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वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

[ १२ ]

'यह मेरा हृदय कहता है' इस ज्ञान की भाँति अभ्यास भी प्रत्यक्ष ही है जैसे
आर्ष ज्ञान ।
अदृष्ट
वाक्यपदीय की ३६ वीं कारिका के आधार पर अदृष्ट प्रमाण की भी चर्चा की गई है । प्रेत
अथवा पितर भीत से बिना छिद्र बनाये हाथ बाहर निकाल देते हैं ये सिद्धियाँ अदृष्टजन्य ही
हैं । दूसरे दार्शनिक इसे भी आर्ष ज्ञान की भाँति प्रत्यक्ष ही मानते हैं । जैसे तपःसाध्य
आर्षज्ञान है वैसे ही पितरों की सिद्धियाँ भी हैं।
वाक्यपदीयकार ने उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि, सम्भव और ऐतिह्य नाम के प्रमाणों
की कोई चर्चा भी नहीं की है । सम्भवतः उन्होंने इन प्रमाणों को नगण्य माना हो ।
श्री म० म० तात्याशास्त्रि प्रभृति वैयाकरणों ने व्याकरण सिद्धान्त में सांख्य सिद्ध प्रमाण
मान्य कहे हैं । अत एव यह भी एक पक्ष प्रामाणिक प्रतीत होता है कि व्याकरण सिद्धान्त में
प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द तीन ही प्रमाण मान्य रहे हैं ।
इस प्रकार नित्य चेतन शब्द ब्रह्म की प्राप्ति के लिए उसकी प्राप्ति के साधन वेद के
प्रधान अङ्ग व्याकरण का अध्ययन आवश्यक, प्रामाणिक और आभ्युदयिक सिद्ध है । फिर भी
सर्वदा शब्द का प्रतिभास न होने में कोई कारण अवश्य होगा । इत्यादि अनेक शंकाओं के
समाधान के लिए शब्द के वास्तविक स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है ।
शब्द के दो रूप
वैयाकरणों ने शब्द के दो रूप स्वीकार किये हैं । एक निमित्त और दूसरा अर्थबोधक ।
स्फोट और वैखरी रूप से दो प्रकार के शब्दों में कार्यकारणभाव माना गया है ।
स्फोट
स्फोट वह शब्द है जहाँ अन्य शब्द छिपकर बैठे रहते हैं और जिसके अनुग्रह से शब्द
सुनाई पड़ते हैं तथा अर्थ का बोध होता है । स्फोट निमित्त और अर्थ बोधक भी है । श्रोता के
लिए वैखरी निमित्त है और स्फोट अर्थबोधक है क्योंकि पूर्वपूर्ववर्णों के नाश हो जाने से उत्तर-
उत्तर वर्ण के एक साथ न रहने से अर्थबोध नहीं हो सकता था । अतः स्फोट ही अर्थबोधक माना
गया है । वक्ता के तात्पर्य से स्फोट वैखरी का निमित्त है और वैखरी ही अर्थबोध (स्फोट
प्रकाशन) के लिए उच्चारित होती है । इन दोनों पक्षों में स्फोट ही अर्थबोधक स्वीकृत है ।
यद्यपि ध्वनियों के क्रम से जन्म लेने के कारण स्फोट सक्रम प्रतीत होता है तथापि वह
सक्रम नहीं है किन्तु जैसे मयूर के अण्डे के रस में मयूर के अंग प्रत्यंग अक्रम रहते हैं
किन्तु क्रम से ही विकसित होते हैं वैसे स्फोट भी अक्रम है किन्तु ध्वनि के क्रम से उच्चरित
होने से स्फोट में सक्रमता प्रतीत होती है। इसी प्रकार शब्द में वर्ण, पद, वर्णावयव,
पदावयव, जाति, व्यक्ति, खण्ड आदि प्रतीतियाँ भ्रम हैं। वस्तुतः एक तथा सत्य वाक्य
ही स्फोट है ।
जगत् शब्द का विवर्त है
वाक्यपदीयकार ने जगत् को शब्द का विवर्त और परिणाम दोनों माना है यह 'शब्दस्य
परिणामोऽयम्'-'एतद्विश्वं व्यवर्त्तत' इस कारिका से सिद्ध होता है । कुछ ऐसे वचन
मिले हैं जिनसे परिणाम और विवर्त शब्द में पर्यायता प्रतीत होती है जैसे भवभूति ने

[ १४ ]

'आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान् विकारान्' कहा है। विकार और परिणाम पर्याय शब्द हैं।
बुद्बुद पानी का विवर्त है विकार नहीं। फिर भी दोनों शब्दों के व्यवहार में साङ्कर्य कहा
है। स्फोट सिद्धि के प्रारम्भ में गोपालिका टीकाकार ने शब्द को जगत् का विवर्त और विकार
दोनों माना है। उनका कहना है कि स्फोट का विवर्त जगत् है किन्तु ध्वनि अथवा वैखरी
का परिणाम है। यह उचित भी प्रतीत होता है। अब 'वागेव विश्वाभुवनानि जज्ञे' 'सभूरिति
व्याहरद् भुवनमसृजद्' श्रुतियाँ भूर्व्याहार को जगत् सृष्टि में कारण मानती हैं तब वैखरीका
परिणाम जगत् मान लेने में कोई हानि नहीं प्रतीत होगी।

शब्द से सृष्टि प्रक्रिया

वैयाकरणों के मत से सृष्टि का क्रम इस प्रकार मान्य है। सृष्टि के आरम्भ में पश्यन्ती
वाग्रूपी शब्द ब्रह्म ने अपनी अपरिमित शक्ति वाली माया के साथ होकर विभिन्न प्रकार के
प्राणियों के कर्मों की सहायता से समस्त नाम रूपात्मक जगत् को बुद्धिस्थ करके 'यह मैं
करूँगा' संकल्प करता है और तब अपनी स्वतन्त्र शक्ति 'कालशक्ति' के साथ आकाशादिकों
की, उसके बाद भूतों की सृष्टि करता है। कहा भी है कि—
'यः सर्वपरिकल्पनानामाभासेऽप्यनवस्थितः।
तर्कांगमानुमानेन बहुधा परिकल्पितः ॥
अन्तर्यामी स भूतानामाराद् दूरे च दृश्यते ।
सोऽत्यन्तमुक्तो मोक्षाय मुमुक्षुभिरुपास्यते ॥
तस्यैकमपि चैतन्यं बहुधा प्रविभज्यते ।
अंगाराङ्कितमुत्पाते वारिराशेरिवोदकम् ॥
त्रयीरूपेण तज्ज्योतिः प्रथमं परिवर्तते ।
ब्रह्मेदं शब्दनिर्माणं शब्दशक्तिनिबन्धनम् ॥
विवृत्तं शब्दमात्राभ्यस्ततश्चैव प्रविलीयते ।'
'जो प्रलय के बाद भी स्थिर है, जिसकी तर्क, आगम और अनुमान द्वारा अनेक प्रकार से
कल्पना की गई है, जो समस्त प्राणियों के दूर और अन्तर विद्यमान है, जो मुक्त है और
मोक्षार्थी जिसकी उपासना करते हैं उसीका एक चैतन्य अनेक रूप में विभक्त है। जिसकी
प्रथम ज्योति त्रयी (वेद) रूप में परिणत होती है वह शब्द है और उसी की मात्रा से
जगत् का विवर्त हुआ है और उसी में यह विलीन होता है।'
नागेशभट्ट ने सृष्टि का क्रम कुछ दूसरा ही स्वीकार किया है। जैसे 'प्रलय काल में
समस्त प्राणियों के भोग्य कर्मों का जब प्रक्षय हो जाता है तब जगत् माया में और माया
ईश्वर में लीन हो जाती है। यह लीनता नाश नहीं है किन्तु सुप्त होना है। उसके बाद जो
कर्म फल देने योग्य नहीं थे काल वश फल देने के लिए उन्मुख हुए तब भगवान् का माया
और पुरुष के रूप में अबुद्धिपूर्वक सृष्टि होती है फिर परमेश्वर में सृष्टि चलाने की इच्छा
रूपा माया वृत्ति का उदय होता है और अव्यक्त, त्रिगुण बिन्दु उत्पन्न होता है। इसे ही
'शक्तितत्त्व' कहते हैं। इस बिन्दु में तीन अंश हैं। चिदंश (बीज) चिदचिन्मिश्र अंश
नाद (परावाक्) चिदंश बिन्दु। इस प्रकार उत्पन्न नाद ही परावाक् है जिसे वाक्य-
पदीयकार ने धात्वर्थसृष्टिस्थिति अथवा प्रवाहनित्यता के आधारपर अनादिनिधन शब्द से
कहा है। वस्तुतः शब्द अनादि और अनन्त नहीं है।'

