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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

चार्वाकादिमत निराकरण

२१६ वेदान्तसार
अवतरणिका-इसप्रकार अज्ञान के कारण चैतन्य में प्रतिभासित होने
वाले सम्पूर्ण जगत्प्रपञ्च के विकास की समष्टिव्यष्टिविषयक मान्यताओं एवं
उनमें ऐक्य का प्रतिपादन करने के पश्चात् आत्माविषयक अनेक प्रकार की
भ्रान्तधारणाओं का निराकरण तथा श्रुति में उनके विषय में वर्णित औचित्य
के विषय में कहते हैं-
इदानीं प्रत्यगात्मनीदमिदमयमयमारोपयतीति विशेषत उच्यते।
अतिप्राकृतस्तु “आत्मा वै जायते पुत्र” इत्यादिश्रुतेः स्वस्मिन्निव
स्वपुत्रेऽपि प्रेमदर्शनात्पुत्रे पुष्टे नष्टे चाहमेव पुष्टो नष्टश्चेत्याद्यनुभवाच्च पुत्र
आत्मेति वदति।
चार्वाकस्तु “स वा एष पुरुषोऽन्नरसमय” इत्यादिश्रुतेः
प्रदीप्तगृहात्स्वपुत्रं परित्यज्यापि स्वस्य निर्गमदर्शनात्स्थूलोऽहं
कृशोऽहमित्याद्यनुभवाच्च स्थूलशरीरमात्मेति वदति।
अपरश्चार्वाकः “ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्य ब्रूयुः”
इत्यादिश्रुतेरिन्द्रियाणामभावे शरीरचलनाभावात्काणोऽहं
बधिरोऽहमित्याद्यनुभवाच्चेन्द्रियाण्यात्मेति वदति।
अपरश्चार्वाकः “अन्योऽन्तर आत्माप्राणमय” इत्यादिश्रुतेः प्राणाभाव
इन्द्रियादिचलनायोगादहमशनायावानहं पिपासावानित्याद्यनुभवाच्च प्राण
आत्मेति वदति।
अन्यस्तु चार्वाकः “अन्योऽन्तर आत्मा मनोमय” इत्यादिश्रुतेर्मनसि
सुप्ते प्राणादेरभावादहं सङ्कल्पवानहं विकल्पवानित्याद्यनुभवाच्च मन
आत्मेति वदति।
बौद्धस्तु “अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमय” इत्यादिश्रुतेः कर्तुरभावे
करणस्य शक्त्यभावादहं कर्ताहं भोक्तेत्याद्यनुभवाच्च बुद्धिरात्मेति वदति।
प्राभाकरतार्किकौ तु “अन्योऽन्तर आत्मानन्दमय” इत्यादिश्रुते-
र्बुद्ध्यादीनामज्ञाने लयदर्शनदहमज्ञोऽहमज्ञानीत्याद्यनुभवाच्चाज्ञानमात्मेति
वदतः।
भाट्टस्तु “प्रज्ञानघन एवानन्दमय” इत्यादिश्रुतेः सुषुप्तौ
प्रकाशाप्रकाशसद्भावान्मामहं न जानामीत्याद्यनुभवाच्चाज्ञानोपहितं
चैतन्यमात्मेति वदति।
अपरो बौद्धः “असदेवेदमग्र आसीत्” इत्यादिश्रुतेः सुषुप्तौ
सर्वाभावादहं सुषुप्तौ नासमित्युत्थितस्य स्वाभावपरामर्शविषयानुभवाच्च
शून्यमात्मेति वदति॥१९॥

