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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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१४ विनय-पत्रिका
भैरवरूप शिवस्तुति
( ११ )
भीषणाकार भैरव भयंकर भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति विपत्ति-हरता ।
मोह-मूपक-मार्जार, संसार-भय-हरन, तारन-तरन, अभय-करता ॥१॥
अतुल-बल विपुल विस्तार विग्रह गौर, अमल अति धवल धरनीधरभं ।
सिरसि संकुलित-कल-जूटपिंगलजटा, पटल सत-कोटि विद्युच्छटाभं ॥२॥
भ्राज विबुधापगा आप पावन परम, मौलि-मालेव सोभा विचित्रं ।
ललित ललाटपर राज रजनीस-कल, कलाधर नौमि हर धनद मित्रं ॥३॥
इन्दु-पावक भानु-नयन मर्दन मयन, गुन-अयन ज्ञान-विज्ञान-रूपं ।
ख्वन-गिरिजा भवन भूधराधिप सदा, श्रवन कुंडल वदन छवि अनूपं ॥४॥
चर्म्म-असि-सूल-धर,डमरु-सर-चाप कर, जान वृषभेस करुना-निधानं ।
जरत सुर-असुर नर-लोक सोकाकुलं,मृदुलचित अजित कृत गरलपानं ॥५॥
भस्म तनु भूषनं, व्याघ्र चम्मोम्बरं, उरग-नर-मौलि उर-मालधारी ।
डाकिनी साकिनी खेचरं भूचरं जंत्र मंत्र भंजन प्रवल कल्मपारी ॥६॥
काल अतिकाल कलिकाल व्यालाद खग, त्रिपुर-मर्दन भीम कर्मभारी ।
सकल लोकान्त-कल्पान्त सूलाग्रकृत, दिग्गजाब्यक्त गुन नृत्यकारी ॥७॥
पाप-सन्ताप घनघोर-संस्कृति दीन भ्रमत जग-जोनि नहिं कोपि त्राता ।
पाहि भैरव रूप राम रूपी रुद्र, बन्धु, गुरु, जनक जननी विधाता ॥८॥
यस्य गुन-गन गनति विमलमसि सारदा, निगम नारद प्रमुख ब्रह्मचारी ।
सेस सर्वैस आसीन आनन्द-वन, दास तुलसी प्रनत त्रासहारी ॥९॥
शब्दार्थ—एक भैरव = शिवजीका एक नाम। वामन पुराणके ६७ वें अध्यायमें अष्ट
भैरवका उल्लेख है। विग्रह = शरीर। मार्जार = बिलाव। धरनीधर = शेषनाग अथवा हिमालय
पर्वत। कल = सुन्दर। पटल = समूह, राशि। विबुधापगा = देवनदी गंगा। मौलि = मस्तक।
धनद = कुबेर। मयन = कामदेव। ख्वन = कान। चर्म = ढाल। वृषभ + ईस = बैलोंमें
श्रेष्ठ नन्दी। खेचर = आकाशमें विचरण करनेवाले। कल्मष + अरि = पापको भस्म करने-
वाले। ब्याल + आद = साँपको भक्षण करनेवाले। कोपि = कोई भी। निगम = वेद।
भावार्थ—हे भीषणाकार भैरव ! हे भयंकर भूत-प्रेत और गणोंके स्वामी !

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