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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 30

विनय-पत्रिका १९
विष पान किया, ऐसे महादेवजीके समान उपकारी संसारमें दूसरा कौन है !
॥७॥ कल्प-कल्पान्ततक अनेक तरहके उपाय क्यों न करो, शिवजीकी कृपाके
बिना संसारका विवेक यानी संसारके सत्-असत् आदिका ज्ञान नहीं हो सकता
॥८॥ तुलसीदास कहते हैं कि विज्ञानके घर तथा पार्वतीके पति शिवजी मेरे
भयका नाश करनेवाले हैं ॥९॥
विशेष
१—'निर्गुन'का अर्थ अशरीरी या निराकार भी है। किन्तु इस पदमें
आगे निराकार भी कहा गया है, इसलिए यहाँ निर्गुनका अर्थ त्रिगुणातीत करना
ही अधिक संगत है। सत्त्व-रज-तम ये ही तीन गुण हैं जिनसे सृष्टिकी उत्पत्ति
होती है।
२—'निराकार'—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँच भूतोंसे
बने हुए शरीरसे रहित।
३—'भव-विवेक'—इसका शाब्दिक अर्थ है संसारके स्वरूपका निश्चय।
आशय यह कि शिव-कृपाके बिना वास्तविक ज्ञान—सत् और असत्‌का बोध
नहीं होता।
( १४ )
देखो देखो, बन बन्यो आजु उमाकन्त ।
मानो देखन तुमहि आयी ऋतु बसन्त ॥१॥
जनु तनुदुति चम्पक-कुसुम-माल । वर बसन नील नूतन तमाल ॥२॥
कल कदलि जंघ पद कमल लाल । सूचत कटि केहरि, गति मराल ॥
भूषन प्रसून बहु विविध रंग । नूपुर किंकिनि कलरव विहंग ॥४॥
कर नवल बकुल-पल्लव रसाल । श्रीफल कुच, कंचुकि लता-जाल ॥५॥
आनन सरोज, कच मधुप गुंज । लोचन विसाल नवनील कंज ॥६॥
पिक बचन चरित बर बरहि कीरि । सित सुमन हास, लीला समीर७
कह तुलसिदास सुनु सिव सुजान । उर वसि प्रपंच रचे पंचवान ॥८॥
करि कृपा हरिय भ्रम फन्द काम । जेहि हृदय बसहिं सुखरासि राम९.