चार्वाकादिमत-निराकरण २१७

पदच्छेद- इदानीम् प्रत्यग् आत्मनि इदम्-इदम्, अयम्-अयम् आरोपयंति,
इति विशेषतः उच्यते-
(1) अतिप्राकृतः तु-“आत्मा वै जायते पुत्रः” इत्यादि श्रुतेः, स्वस्मिन्
इव स्वपुत्रे अपि प्रेमदर्शनात् पुत्रे पुष्टे नष्टे च अहम् एव पुष्टः नष्टः च
इत्यादि अनुभवात् च पुत्रः आत्मा इति वदति।
(2) चार्वाकः तु-“सः वै एष पुरुषः अन्नरसमयः” इत्यादि श्रुतेः।
प्रदीप्तगृहात् स्वपुत्रम् परित्यज्य अपि स्वस्य निर्गमदर्शनात्, स्थूलः अहम्,
कृशः अहम् इत्यादि अनुभवात् च स्थूलशरीरम् आत्मा, इति वदति।
(3) अपरः चार्वाकः “ते ह प्राणाः प्रजापतिम् पितरम् एत्य ब्रूयुः”
इत्यादि श्रुतेः, इन्द्रियाणाम् अभावे शरीरचलनाभावात्, काणः अहम्, बधिरः
अहम्, इत्यादि अनुभवात् च इन्द्रियाणि आत्मा, इति वदति।
(4) अपरः चार्वाकः “अन्यः अन्तरः आत्मा प्राणमयः” इत्यादि श्रुतेः,
प्राण-अभावे इन्द्रियादि-चलन-अयोगाद्, अहम् अशनायावान्, अहम्
पिपासावान् इत्यादि अनुभवात् च प्राणाः आत्मा इति वदति।
(5) अन्यः तु चार्वाकः “अन्यः अन्तरः आत्मा मनोमयः” इत्यादि श्रुतेः,
मनसि सुप्ते प्राणादेः अभावाद् अहम् सङ्कल्पवान्, अहम् विकल्पवान् इत्यादि
अनुभवात् च मनः आत्मा इति वदति।
(6) बौद्धः तु “अन्यः अन्तर आत्मा विज्ञानमयः” इत्यादि श्रुतेः, कर्तुः
अभावे करणस्य शक्ति-अभावात्, अहम् कर्ता, अहम् भोक्ता, इत्यादि
अनुभवात् च बुद्धिः आत्मा इति वदति।
(7) प्राभाकरतार्किकौ तु “अन्यः अन्तरः आत्मा आनन्दमयः” इत्यादि
श्रुतेः बुद्धि-आदीनाम् अज्ञाने लयदर्शनात् अहम् अज्ञः, अहम् अज्ञानी, इत्यादि
अनुभवात् च अज्ञानम् आत्मा इति वदतः।
(8) भाट्टः तु “प्रज्ञानघन एव आनन्दमयः” इत्यादि श्रुतेः, सुषुप्तौ
प्रकाश-अप्रकाश-सद्भावात् माम् अहम् न जानामि, इत्यादि अनुभवात् च
अज्ञान-उपहितम् चैतन्यम् आत्मा, इति वदति।
(9) अपरः बौद्धः “असद् एव इदम् अग्रे आसीत्” इत्यादि श्रुतेः,
सुषुप्तौ सर्व-अभावाद् ‘अहम् सुषुप्तौः न आसम्’ इति उत्थितस्य
स्व-अभावपरामर्श-विषय-अनुभवात् च शून्यम् आत्मा इति वदति।।19।।

२१८ वेदान्तसार
अनुवाद- अब अन्तरात्मारूप चैतन्य में 'यह आत्मा है', 'यह आत्मा है',
इसप्रकार जो आरोप किया जाता है, विशेषरूप से (उसके विषय में) कहा
जा रहा है-
(1) अत्यन्त सामान्यलोग तो 'आत्मा ही पुत्ररूप में उत्पन्न होता है',
इत्यादि श्रुति के वचन से एवं अपने समान ही अपने पुत्र में भी प्रेम को
देखने के कारण, पुत्र के पुष्ट एवं नष्ट होने पर 'मैं ही पुष्ट एवं नष्ट हो
गया' इत्यादि अनुभव के कारण 'पुत्र ही आत्मा है', इसप्रकार कहते हैं।
(2) चार्वाक् (मतानुयायी) तो "वह यह पुरुष अन्नरस का विकार है'
इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, जलते हुए घर में अपने पुत्र को भी छोड़कर
स्वयं के (बाहर) निकल आने को देखकर, मैं मोटा हूँ, मैं पतला हूँ,
इत्यादि अनुभव के कारण, (यह) स्थूलशरीर ही आत्मा है, इसप्रकार कहता
है।
(3) अन्य चार्वाक् (मतानुयायी) 'वे प्राण अर्थात् इन्द्रियाँ प्रजापति के
पास जाकर बोलीं' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, इन्द्रियों के अभाव में
शरीर में गति का अभाव होने से, 'मैं काना हूँ', 'मैं बहरा हूँ' इत्यादि
अनुभवों के कारण, 'इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं', इसप्रकार कहता है।
(4) अन्य चार्वाक् (मतानुयायी) 'आन्तरिक आत्मा (इससे) भिन्न
अर्थात् प्राणरूप है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, प्राणों के अभाव में
इन्द्रिय आदि में गति न होने से, 'मैं भूखा हूँ', 'मैं प्यासा हूँ' इत्यादि
अनुभव के कारण, 'प्राण ही आत्मा है', ऐसा कहता है।
(5) अन्य चार्वाक् (मतानुयायी) तो 'आन्तरिक आत्मा (इससे) भिन्न
अर्थात् मनोमय है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, मन के प्रसुप्त होने पर
प्राणादि का अभाव होने से, 'मैं सङ्कल्पवान् हूँ', 'मैं विकल्पवान् हूँ' इत्यादि
अनुभव के कारण, 'मन ही आत्मा है' इसप्रकार कहता है।
(6) बौद्ध (मतानुयायी) तो 'आन्तरिक आत्मा (इससे) अलग अर्थात्
विज्ञानमय है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, कर्ता के अभाव में करण की
शक्ति का अभाव हो जाने के कारण, मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ इत्यादि
अनुभव से, 'बुद्धि ही आत्मा है' इसप्रकार कहता है।
(7) प्रभाकर अनुयायी एवं न्याय (मतावलम्बी) तो 'आन्तरिक आत्मा
(इस सबसे) भिन्न अज्ञानमय है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, बुद्धि आदि