[ १५ ]
यह ही मत 'प्रपञ्चसार' में (जो तन्त्रशास्त्र का ग्रन्थ है) प्रतिपादित है जैसे—
प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम।
अणोरणीयसी स्थूलात्स्थूला व्याप्तचराचरा ॥
स जानाति विपाकांश्च तस्यां सम्यग्ववस्थितान् ।
सा तत्त्वसंज्ञा चिन्मात्रा ज्योतिषः सन्निधेस्तदा ॥
विचिकीपुर्घनीभूतः सा चिदभ्येति विन्दुताम् ।
काले न भिद्यमानस्तु स विन्दुर्भवेति त्रिधा ॥
स्थूलसूक्ष्मपरत्वेन तस्य त्रैविध्यमिष्यते ।
स बिन्दुनादबीजत्वभेदेन च निगद्यते ॥
विन्दोस्तस्माद्भिद्यमानाद्रवोऽव्यक्तात्मकोऽभवत् ।
स रवः श्रुतिसम्पन्नैः शब्दब्रह्मेति कथ्यते ॥ इत्यादि।
तात्पर्य यह कि घनीभूत ब्रह्म, उसकी विचिकीर्षा, अव्यक्त (कारणबिन्दु), अव्यक्तरव
(परावार्), पश्यन्ती (कर्मबिन्दु रूप सामान्यस्पन्दवती), मध्यमा (नादरूप स्पन्दविशेषवती),
वैखरी (बीजरूपा अकारादिवर्णरूपा) ।
इस प्रकार नागेश का मत तन्त्रशास्त्र की वासना के आधार पर वाक्यपदीय कारिकाओं
का अर्थ अन्यथा करने वाला है। जहाँ वाक्यपदीयकार शब्द ब्रह्म को नित्य मानते हैं
तथा जगत् को शब्द ब्रह्म का विवर्त मानते हैं वहाँ नागेश शब्द ब्रह्म को अनित्य मानते हैं
तथा प्रवाहनित्यता को ध्यान में रखकर वाक्यपदीय की 'अनादिनिधनं ब्रह्म' कारिका का
अन्यथा अर्थ करते हैं। इनका यह मत शैवागम के 'शिवदृष्टि' ग्रन्थ तथा बौद्धदर्शन के
तत्त्वसंग्रह ग्रन्थ में वैयाकरणमत के रूप में उद्धृत तथा स्वीकृत सिद्धान्त से भिन्न होने के
कारण तथा वाक्यपदीय के सर्वथा विपरीत होने के कारण असङ्गत है। यह अन्य ग्रन्थकार
(जैसे न्यायमञ्जरीकार जयन्त और शारदातिलक) के द्वारा ज्ञात वैयाकरण मत से
भी विरुद्ध है।

सिद्धान्तशैव, शांकर और वैयाकरण मत में भेद

सिद्धान्तशैव का मत है कि 'शिव और शक्ति (ज्ञानरूपा) एक तत्त्व, शिव की परिग्रह
शक्ति 'विन्दु' जो 'क्रियाशक्ति' भी कही जाती है द्वितीय तत्त्व, आत्मा तृतीय तत्त्व, इस प्रकार
तीन 'रत्न' हुए। विन्दु के दो भेद एक शुद्ध (महामाया) दूसरा अशुद्ध (माया)। विन्दु को
शक्ति का नाम मिलता है। उसे ही आश्रय बनाकर शिव शुद्धबिन्दु को क्षुब्ध करते हैं। उससे
शब्द और अर्थ सृष्टि की धारा उत्पन्न होती है। वह शब्दधारा क्रम से परा, पश्यन्ती,
मध्यमा और वैखरी के रूप में है फिर अशुद्ध विन्दु क्षुब्ध होकर अशुद्ध शब्द धारा उत्पन्न
करता है। वह भी क्रम से परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप है। इस प्रकार दोनों
प्रकार के बिन्दुओं से उत्पन्न धाराएँ जड हैं। उनका परिणाम वाणी भी जड है। उनका
अतिक्रम ही मोक्ष है। वाक् तादात्म्य मोक्ष नहीं है।' यह मत शैव सिद्धान्त के अष्टप्रकरण में
प्रतिपादित है। विशेष वहीं देखना चाहिए।
अभिनव गुप्त का मत है कि प्रकाश और विमर्श दो ही वस्तु हैं। प्रकाश ही शिव है
और विमर्श ही उसकी स्वातन्त्र्यशक्ति उमा कही जाती है। शिव भी प्रकाश के बिना
विमर्श और विमर्श के बिना प्रकाश नहीं रह सकता अतः दोनों एक ही हैं। इसलिए इन्हें

[ १६ ]
'अद्वैती' कहा जाता है। विमर्श को परावाक् और प्रकाश को अर्थ माना है। यही सिद्धान्त
कालिदास ने 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।'
में वर्णित किया है। जब सर्वस्वतन्त्र शिव अपनी स्वतन्त्र शक्ति का संकोच करते हैं तब 'मैं यह
जानता हूँ' भेद बुद्धि होती है। इस प्रकार स्वातन्त्र्य शक्ति रहित अंश जडवर्ग है और शक्ति
सहित अंश चेतन वर्ग है।
शांकरमत में विशेषता यह है कि 'प्रकाश को स्वप्रकाश मान लेने से कार्य चल जाता
है प्रकाशक के रूप में विमर्श मानना आवश्यक नहीं है। प्रकाश ही ब्रह्म है जो अनिर्वचनीय
अविद्या के द्वारा अनेक रूप में प्रतीत होता है।'
शब्द ब्रह्मावादियों का मत है कि विमर्श (पश्यन्ती) ही ब्रह्म है। वह अविद्या के द्वारा
अनेक रूप में भासित होता है।
इस प्रकार वैयाकरण के मत में पश्यन्ती वाक् ही शब्द ब्रह्म है और शब्द ब्रह्म में
तादात्म्य ही जीव का मोक्ष है। मुक्ति में भी शुद्धात्मना जीव की स्थिति रहती है।
सिद्धान्तशैव के मत में मोक्षदशा में अशुद्ध वाक् रूप बन्धन का अतिक्रम हो जाता है
और शुद्ध वाग् रूप का अनुगम रहता है इसलिए वह 'चित्' रूप में भासित होता है और
वाणी 'चिद्' रूप में प्रतीत होती है। वस्तुतः जीव का वाक् तादात्म्य नहीं होता।
वाणी के तीन भेद
वाणी के तीन भेद माने गए हैं पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। इन तीनों के भी तीन-तीन
भेद हैं, स्थूला, सूक्ष्मा और परा। इस प्रकार वाणी के नव भेद हुए। वर्ण विभाग रहित
स्वर प्रधान संगीत रूपा वाक् स्थूला पश्यन्ती, यही जिज्ञासा सहित सूक्ष्मा पश्यन्ती,
यही जिज्ञासा हीन संविद्रूपा परा पश्यन्ती। चर्म से जटिल मृदंग पर उत्पन्न ध्वनि रूप
स्थूला मध्यमा, यही बजाने की इच्छारूपा सूक्ष्मा मध्यमा, यही बजाने की इच्छा रहिता
और निरुपाधिक परा मध्यमा। पृथक्-पृथक विलक्षणता के कारण स्पष्ट व्यक्त वर्ण रूपा वाक्
स्थूला वैखरी। यही विवक्षा रूपा सूक्ष्मा वैखरी। यही विवक्षा रहित होने परसंविद्रूपा परा
वैखरी। इस प्रकार पश्यन्ती ही सूक्ष्मतर अवस्था में 'परा' वाक् भी कही जाती है।
तात्पर्य यह है कि एक बिन्दु में तीन रेखा डाल देने से भी मूलभूत बिन्दु एक ही है।
उस एक बिन्दु में पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी तीन रेखावें हैं और इन एक एक रेखाओं
में भी स्थूला, सूक्ष्मा और परा तीन रेखाएँ हैं। इस प्रकार नव वाणी बनती है जिनमें एक वह
अलग ही है जिनमें तीन तीन भेद के साथ तीनों वाणियाँ हैं अतः वह रूप दशम भेद है।
पूर्वोक्त नव और उनकी शरण तीन वाणियाँ इस प्रकार द्वादश भेद हुए। इन्हें द्वादशादित्यों
कहा जाता है और सूर्य भी कहा जाता है।
अत एव कहा है कि—
सर्वभूतान्तरचरः शब्दब्रह्मात्मको रविः।
भित्त्वा यं बोधखड्गेन निर्गच्छन्त्यविशङ्किताः॥
'समस्त प्राणियों के हृदय में विचरने वाला शब्दब्रह्म रूप सूर्य बोधरूप खड्ग से
जिसका भेदन कर निडर लोग निकल जाते हैं।' द्वादशादित्यों ही चिन्मरीचियाँ अथवा
सूर्य रश्मियाँ हैं। सूर्य ही समस्त अर्थों का प्रकाशक होने से शब्द ब्रह्मात्मक अथवा वेदात्मक
है। षोडशकला वाले पुरुष में १५ कलायें परिणामशालिनी हैं फिर भी सोलहवीं कला

