पूत = पवित्र किया हुआ। तज्ञ = ब्रह्मस्वरूपको
जाननेवाले। भवदंघ्रि = आपके चरणोंकी।
भावार्थ-हे हर, हे रुद्र, हे शंकर ! आप शरणागतजनोंके मोहान्धकारको
दूर करनेके लिए सूर्य-स्वरूप हैं। इसलिए हे लोकाभिराम, मेरे शोकको आप दूर
कीजिये। आपके ललाटपर दूजके बाल-चन्द्र हैं, आपकी बड़ी-बड़ी आँखें
कमलके समान हैं। आप करोड़ों कामदेवके समान सुन्दरताके घर हैं ॥१॥
आपका सुन्दर शरीर शंख, कुन्द, चन्द्रमा और कपूरके समान है। आपके शरीर-
में करोड़ों मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेज विराजमान है। आप अंग-प्रत्यंगमें
भस्म लगाये रहते हैं और आपके आधे शरीरमें हिमाचल-कन्या पार्वती सुशोभित
हैं। आपके गलेमें सर्पों और नर-मुण्डोंकी माला विराजमान है ॥२॥ मस्तकपर
जटा-जूटका मुकुट है, उसपर विष्णु भगवान्के चरणोंसे पवित्र हुई गंगाजीकी
छटा बिजलीके समान चमक रही है। कानोंमें कुण्डल और कण्ठमें हलाहल
विष धारण करनेवाले करुणाकन्द, सत्-चित्-आनन्दस्वरूप अवधूत भगवान्
शंकरजी, मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥३॥ आपके हाथमें त्रिशूल, बाण,
धनुष और तलवार है। शत्रु-रूपी वनको जलानेके लिए आप अग्निस্বরূপ हैं;
बैल ही आपकी सवारी है। बाघ और हाथीका चमड़ा आपका वस्त्र है। आप
ब्रह्मज्ञानकी वर्षा करनेवाले मेघ हैं। सिद्ध, देवता, मुनि, मनुष्यसे आप सेवित
हैं ॥४॥ तांडव नृत्यपर आप डमरू बजाते हैं। उसकी आवाज डिम-डिम-डिम-
डिम होती है। (उसीसे व्याकरणके चौदहो सूत्र निकले हैं) आप अशुभके
समान जान पड़ते हैं; पर हैं कल्याणमूर्ति। महाप्रलयके समय आप समूचे-
विश्व-ब्रह्माण्डको भस्म कर डालते हैं; कैलास आपका घर है, और काशीमें
आप बैठे रहते हैं ॥५॥ आप तत्त्वके जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ हैं, यज्ञोंके स्वामी हैं,
अच्युत हैं और व्यापक हैं। हे पुरारि, यह विश्व-ब्रह्मांड आपके ही अंशसे उत्पन्न
हुआ है। ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, अग्नि, अष्टवसु, उनचास पवन और
यमराज आपके ही चरणकी पूजा करके सब तरहके अधिकारी हुए हैं ॥६॥
आप कला-रहित (यानी घटते-बढ़ते नहीं), उपाधि-रहित, निर्गुण, माया-रहित
साक्षात् ब्रह्म हैं। आप कर्म-पथमें एक हैं। आप जन्म-रहित और विकार-रहित
हैं। हे शंकरजी, सारा ब्रह्माण्ड आपका शरीर है, आपका रूप बड़ा भयानक है;
आप देवताओंके स्वामी हैं। हे शिव ! आप सर्वगत और सबका उपकार करने-
वाले हैं ॥७॥ हे शिवजी, आपके प्रसन्न रहनेपर ज्ञान, वैराग्य, धन, धर्म, मोक्ष
और सुन्दर सौभाग्य यह सब प्राप्त हो जाते हैं। फिर भी मूर्ख मनुष्य आपके
चरणारविन्दोंसे विमुख होकर सांसारिक मार्गपर आरूढ़ हैं और संसारमें ही भटक
रहे हैं ॥८॥ हे शम्भो ! नष्टबुद्धि, अत्यन्त दुष्ट, कष्टमें लीन और दुःखी तुलसीदास
आपकी शरण आया है। हे कामारि ! माया-जनित भेद-बुद्धि दूर करके उसे
श्रीरामचन्द्रके चरण-कमलोंमें अनन्य भक्ति दीजिये ॥१०॥
विशेष
१- 'कम्बु कुन्देन्दु-कर्पूर' - चारोका तात्पर्य उज्ज्वलतासे है। शिवजीका
शरीर शंखके समान उज्ज्वल और चिकना है, कुन्दपुष्पके समान कोमल है,
चन्द्रमाके समान शीतल है और कपूरके समान सुगन्धित है। इसीसे गोस्वामी-
जी ने 'कम्बु-कुन्देन्दु कर्पूर विग्रह' कहा है।
२-जिस समय विष्णु भगवान्ने वामनरूप धारण करके राजा बलिकी दी
हुई तीन पैर भूमि नापनेके लिए अपना शरीर बढ़ाया था, उस समय ब्रह्माने
पैरको धोकर चरणोदकको कमण्डलुमें रख लिया था। वही जल गंगाका मूल
कारण है, इसीसे 'हरिचरण-पूतं' कहा गया है।
३- 'निर्विकार'-जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और विनाश
ये षट्-विकार हैं; भगवान् शिव इन षट्-विकारोंसे रहित हैं, इसलिए उन्हें
निर्विकार कहा गया है।
१४ विनय-पत्रिका
भैरवरूप शिवस्तुति
( ११ )
भीषणाकार भैरव भयंकर भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति विपत्ति-हरता ।
मोह-मूपक-मार्जार, संसार-भय-हरन, तारन-तरन, अभय-करता ॥१॥