चार्वाकादिमत-निराकरण २९९
का अज्ञान में लय होता देखने से, 'मैं अज्ञानी हूँ', 'मैं अज्ञानी हूँ', इत्यादि
अनुभव के कारण, 'अज्ञान ही आत्मा है' इसप्रकार कहते हैं।
(8) कुमारिलभट्ट के (मतानुयायी) तो 'अज्ञानघन और आनन्दमय ही
आत्मा है' इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार, सुषुप्ति अवस्था में प्रकाश एवं
अप्रकाश दोनों के विद्यमान होने से, 'मैं स्वयं को नहीं जानता हूँ', इत्यादि
अनुभव के कारण, 'अज्ञानरूप उपाधि से युक्त चैतन्य ही आत्मा है'
इसप्रकार कहता है।
(9) अन्य बौद्ध (मतानुयायी) - 'सृष्टि से पूर्व यह असत् (शून्य) ही
था' इत्यादि श्रुति का वचन, सुषुप्ति अवस्था में सबका अभाव होने के
कारण, 'मैं सुषुप्ति अवस्था में नहीं था' उठने पर ऐसे अपने अभावरूप
परामर्शविषयक अनुभव होने के कारण, 'शून्य ही आत्मा है' इसप्रकार
कहता है।
'चन्द्रिका' - उक्त अंश की व्याख्या के लिए द्रष्टव्य भूमिका में शीर्षक
(23) - आत्मा विषयक विभिन्न मत। पृष्ठ संख्या-(98)।
विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार के समय में आत्मा के
सम्बन्ध में प्रचलितमतों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है।
(2) यहाँ आत्मा के सम्बन्ध में स्थूलतम से सूक्ष्म की ओर जाते हुए
तत्तत् मत को श्रुति, तर्क एवं अनुभव के आधार पर पुष्ट करते हुए पूर्वपक्ष
का प्रतिपादन किया गया है।
(3) चार्वाक-नास्तिक विचारधारा के लोग, जो केवल भोगवाद में
विश्वास करते थे। इनकी बातें सामान्यतया सुनने में अच्छी लगने के कारण
सम्भवतः इन्हें 'चारु वाक्' कहा गया।
(4) अपरः चार्वाकः शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीनसमय में
सम्भवतः चार्वाक मतावलम्बियों में भी भिन्न-भिन्न मत विद्यमान थे।
(5) मतसंख्या तीन में 'प्राण' शब्द 'इन्द्रिय' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
(6) प्रकाशाप्रकाशसद्भावात्-सुषुप्ति अवस्था में ज्ञान एवं अज्ञान दोनों
ही विद्यमान रहते हैं। यहाँ प्रकाश, ज्ञान का तथा अप्रकाश, अज्ञान का
प्रतीक है।
(7) प्रज्ञानघन से अभिप्राय अज्ञान की अपेक्षा ज्ञान के आधिक्य से है।
(8) 'भाट्ट' शब्द का प्रयोग कुमारिलभट्ट के अनुयायी मीमांसकों के
लिए प्रयुक्त हुआ है।