चिकला और परिणाम की साक्षीभूता और परम अमृत रूप है। इसलिए इसका निरोध भी
सम्भव नहीं विनाश तो दूर की बात है।
सिद्धान्तशैवों का मत है कि परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नाम की चार वाणियाँ
हैं और ब्रह्म उनसे अलग है। पश्यन्ती आदि तीनों वाणियाँ परारूपा में परब्रह्म से संगत
होकर एक रूप में स्थिर हैं। फिर वाचस्पति परमेश्वर अपनी ज्योति से अपने से अभिन्न
वस्तु समुदाय को नित्य भासित करता है जिससे इच्छा उठती है और यही सृष्टिक्रम का
कारण बनता है।
नागेशभट्ट ने सिद्धान्तशैव के इसी मत और 'ए । वाङ्मूलचक्रस्था पश्यन्ती नाभि-
संस्थिता। हृदिस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा' इस तन्त्रशास्त्र के मत के आधार पर
वाणी के चार भेद परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी मान लिया जो वास्तव में व्याकरण
सिद्धान्त के विरुद्ध है। क्योंकि आचार्य भर्तृहरि ने 'वैखर्या मध्यमायाश्च पश्यन्त्याश्चैतदद्भु-
तम्। अनेकतीर्थभेदायास्त्रय्या वाचः परं पदम्' कारिका में वाणी के तीन ही भेद
स्वीकार किए हैं। 'सारस्वती सुषमा' के लेख में जिस विद्वान् ने 'स्वरूपज्योतिरेवान्तः
परावागनपायिनी' कारिका को वाक्यपदीय की मानकर प्रमाण के रूप में उपस्थित कर परा
वाणी को भर्तृहरि सम्मत कहने का दुःसाहस किया है उसने वाक्यपदीय को न देखकर ही
ऐसा किया है अतः हम इस विषय में कुछ नहीं कहेंगे।
जिन लोगों ने 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि' महाभाष्यस्थ मन्त्र की नागेश की
टीका के आधार पर वाणी के चार भेदों की कल्पना का समर्थन किया है उन्हें इसी मन्त्र का
प्रदीप देखना चाहिए, जहाँ कैय्यट ने लिखा है कि—
'चतुर्णां ( नामाख्यातोपसर्गनिपातानाम् ) पदजातानामेकैकस्य चतुर्थभागं
मनुष्या अवैयाकरणा वदन्ति।'
यद्यपि 'चतुर्णाम्' की व्याख्या 'नामाख्यानोपसर्गनिपातानाम्' इस मन्त्र की व्याख्या में
कैय्यट ने नहीं लिखा है तथापि 'चत्वारि शृङ्गा' मन्त्र की व्याख्या में भाष्यकार ने स्वयं कण्ठतः
'नामाख्यात' आदि की गणना की है, इस प्रकार नागेश की वाणी के चार भेद स्वीकार करने
वाला सिद्धान्त व्याकरण सिद्धान्त के सर्वथा विरुद्ध है।
हाँ, एक बात यह रह जाती है कि वे वाणी के चार भाग कौन हैं जिनमें अवैयाकरण केवल
चतुर्थ भाग बोलते हैं। इसका उत्तर दो अत्यन्त स्पष्ट हैं। एक तो यह कि अवैयाकरण
वाणी के उस रूप को जानते हैं जिसमें लोक व्यवहार होता है, शेष साधुत्वादि रूप नहीं
जानते। दूसरा उत्तर यह हो सकता है कि—
'त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुषः पादोऽस्येहा भवत् पुनः।
पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥'
इस मन्त्र में वर्णित ब्रह्म के चार अंश का जो विवेचन है वही शब्द ब्रह्मवादियों के मत
में सुस्थिर है।
यह वाक् संस्कृतरूप वाक् है जिसके ज्ञान से पुण्य होता है जिसका फल है 'एकः शब्दः
सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति।'
द्वितीय-काण्ड का प्रतिपाद्य विषय
हम यहाँ द्वितीय काण्ड के प्रतिपाद्य समस्त विषयों की चर्चा न करके केवल उसकी मुख्य
विचारधारा का निर्देश मात्र देना उपयुक्त समझते हैं।

