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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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विनय-पत्रिका २७
( १८ )
जयति जय सुरसरी जगदखिल-पावनी।
बिस्नु-पदकञ्ज-मकरन्द इव अम्बुवर
वहसि, दुख दहसि अघवृन्द-विद्राविनी ॥१॥
मिलित जलपात्र-अज जुक्त-हरिचरन रज,
विरज-चर-चारि त्रिपुरारि सिर-धामिनी।
जह्नु-कन्या धन्य, पुन्य कृत सगर-सुत,
भूधर द्रोनि-विद्दरनिवहु नामिनी ॥२॥
जच्छ, गन्धर्व, मुनि, किन्नरोरग, दनुज,
मनुज मज्जहिं सुकृत-पुञ्ज जुत-कामिनी।
स्वर्ग-सोपान, विज्ञान-ज्ञानप्रदे,
मोह-मद-मदन-पाथोज-हिम यामिनी ॥३॥
हरित गम्भीर वानीर दुहुँ तीर वर,
मध्य धारा विसद, विश्व-अभिरामिनी।
नील-परजंक-कृत-सयन सर्पेस जनु,
सहस सीसावली स्रोत सुर-स्वामिनी ॥४॥
अमित-महिमा, अमित रूप, भूपावली,
मुकुट-मनिद्य त्रैलोक पथ गामिनी।
देहि रघुवीर-पद-प्रीति निर्भर मातु,
दास तुलसी त्रास हरनि भव-भामिनी ॥५॥
शब्दार्थ—पावनी = पवित्र करनेवाली। मकरन्द = मधु। विद्राविनी = नाश करने-
वाली। विरज = निर्मल। द्रोनि = कन्दरा। विद्दरनि = विदीर्ण करनेवाली। किन्नरोरग =
(किन्नर + उरग) किन्नर और नाग। पाथोज = कमल। वानीर = बेंत वृक्ष। विसद =
उज्ज्वल। परजंक = पर्यङ्क, पलंग।
भावार्थ—हे समूचे संसारको पवित्र करनेवाली गंगे! तुम्हारी जय हो,
जय हो। तुम विष्णु भगवान्‌के चरण-कमलोंमें मधुके समान सुन्दर जल धारण
करनेवाली हो, दुःखोंको जला डालनेवाली हो और पाप-पुंजको नाश करनेवाली
हो ॥१॥ विष्णु भगवान्‌की चरण-रजसे संयुक्त तुम्हारा निर्मल (रजोगुणका नाश