अतुल-बल विपुल विस्तार विग्रह गौर, अमल अति धवल धरनीधरभं ।
सिरसि संकुलित-कल-जूटपिंगलजटा, पटल सत-कोटि विद्युच्छटाभं ॥२॥
भ्राज विबुधापगा आप पावन परम, मौलि-मालेव सोभा विचित्रं ।
ललित ललाटपर राज रजनीस-कल, कलाधर नौमि हर धनद मित्रं ॥३॥
इन्दु-पावक भानु-नयन मर्दन मयन, गुन-अयन ज्ञान-विज्ञान-रूपं ।
ख्वन-गिरिजा भवन भूधराधिप सदा, श्रवन कुंडल वदन छवि अनूपं ॥४॥
चर्म्म-असि-सूल-धर,डमरु-सर-चाप कर, जान वृषभेस करुना-निधानं ।
जरत सुर-असुर नर-लोक सोकाकुलं,मृदुलचित अजित कृत गरलपानं ॥५॥
भस्म तनु भूषनं, व्याघ्र चम्मोम्बरं, उरग-नर-मौलि उर-मालधारी ।
डाकिनी साकिनी खेचरं भूचरं जंत्र मंत्र भंजन प्रवल कल्मपारी ॥६॥
काल अतिकाल कलिकाल व्यालाद खग, त्रिपुर-मर्दन भीम कर्मभारी ।
सकल लोकान्त-कल्पान्त सूलाग्रकृत, दिग्गजाब्यक्त गुन नृत्यकारी ॥७॥
पाप-सन्ताप घनघोर-संस्कृति दीन भ्रमत जग-जोनि नहिं कोपि त्राता ।
पाहि भैरव रूप राम रूपी रुद्र, बन्धु, गुरु, जनक जननी विधाता ॥८॥
यस्य गुन-गन गनति विमलमसि सारदा, निगम नारद प्रमुख ब्रह्मचारी ।
सेस सर्वैस आसीन आनन्द-वन, दास तुलसी प्रनत त्रासहारी ॥९॥
शब्दार्थ—एक भैरव = शिवजीका एक नाम। वामन पुराणके ६७ वें अध्यायमें अष्ट
भैरवका उल्लेख है। विग्रह = शरीर। मार्जार = बिलाव। धरनीधर = शेषनाग अथवा हिमालय
पर्वत। कल = सुन्दर। पटल = समूह, राशि। विबुधापगा = देवनदी गंगा। मौलि = मस्तक।
धनद = कुबेर। मयन = कामदेव। ख्वन = कान। चर्म = ढाल। वृषभ + ईस = बैलोंमें
श्रेष्ठ नन्दी। खेचर = आकाशमें विचरण करनेवाले। कल्मष + अरि = पापको भस्म करने-
वाले। ब्याल + आद = साँपको भक्षण करनेवाले। कोपि = कोई भी। निगम = वेद।
भावार्थ—हे भीषणाकार भैरव ! हे भयंकर भूत-प्रेत और गणोंके स्वामी !
विनय-पत्रिका १५
आप विपत्तियोंको हरनेवाले हैं। आप अज्ञानरूपी चूहेका नाश करनेवाले बिलाव
हैं; संसारका भय हरनेवाले हैं; संसारके जीवोंको तारनेवाले और स्वयं मुक्त-
स्वरूप तथा अभयदान करनेवाले हैं ॥१॥ आपके बलकी तुलना नहीं की जा
सकती। आपका अत्यन्त विशाल गौर शरीर बहुत निर्मल है और उसकी
उज्ज्वलता हिमालय पर्वतकी कान्तिके समान है। सिरपर पीले रंगका सुन्दर
जटाजूट सुशोभित है जिसकी आभा करोड़ों बिजलियोंकी राशिके समान है ॥२॥
मस्तकपर मालाके समान गंगाजीका परम पवित्र जल विराजमान है, जिसकी
शोभा ही विचित्र है। आपके सुन्दर ललाटपर निशानाथ चन्द्रमाकी कला
शोभित है। ऐसे कुबेरके मित्र शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३॥
चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य आपके नेत्र हैं; आप कामदेवको जला चुके हैं; आप
गुणोंके भण्डार हैं और ज्ञान-विज्ञानस्वरूप हैं। हे गिरिजा-रमण, आपका भवन
कैलास-पर्वत है; आप सदैव कानोंमें कुण्डल धारण किये रहते हैं; आपके मुखकी
छवि अनुपम है ॥४॥ आप अपने हाथमें ढाल, तलवार, शूल, डमरू, बाण और
धनुष धारण किये रहते हैं। नन्दी नामक बैल आपकी सवारी है और आप
करुणाके भण्डार हैं। (करुणा-निधान होनेके कारण ही आपने) विषकी अजेय
ज्वालासे देव-दैत्य और मनुष्यलोकको जलते हुए तथा शोकमें व्याकुल देखकर
उसे पान कर लिया था,—ऐसे आप कोमल चित्तवाले हैं ॥५॥ भस्म ही आपके
शरीरका आभूषण है, बाघका चमड़ा ही वस्त्र है; आप अपने हृदयपर सर्पों और
नरमुण्डोंकी माला धारण किये हुए हैं। डाकिनी, शाकिनी, खेचर, भूचर तथा
यन्त्र-मन्त्रका आप नाश करनेवाले हैं। बड़े-बड़े पापोंके तो आप शत्रु हैं ॥६॥
आप कालके महाकाल हैं, कलिकालरूपी सर्पको भक्षण करनेके लिए गरुड़ हैं।
आप त्रिपुरासुरको मारनेवाले तथा बड़े-बड़े भयंकर कर्म करनेवाले हैं। आप सब
लोकोंके नाशक, तथा महाप्रलयके समय अपने त्रिशूलकी नोकसे दिशारूपी
हाथियोंको छेदकर निर्गुणरूपसे नृत्य करनेवाले हैं ॥७॥ इस पाप-सन्तापसे
परिपूर्ण भयानक संसारकी चौरासी लाख योनियोंमें मैं दीन होकर भ्रमण कर
रहा हूँ, मेरी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हे भैरवरूप ! हे रामरूपी रुद्र !
मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि मेरे बन्धु, गुरु, पिता, माता और विधाता आप ही
हैं ॥८॥ निर्मल बुद्धिवाली सरस्वती, वेद और नारदके समान प्रधान ब्रह्मचारी
१६ विनय-पत्रिका
तथा शेषनाग जिनकी गुणावलीका वर्णन करते हैं, ऐसे सर्वेश्वर, आनन्दवन
(काशी) में विराजमान भयको हरनेवाले शिवजीको तुलसीदास प्रणाम
करता है ॥९॥
विशेष
१—शिवजीका भैरवरूप चतुर्भुजी कहा गया है कालिकापुराणके ६० वें
अध्यायमें लिखा है—
भैरवः पाण्डुनाथश्च रक्तगौरश्चतुर्भुजः।
किन्तु यहाँ गोस्वामीजीने उस रूपका वर्णन न करके किसी और ही रूपका
वर्णन किया है,।
२—धरणीधराभं—का अर्थ 'शेषनागकी कान्तिके समान' भी किया
जा सकता है।
३—'भैरवरूप रामरूपी रुद्र'—कहनेका आशय यह है कि भैरवरूपसे
संसारका भय दूर कीजिये और रामरूपसे मुझे अपनाइये। दनुज-वधके समय
भगवान्का रुद्ररूप था।
( १२ )
संकरं सम्प्रदं सज्जनानन्ददं, सैल-कन्या-वरं परम रम्यं।
काम-मद-मोचनं तामरस-लोचनं, वामदेवं भजे भावगम्यं ॥१॥
कम्बु-कुन्देन्दु-कर्पूर-गौरं शिवं, सुन्दरं सच्चिदानन्द कन्दं।
सिद्ध-सनकादि योगीन्द्र-वृन्दारका, विष्णु-विधि-वन्द्य चरनारविन्दं ॥२
ब्रह्म कुल वल्लभं, सुलभमति दुर्लभं, विकट वेषं विभुं, वेदपारं।
नौमि करुनाकरं गरल गंगाधरं, निर्मलं निर्गुनं निर्विकारं ॥३॥
लोकनाथं सोकसूल निर्मूलिनं, सूलिनं मोह-तम-भूरि-भानुं।
कालकालं, कलातीतमजरं हरं, कठिन कलिकाल कानन कृसानुं ॥४॥
तज्ञमज्ञान-पाथोधि-घटसम्भवं, सर्वगं सर्वसौभाग्यमूलं।
प्रचुर भव-भंजनं, प्रनत जनरंजनं, दासतुलसी सरन सानुकूलं ॥५॥
शब्दार्थ—तामरस = कमल। कन्द = मेघ। वृन्दारका = देवता। विभु = व्यापक।
निर्विकार = विकाररहित। भानु = सूर्य। कृसानु = अग्नि। तज्ञ = तत्त्ववेत्ता। पाथोधि =
समुद्र। घट-सम्भव = घड़ेसे उत्पन्न, अगस्त्य ऋषि।
विनय-पत्रिका १७
भावार्थ—कल्याणकर्ता, कल्याणदाता, सज्जनोंको आनन्द देनेवाले, पार्वती-
जीके स्वामी, अत्यन्त सुन्दर, कामदेवके मदको चूर्ण करनेवाले, कमलके समान
नेत्रवाले भावगम्य शिवजीको मैं भजता हूँ ॥१॥ आपका सुन्दर शरीर शंख,
कुन्द, चन्द्रमा और कपूरके समान गौर है। आप सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप हैं।
आपके चरणारविन्दकी वन्दना सिद्ध, सनकादि (सनक, सनन्दन, सनातन,
सनत्कुमार), बड़े-बड़े योगी, देवता, विष्णु और ब्रह्मा करते हैं॥२॥ आपको ब्राह्मण-
कुल प्रिय है अथवा ब्रह्मवंशके आप परमप्रिय हैं; आपका प्राप्त होना सुलभ भी है
और दुर्लभ भी। आपका वेष विकट है; आप व्यापक हैं और वेदोंके ज्ञानसे परे हैं।
ऐसे करुणाकर, हलाहल विष और गंगाजीको धारण करनेवाले, निर्मल, निर्गुण
और निर्विकार शिवजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३॥ आप सब लोकोंके स्वामी,
शोकों और दुःखोंको निर्मूल करनेवाले, त्रिशूलधारी और मोहान्धकारको दूर
करनेके लिए अनन्त सूर्यके समान हैं। आप कालके भी काल और कलातीत
अर्थात् सदा एकरस और अजर हैं। शिवजी कठिन कलिकालरूपी वनको भस्म
कर डालनेके लिए अग्नि-स्वरूप हैं ॥४॥ आप तत्त्ववेत्ता हैं और, अज्ञानरूपी
समुद्रको पी जानेके लिए साक्षात् अगस्त्य हैं। आप सर्वान्तर्यामी हैं और सब
प्रकारके सौभाग्यके मूल कारण हैं। आप संसारके जन्म-मरणरूपी दुःखोंका नाश
करनेवाले, तथा शरणागतोंको आनन्द देनेवाले हैं। सेवक तुलसीदास आपकी
शरण है—उसपर कृपा कीजिये ॥५॥
विशेष
'पाथोधि-घट-सम्भवं'—समुद्रके तटपर एक टिटिहा अपनी टिटिहरीके साथ
निवास करता था। समुद्र उनके अण्डे बराबर बहा ले जाता था। इससे एक
बार वे दोनों समुद्रपर बहुत क्रुद्ध हुए। दोनों ही चोंचमें बालू भर-भरकर लगे
समुद्रमें छोड़ने। इस प्रकार वे समुद्रको पाट डालना चाहते थे। अचानक वहाँ