[ २८ ]
प्रथम काण्ड में वाक्यस्फोट को ही मुख्य सिद्ध किया गया है किन्तु वाक्य का स्वरूप
क्या है इसका विवेचन द्वितीय काण्ड का मुख्यतया प्रतिपाद्य विषय है। वाक्यपदीय के
द्वितीय काण्ड के आरम्भ में वाक्य के विषय में विभिन्न दृष्टिकोणों की चर्चा की गई है जिनमें
मुख्य ये हैं।
वाक्य विचार
वाक्य दो प्रकार के हैं एक अखण्ड और दूसरा सखण्ड। अखण्ड पक्ष में वाक्य के तीन
भेद हैं। ( १ ) संघातवर्तिनीजाति, ( २ ) एक अनवयव शब्द और ( ३ ) बुद्ध्द्यनुसंहति।
सखण्ड पक्ष में पाँच भेद हैं ( १ ) केवल आख्यातशब्द, ( २ ) क्रम, ( ३ ) संघात, ( ४ )
आद्यपद, ( ५ ) पृथक् सर्वपद साकांक्ष। सखण्डपक्ष के पाँच भेदों में संघात और क्रम
अभिहितान्वयवाद पक्ष में और आख्यातशब्द, आद्यपद, पृथक् सर्वपद साकांक्ष तीन लक्षण
अन्विताभिधानवादपक्ष में हैं। इस प्रकार विभिन्न दर्शनों के आधार पर आठ प्रकार के
वाक्यों के लक्षण किए गए हैं। इसके बाद वार्तिककार और मीमांसकों के मत से वाक्य के
लक्षण कहे गए हैं।
वाक्यार्थ विचार
वाक्यार्थ का विचार अनेक पक्षों में किया गया है। जिनमें अभिहितान्वयवाद, अन्विता-
भिधानवाद और प्रतिभावाद मुख्य हैं। उपर्युक्त प्रथम दो वादों में अनेक प्रकार के दोषों का
उद्भावन करके प्रतिभा को ही वाक्यार्थ रूप में स्थिर किया गया है।
प्रतिभा का स्वरूप
वैयाकरणों के मत में प्रतिभा ही वाक्यार्थ है। नागेश ने भी मंजूषा में स्वीकार किया है'
कि 'प्रतिभा वाक्यार्थः' । वाक्यपदीयकार ने कहा है कि संघातवाचक शब्दों में नियत अंशों की
ही प्रतीति होती है। अतः कल्पित पदार्थों से सिद्ध प्रतिभा को ही वाक्यार्थ कहा गया है—
विच्छेदग्रहणेऽर्थानां प्रतिभान्यैव जायते । वाक्यार्थ इति तामाहुः पदार्थैरुपपादिताम् ॥
यह प्रतिभा प्रत्येक आत्मा के लिए भिन्न भिन्न सिद्ध है तथा 'वह उसका स्वरूप है' यह
ज्ञानकार भी दूसरे को नहीं समझाया जा सकता।
इदं तदिति सान्येषामनाख्येया कथञ्चन । प्रत्यात्मवृत्तिसिद्धा सा कर्त्रापि न निरूप्यते ॥
उसका यह स्वभाव है बिना विचार का अवसर दिये ही समस्त अर्थों का मेल कर देती
है इसलिये विषय में सर्वरूपता प्राप्त कर गई है।
उपश्लेषमिवार्थानां सा करोत्यविचारिता । सार्वरूप्यमिवापन्ना विषयत्वेन वर्तते ॥
चाहे किसी की भावना से अथवा शब्द द्वारा उत्पन्न हुई इस प्रतिभा का कोई भी व्यक्ति
कार्य के प्रकार निर्णय करने में अतिक्रमण नहीं करता ।
साक्षाच्छब्देन जनितां भावनानुगमेन वा । इतिकर्तव्यतायां तां न कश्चिदतिवर्तते ॥
समस्त प्राणी इसी ( प्रतिभा ) को प्रमाण मानते हैं और मनुष्यों की भाँति पशु और
पक्षियों के भी समस्त कार्यों का आरम्भ प्रतिभा ही करती है ।
प्रमाणत्वेन तां लोकः सर्वः समनुपश्यति । समारम्भाः प्रतीयन्ते तिरश्चामपि तद्वशात् ॥
यह सर्व प्राणियों की सिद्धि है जैसे किन्हीं द्रव्यों के परिपाक के साथ ही बिना किसी-

[ १६ ]
प्रयत्न के मादकता आदि आ जाती है। वैसे प्रत्येक व्यक्तियों के नियत संस्कार से जन्य
प्रतिभा भी प्रतिभा वालों के विकसित होने में यत्नान्तर की अपेक्षा नहीं करती।
यथा द्रव्यविशेषाणां परिपाकैरयत्नजाः। मदादिशक्तयो दृष्टाः प्रतिखास्तद्वतां तथा ॥
प्रतिभा ही एक ऐसी वस्तु है जो समय-समय पर स्फुरित होती रहती है। वसन्त में
कोयल के मीठे शब्द स्वयं हो जाते हैं, पक्षियों को घर बनाने की शिक्षा भी स्वयं आ जाती
है। किसी प्राणी को किसी आहार के प्रति प्रीति, दूसरे को द्वेष, जैसे ऊँट को आम के पल्लव से
द्वेष और नीम के पल्लव से प्रीति है। मनुष्य को बड़े प्रयत्न पर तैरना आता है किन्तु भैंस के
बच्चे जन्म लेते ही तैरने लगते हैं।
इस प्रकार यह मानना पड़ता है कि समस्त प्राणियों की समस्त क्रियायें प्रतिभा के ही
द्वारा हो रही हैं। प्रतिभा का कारण भी शब्द ही है। हाँ; यह भेद हो सकता है कि किसी
अवसर पर इस जन्म का अनुभूत शब्द प्रतिभा का कारण बने और किसी अवसर पर
पूर्वजन्म का अनुभूत शब्द प्रतिभा का कारण बने।
वाक्यार्थ प्रतिभा है यह पक्ष इस प्रकार का उपस्थित किया गया है जिससे व्याकरण के
सिद्धान्त की नींव दृढ़ हो जाती है। 'सर्वे सर्वार्थवाचकाः' सिद्धान्त उसी समय पुष्ट हो
जाता है जब हम स्वीकार कर लेते हैं कि 'प्रतिभा' में जितने अर्थ उपस्थित हैं सब उस शब्द
के अर्थ हैं क्योंकि प्रतिभा का कारण वह शब्द है जिससे विभिन्न प्रकार के अर्थों का प्रतिभान
हुआ है। मन्त्रों के जप में भी ध्यान का यही महत्त्व है कि आराधक मन्त्र के अर्थ का ध्यान
करता हुआ अपने ध्यान में स्थित आकार वाले देवता को उस योग्य साक्षात् करे।
अस्तु प्रतिभावाद के स्वीकार कर लेने से ही वैयाकरणों का एक-वृत्तिवाद भी समन्वित
हो जाता है। इन्हें लक्षणा अथवा व्यञ्जना भी सिद्धान्ततः नहीं मानना पड़ता। जब किसी
शब्द की विभिन्न आनुपूर्वी से विभिन्न अर्थों की उपस्थिति होती है तब कोई कारण नहीं कि
मुख्यार्थ और अमुख्यार्थ का विवेचन किया जाय तथा वाक्यार्थ बोध के लिये लक्षणा माना
जाय। इसी प्रकार व्यञ्जना भी मानने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब समस्त अर्थ
शब्दजन्या प्रतिभा से लभ्य हैं तब तो सब अर्थ समान रूप से प्रतिभा ही हैं, उनमें शक्ति,
लक्षणा और व्यञ्जना का भेद स्वीकार करना अयोग्यता ही है। अतः यदि किसी ने किसी
टीका में यह लिख दिया हो कि वैयाकरणों के मत में तीन वृत्तियाँ हैं शक्ति, लक्षणा और
व्यञ्जना' तो यह निश्चय जान लेना चाहिए कि इसे व्याकरण के मूल सिद्धान्त का परिज्ञान
नहीं है।
हाँ, एक बात है, शब्दशास्त्र में दो पहलू हैं एक सम्यग्ज्ञान और दूसरा सम्यक् प्रयोग।
व्याकरण द्वारा कृत्रिम उपायों से सम्यग्ज्ञान शब्दसाधुत्वज्ञान होता है अर्थात् शब्द के व्याव-
हारिक रूप से शब्द के पारमार्थिक रूप का प्रत्यक्ष होता है। किन्तु सम्यक् प्रयोग तो
पारमार्थिक नहीं शुद्ध व्यावहारिक ही है तथा व्यवहार में किसी शब्द की शक्ति नियत है फिर
व्यवहार में मुख्यार्थ बाध आदि के रहने से किसी रूप में तीन अथवा चार वृत्तियाँ भी मान्य
होती ही हैं।
हम तो यह मानते हैं कि 'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधु-
ग्भवति' मन्त्र के सम्यग्ज्ञान का शास्त्र व्याकरण और सम्यक् प्रयोग का शास्त्र साहित्य है।
अत एव इसी मंत्र को आधार मानकर दोनों शास्त्र अपनी उपादेयता भी सिद्ध करते हैं।