२२० वेदान्तसार
(9) तार्किक से अभिप्राय न्यायसिद्धान्त के मतावलम्बी विद्वानों से है।
(10) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते
हैं—
चित्र-४६
आत्मा
(1) पुत्र ───→ श्रुति ──→ आत्मा वै जायते पुत्रः
(साधारण व्यक्ति) ── तर्क ──→ अपने समान ही पुत्र के प्रति प्रेम
── अनुभव──→ पुत्र के नष्ट होने पर 'मैं नष्ट हो गया'
(2) शरीर ───→ श्रुति ──→ सः वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः
(चार्वाक) ── तर्क ──→ आग में जलते पुत्र को छोड़कर स्वयं को बचाना
── अनुभव──→ मैं पतला हूँ, मैं मोटा हूँ
(3) इन्द्रिय ───→ श्रुति ──→ ते ह प्राणा प्रजापतिः पितरमेत्य ब्रूयुः
(चार्वाक) ── तर्क ──→ इन्द्रियों के बिना शरीर में गति का अभाव
── अनुभव──→ मैं काना हूँ, मैं बहरा हूँ
(4) प्राण ───→ श्रुति ──→ अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः
(चार्वाक) ── तर्क ──→ प्राणों के बिना इन्द्रियों में गति का अभाव
── अनुभव──→ मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ
(5) मन ───→ तर्क ── अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः (श्रुति)
(चार्वाक) ────── मन की अनुपस्थिति में इन्द्रियों द्वारा कार्य न
────────── कर पाना, मैं सङ्कल्पवान् हूँ। (अनुभव)
(6) बुद्धि ───→ तर्क ── अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः (श्रुति)
(बौद्ध) ────── कर्ता के अभाव में करण की शक्ति का
────────── अभाव, मैं कर्ता, मैं भोक्ता। (अनुभव)
(7) अज्ञान ─── तर्क ── अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः (श्रुति)
(मीमांसक, ────── बुद्धि आदि का भी अज्ञान में लय होता है।
नैयायिक) ────── मैं अज्ञानी हूँ (अनुभव)
(8) अज्ञानोपहितचैतन्य ──→ प्रज्ञानघन एवानन्दमयः (श्रुति)
(भाट्ट मीमांसक) ── सुषुप्ति अवस्था में ज्ञान अज्ञान दोनों की स्थिति
────────── का रहना। (तर्क)
────────── मैं स्वयं को नहीं जानता हूँ (अनुभव)
(9) शून्य ───→ ── असदेवेदमग्र आसीत् (श्रुति)
(बौद्ध) ────── सुषुप्ति अवस्था में सबका अभाव (तर्क)
────────── मैं सुषुप्ति अवस्था में नहीं था। (अनुभव)