अगस्त्य ऋषि पहुँच गये। पक्षियोंका दुःख देखकर उनका दिल भर आया।
उन्होंने उन्हें सान्त्वना देते हुए 'ॐ राम' मन्त्रका उच्चारण कर तीन बार आच-
मन किया। तीन ही आचमनमें समुद्रका जल बिलकुल सूख गया। इससे
जलमें रहनेवाले जीव व्याकुल हो उठे। देवताओंके विनय करनेपर महर्षिने मूत्र-
द्वारा समुद्रको बाहर निकाला। तभीसे समुद्र अपेय (खारा) हो गया।
२
१८ विनय-पत्रिका
'निर्विकार'—विकार छः हैं—जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय
और नाश। इन छ विकारोंसे भगवान् शिव रहित हैं।
राग बसन्त
( १३ )
सेवहु सिव-चरन-सरोज-रेनु । कल्यान-अखिल-प्रद कामधेनु ॥१॥
कर्पूर गौर करुना उदार । संसार-सार, भुजगेन्द्र हार ॥२॥
सुख-जन्म-भूमि, महिमा अपार । निर्गुन, गुन-नायक, निराकार ॥३॥
त्रय नयन, मयन-मर्दन महेस । अहंकार निहार उदित दिनेस ॥४॥
वर बाल-निसाकर मौलि भ्राज । त्रैलोक-सोकहर प्रमथराज ॥५॥
जिन्ह कहँ बिधि सुगति न लिखी भाल । तिन्हकी गति कासीपति कृपाल
उपकारी कोऽपर हर समान । सुर-असुर जरत कृत गरल पान ॥७॥
बहु कल्प उपायन करि अनेक । बिनु संभु कृपा नहिं भव-विवेक ॥८॥
विज्ञान-भवन, गिरिसुता-रमन । कह तुलसिदास मम त्रास समन ॥९॥
शब्दार्थ—रेनु = रज, धूल। अखिल = सब। भुजगेन्द्र = वासुकि नाग। निहार =
कुहरा, पाला। दिनेस = सूर्य। निसाकर = चन्द्रमा। प्रमथनाथ = गणोंके स्वामी। कोऽपर =
(कः+अपर) दूसरा कौन। गरल = विष।
भावार्थ—शिवजीके चरण-कमलोंकी रजका सेवन करो, वह रज सर्व
कल्याणदायिनी कामधेनु है ॥१॥ शिवजी कपूरके समान गौर हैं। वह करुणा
करनेमें उदार हैं; संसारके सार हैं और वासुकि नागका हार धारण करने-
वाले हैं ॥२॥ वह सुखके जन्म-स्थान हैं, उनकी महिमा अपार है। वह
त्रिगुणातीत हैं, सब गुणोंके स्वामी हैं और आकार-रहित हैं ॥३॥ शिवजी
तीन नेत्रवाले हैं, कामदेवको ध्वंस करनेवाले हैं और अहंकाररूपी कुहरेके लिए
उगे हुए सूर्य हैं ॥४॥ उनके मस्तकपर दूजके चन्द्रमा शोभा पा रहे हैं। वह
तीनों लोकोंका शोक दूर करनेवाले हैं और गणोंके स्वामी हैं ॥५॥ ब्रह्माने
जिन लोगोंके ललाटमें अच्छी गति नहीं लिखी, शिवजी ऐसे कृपालु हैं कि उन्हें
भी मुक्ति दे देते हैं ॥६॥ देवों और दैत्योंको जलते देखकर जिन्होंने हलाहल
विनय-पत्रिका १९
विष पान किया, ऐसे महादेवजीके समान उपकारी संसारमें दूसरा कौन है !
॥७॥ कल्प-कल्पान्ततक अनेक तरहके उपाय क्यों न करो, शिवजीकी कृपाके
बिना संसारका विवेक यानी संसारके सत्-असत् आदिका ज्ञान नहीं हो सकता
॥८॥ तुलसीदास कहते हैं कि विज्ञानके घर तथा पार्वतीके पति शिवजी मेरे
भयका नाश करनेवाले हैं ॥९॥
विशेष
१—'निर्गुन'का अर्थ अशरीरी या निराकार भी है। किन्तु इस पदमें
आगे निराकार भी कहा गया है, इसलिए यहाँ निर्गुनका अर्थ त्रिगुणातीत करना
ही अधिक संगत है। सत्त्व-रज-तम ये ही तीन गुण हैं जिनसे सृष्टिकी उत्पत्ति
होती है।
२—'निराकार'—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँच भूतोंसे
बने हुए शरीरसे रहित।
३—'भव-विवेक'—इसका शाब्दिक अर्थ है संसारके स्वरूपका निश्चय।
आशय यह कि शिव-कृपाके बिना वास्तविक ज्ञान—सत् और असत्का बोध
नहीं होता।
( १४ )
देखो देखो, बन बन्यो आजु उमाकन्त ।
मानो देखन तुमहि आयी ऋतु बसन्त ॥१॥
जनु तनुदुति चम्पक-कुसुम-माल । वर बसन नील नूतन तमाल ॥२॥
कल कदलि जंघ पद कमल लाल । सूचत कटि केहरि, गति मराल ॥
भूषन प्रसून बहु विविध रंग । नूपुर किंकिनि कलरव विहंग ॥४॥
कर नवल बकुल-पल्लव रसाल । श्रीफल कुच, कंचुकि लता-जाल ॥५॥
आनन सरोज, कच मधुप गुंज । लोचन विसाल नवनील कंज ॥६॥
पिक बचन चरित बर बरहि कीरि । सित सुमन हास, लीला समीर७
कह तुलसिदास सुनु सिव सुजान । उर वसि प्रपंच रचे पंचवान ॥८॥
करि कृपा हरिय भ्रम फन्द काम । जेहि हृदय बसहिं सुखरासि राम९.