[ २० ]
इस प्रकार वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड में वाक्य और वाक्यार्थ के विषय में जितने भी
तर्क उपस्थित हुए हैं अथवा हो सकते हैं सब पर संक्षिप्त विचार किया है । पुण्यराज ने इस
काण्ड की टीका के अन्त में कारिकाबद्ध विषयानुक्रमणिका लिखी है जिसे हम यहाँ
नहीं दे रहे हैं।
तृतीय काण्ड का प्रतिपाद्य विषय
वाक्यपदीय का तृतीय काण्ड जो प्रकीर्ण काण्ड भी कहा जाता है उस पर विशेष
विवेचन की आवश्यकता नहीं है केवल उसके प्रकरणों का निर्देश कर देने से इस ग्रन्थ को
देखने के प्रति रुचि जाग उठेगी और प्रतिपाद्य विषयों पर विचार करने का दृष्टिकोण बनेगा ।
अतः मैं यहाँ केवल प्रकरणों की सूची मात्र दे रहा हूँ ।
१. जातिसमुद्देश, २. द्रव्यसमुद्देश, ३. सम्बन्धसमुद्देश, ४. द्रव्यलक्षणसमुद्देश, ५. गुण-
समुद्देश, ६. दिक्समुद्देश, ७. साधनसमुद्देश (कारकविचार), ८ क्रियासमुद्देश, ९. कालसमुद्देश,
१०. पुरुषसमुद्देश, ११. संख्यासमुद्देश, १२. उपग्रहसमुद्देश, १३. लिंगसमुद्देश, १४. वृत्ति-
समुद्देश । यह समुद्देश बड़ा तो है किन्तु वृत्तियों का रमणीय विशद विवेचन इसे
महत्त्वशाली बनाए हुए है ।
इस काण्ड में लक्षणसमुद्देश और बाधासमुद्देश नाम के दो प्रकरण अनुपलब्ध हैं जिनकी
चर्चा हमने पहले सप्रमाण की है ।
विजयदशमी }
२०१८ विक्रमी } रामगोविन्द शुक्ल

विषय-सूची
कारिका १-४ ( ब्रह्म का स्वरूप )
ब्रह्म के स्वरूप का निरुपण, एक ब्रह्म की शक्तिगतभेद से विभिन्नता, ब्रह्म
की कालशक्ति, एक ही ब्रह्म भोक्ता, भोक्तव्य और भोगरूप में स्थित है ।
कारिका ५-१० ( वेद ब्रह्म-प्राप्ति का उपाय और ब्रह्म की प्रतिमा )
ब्रह्म प्राप्ति का उपाय वेद, वेद की अनेक शाखायें, वेद की महिमा,
वेदों से स्मृति प्ररूपन, वेदों से दर्शन शास्त्र और उनमें परस्पर भेद, सत्य
विद्या क्या है, वेद से ही विभिन्न विद्याओं का उद्गम ।
कारिका ११-२२ ( वेद के प्रधान अंग व्याकरण का प्रयोजन )
वेद का प्रधान अंग व्याकरण, व्याकरणाध्ययन के रक्षा-ऊह-आगम-
लघु-असंदेह पाँच प्रयोजन, व्याकरण का मोक्ष द्वार होना, शक्तिग्राहक व्याकरण,
मोक्ष का प्रथम द्वार व्याकरण, व्याकरणज्ञान से आत्मज्ञान, वैकृतध्वनिरूप
अन्धकार में शुद्ध ब्रह्म का भास्वत् स्वरूप, स्फोटरूप ब्रह्म में अक्षरों की प्रतीति,
वेदों में विभिन्नरूप से ज्ञात ब्रह्म की व्याकरण द्वारा प्राप्ति ।
कारिका २३-२९ ( शब्द की नित्यता ही व्याकरण निर्माण में हेतु )
शब्द-अर्थ और सम्बन्ध की नित्यता, साधु शब्दों का ज्ञान करना लक्ष्य,
साधु शब्दों में धर्मजनकता, नित्यशब्दवादियों के मत में कूटस्थनित्यता और
अनित्यशब्दवादियों के मत में प्रवाहनित्यता कथन, नित्य व्यवस्था
निरर्थक नहीं ।
कारिका ३०-३४ ( अनुमान से अतिरिक्त आगम प्रमाण की सिद्धि )
साधुत्वज्ञान के लिए आगम की आवश्यकता, तर्क धर्ममार्ग का बाधक नहीं,
अवस्था-देश और काल के भेद से शक्ति में भेद, अनुमान से ही वस्तुसिद्धि
असम्भव, शक्ति के प्रतिबन्धक होनेके कारण भी अनुमान वस्तुसिद्धि में सहायक
नहीं, तर्क से सिद्ध भी वस्तु कुशल विद्वान् के तर्कों से असिद्ध ।
कारिका ३५-३६ ( अनुमान से अतिरिक्त अभ्यास और अदृष्ट
प्रमाण की सिद्धि )
अनुमान से भिन्न अभ्यास और अदृष्ट पृथक् प्रमाण ।
कारिका ३७-४३ ( वेदमूलक आर्ष आगम की श्रेष्ठता )
ऋषियों का प्रत्यक्ष भी अनुमान से बाधित नहीं, ऋषि वाक्यों पर जनता
का विश्वास, ऋषि के वचन पर सबका विश्वास, आगम के विश्वास पर चलने

[ २ ]
बालों को तर्क वाद से हटाया नहीं जा सकता, केवल अनुमान को प्रमाण
मानने से धोखा अवश्य, तर्कों की अव्यवस्था और आगमों की श्रेष्ठता के कारण
ही व्याकरण की रचना ।
कारिका ४४-५० (शब्द के दो भेद)
शब्द के निमित्त (स्फोट) और प्रत्यायक (वैखरी) दो भेद, कार्यकारण
में भेदवादियों का मत, कार्यकारण में अभेदवादियों का मत, निमित्त (स्फोट)
विभिन्न ध्वनियों का कारण, स्फोट की एकता में भी विभिन्न ध्वनि की प्रतीति,
अक्रम स्फोट की सक्रम प्रतीति स्थानजन्य है, नाद के धर्म का स्फोट में
आरोपित होने का प्रकार, स्फोट की स्वप्रकाशता ।
कारिका ५१-५५ (शब्द में अनेक धर्म समावेश)
शब्द के दोनों भेदों की उदाहरण द्वारा सिद्धि, शब्द का अर्थाभिधान
प्रकार, शब्द की अर्थ की भाँति क्रियारूपता निषेध, शब्द की ग्राह्य और ग्राहक
रूप में स्थिति ।
कारिका ५६-५७ (बोधकत्व निर्णय)
ज्ञात शब्द ही बोधक, अज्ञात शब्द में बोधकत्व का निषेध ।
कारिका ५८-६९ (स्वं रूपं की दूसरी व्याख्या से जाति-
व्यक्तिभेद की कल्पना)
एक ही शब्द दो रूप में गृहीत होने पर कार्य में विरोध नहीं, उच्चरित
शब्द कार्यभाक् नहीं, इसमें कारण, व्यक्तिसंज्ञापक्ष और व्यक्तिसंज्ञीपक्ष ।
कारिका ७०-७२ (मीमांसकों के मत से शब्द का एकत्व)
शब्द के एकत्ववाद और नानात्ववाद की कल्पना, मीमांसकों के मत से
शब्द की एकता का वर्णन, वर्ण के अतिरिक्त वाक्य और पद की अस्वीकृति ।
कारिका ७३-७४ (वैयाकरण मत से वाक्य का एकत्व और व्यवहार
वैयाकरणों के मत से वाक्य का स्वरूप, पाणिनीय व्याकरण में एकत्व
और नानात्ववाद में व्यवहार ।
कारिका ७५-७७ (स्फोट में प्राकृतध्वनि के भेद की ही प्रतीति)
नित्य स्फोट में कालभेद नहीं फिर भी श्रुतिभेद की उपपत्ति, ध्वनि के दो
भेद, प्राकृतध्वनिकाल का स्फोट में आरोप, श्रुतिभेद में वैकृतध्वनि कारण ।
कारिका ७८-८० (ध्वनि से स्फोट की प्रतीति)
ध्वनियों से स्फोट की उपलब्धि में निमित्त बनने के लिए तीन मत ।
कारिका ८१-८४ (ध्वनि की अभिव्यक्ति में तीन मत)
ध्वनि की अभिव्यक्ति में तीन मत । अन्यध्वनि की सहायता से स्फोट
ग्रहण, उदाहरण, स्पष्टीकरण ।

