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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 475 में से

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पृष्ठ 22

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

विनय-पत्रिका ११
रामचन्द्रजीके चरण-कमलोंमें, स्वप्नमें भी भक्ति नहीं हो सकती ॥ २ ॥ ऋषि,
सिद्ध, मुनि, मनुष्य, दैत्य, देवता तथा संसारमें अन्य जितने जीव हैं, आपके
चरणोंसे विमुख होकर भव-सागरका पार नहीं पाते—कल्प-कल्पान्त बीतता
चला जाता है ॥ ३ ॥ सर्प आपके आभूषण हैं और दूषण दैत्यके मारनेवाले
श्रीरामजीके आप सेवक हैं। हे देवाधिदेव, आप त्रिपुरासुरके संहारकर्ता हैं।
हे शंकर ! आप अज्ञान-रूपी पालाके लिए सूर्य हैं, और शरणागतोंका शोक
और भय दूर करनेवाले हैं ॥ ४ ॥ हे काशीपुरीके स्वामी ! आप पार्वतीके मन-
रूपी मानसरोवरके हंस हैं, और श्मशान-निवासी हैं। तुलसीदासको श्रीहरिके
श्रेष्ठ चरणारविन्दोंमें अटल भक्ति दीजिये ॥ ५ ॥
विशेष
१—प्रारम्भमें दो बार 'सिव सिव' कहना आर्त्ति-सूचक है। इसे वीप्सा
कहते हैं।
राग धनाश्री
( १० )
मोह-तम तरनि, हर रुद्र संकर सरन, हरन मम सोक लोकाभिरामं ।
बाल-ससि भाल, सुविसाल लोचन-कमल, काम-सत-कोटि-लावन्य-धामं
कम्बु-कुन्देन्दु-कर्पूर-विग्रह रुचिर, तरुन-रबि कोटि तनु-तेज भ्राजै ।
भस्म सर्वांग अर्धांग सैलात्मजा, ब्याल-नृकपाल-माला विराजै ॥२॥
मौलि संकुल जटा-मुकुट विद्युच्छटा, तटिनि-बर-वारि हरि-चरन-पूतं
श्रवन कुंडल, गरल कंठ, करुनाकन्द, सच्चिदानन्द वन्देऽवधूतं ॥३॥
सूल-सायक-पिनाकासि कर, सत्रु-वन,दहन इव धूमध्वज, वृषभ-जानं
व्याघ्र-गज-चर्म-परिधान, विज्ञान-घन, सिद्ध-सुर-मुनि मनुज-सेव्यमानं
तांडवित-नृत्यपर, डमरु डिंडिम प्रवर, असुभ इव भाति कल्यानरासी
महा कल्पान्त ब्रह्मांड मंडल दवन, भवन कैलास आसीन कासी ॥५॥
तज्ञ, सर्वज्ञ, जज्ञेस, अच्युत, विभो, विस्व भवदस संभव पुरारी ।
ब्रह्मेन्द्र, चन्द्रार्क, वरुनाग्नि, वसु, मरुत, जम, अर्चि भवदंघ्रि सर्वाधिकारी

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