चार्वाकादिमत-निराकरण २२१
अवतरणिका-इसप्रकार विभिन्नमतों में आत्माविषयक मतों का निरूपण
पूर्वपक्ष के रूप में करने के पश्चात् 'पुत्रादि' का 'आत्मा न होना'
प्रतिपादित करते हुए श्रुतियों के प्रामाण्य को सिद्ध भी करते हैं-
एतेषां पुत्रादीनामनात्मत्वमुच्यते। एतैरतिप्राकृतादिवादिभिरुक्तेषु
श्रुतियुक्त्यनुभवाभासेषु पूर्वपूर्वोक्तश्रुतियुक्त्यनुभवाभासानामुत्तरोत्तर-
श्रुतियुक्त्यनुभवाभासैरात्मत्वबाधदर्शनात्पुत्रादीनामनात्मत्वं स्पष्टमेव।
किञ्च प्रत्यगस्थूलोऽचक्षुरप्राणोऽमना अकर्ता चैतन्यं चिन्मात्रं
सदित्यादिप्रबलश्रुतिविरोधादस्य पुत्रादिशून्यपर्यन्तस्य जडस्य
चैतन्यभास्यत्वेन घटादिवदनित्यत्वादहं ब्रह्मेति विद्वदनुभवप्राबल्याच्च
तत्तच्छ्रुतियुक्त्यनुभवाभासानां बाधितत्वादपि पुत्रादिशून्यपर्यन्त-
मखिलमनात्मैव। अतस्तत्तद्भासकं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसत्यस्वभावं
प्रत्यक्चैतन्यमेवात्मवस्त्विति वेदान्त विद्वदनुभवः। एवमध्यारोपः॥२०॥
पदच्छेद-एतेषाम् पुत्रादीनाम् अनात्मत्वम् उच्यते। एतैः
अतिप्राकृत-वादिभिः उक्तेषु श्रुति-युक्ति-अनुभव-आभासेषु पूर्व-पूर्वोक्त
श्रुति-युक्ति-अनुभव-आभासानाम् उत्तरोत्तर-श्रुति-युक्ति-अनुभव-आभासैः
आत्मत्व-बाधदर्शनात् पुत्रादीनाम् अनात्मत्वम् स्पष्टम् एव।
किञ्च प्रत्यग्-अस्थूलः अचक्षुः अप्राणः अमना अकर्ता चैतन्यम् चिन्मात्रम्
सद् इत्यादि प्रबलश्रुति-विरोधाद् अस्य पुत्रादिशून्यपर्यन्तस्य जडस्य चैतन्य-
भास्यत्वेन घटादिवद् अनित्यत्वाद् अहम् ब्रह्म इति, विद्वद्-अनुभवप्राबल्यात् च
तत् तत् श्रुति-युक्ति-अनुभव-आभासानाम् बाधितत्वाद् अपि पुत्रादि-
शून्यपर्यन्तम् अखिलम् अनात्मा एव।
अतः तत् तद् भासकम् नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-सत्यस्वभावम् प्रत्यक्
चैतन्यम् एव आत्मवस्तु, इति वेदान्त-विद्वद् अनुभवः। एवम् अध्यारोपः॥20॥
अनुवाद-(अब) इन पुत्र आदि का अनात्मत्व कहा जाता है। इन
अत्यन्त साधारणलोगों आदि द्वारा कहे गए श्रुति, युक्ति एवं अनुभव आभासों
में पूर्व-पूर्व में प्रतिपादित श्रुति-युक्ति और अनुभव आभासों का उत्तरोत्तर
श्रुति-युक्ति और अनुभव आभासों द्वारा, पुत्र आदि के आत्मा के बाधरूप
दर्शन से, उन (पुत्र-आदिकों) का आत्मा न होना स्पष्ट ही है।
इसके अतिरिक्त 'आन्तरिक आत्मा सूक्ष्म, अचक्षु, अप्राण, अमना,
अकर्ता, चैतन्यज्ञानस्वरूप एवं नित्य है' इत्यादि प्रबलश्रुतिविरोध से, पुत्र
आदि से लेकर शून्यपर्यन्त सबके जड़ एवं चैतन्य का आभासमात्र होने से,

२२२ वेदान्तसार
घट आदि के समान अनित्य होने के कारण, 'मैं ब्रह्म हूँ' इत्यादि विद्वानों के
अनुभव की प्रबलता से, उन-उन श्रुति, युक्ति और अनुभव आभासों के
बाधित होने के कारण भी 'पुत्र आदि से लेकर शून्यपर्यन्त सभी आत्मा नहीं
है।' यही सिद्ध होता है।
इसलिए उन-उन सभी वस्तुओं को प्रकाशित करने वाला नित्य, शुद्ध,
बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वभाव वाला प्रत्यक्चैतन्य ही आत्मा है एवं वस्तु है, ऐसा
ही वेदान्त के विद्वानों का अनुभव भी है। इसप्रकार (यही) अध्यारोप है।
'चन्द्रिका'-इससे पूर्व चार्वाक, बौद्ध, मीमांसक एवं नैयायिकों आदि
द्वारा पुत्र आदि को आत्मा बताए गए मतों को पूर्वपक्ष के रूप में स्थापित
करने के पश्चात् ग्रन्थकार प्रस्तुत गद्यखण्ड में पुत्र आदि विषयक उन
सिद्धान्तों का खण्डन करते हुए अपने मत की प्रस्थापना करते हैं-
मोटी बुद्धि वाले अत्यन्त साधारणलोगों एवं चार्वाक, बौद्धसिद्धान्तों के
समर्थक विद्वानों द्वारा श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करके, तर्क एवं
अनुभवरूप आभास को उद्धृत करते हुए क्रमशः जो आत्मा को पुत्र, शरीर,
इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, अज्ञान, शून्य आदि बताया गया, उसी प्रसङ्ग में
वहीं अपने-अपने मत की स्थापना के लिए जो श्रुतिवाक्य तर्क एवं अनुभव
रूप प्रमाण प्रस्तुत किए गए, उन-उन श्रुति-युक्ति एवं अनुभवरूप आभासों
द्वारा ही पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्त का, बाद में प्रतिपादित सिद्धान्त द्वारा स्वतः
ही खण्डन हो जाता है। अतः उनका अलग से पुनः खण्डन पिष्टपेषण ही
होगा। इसलिए उसका यहाँ खण्डन नहीं किया जा रहा है। साथ ही
पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्त का बाद में प्रतिपादित सिद्धान्त द्वारा खण्डन होने के
कारण शरीर, पुत्र आदि आत्मा नहीं है, यह बात भी स्पष्टरूप से प्रतीत
होती है।
इसके अलावा अनेक श्रुतिवचनों में उस आन्तरिक शुद्धचैतन्यरूप आत्मा
को सूक्ष्म, नेत्रेन्द्रिय आदि से दिखायी न देने वाला, प्राण एवं मन से भिन्न,
अकर्ता, चैतन्य, प्रकाशस्वरूप एवं नित्य बताया गया है। इन श्रुतिवचनों की
प्रबलता स्वतःसिद्ध है। इसके अतिरिक्त जिन सिद्धान्तों में पुत्र, शरीर,
इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि आदि से लेकर शून्य तक को आत्मा बताया गया
है, वे सिद्धान्त स्वतः निरस्त हो जाते हैं, क्योंकि पुत्र आदि से शून्यपर्यन्त
आत्मारूप में कहे गए तत्त्व वस्तुतः जड़ हैं, चैतन्य का आभासमात्र हैं।