[ ३ ]

कारिका ८५-८७ ( वाक्य में पद और वाक्य की प्रतीति असत् )
वाक्य में पद और वर्ण की प्रतीति एक उपाय, पद और वाक्य के भेद की
प्रतीति भी एक उपाय, उदाहरण ।
कारिका ८८-९२ ( क्रम से वर्ण, पद और वाक्य ग्रहण का कारण )
वाक्य में पदादि प्रतीति का कारण, उदाहरण, क्रम से वर्ण पद ग्रहण के
द्वारा बुद्धि से वाक्य ग्रहण, बुद्धि क्रम नियत ।
कारिका ९३-९४ ( स्फोट पर अनेक वाद )
जातिस्फोट वाद, व्यक्तिस्फोटवाद, एक नित्य शब्द तत्त्ववाद ।
कारिका ९५-१०१ ( स्फोट में ध्वनिकृत काल भेद की प्रतीति )
ध्वनियों के अभिव्यंजकत्व पक्ष में स्फोट के अनित्यत्व आदि दूषणों का
परिहार, ध्वनि और स्फोट के भिन्न-भिन्न देश में रहने पर भी व्यङ्ग्य व्यञ्जक
भाव बनना, व्यङ्ग्य व्यञ्जक के लिए योग्यता भी नियत, व्यञ्जक की
अनित्यता व्यंग्य में नहीं, उदाहरण, ध्वनिगत काल भेद का स्फोट के काल
भेद में कारण कथन ।
कारिका १०२-१०६ ( स्फोट और ध्वनि का स्वरूप परिचय )
स्फोट और ध्वनि के स्वरूप, स्फोट काल की एकता, उदाहरण, नित्यपक्ष में
समाधान ।
कारिका १०७-११२ ( शब्द के विषय में मतभेद )
शब्द के विषय में तीन भेद, शिक्षाकार का मत, जैनियों का मत, महाभा-
ष्यकार का मत ।
कारिका ११३-११७ ( ज्ञान के शब्दभावापत्ति में तीन मत )
एक मत में ज्ञान के शब्द रूपता में परिणत होने का क्रम, दूसरा मत,
तीसरा सिद्धान्त मत ।
कारिका ११८-१२४ (जगत् में सर्वत्र शब्द रूपता का अनुगम)
शब्द को जगत्कारण मानना, सर्वत्र अर्थों का शब्द से जन्म, शब्द के
विवर्त, जगत् की समस्त प्रवृत्ति के मूल में शब्द, शब्द के उच्चारण में होने वाले
प्रयत्नों का कारण शब्द, समस्त ज्ञान में शब्द का अनुगम, वाणी के निकल
जाने पर अवबोध का अभाव ।
कारिका १२५-१२७ ( सर्वत्र वाग्रूपता का अनुगम )
समस्त विचार और कलायें शब्द जन्य, प्राणियों में जब तक वाग्रूप
का अनुगम तभी तक चेतना, वाणी ही प्रेरक ।

[ ७ ]
कारिका १२८-१३१ ( शब्द ही सर्वत्र व्यापक परमात्मा )
स्वप्न में भी वाग्रूपता का अनुगम, सब जगत् वाणी का ही विकार इस पक्ष
का समर्थन, शब्द ही पुराण प्रसिद्ध परमात्मा ।
कारिका १३२ ( ब्रह्म प्राप्ति का उपाय )
शब्द का सम्यक् ज्ञान ही ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय और शब्द के तत्त्व का
ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति का साधन ।
कारिका १३३ ( वेद मूलक होने से व्याकरण प्रमाण )
मनुष्य निर्मित भी व्याकरण वेद मूलक होने से प्रमाण है ।
कारिका १३४-१३५ ( वेद ही धर्म, आचार और आगम का मूल )
स्मृतियों के अभाव में आचार भी धर्म का मूल, समस्त आगम वेद मूल
होने से ही प्रमाण ।
कारिका १३६-१३८ ( वेदमूलक तर्कशास्त्र आवश्यक )
आगमों के वेदमूलक होने पर भी तर्कशास्त्र की अपेक्षा, शुष्कतर्क की
हेयता ।
कारिका १३९-१४२ ( साधुशब्द ही पुण्यजनक )
साधु और असाधु शब्दों से अर्थबोधकता की भाँति धर्मजनकता का निषेध ।
कारिका १४३ ( वाणी के समस्त रूप व्याकरण के लक्ष्य )
वाणी के तीन भेद । व्याकरण द्वारा तीनों का प्रतिपादन ।
कारिका १४४-१४६ (जगत् के प्रलय और नित्यपक्ष में वेद का प्रामाण्य)
शब्दों की साधु असाधु व्यवस्था भी ऋषि दृष्टित, मीमांसक के मत में वेद
प्रामाण्य, प्रलयवादी के मत में वेद प्रामाण्य ।
कारिका १४७-१५६ ( अपभ्रंश के विभिन्न इतिहास )
व्याकरण भी एक स्मृति, अपभ्रंश के लक्षण, शब्द किसी नियत अर्थ में ही
साधु, असाधु से परम्परया बोध, असाधु के लक्षण, अपभ्रंश की उत्पत्ति
का इतिहास।
ख

पि वागीशतामुपैति".
In line 18, it's the same idea: by remembering him, mutes become masters of speech!
"स्मरणाद् यस्य वागीन्द्रतां मूकाः प्रतिपेदिरे"?
If it's:
स्म-र-णाद् य-स्य वा-गीन्-द्र-तां मू-काः प्र-ति-पे-दि-रे
Wait! That would be:
स्म(1) र(2) णाद्(3) य(4) स्य(5) वा(6) गीन्(7) द्र(8) तां(9) मू(10) काः(11) प्र(12) ति(13) पे(14) दि(15) रे(16) = 16 syllables!
A full half-verse (ardha-shloka) without division!
Wait! 16 syllables total!
1 2 3 4 5 6 7 8 | 9 10 11 12 13 14 15 16:
स्म(1) र(2) णाद्(3) य(4) स्य(5) वा(6) गीन्(7) द्र-(8) | तां(9) मू(10) काः(11) प्र(12) ति(13) पे(14) दि(15) रे(16

"? No, why would it be "अक्षरस्य"?
Wait, what if it is:
"अक्षरम्—अविभक्तककारादिवर्णरूपाया"?
No, look:
यद् अक्षरम्—
Then:
अ (a)
क्ष (ksha)
र (ra)
Then: स्य (sya)??
Wait, could it be:
"अक्षरम्—अक्षरं न क्षरतीति"? No.
Let's look really closely at:
यद् अक्षरम्—अक्षरस्य विभक्तककारादिवर्णरूपाया
Wait, could it be "अक्षरस्य विभक्तककारादिवर्णरूपाया"?
Wait, in Hindi translation (line 18):
"जो (ककारादिरूप) वर्णोंका कारण होते हुए भी"
"वर्णों का कारण" = ककारादिवर्णरूपाया वैखर्या वाचो निमित्तम्!
And in Sanskrit:
"यद् अक्षरम्—अक्षरस्य विभक्तककारादिवर्णरूपाया वैखर्या वाचो निमित्तं, सत्"
Wait, why "अक्षरस्य"?
Wait! Could it be: "अक्षरम्—अक्षरं, विभक्तककारादिवर्णरूपाया वैखर्या वाचो निमित्तं सत्"?
Look at the letter after 'र':
Wait! Is it 'स्य'?
Look:
अ - क्ष - र - म् - ?
Wait, it has a halanta 'म्'?