२० विनय-पत्रिका
शब्दार्थ - उमाकन्त = शिवजी । तनुदुति = शरीरकी कान्ति । चम्पक = चम्पा ।
कदलि = केला । केहरि = सिंह । मराल = हंस । प्रसून = पुष्प । विहँग = पक्षी । बकुल =
मौलसिरी । रसाल = आम । श्रीफल = बेल । कंचुकि = चोली । कच = बाल । पिक =
कोयल । वरहि = मोर । कीर = तोता । सित = सफेद । पंचवान = कामदेव ।
भावार्थ - हे शिवजी, देखिये, देखिये ! आज आप वन बने हैं। मानो
आपको देखनेके लिए वसन्त ऋतु आयी है। (शिवजीके अर्द्धांगमें जो पार्वती-
जी विराजमान हैं, वही मानो वसन्त ऋतु हैं) ॥१॥ महारानीजीके शरीरकी
कान्ति मानो चम्पाके फूलोंकी माला है और श्रेष्ठ नीले वस्त्र नवीन तमाल-पत्र
हैं ॥२॥ सुन्दर जंघाएँ केलेके वृक्ष और चरण लाल कमल हैं। कमर सिंहकी
और चाल हंसकी सूचना दे रही है ॥३॥ गहने रंग-बिरंगे अनेक तरहके फूल
हैं। नूपुर (पैजनी) और किंकिनि (करधनी) का मधुर शब्द पक्षियोंका शब्द
है ॥४॥ हाथ मौलसिरी और आमकी नवीन कोंपल हैं। स्तन ही बेल हैं और
चोली लताओंका जाल है ॥५॥ जगन्माताका मुख कमल है और उनके सिरके
बाल गुंजारते हुए भौंरे हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्र नवीन नीले कमल हैं ॥६॥
मधुरवाणी कोयल है और चरित्र सुन्दर मोर तथा तोते हैं। हँसी सफेद फूल और
लीला शीतल-मन्द-सुगन्ध त्रिविध वायु है ॥७॥ तुलसीदास कहते हैं कि हे परम
ज्ञानी शिवजी ! सुनिये, इस कामदेवने मेरे हृदयमें वासकर बड़ा प्रपंच रच
रखा है ॥८॥ इस कामके भ्रम-फन्दको हटा दीजिये, जिसमें मेरे हृदयमें सुखकी
राशि श्रीरामजी निवास करें ॥९॥
विशेष
१-इस पदमें गोस्वामीजीने अर्द्धनारी-नटेश्वर शिव-पार्वतीका वर्णन वन
और वसन्तका रूपक बाँधकर किया है। भक्तशिरोमणि गोस्वामीजीको
मातेश्वरी पार्वतीजीका स्पष्टतया नख-शिख वर्णन करना अनुचित जान पड़ा,
इसलिए उन्होंने इस अनूठे ढंगसे काम लिया है। इस रूपकमें कवि-कुल-
चूडामणि तुलसीदासजीने कमाल किया है। वनकी कोई भी वस्तु छूटने नहीं
पायी है। वृक्ष, लता, पत्र, पुष्प, सिंह, हंस, पक्षी, भ्रमर सब मौजूद हैं।
यहाँतक कि कमलका लाल, पीला और नीला रङ्ग भी नहीं छूटने पाया है।
विनय-पत्रिका २१
२—'सित सुमन हास'—नवरसके वर्णनमें साहित्यकारोंने हास्यका रङ्ग
सफ़ेद लिखा है। यथाः—
"स्वेत रङ्ग रस हास्य को, देव प्रमथपतिजास" ।
इसीसे गोस्वामीजीने इसकी उपमा सफ़ेद फूलोंसे दी है।
३—इस पदमें उत्प्रेक्षालङ्कार है। उत्प्रेक्षा नाम है तुलना, बराबरी या
वैसी ही भावनाका। इसका लक्षण इस प्रकार हैः—
सम्भावना स्यादुत्प्रेक्षा वस्तुहेतुफलात्मना ।
.................................................
प्रायोब्जं त्वत्पदेनैक्यं प्राप्तुं तोये तपस्यति ॥
—कुवलयानन्द
अथवा—केशव औरहि वस्तुमें औरै कीजे तर्क।
उत्प्रेक्षा तासौं कहैं जिनकी बुद्धि सम्पर्क ॥
देवी-स्तुति
राग मारू
( १५ )
दुसह दोष-दुख दलनि, करु देवि दाया।
विस्व-मूलाऽसि, जन-सानुकूलाऽसि, कर सूलधारिनि महामूलमाया १
तड़ित गर्भाङ्ग सर्वाङ्ग सुन्दर लसत, दिव्य पट भव्य भूषन बिराजैं।
बालमृग-मंजु खञ्जन-विलोचनि, चन्द्रबदनि लखि कोटि रतिमार लाजैं
रूप सुख-सील-सीमाऽसि, भीमाऽसि, रामाऽसि,वामाऽसिवरबुद्धिबानी
छमुख-हेरंब-अंबासि, जगदंबिके, संभु-जायासि जय जय भवानी ॥३॥
चंड-भुजदंड-खंडनि, बिहंडनि महिष, मुंड-मद-भंगकर अंग तोरे।
सुंभ निःसुंभ कुंभीस रन केसरिनि, क्रोध-वारीस अरि-वृन्द बोरे ॥४॥
निगम-आगम अगम गुर्बितवगुन-कथन, उर्विधर करत जेहि सहसजीह्वा
देहि मा, मोहि पन प्रेम यह नेम निज, राम घनस्याम तुलसी पपीहा ॥५
शब्दार्थ—मूलासि = (मूल+असि) जड़ हो। महामूल माया = मायाको उत्पन्न
२२ विनय-पत्रिका
करनेवाली हो । तड़ित = बिजली । भीमासि = दुर्गा हो । रामासि = लक्ष्मी हो । वामासि =
स्त्रीस्वरूपा हो । षन्मुख = कार्त्तिकेय । हेरंब = गणेशजी । कुंभीस = गजराज । केसरिनि =
सिंहिनी । गुर्वि = बहुत बड़ा । उर्विधर = शेषनाग ।
भावार्थ—हे असह्य दोषों और दुःखोंका नाश करनेवाली देवि ! मुझपर
दया करो । तुम विश्व-ब्रह्माण्डकी आदिस्थान हो, भक्तोंपर कृपा करनेवाली हो,
हाथमें त्रिशूल धारण किये रहती हो और मायाकी जन्मदात्री आद्या-शक्ति
हो ॥१॥ तुम्हारे सुन्दर शरीरके अंग-प्रत्यंगमें बिजली-सी चमक शोभा पा रही
है, तुम्हारे वस्त्र दिव्य हैं (अर्थात् वे वस्त्र न कभी गन्दे होते हैं और न पुराने
ही) और भव्य आभूषण तुम्हारे शरीरपर विराजमान हैं । हे मृगशावक और
खंजनके समान मनोहर नेत्रवाली ! हे चन्द्रमुखी ! तुम्हें देखकर करोड़ों रति और
