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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 40

विनय-पत्रिका २९
पालनका भार इस शर्तपर लिया कि वह षट्कृत्तिकाके ही पुत्र कहे जायँ । देव-
लोकने इस शर्तको स्वीकार कर लिया । फिर क्या था, षट्कृत्तिकाने
स्वामिकार्त्तिकको दूध पिलाकर सयाना दिया । इसीसे उनका नाम कार्त्तिकेय
पड़ा । यही कारण है कि गोस्वामीजीने गंगाजीको 'भव-भामिनी' अर्थात् सिव-
प्रिया कहा है । महाराजाधिराज श्रीरघुराजसिंहने भी रामस्वयम्बरमें गंगाजीको
शिव-प्रिया लिखा है । यथाः-
"गंगा जेठी उमा दूसरी देवी शम्भु पियारी ।
जेहिविधि गमनी गंग सुरालै सो सब दियो उचारी ॥
( १९ )
हरनि पाप त्रिविध ताप सुमिरत सुरसरित ।
बिलसति महि कल्प-बेलि मुद, मनोरथ फरित ॥१॥
सोहत ससि धवल धार सुधा-सलिल-भरित ।
विमलतर तरंग लसत रघुवर कैसे चरित ॥२॥
तो बिनु जगदंब गंग कलिजुग का करित ?
घोर भव-अपार सिंधु तुलसी किमि तरित ॥३॥
शब्दार्थ—सुरसरित = देवनदी गंगाजी । बिलसति = शोभित । सलिल = जल ।
भरित = परिपूर्ण । तो = तुम्हारे ।
भावार्थ—हे गंगाजी ! स्मरण करते ही तुम कायिक, वाचिक और मान-
सिक तीनों पापों और दैहिक, दैविक, भौतिक इन तीनों दुःखोंको हर लेती हो ।
आनन्द और मनोरथरूपी फलोंसे लदी हुई कल्पलताके समान तुम पृथ्वीपर
सुशोभित हो ॥१॥ अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारी जो
उज्ज्वल धारा शोभायमान है, उसमें राम-चरितके समान अत्यन्त निर्मल तरंगें
शोभा पा रही हैं ॥२॥ हे जगज्जननी गंगे ! यदि तुम न होतीं, तो कलियुग
न-जानें क्या कर डालता ! उस अवस्थामें तुलसीदास इस भयंकर और अपार
संसार-सागरसे कैसे तरता ? ॥३॥