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्यायोपेतम् ३
विभक्ताकारादिवर्णरूपा वैखरी वागुच्यते । ततः सैव बाह्यार्थवासनया अविद्यारूपया
क्रमेण घटपटाद्याकारैर्विवृत्ता चक्षुरादिना गृह्यते इति । अयमेवार्थः—
इत्याहुस्ते परं ब्रह्म यदनादितथाऽव्ययम् । तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती परा हि वाक् ॥
स एवात्मा सर्वदेहव्यापकत्वेन वर्तते । अन्तः पश्यद्वपुस्तस्यैव चिद्रूपत्वमरूपकम् ॥
तावन्मात्रपरा काष्ठा यावत्पश्यन्त्यनन्तकम् । अक्षादिवृत्तिभिर्हीनं देशकालादिशून्यकम् ॥
सर्वतः क्रमसंहारमात्रमाकारवर्जितम् । ब्रह्मतत्त्वं परा काष्ठा परमार्थस्तदेव सः ॥
आस्ते विज्ञानरूपत्वे स शब्दोऽर्थविवक्षया । मध्यमा कथ्यते सैव बिन्दुनादमयक्रमात् ॥
संप्राप्ता वक्त्रकुहरं कण्ठादिस्थानभागशः । वैखरी कथ्यते सैव बहिर्वासनया क्रमात् ॥
घटादिरूपैर्व्यक्ता गृह्यते चक्षुरादिना ।

: "कस्थितिविशेषः इति तदर्थः ।"
Wait: "व्यञ्जकस्थितिविशेषः" or "व्यङ्ग्यस्थितिविशेषः"?
Look at line 31: व्य-ञ्ज-
Line 32: क-स्थि-ति-वि-शे-षे-ण? Or क-स्थि-ति-वि-शे-षः?
Let's look at line 32:
क-स्थि-ति-वि-शे-षः (or कस्थितिविशेषेण? It ends with ः: 'विशेषः इति तदर्थः ।')
Wait, let's look at line 32 start:
Is it 'क'?
Letter 1: looks like 'क' or 'कप्र'? No, line 31 ends with hyphen:
"विभावादिभिर्व्यञ्ज-"
Line 32 starts with:
"कस्थितिविशेषः इति तदर्थः ।"
Wait, why does it look a bit blurred/garbled?
Wait, is it "कस्थिति-"?
Let's look at the characters:
क, then 'स्थि' (स with थ inside, i-matra), then 'ति' (त with i-matra), then 'वि' (व with i-matra), then 'शे' (श with e-matra), then 'षः' (ष with visarga).
Yes! "कस्थित

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ५

अत एव शान्तरक्षितेन अनादिनिधनमिति कारिकामर्थतोऽनुवदता विवर्त-
पदमपहाय परिणामपदमेव प्रयुक्तम् । तथा हि—
नाशोत्पादसमालीढं ब्रह्म शब्दमयं च यत् ।
यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते ॥ इति ।
विवर्तपदेन परिणाम एवाभिप्रेतो वाक्यपदीयकारस्यापि 'शब्दस्य परिणामोऽय-
मित्याम्नायविदो विदुः' इति अग्रिमकारिकादर्शनावदगम्यते ।
विवर्ततेऽर्थभावेन इत्यस्य 'एकस्य तत्त्वादप्रच्युतस्य भेदानुकारेणासत्याविभक्ता-
न्यरूपोपग्राहिता विवर्त' इति टीकादर्शनात् शब्दस्य विवर्तोऽर्थो न परिणाम इत्य-
वगम्यते । न्यायमञ्जर्यां शब्दविवर्तवादस्य शब्दपरिणामवादस्य च खण्डनदर्शना-
दुभयमपि वैयाकरणानामभिमतमित्यवगम्यते इत्यलमतिजल्पनेन ।
विवर्तपरिणामयोर्लक्षणे तु—'अत

एकमेव यदाम्नातं भिन्नं शक्तिव्यपाश्रयात् ।
अपृथक्त्वेऽपि शक्तिभ्यः पृथक्त्वेनेव वर्तते ॥ २ ॥
यत्—शब्दब्रह्म 'एकमेवाद्वितीयम्' 'अद्वैत एक एवाभवत्' 'सलिल एवैको
द्रष्टा' इत्यादिश्रुतिभिः एकमेवाम्नातं कथितं तत् शक्तिव्यपाश्रयात् शक्तीनां
घटपटादिविचित्रकार्यजननयोग्यतारूपाणां व्यपाश्रयात् आश्रयणात् शक्तिगतभेदा-
रोपादिति यावत् भिन्नं पृथग्रूपम् 'प्रणव पूर्वकस्त्रेधा व्यभवत्' इति श्रुतेः।
सलिलशब्देन ब्रह्म। प्रणवोऽत्र अविभक्तं ब्रह्म त्रेधा त्रिप्रकारेण--ऋग्यजुःसामरूपेण
व्यभवत विभक्तमभूदिति तदर्थः। तथा च ब्रह्मण एकत्वेऽपि तद्गतशक्तिवैचित्र्याद्
भेदमारोप्य विचित्रकार्यजनकत्वमिति भावः। नन्वेकस्य विभिन्नरूपताऽनुपपन्नेत्यत
आह—अपृथक्त्वेऽपीति। अपृथक्त्वेऽपि अभिन्नत्वेऽपि ब्रह्म शक्तिभ्यः
पृथक्त्वेनेव वर्तते शक्तिभेदमाश्रित्य पृथगिव भिन्नमिवावभासते न तु वस्तुतो
भिन्नमिति भावः। शक्तिभ्य इत्यत्र ल्यब्लोपे पञ्चमी तथा च शक्तीराश्रित्येति
तदर्थः। ननु ब्रह्मणो नानाकारावग्रहे एकत्वानुपपत्तिरिति चेन्न, वृक्षा इति एकस्या-
मुपलब्धौ नानावृक्षाकारावग्रहसत्त्वेऽपि यथा ज्ञानस्यैकत्वं नानुषपन्नं तद्वद् ब्रह्मणोऽ-
पीत्यदोषात्।
(वह एक और समस्त जगत् का कारण ब्रह्म (शब्द)) जो (एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म, आदि
श्रुतियोंमें) एक ही कहा गया है वह उस नित्य शक्तिका आश्रय है (जिससे घट-पट
आदि विचित्र प्रकारके भिन्न भिन्न कार्य और ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद रूपसे भिन्न भिन्न
रूपमें प्रकट होते हैं।) यद्यपि उस ब्रह्ममें वास्तविक भेद नहीं है फिरभी शक्तिकी विचित्रतासे
भेद दिखाई पडता है।
एतदुक्तं भवति—आवर्तबुद्बुदतरङ्गादयो जलविकाराः परस्परं भिन्ना अपि
जलमेव न ततो व्यतिरिक्ताः तथा घटपटादयो विकाराः परस्परं भिन्ना अपि पृथिव्येव
न व्यतिरिक्ता इति घटपटादीनां भेदः पृथिव्या एकत्वमिव विलक्षणकार्योदयानूमीय-
मान वैलक्षण्याः शक्तयो ब्रह्मण एकत्वं न विरुन्धन्ति इति घटादिरूपेण भिन्नत्वेऽपि
पृथिव्याः स्वतोऽभिन्नत्ववत् शक्तिरूपेण ब्रह्मणो भिन्नत्वेऽपि स्वतोऽभिन्नत्वमिति
ब्रह्मणि नानात्वं काल्पनिकमेकत्वं च वास्तवमिति न तयोर्विरोध इति भावः ॥ २ ॥
जैसे भँवरी, बुलबुले और तरङ्ग परस्परमें भिन्न हैं फिरभी सब जल हैं। घट पट आदि
परस्पर भिन्न हैं फिर भी सब पृथिवी हैं। वैसे एक ही शब्द ब्रह्म शक्तिरूपसे भिन्न होते हुए भी
स्वतः अभिन्न है अर्थात् शब्द ब्रह्म का एक होना स्वाभाविक और भेद काल्पनिक ही है ॥ २ ॥
शब्दब्रह्मनिष्ठशक्तीनां कार्यवैचित्र्योपादकत्वे नित्यानां तासां सर्वदा सत्त्वात्
कुतो न सर्वदा सर्वकार्योत्पाद इत्यतो नियामकमाह—
इस नित्य शब्द और शब्दकी विचित्र कार्योंको उत्पन्न कर सकनेवाली शक्तिके नित्य होने
पर भी सदा सब कार्य नहीं होते। क्योंकि—