कामदेव लज्जित होते हैं ॥२॥ तुम रूप, मुख और शीलकी सीमा हो । तुम्हीं
भीमा नाम दुर्गा हो और तुम्हीं लक्ष्मी हो; तुम हो तो स्त्री-स्वरूपा, पर तुम वाणी
और बुद्धिमें श्रेष्ठ हो । तुम कार्त्तिकेय और गणेशजीकी माता हो, जगज्जननी
हो और शिवजीकी पत्नी हो । हे भवानी ! तुम्हारी जय हो, जय हो ! ॥३॥
तुम चंड नामक दैत्यके भुजदण्डोंको टुकड़े-टुकड़े करनेवाली हो और महिषासुरको
मारनेवाली हो । मुण्ड नामक राक्षसके घमण्डको चूरकर तुमने उसके अंग-अंगको
तोड़ डाला था । शुम्भ और निशुम्भ गजराजोंको युद्धमें मारनेके लिए तुम
सिंहिनी हो । तुमने अपने क्रोधरूपी समुद्रमें शत्रुके झुंडको डुबो दिया है ॥४॥
वेद-शास्त्र और हजार जीभवाले शेष तुम्हारा गुण गाते हैं, किन्तु तुम्हारे अगम
यानी अपार गुणका पार पाना बड़ा कठिन है । हे माता ! तुम मुझे ऐसा प्रण
और प्रेम दो, जिसमें मैं अपना यह नेम बना लूँ कि श्रीरामचन्द्रजी श्याम घन हैं
और तुलसीदास पपीहा है ।
विशेष
१—'भीमा'—नाम दुर्गाका है । यथा:—
तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्त्तयः ।
भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ॥
इति मार्कण्डेयपुराणे देवीमाहात्म्ये ।
विनय-पत्रिका २३
२—'वामा'—शब्दका अर्थ कई टीकाकारोंने पार्वती किया है। पर अमर-
कोशमें इस शब्दका अर्थ 'सामान्य स्त्री' पाया जाता है। पुराणोंमें यह शब्द
दुर्गाके लिए प्रयुक्त हुआ है, पार्वतीके लिए नहीं। यथा:—
वामं विरुद्धरूपन्तु विपरीतन्तु गीयते।
वामेन सुखदा देवी वामा तेन मता बुधैः॥
इति देवीपुराणे ४५ अध्यायः।
अथवा—
या पुनः पूज्यमानातु देवादीनान्तु पूर्वतः।
यज्ञभागं स्वयं धत्ते सा वामा तु प्रकीर्त्तिता॥
इति कालिका पुराणे ७७ अध्यायः।
किन्तु आगेके पदमें गोस्वामीजीने पार्वतीकी स्तुति की है, इसलिए यह
पद भी पार्वतीकी ही स्तुतिमें लिखा गया प्रतीत होता है। क्योंकि शिवकी
स्तुतिके बाद किसी अन्य देवीकी स्तुति और उसके बाद पार्वतीकी स्तुति असंगत
है। इस स्तुतिमें ग्रन्थकारने दुर्गा और पार्वतीमें अभेद सम्बन्ध माना है।
३—मार्कण्डेय और देवीपुराणमें चण्ड, मुण्ड, महिषासुर और शुम्भ-
निःशुम्भ नामक प्रबल पराक्रमी दैत्योंकी कथा है। जब इनके अत्याचारोंसे तीनों
लोक थर्रा उठा, तब सब देवताओंने तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेशने आद्या शक्ति
भगवती महामायाकी स्तुति की। देवीने उक्त राक्षसोंका वध करके संसारमें
शान्ति स्थापित की।
राग रामकली
( १६ )
जय जय जगजननि देवि, सुर-नर-मुनि-असुर-सेवि,
मुक्ति-भुक्ति-दायिनि, भय-हरनि कालिका।
मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्वसर्बरीस बदनि,
ताप-तिमिर तरुन तरनि-किरन मालिका ॥१॥
२४ विनय-पत्रिका
वर्म-चर्म कर कृपान, सूल-सेल-धनुष वान,
धरनि, दलनि, दानव-दल, रन-करालिका !
पूतना-पिसाच-प्रेत-डाकिनि-साकिनि समेत,
भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका ॥२॥
जय महेस-भामिनी, अनेक-रूप-नामिनी,
समस्त-लोक स्वामिनी, हिमसेल-बालिका ।
रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम,
देहु है प्रसन्न पाहि प्रनत-पालिका ॥३॥
शब्दार्थ—भुक्ति = भोगैश्वर्य । पर्वसर्वरीस = (पर्व+ शर्वरी+ईश) पूर्णिमाकी रात्रिके
स्वामी, चन्द्रमा । तरुन = मध्याह्नकाल । तरनि = सूर्य । मालिका = माला । सेल = साँगी ।
मृगालि = मृगसमूह । भामिनी = पत्नी ।
भावार्थ—हे जगज्जननी ! हे देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो । देवता,
मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं । हे कालिके ! तुम भोग-
सामग्री और मोक्ष दोनों देनेवाली हो । कल्याण, आनन्द और अष्टसिद्धियोंकी
तुम स्थान हो । तुम हो तो पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान मुखवाली, पर त्रिताप-
रूपी अन्धकारका नाश करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्यकी किरण-माला
हो ॥१॥ तुम्हारे शरीरपर कवच है और हाथोंमें ढाल, तलवार, त्रिशूल, साँगी
और धनुष-बाण है । तुम युद्धमें विकराल रूप धारण करके पृथ्वीके दानव-दलका
संहार करनेवाली हो । पूतना, पिशाच, प्रेत, डाकिनी, शाकिनीके सहित भूत,
ग्रह और बेतालरूपी पक्षी एवं मृग-समूहको पकड़नेके लिए तुम जालरूप हो ॥२॥
हे शिवे ! तुम्हारी जय हो । तुम्हारे नाम और रूप अनन्त हैं । तुम विश्व-ब्रह्मांड-
की स्वामिनी और हिमाचलकी कन्या हो । हे भक्तोंका पालन करनेवाली !