चार्वाकादिमत-निराकरण २२३

साथ ही घट, पट आदि वस्तुओं के समान अनित्य हैं, नाशवान् हैं, अतः वे
आत्मा हो ही नहीं सकते हैं।
साथ ही वेदान्त के जीवन्मुक्त विद्वानों ने अपनी साधना द्वारा स्वयं को
'मैं ही ब्रह्म हूँ' इस रूप में अनुभव भी किया है। उनके अनुभव की
प्रबलता को देखते हुए, यही सिद्ध होता है कि इससे पूर्व विभिन्नमत
मतान्तर जो पुत्र आदि को आत्मा बताते रहे हैं, वे ठीक नहीं हैं, क्योंकि
उन्हीं द्वारा दी गई युक्तियों के आधार पर ही उत्तरोत्तर सिद्धान्त का खण्डन
स्वतः ही हो जाता है। अतः पुत्र आदि को आत्मा मानना उचित एवं
न्यायसंगत नहीं है।
पुनः प्रश्न उठता है कि यदि पुत्रादि आत्मा नहीं है तो फिर आपके मत
में आत्मा क्या है? इसी का प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि
'वस्तुतः सदैव विद्यमान रहने वाला पुत्रादि के समान कभी भी विनष्ट न
होने वाला, जन्म-मरण आदि दुःखों से रहित, सभीप्रकार के बन्धनों से
रहित, अपनी अभिव्यक्ति के लिए किसी भी अन्यप्रकार के प्रकाश की
अपेक्षां न रखने वाला, स्वयं प्रकाशक, मुक्तस्वभाव, सभी के अन्तःकरण में
विद्यमान रहने वाला, शुद्धचैतन्य ही आत्मा है। यही यथार्थ तत्त्व है, सत्य
है। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों के ज्ञाता
विद्वानों का अनुभव भी यही है।' इसप्रकार ब्रह्मरूप वस्तु का प्रतिपादन
करके ग्रन्थकार कहते हैं कि यही अध्यारोप है कि हम शुद्धचैतन्य को सत्य
न मानकर पुत्र आदि को सत्य मान बैठे हैं। अपने अज्ञानवश हमने अवस्तु
में वस्तु का आरोप किया हुआ है।
किन्तु इस सम्पूर्णप्रसङ्ग में यह शङ्का अत्यन्त स्वाभाविकरूप से होती है
कि कुछ श्रुतियों में पुत्र आदि को आत्मा कहा गया है तथा कुछ में उसके
आत्मत्व का विरोध किया गया है। इसलिए पुत्रादि के आत्मा होने सम्बन्धी
श्रुतियों को अप्रामाणिक कहा जाना तथा आत्मत्वसाधक श्रुतियों को
प्रामाणिक मानना, न्यायसंगत नहीं है क्योंकि श्रुति वेदवाक्य है। अतः वहाँ
कुछ प्रामाणिक हो तथा कुछ अप्रामाणिक यह संगत नहीं हो सकता है।
इसका यही समाधान दिया जा सकता है कि पुत्र आदि को आत्मा बताने
वाले श्रुतिवचन सर्वथा अप्रामाणिक नहीं हैं, अपितु उनमें स्थूल का ज्ञान
कराकर, साधक को सूक्ष्मविषय की ओर ले जाने का प्रयास किया गया है।
यह जटिलविषय को समझाने की एक शैली कही जा सकती है। इसीको