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्यायुतम् ।
अध्याहितकलां यस्य कालशक्तिमुपाश्रिताः ।
जन्मादयो विकाराः षड् भावभेदस्य योनयः ॥ ३ ॥
यस्य ब्रह्मणः अध्याहित आरोपितः कला भेदः (निमेषादिक्रियोपहितानानात्वं
यस्यास्ताम् अध्याहितकलां कालशक्तिं विधात्मा एक एव परं ब्रह्माभिधानं
सत्यो भावः स एव नानाविधकार्यवशत्तियाऽनन्यशक्तित्वेन व्यवह्रियते तस्य स्वात-
न्त्र्यशक्तिः कालस्ताम् उपाश्रिता जन्मादयः जायतेऽस्ति, विपरिणमते, वर्द्धते,
हसति, नश्यति इत्येवंरूपाः षड् विकारा भावभेदस्य योनयः कारणानि
भवन्ति । औपाधिकभेदमादायैकरस्यापि कालस्य क्रमरूपतया क्रमवत्कार्यजनकत्व-
मिति भावः ।
जिस ब्रह्मकी काल्पनिक भेदों वाली शक्ति कालशक्ति स्वतन्त्रशक्ति है (जिसमें निमेष पल-
घटी आदि की कल्पना की गई है और जिस शक्तिके कारण ब्रह्म अनन्यशक्तिमान् माना जाता
है।) उसीके अनुसार जन्म (जायते, अस्ति, विपरिणमते, वर्द्धते, हसति, नश्यति) आदि छः
प्रकारके विकार हैं जो भावों (पदार्थों) के भेदके (क्रमिक भेदके) कारण माने जाते हैं।
अयं भाव —सर्वाः कारणशक्तयः कालेन अनुज्ञाताः सद्यो जनयन्ति कार्यम्,
प्रतिबद्धाः सद्यो न जनयन्ति कार्यम्, हेमन्तादिकाले प्रतिबद्धाः वसन्तादिकाले अनु-
ज्ञायन्ते इति कालः स्वातन्त्र्यशक्तिः अन्यासां च कालपारतन्त्र्यम्, यथा धीवराः पक्ष्य-
न्तराणां ग्रहणाय सूत्रप्रतिबद्धान् पक्षिणश्चेष्टयन्ते तथा च ते सूत्रप्रतिबन्धादस्वतन्त्रा
इव भवन्ति तथेच्छायां तन्तुनाऽऽकर्षणात्। एवं कालसूत्रप्रतिबन्धात् पदार्थाः संकोच-
विकासलघुत्वगुरुत्वापत्तिवसावनवरतमनुभवन्ति। 'अतश्च कालसूत्रान्तर्गतं विश्वं ग्राहकालं
प्रसूयते' इति जायते इत्यवसीयते, प्रसूतमनुतिष्ठते इति अस्ति इति व्यपदिश्यते,
अवस्थितस्य विकारापत्तिरिति विपरिणमते, तच्च विपरिणमन्मुहूर्त्तमपि नावतिष्ठते
इति वर्धते यावदनेन वर्धितव्यं, ततोऽपचीयते मुहूर्तमप्यनवस्थानादेव ततः अव-
स्थितं कृतकरणीयं विनश्यति । तदुक्तं वाक्यपदीये—( का० ३ समु० ९ )
उत्पत्तौ च स्थितौ चापि विनाशे चापि तद्वताम् ।
निमित्तं कालमेवाहुरिभक्तेनात्मना स्थितम् ॥
तमस्य लोकयन्त्रस्य सूत्रधारं प्रचक्षते । प्रतिबन्धाभ्यनुज्ञाभ्यां तेन विश्वं विभज्यते ॥
यदि न प्रतिबध्नीयात् प्रतिबन्धं नोत्सृजेत् । अवस्था व्यतिकीर्येरन् पौर्वापर्यं विना कृताः॥
विशिष्टकालसम्बन्धो वृत्तिलाभाय कल्पते । शक्तीनां सम्प्रयोगस्य हेतुत्वेनावतिष्ठते ॥
स्थितिस्तस्यानुग्रहरूपैस्तैर्धर्मैः संसर्गिभिस्ततः। प्रतिबन्धस्तिरोभावः प्रहानमिति चात्मनः॥
प्रतिबद्धाश्च यास्तेन विश्वा विश्वस्य वृत्तयः। ताः स एवानुजानाति यथा तन्तुः शकुन्तिनः॥
विशिष्टकालसम्बन्धाल्लन्धपाकासु शक्तिषु ।
क्रियाभिव्यज्यते नित्या प्रयोगारूढेन कर्मणा ॥ इति ॥ ३ ॥

समस्त कारण शक्तियाँ कालकी आज्ञानुसार कार्य करती हैं और रोके जाने पर कार्य नहीं
करतीं। हेमन्त कालमें जिन्हें रोका गया है वे वसन्त कालमें आज्ञा पा जाती हैं। इसलिए
काल एक स्वतन्त्रशक्ति है। दूसरी शक्तियाँ कालके अधीन हैं। जैसे व्याध दूसरे पक्षियों को
पकड़नेके लिए एक पक्षीको सूत्रमें बाँधकर प्रेरित करते हैं वे पक्षी सूत्रमें बँधे रहनेके कारण
अस्वतन्त्र की तरह हैं। क्योंकि सूत्रके खींचने पर पुनः पकड़ लिए जाते हैं। वैसे कालरूपी
सूत्रमें बँधे हुए पदार्थ सङ्कोच और विकास रूपी उत्पत्ति और ध्वंसका सदा अनुभव करते हैं।
इसीलिए कालरूपी सूत्रमें बँधा हुआ विश्व काल आने पर जब प्रवृत्त होता है तब जायते कहा
जाता है, जब प्रसूत स्थित होता है तब अस्ति कहते हैं, जब विकार होता है तब विपरिणमते
कहते हैं, जब विपरिणमित रुक नहीं सकता तब वर्धते कहते हैं जब तक बढ़ता है जब हीण
होने लगता है तब ह्रसति कहते हैं और जब वह नष्ट हो जाता है तब नश्यति कहते हैं। यह
कालशक्ति एक होने पर भी काल्पनिक भेदों के कारण अनेक और क्रमवाली है। इसीलिए
क्रमसे कार्य उत्पन्न होता है, एक कालमें सब कार्य नहीं उत्पन्न होते ॥ ३ ॥
अभिन्नस्यापि ब्रह्मणः सर्वकार्यजनकत्वमुपपाद्य सांप्रतं सर्वव्यवहारहेतुत्वमुपपादयति-
एकस्य सर्वबीजस्य यस्य चेयमनेकधा ।
भोक्तृभोक्तव्यरूपेण भोगरूपेण च स्थितिः ॥ ४ ॥
सर्वबीजस्य यस्य एकस्य ब्रह्मणः इयं तत्त्वाभ्यात्वाभ्यामनिर्वोच्या ( ब्रह्म-
त्वेन ब्रह्मभिन्नत्वेन च वक्तुमशक्या ) शक्तिरूपा स्थितिः अनेकधा भोक्तृभोक्त-
व्यरूपेण भोगरूपेण च लोकव्यवहाराय प्रवर्तते । भोक्ता=पुरुषः, भोक्तव्याः=
विषयाः, भोगः=विषयोपभोगजन्यसुखदुःखाद्यनुभव इति विवेकः । तदुच्यते-
सर्वदाऽव्यभिचारम्भूतरूपमेकस्यैवेति निर्णयः । भावानामात्मभेदश्च कल्पना स्यादनर्थिका ॥
जो समस्त जगत्का कारण और एक है उसकी यह शक्तिरूपा स्थिति ( जो ब्रह्मरूप तथा
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