तुलसीदास तुम्हारी शरणमें है । उसे तुम प्रसन्न होकर श्री रघुनाथजीके चरणोंमें
परम प्रेम और अचल नेम दो ।
विनय-पत्रिका २७
गंगा-स्तुति
राग रामकली
( १७ )
जय जय भगीरथ-नन्दिनि, मुनि-चय-चकोर-चन्दिनि,
नर-नाग-बिबुध-वन्दिनि, जय जह्नु-बालिका।
बिस्नु-पद-सरोज जासि, ईस-सीस पर विभासि,
त्रिपथगासि, पुन्य-रासि, पाप-छालिका ॥१॥
विमल-विपुल-वहसि वारि, सीतल त्रयताप-हारि,
भँवर वर विभंगतर तरंग-मालिका।
सुर जन पूजोपहार, सोभित ससि धवल धार,
भंजन भव-भार, भक्ति-कल्पथालिका ॥२॥
निज तटवासी विहंग, जल-थल-चर पसु-पतंग,
कीट, जटिल तापस सब सरिस पालिका।
तुलसी सब तीर तीर सुमिरत रघुबंस-वीर,
विचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका ॥३॥
शब्दार्थ—नन्दिनि = पुत्री। चय = समूह। त्रिपथगासि = पृथिवी, पाताल और स्वर्ग-
लोकके मार्गोंसे जानेवाली हो। छालिका = धोनेवाली। विभंगतर = अत्यन्त चञ्चल।
थालिका = थाल्हा, खन्तोला।
भावार्थ—हे भगीरथ-नन्दिनी गंगे ! तुम्हारी जय हो, जय हो। तुम मुनि-
समूहरूपी चकोरोंके लिए चन्द्रिकारूप हो। मनुष्य, नाग और देवता तुम्हारी
वन्दना करते हैं। हे जाह्नवी ! तुम्हारी जय हो। तुम विष्णु भगवान्के चरण-
कमलोंसे उत्पन्न हुई हो; शिवजीके मस्तकपर शोभा पा रही हो; तुम आकाश,
पाताल और मर्त्यलोक तीनों मागोंमें तीन धाराओंसे बहती हो। तुम पुण्य-राशि
हो और पापोंको धो डालनेवाली हो ॥१॥ तुम शीतल और दैहिक-दैविक-भौतिक
तीनों तापोंको हरनेवाला अथाह निर्मल जल धारण किये हो। तुम सुन्दर भँवर
२६ विनय-पत्रिका
तथा अत्यन्त चंचल तरंगोंकी माला धारण किये रहती हो। पुरवासियोंने तुम्हें
पूजामें जो सामग्री भेंट की है, उससे चन्द्रमाके समान तुम्हारी उज्ज्वल धारा
सुशोभित है। वह धारा संसारके भारको नाश करनेवाली तथा भक्तिरूपी कल्प-
वृक्षके लिए थाल्हा है ॥२॥ तुम अपने किनारेपर रहनेवाले पक्षी, जलचर,
थलचर, पशु, पतंग, कीड़े-मकोड़े तथा जटाधारी तपस्वी सबका समान रूपसे
पालन करती हो। हे मोहरूपी महिषासुरका वध करनेके लिए कालिकारूप गंगे !
मुझ तुलसीदासको ऐसी बुद्धि दो कि जिससे मैं श्रीरामजीका स्मरण करता हुआ
तुम्हारे किनारे-किनारे विचरण कर सकूँ ॥३॥
विशेष
१—‘भगीरथ-नन्दिनि’—सूर्यवंशमें सगर नामके महापराक्रमी राजा थे।
उनकी दो रानियाँ थीं। एकसे अंशुमान् पैदा हुए और दूसरीसे साठ हजार पुत्र
उत्पन्न हुए। राजा सगरके प्रतापसे देवराज इन्द्र सदैव संत्रस्त रहा करता था।
उसने ईर्ष्यावश राजा सगरके अश्वमेध यज्ञका घोड़ा चुरा लिया और उसे ले
जाकर योगेश्वर कपिलमुनिके आश्रमपर बाँध दिया। उस घोड़ेको ढूँढ़नेके लिए
सगरके साठ हजार पुत्र निकले। मुनिके आश्रमपर घोड़ेको बँधा देखकर उन्हें
कटु वाक्य कहा। इससे कपिलदेवजीने क्रुद्ध होकर उन्हें भस्म कर दिया।
महाराज अंशुमान्के पुत्र भगीरथ हुए। उन्होंने घोर तपस्या की और
श्रीगंगाजीको पृथ्वीपर लाकर उन लोगोंका उद्धार किया। इसीसे श्रीगंगाजीको
‘भगीरथ नन्दिनी’ या ‘भागीरथी’ कहा जाता है।
२—‘जह्नु बालिका’—राजा भगीरथ अपने रथके पीछे-पीछे गङ्गाजीको
भूलोकमें ला रहे थे। मार्गमें जह्नु मुनिका आश्रम मिला। मुनिने कुपित होकर
उस प्रवाहको पान कर डाला। जब राजा भगीरथने स्तुति द्वारा उन्हें प्रसन्न
किया, तब मुनिने संसारके कल्याणार्थ गङ्गाजीको अपनी जङ्घासे निकाल दिया।
इसीसे गङ्गाजीका नाम ‘जह्नुसुता’ या ‘जाह्नवी’ पड़ा। लिखा है:—
जानु द्वारा पुरा दत्ता जह्नु सम्पीय कोपतः।
तस्य कन्यास्वरूपा च जाह्नवी तेन कीर्त्तिता ॥
—ब्रह्मवैवर्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डम्।
विनय-पत्रिका २७
( १८ )
जयति जय सुरसरी जगदखिल-पावनी।
बिस्नु-पदकञ्ज-मकरन्द इव अम्बुवर
वहसि, दुख दहसि अघवृन्द-विद्राविनी ॥१॥
मिलित जलपात्र-अज जुक्त-हरिचरन रज,
विरज-चर-चारि त्रिपुरारि सिर-धामिनी।
जह्नु-कन्या धन्य, पुन्य कृत सगर-सुत,
भूधर द्रोनि-विद्दरनिवहु नामिनी ॥२॥
जच्छ, गन्धर्व, मुनि, किन्नरोरग, दनुज,
मनुज मज्जहिं सुकृत-पुञ्ज जुत-कामिनी।
स्वर्ग-सोपान, विज्ञान-ज्ञानप्रदे,
मोह-मद-मदन-पाथोज-हिम यामिनी ॥३॥
हरित गम्भीर वानीर दुहुँ तीर वर,
मध्य धारा विसद, विश्व-अभिरामिनी।
नील-परजंक-कृत-सयन सर्पेस जनु,
सहस सीसावली स्रोत सुर-स्वामिनी ॥४॥
अमित-महिमा, अमित रूप, भूपावली,
मुकुट-मनिद्य त्रैलोक पथ गामिनी।
देहि रघुवीर-पद-प्रीति निर्भर मातु,
दास तुलसी त्रास हरनि भव-भामिनी ॥५॥
शब्दार्थ—पावनी = पवित्र करनेवाली। मकरन्द = मधु। विद्राविनी = नाश करने-
वाली। विरज = निर्मल। द्रोनि = कन्दरा। विद्दरनि = विदीर्ण करनेवाली। किन्नरोरग =
(किन्नर + उरग) किन्नर और नाग। पाथोज = कमल। वानीर = बेंत वृक्ष। विसद =
उज्ज्वल। परजंक = पर्यङ्क, पलंग।
भावार्थ—हे समूचे संसारको पवित्र करनेवाली गंगे! तुम्हारी जय हो,
जय हो। तुम विष्णु भगवान्के चरण-कमलोंमें मधुके समान सुन्दर जल धारण
करनेवाली हो, दुःखोंको जला डालनेवाली हो और पाप-पुंजको नाश करनेवाली
हो ॥१॥ विष्णु भगवान्की चरण-रजसे संयुक्त तुम्हारा निर्मल (रजोगुणका नाश
२८ विनय-पत्रिका
करके सतोगुण उत्पन्न करनेवाला) और सुन्दर जल ब्रह्माके कमण्डलुमें भरा
रहता है। तुमने शिवजीके मस्तकको ही अपना घर बना रखा है। हे अनन्त
नामवाली जाह्नवी ! तुमने राजा सगरके साठ हजार पुत्रोंको धन्य और पवित्र
कर दिया है। तुमने पहाड़ोंकी कन्दराओंको विदीर्ण कर डाला है ॥२॥ बड़े
पुण्यके फलसे यक्ष, गन्धर्व, मुनि, किन्नर, नाग, दैत्य और मनुष्य अपनी स्त्रियोंके
सहित तुम्हारे जलमें स्नान करते हैं। तुम स्वर्गकी सीढ़ी हो और ज्ञान-विज्ञान-
दायिनी हो। तुम मोह, मद और कामरूपी कमलोंके नाशके लिए शिशिर
ऋतुकी रात हो ॥३॥ तुम्हारे दोनों सुन्दर किनारोंपर हरे और घने बेंतके वृक्ष हैं
और बीचमें संसारको प्रसन्न करनेवाली उज्ज्वल धारा है; यह दृश्य ऐसा प्रतीत
होता है कि मानों नीले पलंगपर शेषनाग सो रहे हैं। हे देवताओंकी स्वामिनी
श्रीगंगाजी ! तुम्हारे हजारों स्रोत शेषनागके हजार मस्तकके समान हैं ॥४॥ हे
त्रिपथगे ! तुम्हारी महिमा अपार है, रूप असंख्य हैं, तुम राजाओंकी मुकुट-
मणियोंसे वन्दनीय हो। हे माता ! हे शिव-प्रिये ! तुम भयको हरनेवाली हो;
तुलसीदासको श्रीरामजीके चरणोंमें पूर्ण प्रीति दो ॥५॥
विशेष
'जन्हुकन्याधन्य'—पद १७ के विशेष में देखिये।
१—'नील पर्यङ्क'—इस पूरी पंक्तिमें उत्प्रेक्षालङ्कार है। दोनों किनारोंका
हरित गम्भीर बेत वृक्ष ही नीला पलंग है; गङ्गाजीकी धवल धारा मानो
शेषनाग है; क्योंकि शेषका वर्ण उज्ज्वल है और गङ्गाकी धारा भी उज्ज्वल है।
गङ्गा भी हजारों धाराओंसे समुद्रमें मिली हैं; अतः वे धाराएँ ही मानो शेष-
नागके हजार फन हैं।
२—'भव-भामिनी'—हिमवानके दो कन्याएँ हुईं। बड़ीका नाम गङ्गाजी
और छोटीका नाम उमा था। गङ्गाजीको लोक-कल्याणार्थ देवता लोग माँग ले
गये और उमाका विवाह शिवजीके साथ हुआ। जब बहुत दिनोंतक उमासे
कोई सन्तान नहीं हुई, तब शिवजीने सन्तानोत्पत्ति के लिए तेज छोड़ा। उस
तेजको श्रीगङ्गाजीने धारण किया। उससे कार्त्तिकेयकी उत्पत्ति हुई। देवताओं-
ने उनके दूध पिलानेका भार षट्कृत्तिकाको दिया। षट्कृत्तिकाने उनके
विनय-पत्रिका २९
पालनका भार इस शर्तपर लिया कि वह षट्कृत्तिकाके ही पुत्र कहे जायँ । देव-
लोकने इस शर्तको स्वीकार कर लिया । फिर क्या था, षट्कृत्तिकाने
स्वामिकार्त्तिकको दूध पिलाकर सयाना दिया । इसीसे उनका नाम कार्त्तिकेय
पड़ा । यही कारण है कि गोस्वामीजीने गंगाजीको 'भव-भामिनी' अर्थात् सिव-
प्रिया कहा है । महाराजाधिराज श्रीरघुराजसिंहने भी रामस्वयम्बरमें गंगाजीको
शिव-प्रिया लिखा है । यथाः-
"गंगा जेठी उमा दूसरी देवी शम्भु पियारी ।
जेहिविधि गमनी गंग सुरालै सो सब दियो उचारी ॥
( १९ )
हरनि पाप त्रिविध ताप सुमिरत सुरसरित ।
बिलसति महि कल्प-बेलि मुद, मनोरथ फरित ॥१॥
सोहत ससि धवल धार सुधा-सलिल-भरित ।
विमलतर तरंग लसत रघुवर कैसे चरित ॥२॥
तो बिनु जगदंब गंग कलिजुग का करित ?
घोर भव-अपार सिंधु तुलसी किमि तरित ॥३॥
शब्दार्थ—सुरसरित = देवनदी गंगाजी । बिलसति = शोभित । सलिल = जल ।
भरित = परिपूर्ण । तो = तुम्हारे ।
भावार्थ—हे गंगाजी ! स्मरण करते ही तुम कायिक, वाचिक और मान-
सिक तीनों पापों और दैहिक, दैविक, भौतिक इन तीनों दुःखोंको हर लेती हो ।
आनन्द और मनोरथरूपी फलोंसे लदी हुई कल्पलताके समान तुम पृथ्वीपर
सुशोभित हो ॥१॥ अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारी जो
उज्ज्वल धारा शोभायमान है, उसमें राम-चरितके समान अत्यन्त निर्मल तरंगें
शोभा पा रही हैं ॥२॥ हे जगज्जननी गंगे ! यदि तुम न होतीं, तो कलियुग
न-जानें क्या कर डालता ! उस अवस्थामें तुलसीदास इस भयंकर और अपार
संसार-सागरसे कैसे तरता ? ॥३॥